रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
२४ असली कोकशास्त्र ३६६
में नीचे छेद करके भर दे। छेद में कपड़े की बत्ती [...] कर लगा
दे। बाद जमीन में एक गढ़ा खोदकर एक बर्त्तन रख और उसके
ऊपर लकड़ी से भरी हुई छेदवाली हँडी रख दे। फिर उस बर्त्तन
या मुँह अच्छी तरह से बन्द करके उसके ऊपर गोहरी सुलगा दे।
इस प्रकार आँच पाकर जब लकड़ी का तेल नीचे के बर्त्तन में टपक
जाय, तब उसे बोतल में भर कर धर दे ओर वही तेल खुजली में
लगावे। यह तेल स्त्री-पुरुष सबकी खुजली को नष्ट कर देता है;
किन्तु अत्यन्त छोटे बच्चों को यह तेल न लगाना चाहिए; क्योंकि
यह कुछ-कुछ चुन चुनाता है।
—*—
मसान
यह रोग अधिकतर सौर में उत्पन्न होता है। इस रोग की
उत्पत्ति गन्दगी के कारण होती है। इसमें बालक की पसली चलने
लगती है, ज्वर भी हो आता है। पसलियों में कफ जम जाता है।
कभी तो दस्त होते हैं और कभी नहीं होते। बालक अचेत रहता
है। यह सर्द और गर्म दो प्रकार का होता है। इस रोग में दस्त
करा देना बड़ा ही लाभदायक है। गर्म से होने वाले मसान में तो
कोई डर नहीं रहता, परन्तु सर्दी से होने वाले मसान में भय रहता
है। इसकी दवा यह है:—
कबीला, चूना, नीलाथोथा, बड़ी हड़, बहेड़े का छिलका, और
३७० असली कोकशास्त्र
सफेद कत्था इन सबको सम-मात्रा में ले कूट-छान कर गोली बना
ले। फिर इसको घी में मिलाकर बालक की पसली पर लेप कर दे।
अथवा, कंजे का बीज एक, नीलाथोथा एक रत्ती इन दोनों चीजों
को पीसकर सरसो के बराबर की गोली बनाकर रख दे और एक
गोली प्रति दिन बच्चे को खिलाया करे। या रेंडी का तेल बालक
के पेट पर मलकर बकाइन के पत्ते गरम करके बाँध दे।
यदि बालक के शरीर पर लाल चकत्ते पड़ गये हों और ज्वर
भी हो तथा वे ऐसे हों कि आज पेट पर दिखलायी पड़ें तो कल
जाँघों पर दिखलायी पड़ें और परसों मुख पर निकल आवें, तो
बैंतरा सोंठ का चूर्ण पावभर, दही आधपाव, छोटी पीपल आधपाव
इन सबको मिट्टी की हाँड़ी में भर कर उसका मुँह बन्द कर दे।
बाद एक गढ़ा खोदे और उसमें हाँड़ी रखकर चारो ओर से गोहरी
धर के आग लगा दे। जब गोहरी जलकर राख हो जाय तब उस
राख को निकाल कर दूसरी गोहरी भर कर फिर आग लगा दे।
इस प्रकार तीन आँच देकर ठण्ढा हो जाने पर हाँड़ी में से रत्ती-
रत्ती भर सब दवा निकाल कर शीशी में रख मजबूती से काग
लगा दे। फिर यही दवा माता के दूध में चावल भर दे। यदि रोग
का बल अधिक हो तो एक रत्ती अदरक का रस और छः रत्ती
शहद मिलाकर तीन दिन तक दोनों वक्त दे।
—*—
असली कोकशास्त्र ३७१
पसली
यदि बालक की पसली चलती हो तो तुलसीदल के चार रत्ती
रस में एक माशा शहद मिलाकर देना चाहिए और नीचे लिखे
तेल को पेट पर मलकर सेंक देना चाहिए ।
तेल बनाने की रीति
अदरख और लहसुन के दो-दो तोले रस में आधी छटाँक
मीठा तेल मिलाकर मधुर आँच से पकावे । जब जलकर केवल तेल
रह जाय, तब उसे एक शीशी में भरकर रख दे । जिस बालक को
बहुधा पसली का रोग हो जाता हो उसके पेट पर ऊपर की रीति
