रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
६८ असली कोकशास्त्र
कर बोयेगा, सस्ता नहीं। ऐसा क्यों ? उससे पूछिये । वह
साफ कह देगा कि भविष्य में होने वाली मेहनत-मसक्कत इसी
पर निर्भर है, यदि इस में किसी प्रकार की कोतायी की जायगी
तो आने वाले साल में भूखों मरना पड़ेगा। यदि बीया अच्छा
नहीं होगा तो फसल कहाँ से अच्छी होगी। इसी पर तो
फसल का दारोमदार है। जब गाय भैंस गाभिन कराने का
समय आयेगा तब भी अच्छे से अच्छा हृष्ट-पुष्ट मजबूत साँड़
ढूँढ़ा जायगा। इस विषय में अनाड़ी से अनाड़ी ग्रामीणी भी
एक मत हैं फिर बुद्धिमानों का तो कहना ही क्या ? किन्तु बड़े
खेद की बात है, जो मनुष्य इतना बुद्धिमान बनता है वह अपनी
सन्तान के लिए कुछ भी विचार नहीं करता। मनुष्य होकर
इसने क्या विशेषता की, इससे तो पशु भी अच्छे हैं, जो समय
आने पर ही सन्तानोत्पत्ति की चेष्टा करते हैं। उनकी सन्तान
कैसी हृष्ट-पुष्ट सुन्दर फुर्तीली और तन्दुरुस्त होती है। सुन्दर
निरोग और बलिष्ट सन्तान बनाने के लिये ही वेदशास्त्रों ने
विवाह का समय विभाग किया था। जिसका दिग्दर्शन ऊपर
किया जा चुका है।
असली कोकशास्त्र ६६
विवाह
विवाह का क्या अर्थ है यह जानना परम आवश्यक है।
“वि” पूर्वक “वह” प्रापणे धातु से विवाह शब्द बनता है।
जिसका अर्थ है—वर-कन्या दोनों का मिलकर विशेष रूप से
गृहस्थ धर्म का पलन करने के लिए, प्रेम तथा श्रद्धा पूर्वक एक
दूसरे को अन्तःकरण से स्वीकार करना—अर्थात् पति-पत्नि
परस्पर एक दूसरे के सुख दु ख को अपना सुख दुःख समझते
हुए, प्रेम भाव से गृहस्थ-सम्बन्धी कार्याँ का सम्पादन करें।
यह तभी हो सकता है जब दोनों में सच्चा प्रेमभाव हो। सच्चे
प्रेम की उत्पत्ति एक दूसरे के गुण दोष जानने के बाद ही होती
है। इसी लिए विवाह के पूर्व जन्मपत्री अर्थात् जीवनचर्या
(विद्या, बल, बुद्धि, आयु और चरित्र) मिलायी जाती है। भूल
इतनी ही है कि जन्म-दिन के ही गृह-दोष मिलाये जाते हैं।
चाहिए जन्म से लेकर विवाह काल तक के गृह-दोष मिलाना।
लोग गृह-दोष के स्थान पर ग्रह-दोष मिलाते हैं, यथार्थ में
चाहिए गृह-दोष। जो मनु भगवान ने मनुस्मृति में दिखलाये हैं।
हम पहले गुण दिखाकर फिर दोष भी दिखायेंगे—
गुरुणानुमतः स्नात्वा समावृत्तो यथाविधिः ।
उद्वहेत द्विजो भार्यां सवर्णां लक्षणान्वितान् ।
असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः ।
७० असली कोकशास्त्र
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ॥
अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हँस वारणगामिनीम् ।
