सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
सहजो बाई का जीवन-चरित्र
सहजो बाई राजपूताना के एक प्रतिष्ठित धूसर कुल की स्त्री थीं जो परम भक्त हुईं और संत
मत के अनुसार साध गति को प्राप्त हुईं। इनका जीवन-चरित हमने भक्त-माल और उस प्रकार
की कई पुस्तकों में ढूँढ़ा परन्तु कहीं कुछ प्रमाणिक वृत्तान्त न पाया। उनकी बानी से इतना निश्चय
होता है कि वह सम्वत् १८०० में बर्तमान थीं और प्रसिद्ध महात्मा चरनदास जी की गुरुमुख चेली
थीं जो आप भी मेवात के एक धूसर कुल में प्रकट हुए थे और जिनके अनुयायी भारतवर्ष के देश-
देशान्तर में अब तक हजारों हैं, यद्यपि उनमें शब्द अभ्यासी और भेदी बिरले देख पड़ते हैं। सहजो
बाई की बानी से चरनदासजी के जन्म का समय भादों सुदी ३ मंगलवार संवत् १७६० बिक्रमी
प्रमान होता है।
सहजो बाई के विषय में कोई कोई चमत्कार के कौतुक प्रसिद्ध हैं परन्तु चूँकि उनका कहीं
प्रमान नहीं मिलता यहाँ लिखना उचित नहीं है। उनकी गहरी गुरुभक्ति और गति उनकी अति
कोमल, मधुर और हृदयवेधक बानी से जानी जा सकती है।
दयाबाई (जिनकी कोमल और मधुर बानी अलग छपी है) सहजो बाई की सजाती और
गुर-बहिन थीं।
अधम, एडिटर संतबानी पुस्तकमाला।
॥ सूचीपत्र ॥
सतगुरु महिमा का अंग १-३ | जन्म दशा २१-२४
हरि तें गुरु की विशेषता ३-४ | वृद्ध अवस्था २४-२६
गुरु मारग महिमा ४ | मृत्यु दशा २६-२७
गुरु चरन महिमा ४-५ | काल मृत्यु २७
गुरु आज्ञा ५-६ | अकाल मृत्यु २८-२६
गुरु-विमुख ६-७ | नाम का अंग २६-३२
गुरु शब्द ७ | नन्हा महा उत्तम का अंग ३२-३४
उपदेश गुरु भक्ति का ८ | प्रेम का अंग ३४-३५
गुरु महिमा ८-११ | अजपा गायत्री का अंग ३५
साधु महिमा ११-१३ | संत बैराग जगत मिथ्या का अंग ३५-३६
दुष्ट लक्षण १३ | सच्चिदानन्द का अंग ३६-३७
साधु लक्षण १३-१५ | नित्य अनित्य सांख्य मत का अंग ७-३८
द्वादस प्रकार के बचन साध के १५ | निर्गुन सर्गुन संशय निवारन भक्ति का अंग ३८-४१
द्वादस प्रकार के बचन दुष्ट के १६ | सोलह तिथि निर्णय ४१-४५
बैराग उपजावन का अंग १६-२० | सात बार निर्णय ४५-४७
कर्म अनुसार योनि २०-२१ | मिश्रित पद ४८-६२
सहजो बाई का सहज प्रकाश
सतगुरु महिमा का अंग
॥ दोहा ॥
कर जोरूँ परनाम करि, धरूँ चरन पर सीस ।
दादा गुरु सुकदेव जी, पूरन बिस्वा बीस ॥ १ ॥
परमहंस तारन तरन, गुरु देवन गुरु देव ।
अनुभै बानो दीजिये, सहजो पावै भेव ॥ २ ॥
॥ चौपाई ॥
नमो नमो गुरु देवन देवा । नमो नमो गुरु अगम अभेवा ॥
नमो नमो निरलम्ब निरासा । नमो नमो परमातम बासा ॥
नमो नमो त्रिभुवन के स्वामी । नमो नमो गुरु अंतरजामी ॥
नमो नमो गुरु पातक हरता । नमो नमो परायन करता ॥
गति मति छाके आनँद रूपा । नमो नमो गुरु ब्रह्म सरूपा ॥
नमो नमो मम प्रान पियारे । नमो नमो तिर्गुन तें न्यारे ॥
भक्ती ज्ञान जोग के राजा । सहजो के पुरवो सब काजा ॥
जो कोइ सरन तुम्हारी आयौ । तुरियातीत बिज्ञान बसायौ ॥ ३ ॥
॥ दोहा ॥
निर्मल आनँद देत हौ, ब्रह्म रूप करि देत ।
जीव रूप की आपदा, ब्याधा सब हरि लेत ॥ ४ ॥
॥ चौपाई ॥
नमो नमो सुकदेव गुसाईं । प्रकट करी भक्ती जग माहीं ॥
श्रीमतभागवत् भानु प्रकासा । पढ़ सुनि कटै तिमिर को फाँसा ॥
ज्ञान जोग की नौका कीन्ही । चरनदास केवट को दीन्ही ॥
बहुतक पापी जीव चढ़ाये । भवसागर सूँ पार लँघाये ॥
' is round and connects to the letter.
In line 16: "ह्वै दीपक" -> here 'दीपक' has a FULL arc connecting to the 'द'!