से मालिश किया करे ।
पेट बढ़ना
यदि बालक का पेट बढ़ आवे तो शहद का शर्बत थोड़ा-थोड़ा
करके पिलाना चाहिए । कुछ दिनों तक इसका सेवन करने से पेट
पचकर ठीक हो जाता है ।
३७२ असली कोकशास्त्र
चिलहक
अगर पेशाब करते समय बालक रोने लगे और इन्द्रिय को
पकड़-पकड़ कर नोचे तो जान लेना चाहिए कि पेशाब करने में
चिलहक पैदा हो रही है। इसके लिए थोड़े से बबूल के गोंद को
कपड़े में बाँधकर पानी में भिगो दे। बाद उस पानी में मिश्री मिला-
कर दिनभर में पाँच-छः बार पिलावे। अथवा धनियाँ को पानी में
भिगोकर रातभर रहने दे और सबेरे छानकर मिश्री मिला मिट्टी के
नये बर्त्तन में रख दे और थोड़ा-थोड़ा करके पिलावे । यह इन्द्रिय
जुलाब है। इससे गर्मी शान्त हो जाती है और पेशाब के समय
होने वाला चिलहक फौरन ही शान्त हो जाता है। या पत्थर की
बेर (यह यहूद देश का पत्थर है और इसे 'हजरुल यहूद' कहा
जाता है—पंसारियों के यहाँ मिलती है) को पानी में घिसकर
पिलाने से भी चिलहक दूर हो जाती है।
—०—
नाक से रुधिर बहना
शंखपुष्पी (कौड़ेनी) को मिर्च के साथ पीसकर सेवन करने
से विनाश का फूटना बन्द हो जाता। बच्चों को बहुत थोड़ी मात्रा
में यह चीज देनी चाहिए; क्योंकि यह बहुत ही तर चीज है।
अनार के फूल का रस और सफेद दूब का रस इन दोनों से
असली कोकशास्त्र १७३
दिनभर में दो-तीन बार नास लेने से भी रुधिर का गिरना बन्द
हो जाता है। अथवा फिटकिरी का पानी सूँघे।
यदि नाक में कीड़े पड़ गये हों तो पिंडोल मिट्टी की डली कूट
कर रोगी के मुख पर एक कपड़ा डाल उसी के ऊपर वह मिट्टी
रख दे। आँख बन्द कराकर उसके मस्तक पर भी मिट्टी डाल दे।
बाद धीरे-धीरे उसके ऊपर पानी छिड़के। जब मिट्टी तर हो जाय,
तब पानी छिड़कना बन्द कर दे। इस मिट्टी की सोंधी महक नाक
में जाने से कीड़े बाहर निकल आते हैं। तीन-चार दिन ऐसा करने
से सब कीड़े निकल जाते हैं और रोगी आराम हो जाता है।
—०—
विषूचिका
यदि बालक को हैजा हो जाय तो उसकी दवा बड़ी सावधानी
से करनी चाहिए और सबसे अधिक ध्यान उसकी सफाई पर रखना
चाहिए। कै या दस्त होने पर फोरन उस स्थान को अँगोठी से
तप्त कर देना बहुत ही आवश्यक है इससे हैजे के विषैले कीड़े
मर जाते हैं—बढ़ने नहीं पाते। वमन होने पर उस स्थान को
लीपना बहुत ही बुरा है।
१—प्याज का अर्क सालभर के बच्चे को पाव तोला पन्द्रह-
पन्द्रह मिनट के बाद दस्त-कै बन्द न होने तक देना चाहिए जब
दस्त और कै बन्द हो जाय तब धीरे-धीरे इसे भी दो-तीन खुराक
३७४ असली कोकशास्त्र
देकर बन्द कर देना उचित है। यदि प्यास न बन्द हो तो एक
फूल कच्ची और आधा फूल भुनी हुई लौंग को घिसकर दे देना
उचित है, पर यह मात्रा बड़ी अवस्था वालों की है, बालकों को
कम मात्रा में देनी चाहिए।
२—अफीम, हींग, कपूर और कालीमिर्च पीसकर डेढ़-डेढ़
रत्ती की गोली बनाकर घण्टे-घण्टे पर एक गोली बालक को दे।
कपूर का अर्क पिलाना भी बहुत ही लाभदायक है।
४—कपूर को सुँघाया करे और माता स्वयं भी सूँघा करे।