तनुलोमकेशदशनां मृद्वङ्गीमुद्वहेत् स्त्रियम् ॥
॥ मनु ॥
अर्थ—यथावत् उत्तम रीति से ब्रह्मचर्य और विद्या को
ग्रहण कर गुरु की आज्ञा से स्नान करके, ब्राह्मण क्षत्रिय और
वैश्य अपने वर्ण की उत्तम लक्षण युक्त स्त्री से विवाह करे ॥ १ ॥
जो स्त्री माता की छः पीढ़ी और पिता के गोत्र की न हो, वही
द्विजों के लिये विवाह करने में उत्तम है। जिसके सुन्दर अंग,
उत्तम नाम, हँस और हस्तिनी के सदृश चालवाली, जिसके
सूक्ष्म लोम, सूक्ष्म केश और सूक्ष्म दाँत हों, जिसके अंग कोमल
हों, उस स्त्री से विवाह करे। इस प्रकार विवाह योग्य वर-
कन्या के गुण, कर्म और स्वभाव मिला लेने चाहियें। इसके
अतिरिक्त जो त्याज्य दोष हैं वे भी आगे दिखाये जाते हैं।
जिन दोषों का त्यागना परम आवश्यक और रहना बड़ा
खतरनाक है।
चाहे वे घर या खानदान बड़े धन-धान्य से परिपूर्ण गौ भैंस
घोड़ा हाथियों से भरे हुए भी क्यों न हों, विवाह में ये दश कुल
त्याग ही देने चाहियें—
महान्त्यपि समृद्धानि गोजाविधनधान्यतः ।
स्त्रीसम्बन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत् ॥
असली कोकशास्त्र ७१
हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शसम् ।
क्षय्यामर्याव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठिकुलानि च ॥
नोद्वहेत कपिलां कन्यां नाधिकांगीन रोगिणीम् ।
नालोमिकां नातिलोमां न वाचाटां न पिङ्गलाम् ॥
नक्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम् ।
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम् ॥
अर्थ—१ पहला जिस कुल में उत्तम क्रिया न हो। २ दूसरा—
जिस कुल में कोई उत्तम पुरुष न हो। ३ तीसरा - जिस कुल
में कोई विद्वान न हो। ४ चौथा—जिस कुल में शरीर के
ऊपर बड़े बड़े लोम हों। ५ पाँचवाँ—जिस कुल में बवासीर
हो। ६ छठवाँ जिस कुल में क्षयी ( राजयक्ष्मा ) रोग हो,
७ सातवाँ—जिस कुल में अग्निमन्दता से आमाशय रोग हो।
८ आठवाँ—जिस कुल में मृगी रोग हो। ९ नोवाँ—जिस
कुल में श्वेत कुष्ठ और दशवाँ—जिस कुल में गलित कुष्ठ आदि
रोग हों, उन कुलों की कन्या अथवा उन कुलों के पुरुषों से
विवाह कभी न करें। पीले वर्ण वाली, अधिक अंग वाली जैसे
छंगुली आदि रोगवती, जिसके शरीर पर कुछ भी लोम न हों
और जिसके शरीर पर बड़े-बड़े लोम हों, व्यर्थ अधिक बोलने
वाली और जिसके पीले बिल्ली के सदृश्य नेत्र हों। तथा जिस
कन्या का ( ऋक्ष ) नक्षत्र पर नाम अर्थात् रेवती रोहिणी
इत्यादि ( नदी ) जिसका गंगा, यमुना इत्यादि ( पर्वत )
७२ असली कोकशास्त्र