Why would line 16 have "दोपक" in the first half and "दीपक" in the second half?
"बिना लोय १ दोपक सिष परसैं । ह्वै दीपक तिनहूँ कूँ दरसैं ॥"
Wait! Could it really be printed as 'दीपक' but with a broken type?
Yes, Belvedere Press is famous for worn-out lead types where the slender top curve of 'ी' breaks off, leaving what looks like 'ो' or a stump!
Wait, but if it's broken type, what is the word? The word is "दीपक" (lamp)!
Wait, could it be "दोपक"? In Braj, is "दीपक" ever written "दोपक"? No! "दीपक" is always "दीपक" or "दीवा" or "दीवरा". "दोपक" does not exist in Hindi/Braj!
Wait, what about "तीजो"? In Braj, "तीजो" IS a real word (तीसरा, तीजा, तीजो)!
What about "जल-लीक"? "लीक" is a real word.
Wait, let's look at "दीपक" in line 8:
If a human reads the page, they see "दीपक" (or maybe broken type). Should I transcribe "दीपक
हरि तें गुरु की विशेषता ३
चौथी तेल बूँद जल माहीं। फैलत फैलत फैलत जाही ॥
छोटी से दीरघ परकासै। बरन बरन के रंग निकासे ॥
तीन बुद्धि जग में दरसावै। चौथौ बुद्धि कोइ बिरले पावै ॥
सहजो बुधि सब थोथी कहिये। गुरु की कृपा सबन में चहिये॥१०॥
हरि तें गुरु की विशेषता
॥ दोहा ॥
हरि किरपा जो होय तो, नाहीं होय तो नाहिं।
पै गुरु किरपा दया बिनु, सकल बुद्धि बहि जाहिं ॥११॥
॥ चोपाई ॥
राम तजूँ पै गुरु न बिसारूँ। गुरु के सम हरि कूँ न निहारूँ॥
हरि ने जन्म दियो जग माहीं। गुरु ने आवागवन छुटाहौं ॥
हरि ने पाँच चोर दिये साथा। गुरु ने लई छुटाय अनाथा ॥
हरि ने कुटँब जाल में गेरी। गुरु ने काटी ममता बेरी१ ॥
हरि ने रोग भोग उरझायौ। गुरु जोगो कर सबै छुटायौ ॥
हरि ने कर्म भर्म भरमायौ। गुरु ने आतम रूप लखायौ ॥
हरि ने मो सूं आप छिपायौ। गुरु दीपक दै ताहि दिखायो ॥
फिर हरि बंधमुक्ति२ गति लाये। गुरु ने सबही भर्म मिटाये ॥
चरनदास पर तन मन वारू। गुरु न तजूँ हरि कूँ तजि डारूँ॥१२॥
॥ दोहा ॥
सब परबत स्याही करूँ, घोलूँ समुँदर जाय।
धरती का कागद करूँ, गुरु अस्तुति न समाय ॥१३॥
॥ चोपाई ॥
गुरु की अस्तुति कहँ लौं कीजै। बदला कहा गुरू कूँ दीजै ॥
गुरु का बदला दिया न जाई। मन में उपजत है सकुचाई ॥
इन नैनन जिन राम दिखाये। बंधन कोटि काटि मुक्ताये ॥
(१) बेड़ी। (२) ऐसी मुक्ति जिसमें झीनी माया का बन्धन लगा रहता है।
४ सहजो बाई
अभय दान दीनन कूँ दीन्हे । देखत आप सरीखे कीन्हे ॥
गुरु को किरपा अपरम्पारै । गुन गावत मम रसना हारै ॥
सेस सहस मुख निस दिन गावै । गुरु अस्तुति का अन्त न पावै ॥
मौन गहूँ अस्तुति कहा करूँ । बार बार चरनन सिर धरूँ ॥
चरनदास महिमा अधिकाई । सबेस वारे सहजो बाई ॥१४॥
गुरु मारग
॥ दोहा ॥
गुरु मग दृढ़ पग राखिये, डिगमिग डिगमिग छाँड ।
सहजो टेक टरै नहीं, सूर सती ज्यों माँड ॥१५॥
॥ चौपाई ॥
गुरु के प्रेम पन्थ सिर दीजै । आगा पोछा कबहुँ न कीजै ॥
गुरु के पन्थ होय सो होई । मारग आन चलौ मत कोई ॥
गुरु के पन्थ पैज१ का पूरा । गुरु के पन्थ चलै सो सूरा ॥
गुरु के पन्थ चलै सो जोधा । गुरु के पन्थ चलै का बोदा ॥
गुरु के पन्थ नहीं ठग लागै । गुरु के पन्थ कपट भय भागै ॥
