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सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

५४ सहजो बाई
अमर लोक पद फगुवा पैयै, जनम मरन बिपता दली१ ।
चरनदास गुरु किरपा कीन्ही, सहजो हिये आनँद रली ॥४॥
॥ राग काफी ॥
हरि हर जप लेनी औसर बीतो जाय ।
जो दिन गये सो फिर नहिं आवैं, कर बिचार मन लाय ॥
या जग बाजी साच न जानो, ता में मत भरमाय ।
कोइ किसी का है नहिं बौरै, नाहक लियो लगाय ॥
अंत समय कोइ काम न आवै, जब जम देहि बोलाय ।
चरनदास कहैं सहजो बाई, सत संगत सरनाय ॥
॥ राग बसंत ॥
आतम पूजा अधिक जान । सकल सिरोमन याहि मान ॥
बिस्तारो हित भवन२ माहिं । भरम दृष्टि जहँ आवै नाहिं ।
हिरदा कोमल ठौर लिया । कर बिचार जहँ धूप दिया ॥
या सेवा का दया मल । समता चंदन छिमा फूल ।
मीठे बचन सोइ बालभोग । निंदा झूठ तजो अजोग ॥
घंटा अनहद सुरत लाव । घट घट देखे एक भाव ॥
करौ सुखी सुख आप लेव । इस पूजा सों सुखी देव ॥
चरनदास गुरु दई मोहिं । हंस हंस जहँ जाप होहि ॥
इन्द्री मन बुध तहँ लगाव । कर सहजो बाई याको चाव ॥
( २ )
सो बसंत नहिं बार बार । तैं पाई मानुष देह सार ॥
यह औसर बिरथा न खोव । भक्ति बीज हिये धरती बोव ॥
सतसंगत को सींच नीर । सतगुरु जी सों करौ सीर ॥
नीकी बार बिचार देव । परन राख या कूँ जु सेव ॥
रखवारी कर हेत हेत । जब तेरी होवै जैत जैत ॥
(१) टरी । (२) अंतर, घट ।