जिसका विन्ध्याचला इत्यादि (पक्षी) पक्षी पर अर्थात् कोकिला
हंसा इत्यादि (अहि) अर्थात् उरगा भोगिनी इत्यादि (प्रेष्य)
दासी इत्यादि और जिस कन्या का (भीषण) कालिका चण्डिका
इत्यादि नाम हों उससे भी विवाह न करे। इन त्याज दोषणियों का
सर्वथा त्याग कर देना ही उत्तम है।
इस उपरोक्त विधि से परीक्षित स्त्री पुरुषों के परस्पर
विवाह होने पर ही सच्चा दाम्पत्य सुख मिल सकता है, अन्यथा
नहीं।
---:०:---
पुरुष भेद
चत्वारः पुरुषा ब्रह्मन्नामानि च यथाक्रमम् ।
शशो मृगो वृषश्चैव चतुर्थेस्तु )गस्तथा ॥
शशक, मृग, वृषभ और अश्व ये चार प्रकार के पुरुष माने
गये हैं।
---:०:---
शशक पुरुष
अल्पाहारल्पदर्पा लघुसुरतरताः शौचभाजो
धनाढ्याः । मानोदीर्णाः शशाःस्युः सुरभिरतजलाः
कान्तिमन्तःसह
असली कोकशास्त्र ७३
अल्पाहारी, अहंकार रहित, सम्भोग में जल्दी तृप्त होनेवाला,
धनवान, कान्तिवान, हमेशा प्रसन्न रहने वाला, शशक पुरुष
कहलाता है।
आताम्रस्फारनेत्रा लघु समदशना वस्तुर्लास्याः
सुवेषाः । मृद्वारक्तं वहन्तः करमतिललितं श्लिष्ट
शाखं सुवाच ॥ वृत्तव्यालोललीलाः सुमृदुशिरसिजा
नातिदीर्घा वहन्तो । ग्रीवां जानूरुहस्ते जघन चरणयो-
र्बिभ्रतः कार्श्य॑मुच्चैः ॥
बड़ी और सुर्ख आँख वाला, छोटे किन्तु समान दाँत वाला,
तिल मुख और सुन्दर प्रकृति वाला विच्छिन्न उगुलियों वाला सुन्दर
मुलायम और लाल हाथ वाला निरन्तर भोग की इच्छा रखनेवाला,
और जिसके सिर के बाल मुलायम हों, तथा जिसकी गर्दन चौड़ी
और नाटी हो, जिसके हाथ, पाँव तथा जंघायें लम्बी हों, उसे
शशक पुरुष जानो ।
मृदुवचनसुशीलः कोमलाङ्गः सुकेशः ।
सकलगुणनिधानः सत्यवादी शशोऽयम् ॥
मीठा बोलने वाला, सुशील, कोमलाङ्गी, सुन्दर केश वाला, सर्व
गुण सम्पन्न सत्यवादी शशक पुरुष कहलाता है ।
न खर्वो नातिदीर्घश्च गुरुद्विजपरायणः ।
विमुखः परदारेषु सदा परहिते रतः ॥
७४ असली कोकशास्त्र
न बहुत छोटा, और न लम्बा सामान्य कद वाला, ब्राह्मण
और गुरु-भक्त, परायी औरत को न चाहने वाला, परोपकारी,
स्वभाव वाला शशक पुरुष कहलाता है ।
साधू-i सङ्गमे चैव अनुगामी समुत्सुकः ।
लक्षणैर्लक्षितः श्रीमान् शशोऽयं देवपूजकः ॥
सत्पुरुषों की संगति करने वाला, सदाचारयुक्त, धनवान
देवताओं का पूजक शशक पुरुष कहाता है ।
गम्भीर वचनः शा तः न पापे विद्यते मनः ।
इतितॆ कथितं ब्रह्मन् शशकस्य च लक्षणम् ॥
गम्भीर वचन बोलने वाला, शान्ति-प्रिय, हमेशा पाप से दूर
रहने वाला शशक पुरुष कहाता है ।
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मृग पुरुष
वदति मधुरवाणीं दीर्घनेत्रोऽतिभीरु-