यदि वह थोड़ा-थोड़ा कपूर खा लिया करे तो और भी अच्छा हो।
बालक के पास रहने में माता को अपने शरीर पर भी पूरी दृष्टि
रखनी चाहिए।
—०—
फूली
यदि आँख में फूली पड़ जाय तो चिरचिटे की जड़ का रस
शुद्ध शहद में मिलाकर आँखों में अंजन लगावे। इससे फूली कट-
कर आँखें निरोग हो जाती हैं।
—०—
असली कोकशास्त्र ३७५
स्वास्थ्य-रक्षा के नियम
१—हर एक खाद्य पदार्थ दाँतों से इतना अधिक पीसकर
खाओ कि उसमें लार पैदा हो जाय । वह शीघ्र पचनेवाला पौष्टिक
और स्वास्थ्यप्रद होता है ।
२—मशीन का आटा तत्त्व-हीन कब्ज करने वाला होने से
रोगकर है और हाथ की चक्की का आटा बल-पुष्टि देनेवाला सुपच
तथा पेट साफ रखने वाला होने से निरोग है ।
३—मशीन में साफ किये चावलों का पोषक तत्त्व निकल
जाता है । इस लिए इस प्रकार की चीजों का खाना निरर्थक है ।
४—आग पर पकाये पदार्थों की अपेक्षा स्वयं सूर्य ताप से पके
पदार्थ अधिक लाभकर होते हैं, जैसे फल आदि ।
५—भोजन के आदि और अन्त में केवल आचमन मात्र
करना चाहिए और इससे अधिक पानी पीना हानिप्रद है । भोजन
के मध्य में थोड़ा जल पीना चाहिए ।
६—जिनको पेट की शिकायत रहती हो उनको पाखाना जाने
के आध घण्टा पूर्व आध सेर पानी पीकर टहल लेना चाहिए । इस
नियम से उनकी शिकायत जाती रहेगी ।
७—सब दालों की अपेक्षा अरहर की दाल देर हजम है ।
८—सब आहारों की अपेक्षा दुग्धाहार उत्तम आहार है तथा
दुग्धाहार की अपेक्षा फलाहार और भी उत्तम है ।
३७६ असली कोकशास्त्र
९—तमाखू, बीड़ी, सिगरेट, गाँजा, चरस, भाँग, शराब,
चाय, काफी आदि जितने मादक द्रव्य हैं, इनको भूलकर भी कभी
सेवन न करे। ये उत्तेजक और स्वास्थ्य बिगाड़ने वाले हैं ।
१०—जब तक पहला भोजन अच्छी प्रकार हजम होकर पेट
साफ न हो जाय तब तक दूसरा भोजन कभी न खाय। इस प्रकार
करने से कभी पेट खराब नहीं होगा ।
११—जिनकी पाचन-शक्ति निर्बल पड़ गयी हो वे निरन्तर
गदरे ( अधकचरे ) फलों का सेवन करें। उनमें फिर यथार्थ-शक्ति
लौट आयगी ।
१२—फलों के पूर्ण पक जाने पर उनमें शक्तियों का हास
आरम्भ हो जाता है अतएव स्वास्थ्य के लिए गदरे अर्थात् अधपके
फल ही अधिक लाभदायक हैं ।
१३—बथुआ, सोआ, पालक आदि हरे शाक-पात सूखे आलू
लौकी आदि की अपेक्षा अधिक शरीर-पोषक और हितकर होते हैं।
छिलकेदार तरकारी अधिक लाभदायक होती है। हरएक शाक को
मन्द-मन्द आंच से अपने ही पानी में गला देना अच्छा है ।
१४—दिन में थोड़ा-थोड़ा कर अनेक बार जल पीना चाहिए ।
जिसका कुल परिमाण तीन सेर तक होना उचित है ।
१५—भूख प्यास लगने पर भोजन और जल का सेवन अवश्य
करना चाहिए। नहीं तो स्वास्थ्य बिगड़ता है ।
१६—पाखाना, पेशाब, जम्हाई, नींद और छींक रोक देने से
असली कोकशास्त्र
चित्र नं १६
चौथा महीना
इस पृष्ठ पर कोई प्रत्यक्ष पठनीय पाठ मुद्रित नहीं है (यह पृष्ठ रिक्त/अंतःपत्र है, जिस पर केवल पिछले पृष्ठ की उल्टी छाप/धब्बे दिखाई दे रहे हैं)।
असली कोकशास्त्र ३७७
अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