गुरु के पन्थ मुकित उजियारा । गुरु के पन्थ नहीं संसारा ॥
गुरु के पन्थ मिटै दुख दोई । गुरु के पन्थ महा सुख होई ॥
चरनदास कौ पन्थ दुहेला । गुरमुख चालै ताहि सुहेला ॥
गुरु के पन्थ चलै सतबादी । सहजो पावै भेद अनादी ॥१६॥
गुरु चरन
॥ दोहा ॥
अठसठ तीरथ गुरु चरन, परबी होत अखंड ।
सहजो ऐसा धाम नहिं, सकल अंड ब्रह्मांड ॥१७॥
सब तीरथ गुरु के चरन, नित ही परबी होय ।
सहजो चरनोदक लिये, पार रहत नहिं कोय ॥१८॥
(१) टेक ।
गुरु आज्ञा ५
॥ चौपाई ॥
सब तीरथ गुरु चरनन लारे। चरन बर्त दृढ़ सदा हमारे॥
चरन कँवल की निसदिन पूजा। परसूँ और देव नहिं दूजा॥
इष्ट हमारे गुरु के चरना। गुरु के चरन ध्यान हूँ करना॥
गुरु के चरन लगे सो तारे। गुरु के चरन प्रान सूँ प्यारे॥
आसा मनसा और करमना। गुरु के चरन प्रेम चित धरना॥
गुरु के चरन होय सो होना। हानि लाभ कै दुख सुख मरना॥
रनजीता¹ गुरु चरन तुम्हारे। जोवन प्रान अधार हमारे॥
गुरु के चरन मुक्ति फलदायक। सहजो गुरुके चरन सहायक ॥१९॥
॥ दोहा ॥
गुरु पग निश्चै परसिये, गुरु पग हिरदे राख।
सहजो गुरुपग ध्यान करि, गुरु बिन और न भाख ॥२०॥
॥ चौपाई ॥
गुरु के चरन कँवल चित राखूँ। आठसिद्धि नौ निधि सब नाखूँ॥
सकल पदारथ गुरु पग माहीं। गुरु पग परसे सब दुख जाहीं॥
गति मति पलटे गुरु पग परसे। गुरु पग परसे त्रिभुवन दरसै॥
गुरु पग परसे ब्रह्म विचारै। गुरु पग परसे माया छाँड़ै॥
गुरु पग परसे जोग जुगन्ता। गुरु पग परसे जीवन मुक्ता॥
गुरु पग परसे बन्धन छूटै। मोह ममत की फाँसी टूटै॥
गुरु पग परसे हरि पद पावै। रहै अमर ह्वै गर्भ न आवै॥
चरनदास पग महिमा भारी। बार बार सहजो बलिहारी ॥२१॥
गुरु आज्ञा
॥ दोहा ॥
गुरु आज्ञा दृढ़ करि गहै, गुरु मत सहजो चाल।
रोम रोम गुरु को रटै, सो सिष होय निहाल ॥२२॥
(१) चरनदास जी का घरऊ नाम ।
६ सहजो बाई
॥ चौपाई ॥
गुरु की अज्ञा दृढ़ करि गहिये। गुरु की अज्ञा ही में रहिये ॥
गुरु अज्ञा बिन काज न कीजै। हानि होय तो होने दीजै ॥
गुरु की अज्ञा बिघ्न न कोई। गुरु की अज्ञा गुरुमुख होई ॥
गुरु की अज्ञा भक्ति बढ़ावै। गुरु की अज्ञा पार लँघावै ॥
गुरु की अज्ञा सकल सिरोमन। गुरु की अज्ञा चलै सो हरिजन ॥
गुरु अज्ञा मानै सोइ साधू। गुरु अज्ञा पद भेद अगाधू ॥
जो कोइ गुरु की अज्ञा भूलै। फिर फिर कष्ट गर्भ में झूलै ॥
चरनदास गुरु अज्ञा पूरी। बिन अज्ञा करनी सब कूरी ॥
अज्ञाकारी गुरुमुख नीके। सहजो लोक भोग सब फीके ॥२३॥
गुरु बिमुख
॥ दोहा ॥
गुरु अज्ञा मानै नहीं, गुरुहि लगावै दोष।
गुरु निन्दक जग में दुखो, मुए न पावै मोष ॥२४॥
॥ चौपाई ॥
ऐसों का दरसन नहिं लीजै। चर्चा बात गोष्टि नहिं कीजै ॥
उनका संग करै जो कोई। बेमुख निगुरा निन्दक होई ॥
गुरु-दोषी की गति मति गाऊँ। अपने मनहीं कूँ समझाऊँ ॥
उनकी चौरासी नहिं छूटै। काल जाल जम जोरा लूटै ॥
फिर फिर जूनो संकट आवै। गर्भ बास में बहु दुख पावै ॥
जग में पात बगूला जैसे। जीवत प्रेत निसाचर ऐसे ॥
मन मैला तन सदा उदासी। गल में डिम्भ कपट की फाँसी ॥
सहजो तिन तें दूरहि भाजै। नाम लेत मम रसना लाजै ॥२५॥
॥ दोहा ॥
जो कुछ करै तो मनमुखी, मेटै गुरुमुख रीत।
भेद बचन समझै नहीं, चलै चाल बिपरीत ॥२६॥
गुरु शब्द ७
साध कहावै आप कूँ, चलै दुष्ट की चाल ।
बाद लिये फूला फिरै, बहुत बजावै गाल ॥२७॥
॥ चौपाई ॥