श्चपलमतिसुदेहः शीघ्रवेगो मृगोऽयम् ॥
विशाल नेत्र, मधुर भाषी, अत्यन्त डरपोक, बुद्धि-चपल,
सुन्दर शरीर वाला, तथा शीघ्र दौड़ने वाला पुरुष मृग संज्ञक
कहाता है ।
स्मितास्यः स्निग्धगात्रश्च बहाशी बलवान्सदा ।
नृत्यगीतप्रियो ब्रह्मन् मृगोऽयं पुरुषः स्मृतः ।
असली कोकशास्त्र ७५
चिकनी देह वाला, हँसमुख, बहुभक्षी, बलवान, नृत्य और
गान को चाहने वाला, मृग पुरुष कहाता है ।
भवति कमलनेत्रः पद्मगन्धः सवेषः ।
उपकृतिपरधीरो नित्यमोदी मृगोऽयम् ॥
कमल-नयन, कमल के समान गन्धवाला, सुन्दर वेष-भूषा
वाला, धीर, परोपकारी हमेशा आनन्द में रहने की इच्छा वाला
पुरुष मृग संज्ञक होता है ।
मृगस्येव महाभाग, दृष्टि स्यात् चपला सदा ।
बह्वाशी गुरुदेवेषु भक्तिमान् नियतं भवेत् ॥
जिसकी दृष्टि चञ्चल मृग के समान हो, बहुत भोजन करने
वाला, ईश्वर भक्त, गुरु भक्त, मृग पुरुष कहाता है ।
वृषभ पुरुष
खेलत्सिंहपदक्रमा मृदुगिरः
पीडासहास्त्यागिनो
निद्रासक्तिभृतस्त्रपा विरहिता
दीप्ताग्नयः श्लेष्मलाः
मध्यान्ते सुखिनोऽतिमज्जवपुषः
सञ्चार मेदोऽधिकाः
सर्वस्त्री सुभगा नवांगुलमितं
लिङ्गं वृषोविभ्रति ॥
७६ असली कोकशास्त्र
खेलते हुए शेर की तरह जिसकी सुन्दर चाल हो, मधुरभाषी,
त्यागी, अधिक सोने वाला, लज्जा विहीन, अग्नि समान तेजस्वी
कफ प्रकृतिक शरीर वाला, मध्यान्त अवस्था में सुखी, चर्बी से स्थूल
देह वाला, स्त्री मात्र को प्यारा, तथा जिसका नौ अंगुल लम्बा
गुप्त अंग हो वह वृषभ जाति पुरुष कहाता है ।
बहुगुणबहुबन्धुः शीघ्रकामो नताङ्गः ।
सकलरुचिरदेहः सत्यवादी वृषोऽयम् ॥
गुणी, बहुत कुटुम्ब वाला, अति कामी, कोमलांगी, सुडौल
शरीर वाला, सत्यवादी, वृषभ पुरुष कहलाता है ।
शरीरे पूगगन्धिः स्यात् जिह्वा दीर्घा तथा भवेत् ।
यस्य नरस्य हे ब्रह्मन् वृषः स परिकीर्त्तितः ॥
जिसके शरीर से सुपारी के समान गन्ध आती हो । लम्बी
जबान वाला मनुष्य, वृषभ कहलाता है ।
नारी दर्शनमात्रेण यस्योद्भूतफुल्लमानसः :
विभेति न च पापेभ्यो वृषः स परिकीर्त्तितः ॥
जिस मनुष्य का नारी को देखने मात्र से मन प्रफुल्लित हो
जाय, और जो पाप करने से न डरे, वह वृषभ पुरुष कहाता है ।
शोभनाङ्गो नताङ्गश्च तथा भूरि कुटुम्बकः ।
गुणवान् शीलवांश्चैव वृषोऽयमीदृशोमतः ॥
अधिक कुटुम्ब वाला, शोभनांग, गुणवान और शीलवान,
नाटा मनुष्य वृषभ संज्ञक होता है ।
असली कोकशास्त्र ७७
ह्रस्वौ च चरणौ यस्य हृष्ट-पुष्ट-कलेवरः ।
योऽसौ लज्जाविहीनश्च, वृषः स परिकीर्तितः ॥
हृष्ट-पुष्ट मजबूत शरीर वाला, तथा जिसके छोटे-छोटे पाँव हो