१७—प्रतिदिन सबेरे और शाम को पाखाना जाना चाहिए।
दो बार पैखाना जाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।
१८—नित्य प्रति सबेरे चार बजे उठना, और रात को नौ बजे
सोना चाहिए। इससे स्वास्थ्य वृद्धि होती है।
१९—सबेरे बासी मुँह पानी पीकर कुछ देर टहलना चाहिए
और फिर शौच दन्तधावन, स्नान से निवृत्त होकर बाहर वायु-सेवन
के लिए निकल जाना सर्वोत्तम है। चलने में इतनी तीव्रता हो कि
अंग-प्रत्यंग में पसीना आ जाय। किसी शुद्ध स्थान पर खुली हवा
में बैठकर सन्ध्या और प्राणायाम करना चाहिए, तत्पश्चात् घर
में आकर सूर्योदय के साथ-साथ हवन कर डाले।
२०—ताजा और सादा भोजन अच्छा है। बासी और गरिष्ठ
भोजन स्वास्थ्य बिगाड़ता है।
२१—बत्तीस अथवा चालीस ग्रास से अधिक भोजन नहीं
करना चाहिए। चाहे कितना ही स्वादिष्ट भोजन क्यों न हो।
२२—किसी भी ऋतु में मुँह ढँक कर न सोना चाहिए। श्वास
सदा नाक से ही लेनी चाहिए, मुँह से नहीं।
२३—स्नान के समय सबसे पहले सिर धोकर फिर सर्वाङ्ग
स्नान करें। इससे आरोग्यता और बुद्धि बढ़ती है।
२४—पानी हमेशा ढाँप कर रखना और छानकर पीना चाहिए
२५—अनपच या पेट का दर्द दूर करने के लिये ताजा अथवा
३७८ असली कोकशास्त्र
गरम जल परम औषध है ।
२६—रहने का मकान हमेशा हवादार और स्वच्छ होना
चाहिए । नंगे शरीर शुद्ध वायु सेवन से अनेक रोग दूर होते हैं ।
२७—नियमित आहार-विहार करने वाला कभी रोगी नहीं
होता और हो भी जाय तो शीघ्र स्वस्थ हो जाता है ।
२८—रोग, अग्नि और ऋण ये शेष रहने पर बढ़ते ही जाते
हैं । इस लिए इनको कभी शेष न रहने दे ।
२९—"मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः" मनुष्यों का
अपवित्र मन बन्धन का हेतु है और पवित्र मन मोक्ष का कारण
है । कामदेव को मन से उत्पन्न होने के कारण ही मनोज या मन-
सिज कहते हैं । वह यदि अपवित्र मन में पैदा होता है तो तन मन
धन सभी को बरबाद कर देता है और स्वच्छ मन में पैदा होकर
वही धार्मिक सन्तान भी पैदा करता है । मन के पवित्र विचार
कामदेव को भस्म कर देते हैं । इस लिए कामदेव हमारा परम शत्रु
है । वह सम्पूर्ण व्याधियों का घर है । इस लिए सद्विचारों द्वारा
उसका विनाश कर व्याधियों से छुटकारा पाना चाहिए और स्वच्छ
मन को मोक्ष का साधन बनाना हमारा परम कर्त्तव्य है ।
असली कोकशास्त्र ३७६
भोजन का परिमाण
एक स्वस्थ साधारण मनुष्य के लिए ३२ ग्रास और कसरती
के लिए ४० ग्रास तक भोजन करना चाहिए । क्योंकि परमात्मा ने
बत्तीस दाँत दिये हैं इस लिये बत्तीस ही ग्रास उचित हैं यदि
अधिक बलवान कसरती है तो सवायी मात्रा ४० ग्रास रक्खी गयी
है । रोगी के लिये आधी अथवा यथोचित खुराक होनी चाहिए ।
एक ग्रास एक तोलाभर की होना उचित है इससे अधिक नहीं ।
चालीस तोले का आध सेर और बत्तीस का डेढ़ पाव तैयार अन्न
होता है । इतना एक व्यक्ति के लिए पर्याप्त है । एक मसल है
“आधपाव रोगी, पावभर भोगी, आधसेर मर्द, और सेर भर बघ”