बेमुख बिषई ज्ञान उचारै । पाँचो जीत न मन कूँ मारै ॥
दारा सुत कूँ हरि गुरु जाने । तन मन विषय बास लिपटाने ॥
पाप पुन्य कूँ झूठ बतावै । परनारी परधन चित लावै ॥
महा अजोगी जोग न ठानै । छल बल झूठ कपट सिध मानै ॥
साध संत कूँ ठगिया जानै । राम भक्ति कूँ तुच्छ बखानै ॥
ऐसे अपराधी मति मारे । तृस्ना काम क्रोध के जारे ॥
डूबे लोभ लहर के माहीं । सुपने छिमा सील चित नाहीं ॥
हिंसा अंकुस लिये दुखदाई । मुख देखै नहिं सहजो बाई ॥२८॥
गुरु शब्द
॥ दोहा ॥
गुरू बचन हियरे धरै, ज्यों किर्पिन के दाम ।
भुमि गड़े माथे दिये, सहजो लहै तो राम ॥२६॥
॥ चौपाई ॥
गुरु के सब्द हिये बिच धारै । गुरुमुख गुर के सब्द सम्हारै ॥
तीन लोक जम जोरा लूटै । गुरु के सब्द बिना नहिं छूटै ॥
मोह नींद में सब नर पागे । गुरु के सब्द बिना नहिं जागे ॥
गुरु के सब्द स्रवन जो जावै । छूटै कुबुधि परम गति पावै ॥
गुरु के सब्द प्रेम उजलावैं । गुरु के सब्द हरि आन मिलावै ॥
गुरु के सब्द जीव बुधि नासैं । गुरु के सब्द अभय पद भासैं ॥
गुरु के सब्द राह सोइ चलना । बेद पुरान कहा लै करना ॥
चरनदास गुरु सब्द तुम्हारे । हमरे भर्म फन्द सब जारे ॥
गुन सब गुरु के बचनै माहीं । सहजो सिष जो बिसरै नाहीं ॥३०॥
८ सहजो बाई
उपदेश गुरुभक्ति का
॥ दोहा ॥
सिष का माना सतगुरु, गुरु झिड़कै लख बार ।
सहजो द्वार न छोड़िये, यही धारना धार ॥३१॥
गुरु दरसन कर सहजिया, गुरु का कीजै ध्यान ।
गुरु की सेवा कीजिये, तजिये कुल अभिमान ॥३२॥
सतगुरु दाता सर्व के, तू किर्पिन कंगाल ।
गुरु महिमा जानै नहीं, फस्यौ मोह के जाल ॥३३॥
गुरु सूं कछु न दुराइये, गुरु सूं झूठ न बोल ।
बुरी भली खोटी खरी, गुरु आगे सब खोल ॥३४॥
सहजो गुरु रच्छा करैं, मेटैं सब दुख दुन्द ।
मन को जानैं सब गुरु, कहा छिपावै अन्ध ॥३५॥
गुरु महिमा
॥ दोहा ॥
सहजो कारज जगत के, गुरु बिन पूरे नाहिं ।
हरि तो गुरु बिन क्यों मिलैं, समझ देख मन माहिं ॥३६॥
परमेसर सूं गुरु बड़े, गावत बेद पुरान ।
सहजो हरि के मुक्ति है, गुरु के घर भगवान ॥३७॥
अष्टादस और चार षट, पढ़ि पढ़ि अर्थ कराहिं ।
भेद न पावैं गुरु बिना, सहजो सब भर्माहिं ॥३८॥
सकल बिकल सब छोड़ कर, गुरु चरनन चित लाव ।
सहजो निस्चै हरि जपो, बहुर न ऐसो दाव ॥३९॥
दीपक ले गुरु ज्ञान को, जगत अँधेरे माहिं ।
काम क्रोध मद मोह में, सहजो उरझै नाहिं ॥४०॥
सहजो गुरु परताप सूं, होय समुन्दर पार ।
बेद अर्थ गूँगा कहै, बानो कितइक बार ॥४१॥
प्रथम भाग: साखी संग्रह (गुरु-महिमा, नाम-सुमिरन व साधु-लक्षण)
गुरु महिमा ६
सहजो सतगुरु के मिले, भये और सूँ और ।
काग पलट गति हंस ह्वै, पाई भूली ठौर ॥४२॥
सहजो यह मन सिलगता, काम कोध की आग ।
भली भई गुरु ने दिया, सील छिमा का बाग ॥४३॥
निस्चै यह मन डूबता, मोह लोभ की धार ।
चरनदास सतगुरु मिले, सहजो लई उबार ॥४४॥
ज्ञान दीप सतगुरु दियौ, राख्यो काया कोट ।
साजन बसि दुर्जन भजे१, निकस गई सब खोट ॥४५॥
सहजो गुरु दीपक दियौ, रोम रोम उजियार ।
तीन लोक दृष्टा भये, मिट्यौ भरम अँधियार ॥४६॥
सहजो गुरु दीपक दियौ, नैना भये अनन्त ।
आदि अन्त मध एक ही, सूझि पड़े भगवन्त ॥४७॥
सहजो गुरु दीपक दियौ, देख्यौ आतम रूप ।
तिमिर गयौ चाँदन भयौ, पायौ परघट भूप ॥४८॥