और लज्जा-विहीन पुरुष वृषभ के समान होता है ।
—:—
अश्व पुरुष
काष्ठतुल्यवपुर्धृष्टो मिथ्याचारश्च निर्भयः
कर्कशो दीर्घदेहश्च दरिद्रस्तु हयो मतः ॥
काठ के समान कठोर शरीर वाला, झूठा, मिथ्या व्यवहारी
निर्भय, धनहीन, लम्बा कहावर मनुष्य अश्व संज्ञक होता है ।
वक्रश्रोत्रशिरोधराधर रदै-
रत्यन्त दीर्घैः कृशैः,
घे स्युः पीवर कण्ठ मांसल भुजाः
स्थूलर्जु सान्द्रैः कचैः
प्रौढष्ये कुटिलाङ्गजानु सुनखाः
दीर्घांगुलि श्रणयोः
दोर्घास्फार विलोल लोचन भृतः
प्रौढाश्च निद्रालसाः ।
टेढ़े मुख वाला, जिसके कान, ओठ, तथा पतले दाँत हों, मोटी
बाँह, घने सीधे बाल, टेढ़ी जाँघ, सुन्दर नख, लम्बी उँगलियों वाला,
७८ असली कोकशास्त्र
मधुर भाषी, ईर्ष्यालु स्वभाव वाला जिसकी आँखें चञ्चल विशाल हों,
और अधिक सोना पसन्द करता हो, उसे अश्व संज्ञक पुरुष कहते हैं।
गम्भीरांमधुरां गिरं द्रुतिगतिं
पीनोरुकौ विश्रुतो,
दीप्ताग्निप्रमदारतः शुचिगिरो
रेतोऽस्थिधातूर्ज्ज्वला ।
तृष्णात्र्त्ता नवनीतशीत बहुल
च रस्मरांबुद्रवा,
लिङ्गै र्द्वादशकांगुलैर्निगदिता
अश्वाः समोरस्थलाः ॥
गम्भीर, मधुर बोलने वाला, शीघ्रगामी, मोटी जाँघों वाला
दीप्ताग्नि स्त्रियों में रत रहने वाला, सत्य प्रिय, जिसका वीर्य हड्डी
से अधिक सफेद हो, सम वक्षस्थल वाला, पुरुष अश्वसंज्ञक होता है ।
स्थूलाङ्गश्चोग्रभाषश्च निद्रां न भजते क्वचित् ।
दिवा-रात्रि सदा तिष्ठेत् नारी दर्शन-लालसः ॥
स्थूल शरीर और उग्र स्वभाव वाला, कम सोने वाला, दिन-
रात स्त्रियों की लालसा करने वाला अश्वसंज्ञक पुरुष कहाता है ।
कृष्ण वर्णो महापापी पर निन्दा-परायणः ।
तापितः स्मरबाणेन ह्येष धर्म विवर्जितः ॥
रंग का काला, महापापी, दूसरों की निन्दा करने वाला, काम
बाण से सताया हुआ, धर्म हीन, अश्व-संज्ञक पुरुष कहाता है ।
असली कोकशास्त्र ७६
देवादि पुरुष भेद
देवगन्धर्वयक्षाणां ये राक्षसपिशाचयाः ।
लक्षणैः संयुतास्ते स्युर्नरास्तैरेव नामभिः ॥
देव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और पिशाच ये पाँच लक्षणों वाले
पुरुष इन्हीं नामों से पुकारे जाते हैं ।
—:०:—
देव पुरुष
सत्यप्रिय, बलवान् ज्ञानी, दानी और मधुर बोलने वाला,
पवित्र सुन्दर, कोमल अंग वाला, काम-क्रोध रहित, मधुर पदार्थ
चाहने वाला, कान्तियुक्त लम्बी भुजा वाला, कमल समान नेत्र
वाला, सतोगुणी पुरुष देव पुरुष कहाता है ।
—:०:—
गन्धर्व पुरुष
सुन्दर स्वरूप, गायन प्रिय, मीठे खट्टे पदार्थों में रुचि रखने
वाला मृग-नयन, गन्धर्व-विद्या परायण, सत, रज, गुण युक्त पुरुष
गन्धर्व कहलाता है ।
—०—