आधसेर से ऊपर सिवाय पेटू के और कौन खा सकता है । किन्तु
जिनको दुग्धादि पदार्थ प्राप्त नहीं हो सकते उनकी खुराक अधिक
बढ़ जाती है, क्योंकि तर पदार्थ स्वभावतः अन्न का भाग कम कर
देते हैं । इसी लिये आजकल लोगों की खुराक अधिक बढ़ी हुई है
क्योंकि उन्हें घी दुग्ध आदि तर पदार्थ प्राप्त नहीं हो रहे अतः शुष्क
खुराक बढ़ रही है । इसका परिणाम सिवाय रोग के और क्या हो
सकता हैं । इसी लिये उदर विकारों के रोग का प्रकोप हर ओर
दिखायी दे रहा है । यह भी मिथ्याहार कहाता है । दुग्ध घी की
रक्षा के लिये गो-रक्षा की परम आवश्यकता है । इसमें वनस्पति आदि
का घी दुग्ध काम न कर सकेगा । प्रत्युत उससे हानि ही होगी ।
३८० असली कोकशास्त्र
ग्रास चर्वण
एकग्रास कितनी बार चबाना चाहिए। परमात्मा ने उसकी संख्या
स्वयमेव निर्माण कर दी है अर्थात् जितने दाँत हैं उतनी ही बार
यदि एक ग्रास को चबाया जाय तो वह पिसकर इतना बारीक हो
जायगा कि उसका रस बहुत शीघ्र रस-वाहिनी नाड़ियें खींच लेंगी
और किसी प्रकार का रोग भी उत्पन्न नहीं होगा। प्यास भी कम
लगेगी। क्योंकि अधिक चबाने से मुख में लवाब बन जाता है जो
कण्ठ में खुश्की पैदा नहीं होने देता जिससे प्यास नहीं लगती ओर
पानी कम पीने में आता है। किन्हीं का सिद्धन्त है कि भोजन में
जल नहीं पीना चाहिए और घण्टा भर ठहर कर पीना चाहिए तथा
कोई भोजन के मध्य में अमृत कहते हैं जैसे कहा है—
अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम् ।
भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम् ॥
अर्थ—अपच के समय जलपान ओषध का काम करता है और
पच जाने पर जलपान बल-वृद्धि करता है। भोजन के बीच थोड़ा
सा जलपान अमृत के तुल्य होता है और भोजन के अन्त में पानी
पीना विष के समान है।
भोजन के आरम्भ में तीन आचमन अवश्य कर लेना चाहिए
उससे कण्ठ गीला हो जाता है और प्यास पैदा नहीं होने देता।
असली कोकशास्त्र ३८१
भोजन के मध्य में जल पीने से अन्न की मात्रा घट जाती है, अन्यथा
अन्न का भाग अधिक हो जाने से आलस्य उत्पन्न करता है और
जल आलस्य विनाश करने वाला है। अत्यन्त ग्रास चबाने से प्यास
स्वयं ही कम लगती है और जो लगती भी है वह उचित ही है।
उसके अनुसार जल पीना अमृत कहा गया है यदि अधिक लगती
हो तो कोई उदर-विकार समझना चाहिए। तब भोजन कम कर
देना उचित है। घण्टाभर के बाद जब प्यास लगे तब थोड़ा-थोड़ा
कर खूब जल पीना उत्तम है इससे उदर-विकार पच जायगा। भोजन
के अन्त में भी तीन आचमन मात्र करके उठ जाना चाहिए। जिन
लोगों का मत भोजन में जल का निषेध है वे भोजन के अध घण्टा
पूर्व जल का विधान करते हैं। उसके विधान का भी यही आशय
निकलता है कि अन्न की मात्रा घटायी जाय। क्योंकि जब पेट में
जल रहेगा तो सुतरां अन्न कम खाया जायगा।
—०—
भोजन करने का समय
प्रातःकाल १० बजे से १२ बजे तक, और सायंकाल को ८ बजे
तक अवश्य भोजन कर लेना चाहिए। इसके पश्चात् भोजन करना
रोगों को निमन्त्रण देना है क्योंकि सूर्य के तेज की वृद्धि के साथ-