सहजो गुरु परसन्न ह्वै, मेट्यौ मन सन्देह ।
रोम रोम सूँ प्रेम उठि, भींज गई सब देह ॥४६॥
सहजो गुरु परसन्न ह्वै, एक कह्यौ परसंग ।
तन मन तें पलटी गई, रंगी प्रेम के रंग ॥५०॥
सहजो गुरु परसन्न ह्वै, मूँद लिये दोउ नैन ।
फिर मो सूँ ऐसे कही, समझ लेहि यह सैन ॥५१॥
सहजो गुरु किरपा करी, कहा कहूँ मैं खोल ।
रोम रोम फुल्लित भई, मुखे न आवै बोल ॥५२॥
चिंउटी जहाँ न चढ़ि सकै, सरसों ना ठहराय ।
सहजो कूँ वा देस में, सतगुरु दई बसाय ॥५३॥
(१) भागे ।
१० सहजो बाई
सिष पौधा नौधा अभी, गुरु किरपा की बाड़ ।
सहजो तरवर फैल बड़, सुफल फलै वह झाड़ ॥५४॥
सहजो सिष ऐसा भला, जैसे माटी मोय ।
आपा सौंपि कुम्हार कूँ, जो कछु होय सो होय ॥५५॥
सहजो सिष ऐसा भला, जैसे चकई डोर ।
गुरु फेरै त्यौं ही फिरै, त्यागै अपना खोर१ ॥५६॥
सहजो गुरु ऐसा मिलै, जैसे धोबी होय ।
दै दै साबुन ज्ञान का, मलमल डारै धोय ॥५७॥
सहजो गुरु ऐसा मिलै, मेटै मन सन्देह ।
नीच ऊँच देखै नहीं, सब पर बरसै मेह ॥५८॥
सहजो गुरु ऐसा मिलै, जैसे सूरज धूप ।
सब जीवन कूँ चाँदना, कहा रंक कहा भूप ॥५६॥
सहजो गुरु ऐसा मिलै, समदृष्टी निर्लोभ ।
सिष कूँ प्रेम समुद्र में, करदे झोबाझोब ॥६०॥
सहजो गुरु बहुतक फिरैं, ज्ञान ध्यान सुधि नाहिं ।
तार सकैं नहिं एक कूँ, गहैं बहुत की बाहिं ॥६१॥
ऐसे गुरु तो बहुत हैं, धूत धूत धन लेहिं ।
सहजो सतगुरु जो मिलैं, मुक्ति धाम फल देहिं ॥६२॥
कुटंब जाल जित तित रुप्यो, पसु पंछी नर माहिं ।
सहजो गुरुबर्ती बचै, निगुरे अरुझत जाहिं ॥६३॥
बार बार नाते मिलैं, लख चौरासी माहिं ।
सहजो सतगुरु ना मिलैं, पकड़ निकासैं बाहिं ॥६४॥
जन्म जन्म हरि संग ही, मिलि रह्यो आठो जाम ।
सहजो गुरु के बिन मिले, पायौ ना बिसराम ॥६५॥
(१) रास्ता, आदत ।
साध महिमा ११
सहजो गुरु पूरा मिलै, सिष मैला घट चित्त ।
मेह बरसै कालर१ जिमीं, खेत न उपजै खित्त२ ॥६६॥
मलयागिरि के निकट जो, सब द्रुम चंदन होहिं ।
कीकर सीसों चीड़ बृछ, हुए न कबहूँ होहिं ॥६७॥
सिष माटी सिष पाथरा, सिष लकड़ी सम जोय ।
सहजो गुरु पारस लगे, कैसे कंचन होय ॥६८॥
सिष्य सराई३ तेल बिन, बाती भी नहिं माहिं ।
सहजो गुरु दीपक मिलै, चाँदन होसी नाहिं ॥६९॥
सहजो गुरु समरथ कला, सर्बदेसी सर्ब अंग ।
कोइ कैसा ही सिष्य हो, सब पर गेरै रंग ॥७०॥
सहजो गुरु रँगरेज सा, सबहीं कूँ रँग देत ।
जैसा तैसा बसन है, जो कोइ आवै सेत ॥७१॥
सहजो गुरु दरसन दियो, पूर रहे सब ठौर ।
जहाँ तहाँ गुरु ही लखै, दृष्टि न आवै और ॥७२॥
देखत ही आनंद भये, सतगुरु पहुँचे आय ।
भवसागर दुख रूप सूँ, सहजो लई बचाय ॥७३॥
चरनदास के चरन पर, सहजो वारै प्रान ।
जगत ब्याध सूँ काढ़ि कर, राख्यो पद निरबान ॥७४॥
सहजो गुरु महिमा कही, पढ़ सुनि हिया सिराय४ ।
उपजै गुरु की भक्ति दृढ़, दुबिधा दुर्मति जाय ॥७५॥
साध महिमा
॥ दोहा ॥
साध मिले गुरु पाइया, मिटि गये सब सन्देह ।
सहजो कूँ सम ही भयो, कहा गिरवर कहा गेह ॥ १ ॥
(१) कल्लर = ऊसर । (२) पृथ्वी । (३) दिया या दीवा । (४) ठंडा होय ।
ही करते घात ॥१३॥`
- Wait, "जम ही करते घात" - is it 'जम'?
- Yes, 'जम' (यमरूप / यमराज).
- Sakhi 14:
सहजो संगत साध की, छूटै सकल बियाध ।- "सहजो संगत साध की, छूटै सकल बियाध ।"
- Wait, there is a comma after की:
की,.
