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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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हरि तें गुरु की विशेषता ३
चौथी तेल बूँद जल माहीं। फैलत फैलत फैलत जाही ॥
छोटी से दीरघ परकासै। बरन बरन के रंग निकासे ॥
तीन बुद्धि जग में दरसावै। चौथौ बुद्धि कोइ बिरले पावै ॥
सहजो बुधि सब थोथी कहिये। गुरु की कृपा सबन में चहिये॥१०॥
हरि तें गुरु की विशेषता
॥ दोहा ॥
हरि किरपा जो होय तो, नाहीं होय तो नाहिं।
पै गुरु किरपा दया बिनु, सकल बुद्धि बहि जाहिं ॥११॥
॥ चोपाई ॥
राम तजूँ पै गुरु न बिसारूँ। गुरु के सम हरि कूँ न निहारूँ॥
हरि ने जन्म दियो जग माहीं। गुरु ने आवागवन छुटाहौं ॥
हरि ने पाँच चोर दिये साथा। गुरु ने लई छुटाय अनाथा ॥
हरि ने कुटँब जाल में गेरी। गुरु ने काटी ममता बेरी१ ॥
हरि ने रोग भोग उरझायौ। गुरु जोगो कर सबै छुटायौ ॥
हरि ने कर्म भर्म भरमायौ। गुरु ने आतम रूप लखायौ ॥
हरि ने मो सूं आप छिपायौ। गुरु दीपक दै ताहि दिखायो ॥
फिर हरि बंधमुक्ति२ गति लाये। गुरु ने सबही भर्म मिटाये ॥
चरनदास पर तन मन वारू। गुरु न तजूँ हरि कूँ तजि डारूँ॥१२॥
॥ दोहा ॥
सब परबत स्याही करूँ, घोलूँ समुँदर जाय।
धरती का कागद करूँ, गुरु अस्तुति न समाय ॥१३॥
॥ चोपाई ॥
गुरु की अस्तुति कहँ लौं कीजै। बदला कहा गुरू कूँ दीजै ॥
गुरु का बदला दिया न जाई। मन में उपजत है सकुचाई ॥
इन नैनन जिन राम दिखाये। बंधन कोटि काटि मुक्ताये ॥
(१) बेड़ी। (२) ऐसी मुक्ति जिसमें झीनी माया का बन्धन लगा रहता है।