८० असली कोकशास्त्र
यक्ष पुरुष
दयालु, गुणों की खान, दीन रक्षक, स्थूलोदर, मजबूत शरीर
वाला, जिसके जंघा और कण्ठ लाल हों, दृढ़मती, धनी, लाल वर्ण
नेत्र वाला, रज तम गुण से युक्त यक्ष पुरुष कहाता है ।
—०—
राक्षस पुरुष
भयङ्कर बड़ी-बड़ी आँखों वाला, लाल और श्याम वर्ण युक्त
कामी, क्रोधी, निर्दयी, लम्बे स्थूल अंग वाला, दुष्ट बुद्धि बिल्ली की
सी आँखों वाला, शराबी, अच्छे पुरुषों से द्वेष करने वाला तमो-
गुणी पुरुष राक्षस कहाता है ।
—०—
पिशाच पुरुष
क्रोधी, दयाहीन, पापकर्म करने वाला, क्रूर स्वभाव, बहुभोजी,
बकरी की गन्ध वाला, अतिशय मैला, कडुआ खट्टा पदार्थ चाहने
वाला, कौवे के समान शब्द करने वाला, विश्वासघाती, मन-मलीन
पुरुष, पिशाच-पुरुष कहाता है ।
—०—
६ असली कोकशास्त्र ८१
स्त्री भेद
पद्मिनी चित्रिणी चैव शंखिनी हस्तिनी तथा ।
चतस्रो जातयो नार्या रतौ ज्ञेया विशेषतः ॥
पद्मिनी, चित्रिणी, शंखिनी और हस्तिनी ये चार जाति की
स्त्रियाँ होती हैं ।
पद्मिनी स्त्री
तिलकुसुमसमानां विभ्रती नासिकांच ।
द्विज-गुरुसुर-पूजां श्रद्दधानां सदैव ॥
कुवलयदलकान्तिः कापि चाम्पेयगौरी ।
विकचकमलकोशाकारकामातपत्रा ॥
तिल के फूल सदृश्य सुडौल तथा सुन्दर जिसकी नाक हो,
ब्राह्मण, गुरु, और देवताओं में जो हमेशा श्रद्धा रखती हो, कमल
के समान जिसकी शरीर-कान्ति हो, तथा चम्पा के फूल के समान
जिसका शुभ्र-वर्ण हो, वह पद्मिनी कहाती है ।
व्रजति मृदु सलीलं राजहंसी वतन्वी ।
त्रिवलिवलितमध्या हंस-वाणी सुवेशा ॥
८२ असली कोकशास्त्र
मृदुशुचिलघु भुङ्क्ते मानिनी गाढ़-लज्जा ।
धवल-कुसुम-वासा वल्लभा पद्मिनीस्यात् ॥
राज हंस के समान गति वाली, पतली कमर वाली, त्रिवली
युक्त हंस के तुल्य जिसकी वाणी हो, मुलायम, पवित्र, और स्वतंत्र
भोजन करने वाली, सफेद पुष्प और वस्त्रों को प्यार करने वाली
पद्मिनी कहाती है ।
अमल मुकुल मृद्वी फुल्लराजीवगन्धः ।
सुरतपयसि यस्या सौरभं दिव्यमङ्गे ॥
चकित-मृगदृशाभे प्रान्तरक्ते च नेत्रे ।
स्तनयुगलमनर्घ्यं श्रीफल श्रीविडम्बि ॥
कमल के समान कोमल अन्तःकरण वाली, पद्म गन्ध सदृश
गन्ध वाली हिरणी के समान सचकित नेत्र वाली, और जिसकी
दोनों आँखों के कोने लाल हों, तथा जिसके कुच-द्वय विल्व फल के
समान गोल और कठोर हों, ऐसे लक्षण युक्त स्त्री पद्मिनी होती है ।
कमल-नयन-युक्ता क्षुद्ररन्ध्रा च नासा ।
कृशतनु मृदुवाणी दीर्घ-केशी सुभाङ्गी ॥
परहित-मतियुक्ता पद्मगन्धा सुवेषा ।
अविरल कुचयुग्मा कीर्त्तिता पद्मिनी सा ॥
कमल सदृश विशाल नेत्र वाली, जिसके नाक के छेद छोटे