दुर्मति पाप रहै नहीं, लागै रंग अगाध ॥१४॥- "दुर्मति पाप रहै नहीं, लागै रंग अगाध ॥१४॥"
-
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१२ सहजो बाईVerse lines:
साध मिले पूरी भई, जनम जनम की आस ।
सहजो पायौ भाव तें, सतसंगत में बास ॥ २ ॥
सहजो साधन के मिले, मन भयो हरि के रूप ।
चाह गई थिरता भई, रंक लख्यौ सोइ भूप ॥ ३ ॥
साध मिले हरि ही मिले, मेरे मन परतीत ।
साध लक्षण १३
साध बृच्छ बानी कली, चर्चा फूले फूल ।
सहजो संगत बाग में, नाना फल रहे झूल ॥१५॥
सहजो दरसन साध का, दो नैनों भरि लेहि ।
तिहूँ ताप नसि जायँगे, सीतल होगो देहि ॥१६॥
सहजो दरसन साध का, देखूँ वारूँ प्रान ।
जिन की किरपा पाइये, निर्भय पद निर्बान ॥१७॥
दुष्ट लक्षण
॥ दोहा ॥
दुष्टन की महिमा कहूँ, सुनियो संत सुजान ।
ताना दै दै दृढ़ करें, भक्ती जोग अरु ज्ञान ॥१८॥
॥ चौपाई ॥
धन दुष्टी जो दृढ़ता देई । निन्दा कर पातक हरि लेई ॥
दुष्टी त्यागी दीखै भारी । समझ सोच सहजो बलिहारी ॥
तज दइ साध संग गुरु चरना । त्यागी भक्ति ध्यान का धरना ॥
त्यागी उत्तम रहनी गहनी । त्यागी हरि की लीला कहनो ॥
त्यागे बचन बिमल सुखदाई । तजि दियो साँच झूठ लौ लाई ॥
जत सत सील छिमा तजि दीन्हा । सो साधू माथे धरि लीन्हा ॥
तजी दीनता सुबुधि चिताई१ । सो गरीब साधों ने पाई ॥
तजि बैराग परम संतोषा । सब बिधि तज्यो राम गति मोषा ॥१९॥
॥ दोहा ॥
भली चाल दुष्टी तजै, ऐसा त्यागा होय ।
बुरी चाल साधू तजै, तजन कहै सब कोय ॥२०॥
साध लक्षण
॥ चौपाई ॥
साध सोई जो काया साधै । तजि आलस और बाद बिबादै ॥
गहै धारना सब गति भारी । तजै बिकलता अस्तुति गारी ॥
छिमावन्त धीरज कूँ धारै । पाँचो बस करि मन कूँ मारै ॥
(१) सावधानता ।
१४ सहजो बाई
त्यागै झूठ साँच मुख बोलै । चित इस्थिर इत उत ना डोलै ॥
तन जग में मन हरि के पासा । लोक भोग सूँ सदा उदासा ॥
जत सत नख सिख सीतलताई । तन मन बचन सकल सुखदाई ॥
निर्गुन ध्यानी ब्रह्म गियानी । मुख सूँ बोलै अमृत बानी ॥
समझ एकता भाव न दूजे । जिनके चरन सहजिया पूजे ॥२१॥
॥ दोहा ॥
निर्द्वन्दी निर्बैरता, सहजो अरु निर्बास ।
सन्तोषी निर्मल दसा, तकै न पर को आस ॥२२॥
ज्ञान मध्य इस्थिर दसा, ध्यान मध्य गलतान ।
सहजो साधू राम के, तजैं बड़ाई मान ॥२३॥
जो सोवैं तो सुन्न में, जो जागैं हरि नाम ।
जो बोलैं तो हरि कथा, भक्ति करैं निःकाम ॥२४॥
तन मन मेटैं खेद सब, तज उपाधि की चाल ।
सहजो साधू राम के, तज कनक और बाल१ ॥२५॥
दीर्घ बुद्धि जिनकी महा, सील सदा ही नैन ।
चेतनता हिरदे बसै, सहजो सीतल बैन ॥२६॥
तन कूँ साधे हो रहैं, चित कूँ राखैं हाथ ।
सहजो मन कूँ यौँ गहैं, चलै न इन्द्रिन साथ ॥२७॥
नित ही प्रेम पगे रहैं, छके रहैं निज रूप ।
समदृष्टी सहजो कहै, समझैं रंक न भूप ॥२८॥
सुरत नहीं ब्यौहार में, जगत रीत सूँ पीठ ।
सनमुख हैं गुरु भक्ति में, सहजो हरि के ईठ२ ॥२६॥
साध असंगी सँग तजैं, आतम ही को संग ।
बोध रूप आनन्द में, पियैं सहज को रंग ॥३०॥
(१) स्त्री । (२) इष्ट, प्यारे ।
द्वादस प्रकार के बचन साध के १५
दुर्जन ना साजन नहीं, नहीं बैर नहिं प्रोत ।
सकल बिकल उनके नहीं, सहजो हरि जन रोत ॥३१॥
सहजो हरि जन मुक्त हैं, डार दुई की पोट ।
चाह गई संसा मिटा, बंधन छूटे कोट ॥३२॥
राग द्वेष सूँ रहित हैं, बैरागी निरबन्ध ।