साथ हमारी जठराग्नि की भी वृद्धि होती जो अन्नपाचन में बड़ी
सहायता देती है और सायंकाल का भोजन अत्यन्त हलका और
३८२ असली कोकशास्त्र
स्वल्प होना चाहिए जो केवल जठराग्नि की सहायता से ही हजम
हो जाय । जैसे थोड़ा गर्म दूध थोड़ी चीनी डालकर धीरे-धीरे घूँट
घूँट कर पीना चाहिए। दवाई को छोड़कर रात को अधिक गर्म
दूध न पीना चाहिए क्योंकि उत्तेजना पैदा कर वह स्वप्नदोष भी
पैदा कर देता है।
ताजा भोजन
भोजन सदैव ताजा करना उत्तम है। बासी अन्न तमोगुणी
होकर बल, बुद्धि और आयु का हरने वाला है तथा रोगकर भी
होता है। इस लिए सर्वथा त्याज्य है। ताजा भोजन अवश्य हो
किन्तु अत्यन्त गरम न होना चाहिए, कवोष्ण (थोड़ा गरम)
अर्थात् शरीर की गर्मी के समान गरम हो। लोग बहुत गरम
भोजन करते, और उस पर अत्यन्त शीतल जल, गरमी के दिन हों
तो बरफ़ डालकर पीते हैं। वे बहुत ही बुरा करते हैं। क्योंकि
गरम भोजन से दाँत गरम हो जाते हैं और उन पर ठण्डा पानी
लगने पर गरम, सर्द मसूड़े हो जाते हैं। जिसका परिणाम यह होता
है कि असमय ही दाँत हिलकर गिर जाते हैं। दूसरे पानी भी
अधिक पीने में आता है जिससे बहज़मी रोग उत्पन्न हो जाता है।
ठण्डा भोजन करने से अधिक ठण्डा पानी पीने की विशेष इच्छा
नहीं होती और न अधिक पीने में ही आता है। गरम रोटी ठीक
चबाने में भी नहीं आती जो देर-हजम और अजीर्णता उत्पन्न करती है।
असली कोकशास्त्र ३८३
अहार विचार
फलाहार, दुग्धाहार, अन्नाहार, माँसाहार, रक्ताहार, मृतिका-
हार, काष्ठाहार, रसाहार, पवनाहार इस प्रकार मिलाकर नौ प्रकार
के आहार होते हैं। ये उपरोक्त आहार संसारी जीवों के हैं। जिनमें
से पहले के चार प्रसिद्ध और उत्तर के पाँच अप्रसिद्ध हैं। इस लिए
हम उलटी ओर से विचार करेंगे।
पवनाहार
सर्प का मुख्य आहार पवन है। वह मिट्टी और ओस भी
चाटता है। ऐसा अनुभवी लोगों का कहना है कि—
सर्पा पिवन्ति पवनं न च दुर्बलाःते,
कन्दैर्फलैर्मु निवराः क्षपयन्तिकालम् ।
इत्यादि वचनों से सर्प का पवनभक्षी होना स्पष्ट सिद्ध होता
है। इसी प्रकार गोजर, कानसलाई, बिच्छू आदि भी वायु-भक्षी
हैं। ये बड़े हितकारी जीव हैं क्योंकि वायु में रहने वाला विष ही
इनकी खुराक है, जो हम लोगों के शरीर से मल-मूत्र और श्वासादि
द्वारा निकला हुआ विष वायु में मिला होता है उसे ही ये खाते हैं
इसी लिए ये गन्दे स्थानों पर ही रहते हैं और साफ स्थानों पर नहीं।
यदि आप अपने घर साफ सुथरे रक्खेंगे तो वे वहाँ नहीं आयेंगे,
क्योंकि वहाँ उनकी खुराक नहीं मिलती। जब नये अन्न शाक-पात
३८४ असली कोकशास्त्र
घास आदि उत्पन्न होते हैं उस समय उनमें विष होता है उस
कभी विषैली घास को जो पशु खाता है, उसका पेट फूल जाता है
और वह मर जाता है। रात को जब ओस उन पर पड़ जाती है
तो उन घासादि का विष पत्तों पर पड़े ओस के विन्दुओं में आ
जाता है जिसे सर्प बड़े प्रेम से चाट लेता है। इसी लिए किसी
जीव को नहीं मारना चाहिए। क्योंकि परमात्मा ने इन्हें हमारे