हों, केश लम्बे लम्बे, पतला शरीर, कोमल मृदुवाणी, सुन्दर सुडौल
असली कोकशास्त्र ८१
अंग वाली, परहित बुद्धि रखने वाली, पद्म गन्धा स्त्री पद्मिनी
कहाती है।
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चित्रिणी स्त्री
यस्या मनो न चलति कर्हिचित्त प्रलोभनैः ।
सत्यं प्रियञ्च वदति सर्वदा मिष्टभाषिणी ॥
दया क्षमावती या हि देवपूजा परायणा ।
पत्यौ परायणा या हि नेक्षते परपूरुषम् ॥
विप्रभक्ता च या नारी प्रीतास्यात् स्वल्प-मैथुने ।
सदा धर्मे मतिः यस्याश्चित्रिणी सा प्रकीर्त्तिता ॥
जिसका मन कभी प्रलोभनों में न फँसने वाला हो, जो हमेशा
प्रिय, मधुर, सत्य बोलने वाली हो, दया ओर क्षमा की साक्षात्
मूर्ति हो, देव और पति पूजा में तत्पर रहने वाली, परपुरुष को न
देखने वाली थोड़े मैथुन में तृप्त हो जाने वाली, हमेशा धर्म में मति
रखने वाली स्त्री चित्रिणी कहलाती है ।
मदनसदनमस्या वर्तूं लोच्छूनमन्त-
मृदुमदनजलाढ्यं रोमभिर्नातिसान्द्रैः ॥
प्रकृति चपलदृष्टिर्वाह्य सम्भोगरक्ता ।
रसयतिमधुराल्पं चित्रिणी चित्ररक्ता ॥
८४ असली कोकशास्त्र
दृष्टि चपला, आलिंगन, चुम्बनादि बाह्य सम्भोग रत, रंगीन
चित्र विचित्र वस्त्रों को धारण करने वाली, पुष्पमाला, आभूषणादि
विशेष चाहने वाली स्त्री चित्रणी कहलाती है ।
सुगतिरनतिदीर्घा नातिखर्वा कृशाङ्गी ।
स्तनजघन-विशाला काकजङ्घोन्नतोष्ठी ॥
मधु सुरभिरताम्बुः कम्बु-कण्ठी चकोर-
स्वरवचन विभागा नृत्यगीतादि विज्ञा ॥
समान कद वाली, जिसके कुच बड़े और जंघाएँ बड़ी होती हैं,
कौए के समान लम्बी जाँघ वाली, ऊँचे ओठ, कम्बु ग्रीवा, गायन
कलाओं के जानने वाली, सुन्दरी चित्रणी कहलाती है ।
कठिन घन कुचाढया नातिदीर्घा मनोज्ञा ।
रतिरस-गुणयुक्ता सुन्दरी नातिखर्वा ॥
कमलनयन युग्मा लोभहीना सुशीला ।
तिलकुसुम समानां नासिका चित्रिणी सा ॥
जिसके स्तन द्वय कठिन और मिले हुए हों, शरीर की लम्बाई
सामान्य हो, कमल सदृश नेत्र, लोभ रहित, तिल पुष्प के समान
नासिका, सुशील, रति गुण युक्त, नारी चित्रणी कहाती है ।
असली कोकशास्त्र ८५
शंखिनी स्त्री
दीर्घा सुदीर्घनयना वरसुन्दरी या कामोप-
भोगरसिका गुणशीलयुक्ता ।
रेखात्रयेण च विभूषितकण्ठदेशा सम्भोग-
केलिचतुरा किल शंखिनी सा ॥
विशाल नेत्रा, शारीरिक सब अंगों से सुन्दर, काम और उप-
भोग की महिमा को जानने वाली, शील गुण युक्त कण्ठ में तीन
रेखा वाली, लम्बी, सम्भोग में चतुरा स्त्री शंखिनी कहलाती है।
भवति कमलनेत्रा शीलयुक्ता च दीर्घा ।
कठिन घन कुचाढ्या शांखिनी क्षारगन्धा ॥
मधुर वचनयुक्ता कण्ठदेशे त्रिरेखाम्-