सहजो इच्छा ना रही, माथा ब्रह्म की संध ॥३३॥
आसन संजम साध करि, साधै प्रान अपान१ ।
सहजो मद्रा जौ सधै, तौ जोगो परवान ॥३४॥
तीनों बन्ध लगाय के, अनहद सुनै टकोर ।
सहजो सुन्न समाधि में, नहीं साँझ नहिं भोर ॥३५॥
ना सुख बिद्या के पढ़े, ना सुख बाद बिबाद ।
साध सुखी सहजो कहै, लागे सुन्न समाध ॥३६॥
मुए दुखी जोवत दुखी, दुखी भूख आहार ।
साध सुखी सहजो कहै, पायौ नित्त बिहार ॥३७॥
चाह दुखी आसा दुखी, महा दुखी अज्ञान ।
साध सुखी सहजो कहै, पायौ केवल ज्ञान ॥३८॥
धनवन्ते सब ही दुखी, निर्धन हैं दुख रूप ।
साध सुखी सहजो कहै, पायौ भेद अनूप ॥३६॥
रंक दुखी राजा दुखी, दुखी सकल संसार ।
साध सुखी सहजो कहै, पाया भेद अपार ॥४०॥
ना सुख दारा सुत महल, ना सुख भूप भये ।
साध सुखी सहजो कहै, तृस्ना रोग गये ॥४१॥
द्वादस प्रकार के बचन साध के
१ मीठी बोली । ४ सीतल सुगन्ध बोली ७ बिघ्न-बिदार बोली १० भक्ति दृढ़ावन बोली
२ चरपरी बोली । ५ महाफूल बोली । ८ शुद्ध सुख सज्जन बोली ११ स्थिर बोली ।
३ अमृत-बचन बोली ६ सलिल बोली । ६ भर्म-निवारन बोली १२ साँची बोली ।
(१) प्राण और अपान वायुओं के नाम हैं—प्राण अंतर खिंचने वाली स्वासा को
और अपान बाहर चलने वाली स्वासा को कहते हैं, जिनको प्राणायाम के अभ्यास में
साधना पड़ता है ।
३
१६ सहजो बाई
द्वादस प्रकार के बचन दुष्ट के
१ पाहन बोली । ४ अग्नि सरूप बोली । ७ खट्टी बोली । १० भरमिक बोली ।
२ काँटेदार बोली । ५ अकड़े खटक बोली । ८ कडुई दुर्गंध बोली । ११ निगुरी बोली ।
३ बिष भुवंग बोली । ६ हिया-बेध बोली । ९ झूठी बोली । १२ डिगमिगाट बोली
बैराग उपजावन का अंग
॥ दोहा ॥
सहजो भज हरि नाम कूँ, तजो जगत सूँ नेह ।
अपना तो कोइ है नहीं, अपनी सगी न देह ॥ १ ॥
यही कही गुरुदेवजू, यही पुकारैं सन्त ।
सहजो तज या जगत कूँ, तोहि तजैगो अन्त ॥ २ ॥
कलह कलपना दुख घना, सदा रहै मन भंग ।
अकस¹ भरे कूँ छोड़िये, सहजो जग बेढंग ॥ ३ ॥
जैसे सँड़सी लौह की, छिन पानी छिन आग ।
ऐसे दुख सुख जगत के, सहजो तू मत पाग ॥ ४ ॥
अचरज जीवन जगत में, मरिबो साँचो जान ।
सहजो अवसर जात है, हरि सूँ ना पहिचान ॥ ५ ॥
जग से या जग में पगा, जग संग दीन्हे प्रान ।
राम तजै जग सूँ रचै, सहजो निश्चय हान ॥ ६ ॥
झूठा नाता जगत का, झूठा है घर बास ।
यह तन झूठा देख कर, सहजो भई उदास ॥ ७ ॥
जब लग चावल धान में, तब लग उपजै आय ।
जग छिलके कूँ तजि निकस, मुक्ति रूप है जाय ॥ ८ ॥
कुटँब सँगाती बीच में, आदि अन्त नहिं होय ।
बीच मिले बिच ही गये, सहजो संग न कोय ॥ ९ ॥
सहजो स्वारथ सब लगे, दारा सुत औ बीर ।
जीवत जोतैं बैल ज्यों, मुए चढ़ावैं सोर² ॥१०॥
(१) बैर । (२) जीते जी तो कड़ी मेहनत लेते हैं और मरने पर अपने मतलब के लिए मन्नत
चढ़ाते हैं।
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बैराग उपावन का अङ्ग १७
कोई किसी के संग ना, रोग मरन दुख बन्ध ।
इतने पर अपनौ कहैं, सहजो ये नर अन्ध ॥११॥
दरद बटाय सकैं नहीं, मुए न चालैं साथ ।
सहजो क्योंकर आपने, सब नाते बरबाद ॥१२॥
मर बिछुड़ै जो कुटँब सूँ, बहुर न देखै आय ।
महल द्रव्य सन्तान कू, सहजो पचै बलाय ॥१३॥
मरि बिछुड़न यों होइगो, ज्यों तरवर सूँ पात ।
सहजो काया प्रान यों, मुख सेती ज्यों बात ॥१४॥
सहजो जीवत सब सगे, मुए निकट नहिं जायँ ।
रोवैं स्वारथ आपने, सुपने देख डरायँ ॥१५॥