हित के लिए रचा है।
रसाहार
जो जीव केवल रस पीकर ही जीते हैं उनको रसाहारी कहते
हैं। जैसे शहद की मक्खी, भ्रमर आदि ये सदैव फूल पत्तों आदि
के रसों को चूसते हैं और अपना जीवन निर्वाह करते हैं।
काष्ठाहार
काष्ठाहारी वे जीव हैं जो काष्ठ खाकर अपनी जीवन यात्रा
पूरी करते हैं। जैसे घुन या काष्ठ का कीड़ा जो काष्ठ में रहता और
काष्ठ ही खाता है। व्हाइल आट अर्थात् काठ में रहने वाले सफेद
कीड़े दोमक आदि।
मृत्तिकाहार
मृत्तिकाहारी वे ही जीव हैं जो मिट्टी खाते हैं। वे प्रायः बरसात
में पैदा होते हैं। जैसे,-केचुआ आदि, जब वे हगते हैं तो उनका
पाखाना रात को चमकता है। यह भगवान की अद्भुत महिमा है।
२५ असली कोकशास्त्र ३८५
रक्ताहार
रक्ताहारी वे जीव हैं जो केवल रक्तपान करके जीवन धारण
करते हैं। जैसे जूँ, खटमल आदि। इस प्रकार के जीव प्रायः
प्राणियों के शरीरों पर रहते हैं।
मांसाहार
मांसाहारी वे ही जीव हैं जो केवल अपना जीवन मांस से ही
यापन करते हैं। जैसे शेर, चीता आदि जो प्रायः जंगलों में रहते
हैं और जल में भी।
अन्नाहार
अन्न पर जिनका जीवन निर्भर है वे अन्नाहारी हैं। अर्थात्
मनुष्यादि अनेक जीव हैं।
दुग्धाहार
मनुष्य का दूसरा भोजन दुग्ध है। प्रायः अन्न के साथ इसे
दूध का आहार करना पड़ता है। क्योंकि इसके बिना रूक्ष भोजन
अधिक खाना पड़ता है। जो हानिप्रद होता है। दुध के बिना घी
भी नहीं मिल सकता जो परमावश्यक है। अस्तु-यह रहा मिलि-
ताहार। जब मनुष्य को योगाभ्यास की आवश्यकता पड़ती है तब
अन्न भारी और मलाबद्ध होता है—उस समय दूध ही उत्तम आहार
होता है जो तर पुष्ट और हलका होता है। बचपन में तो अनेक
३८६ असली कोकशास्त्र
जीव दुग्धाहारी होते हैं। किन्तु फिर नहीं रहते। मनुष्य ही बुद्धि
बल से अपनी लाभदायक वस्तुओं का संग्रह कर लेता है यही इसमें
पशु आदि से विशेषता है। इसी लिए इसे मनुष्य कहते हैं।
फलाहार
यह सबसे उत्तम आहार है। क्योंकि प्रकृति इन्हें बनाती है।
जमीन से पानी खिंचकर स्वच्छ छना हुआ जिसमें किसी प्रकार
का विकार नहीं रहता वह फल में संचित होता है और सूर्य की
किरणों के ताप से पकता है। जिस वस्तु पर सूर्य का प्रकाश और
सूर्य की गरमी तथा चन्द्र की सुधावर्षिणी रश्मियों का संसर्ग हुआ
हो तथा जिसने वायु के पवित्र झोकों में कई महीने दिन रात अठ-
खेलियाँ की हों। वह अमृत रस भरा प्रकृति देवी का पैक किया हुआ
ताजा फल, जब हमें मिले तब भला उसकी बराबरी कौन कर
सकता है। सबसे अधिक स्वास्थ्यप्रद बल और तेज को देने वाला
है। बानर को देखो कितना छोटा होता है और बड़े से बड़े पेड़ को
हिला डालता है, छोटी-छोटी भुजाओं के बल कितना लम्बा कूदता
है। तथा कितनी फुरती रखता है। वह अधिक फलों का ही सेवन
करता है। अन्न की अपेक्षा इससे मल बहुत कम तैयार होता है।
अधिक से अधिक लाभ देने वाली वस्तु हमें फलों से मिलती है।
फलों से कन्द, मूल, शाकपात, आदि सभी का ग्रहण हो जाता है।
—०—