कथितमिदमशेषं लक्षणं शास्त्रयुक्तम् ॥
कमल के समान दोनों नेत्र वाली, लम्बी देह वाली, कठोर स्तन
वाली, मधुर भाषिणी, शील स्वभाव युक्ता, जिसकी देह से क्षार
गन्ध आती हो, तथा जिसके कण्ठ देश में तीन रेखायें पड़ी हों,
वह शंखिनी कहाती है।
तनुरतनुरपि स्याद्दीर्घ देहाऽङ्घ्रिमध्या ।
ह्यरुण कुसुमवासः काङ्क्षिणीकोपशीला ॥
अनिभृत शिरमंगे, दीर्घ निम्नंवहन्ती ।
स्मरगृहमतिलोम क्षारगन्धि स्मराम्बु ॥
८६ असली कोकशास्त्र
जिसके हाथ, पैर और शरीर के प्रत्येक अंग लम्बे मोटे और
पतले भी हों, लाल रंग के पुष्प और वस्त्र चाहती हो। क्रोधी स्वभाव
वाली, तथा असमान अंग वाली स्त्री शंखिनी कहलाती है ।
सृजति बहुनखांकं संप्रयोगे लघीयः ।
स्मरसलिलपृषत्का किंचिदुत्तप्तगात्री ॥
न लघु न बहु भोक्त्री प्रायशः पित्तलास्यात् ।
पिशुन मलिन चित्ता शङ्खिनी रासभोक्तिः ॥
जिसका शरीर कुछ गर्म हो, सामान्य खाने वाली, चुगलखोर
गर्दभ स्वर वाली, रति के समय बहुत नख गड़ाने वाली, स्वल्प
रज त्यागिनी, पित्त प्रकृति वाली स्त्री शंखिनी कहलाती है ।
—:*:—
हस्तिनी स्त्री
भवति मदन-दग्धा हस्तिनी स्थूल देहा ।
नयन-दहन-रक्ता मद्य गन्धाल्पकेशी ॥
कठिनन-कुचाढ्या नासिका स्थूल रन्ध्रा ।
पुलकित सकलांगी सर्वदा काम दग्धा ॥
हाथी के समान स्थूल देह वाली, मदमती, अग्नि सदृश रक्त
नेत्र वाली स्वल्प केशा, घन सदृश कठिन स्तन द्वय वाली, नाक
के स्थूल छिद्र वाली हमेशा मद गन्ध वाली, सदैव काम ताप से
पुलकित अंग वाली स्त्री हस्तिनी कहलाती है ।
ऽ)
Wait, Vasantatilaka begins with ऽ ऽ । ऽ.
Here:
"गलदतिविपुलोष्ठी दुःखसाध्या प्रयोगे"
ग-ल-द-ति (। । । ।) -> Aparavaktra?
No, it's:
न न र र?
Wait, whatever the meter, we are transcribing the exact printed text, not reconstructing the original meter!
Let's read line 17-21 carefully again:
Line 17:
"द्विगुण-कटुकषायप्रायभुग् वीतलज्जा ।"
Wait, notice the space between भुग् and वीतलज्जा: yes, there is a space.
Notice the hyphen after द्विगुण: "द्विगुण-".
Wait, look at भुग्: 'भु' followed by 'ग्' with halant/virama.
Line 18:
"ललदतिविपुलोष्ठी दुःखसाध्या प्रयोगे ॥"
Wait, is it "दुःखसाध्या" or "दुःख साध्या"?
There is a space: "दुःख साध्या" or "दुःखसाध्या"?
Look at 'दुःख' and 'साध्या': they are joined or spaced?
There is a small gap, let's look: "दुःख साध्या" - wait, there is a space between 'दुःख' and 'साध्या'. Look at line 18:
"ललदतिविपुलोष्ठी दुःख