सहजो धन माँगे कुटँब, गाड़ा धरा बताय ।
जो कछु है सो दे हमें, फिर पाछे मरि जाय ॥१६॥
मुख देखै ढाँपै भजै, तड़ दे तोड़े नेह ।
सहजो पति सुत निज हितू, जारि करेंगे खेह ॥१७॥
काढ़ काढ़ बेगी कहैं, भीतर बाहर लोय ।
जीव छुटे सहजो कहै, तन का सगा न कोय ॥१८॥
यह मन्दिर यह नारि है, यह धन यह सन्तान ।
तेरो ना सहजो कहै, काहे करत गुमान ॥१९॥
जन्म जुवा सों हारिहो, कियो न लाहा सूल ।
डार पात फल सींच कर, सहजो काटत मूल ॥२०॥
सहजो गुरु परताप सूँ, ऐसी जान पड़ी ।
नहीं भरोसा स्वास का, आगे मौत खड़ी ॥२१॥
भीतर का भीतर खुलै, कै बाहर खुलि जाय ।
देह खेह है जायगी, जैहौ जन्म गँवाय ॥२२॥
स्वासा दीपक के बुझे, होत अँधेरी देह ।
सहजो सूनी प्रान बिनु, जब कैसो हरि नेह ॥२३॥
१८ सहजो बाई
सहजो फिर पछितायगो, स्वास निकसि जब जाय ।
जब लग रहै सरीर में, राम सुमिर गुन गाय ॥२४॥
स्वास खजानो जातु है, ता की सोधो नाहिं ।
सहजो खर्चों का रह्यो, कर हिसाब घर माहिं ॥२५॥
सहजो नौबत स्वास की, बाजत है दिन रैन ।
मूरख सोवत है महा, चेतन कूँ नहिं चैन ॥२६॥
हिरनाकुस से ह्वै मिटे, दुर्जोधन सिसुपाल ।
कुंभकरन रावन गये, सहजो खाया काल ॥२७॥
निश्चै मरना सहजिया, जीवन की नहिं आस ।
क टूटी सी झोपड़ी, कै मन्दिर में बास ॥२८॥
कै गरीब सिर टोकरी, क सिर छत्तर होय ।
जन्म मरन में एक से, सहजो भाँति न दोय ॥२६॥
मरना है रहना नहीं, जाना वाही ठौर ।
सहजो कै कङ्गाल हो, कै हो द्रव्य कड़ोर ॥३०॥
आपन हूँ थिर होहिं जो, करै और को सोग ।
सहजो साथी नाव के, सभी बटाऊ लोग ॥३१॥
बैठि बैठि बहुतक गये, जग तरवर की छाँहिं ।
सहजो बटाऊ बाट के, मिलि मिलि बिछुड़त जाहिं ॥३२॥
यह रस्ता बहता रहै, थमै नहीं छिन एक ।
बहु आवैं बहु जातु हैं, सहजो आँखन देख ॥३३॥
जग देखत तुम जावगे, तुम देखत जग जाय ।
सहजो योंही रीति है, मत कर सोच उपाय ॥३४॥
मुए सो काया जारई, बहुरि न मिलिहै आय ।
रोये तें कहा होत है, सहजो झुरै बलाय ॥३५॥
झुरि झुरि के पिंजर भये, रोय गँवाये नैन ।
मरे गये सो ना मिले, सहजो सुने न बैन ॥३६॥
बैराग उपजावन का अंग १६
जो रोये सूँ बाहुरै, तौ रोवौ दिन रात।
तन छीजै वह न मिलै, सहजो कूड़ी बात ॥३७॥
काहे कूँ रोवत रहौ, कल्प न होवै काज।
सहजो मुए सो मरि गये, आवैं काल्ह न आज ॥३८॥
देह निकट तेरे पड़ी, जीव अमर है नित्त।
दुइ में मूवा कौन सा, का सूँ तेरा हित्त ॥३६॥
जो तेरा हित देह सूँ, नख सिख ताही¹ खंड।
जीव अमर सहजो कहै, ब्यापक और अखंड ॥४०॥
तेरा थानी क्यों मुवा, क्यों न रखा गहि बाहिं।
सहजो बहुतक मिलि छुटे, चौरासी के माहिं ॥४१॥
कभुवक तेरा बाप है, कभुवक तेरा पूत।
कभुवक तेरा मित्र है, कभुवक तेरा सूत² ॥४२॥
जो तेरे सँग प्यार था, जाता वाके साथ।
कै वाही कूँ राखता, सहजो गहि कर हाथ ॥४३॥
कलप रोय पछिताय थक, नेह तजौगे कूर।
पहिले ही सूँ जो तजै, सहजो सो जन³ सूर ॥४४॥
यों खाता यों सोवता, मीठे कहता बोल।
यह बिचार तू मत करै, चित रहै डाँवाडोल ॥४५॥
बैठि पहिरि यों चलता, बस्तर भूषण लाल।
यह बिचार तू मत करै, छल रूपी जग जाल ॥४६॥
आगे रो रो क्या किया, अब क्यों रोवै भाँड।
संग न आया ना चलै, यह जग झूठी माँड ॥४७॥
आगे मुए सो जा चुके, तू भी रहै न कोय।
सहजो पर कूँ क्या झुरै, आपन ही कूँ रोय ॥४८॥
(१) नाहीं। (२) शत्रु, दूत। (३) सावंत।