रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
३५८ असली कोकशास्त्र
पित्त ज्वर
सिरयाई, नीलोफर, गम्भारी, गिलोय, पद्मकाष्ठ और पित्त-
पापड़ा का क्वाथ बालकों के पित्त-ज्वर को दूर भगाता है। नागर-
मोथा, पित्तपापड़ा, खस, नेत्रवाला, पद्मकाष्ठ का क्वाथ ठण्ढा
करके पिलाने से प्यास, दाह, वमन और ज्वर का शीघ्र नाश हो
जाता है।
बाँसा, पित्तपापड़ा, खस, नीम की छाल, चिरायता इनके क्वाथ
का सेवन कराने से वमन, श्वास-कास और पित्त ज्वर दूर होता है।
—:०:—
अन्य ज्वर
हरड़ की छाल, आँवला, पीपल छोटी, चीता इनके सेवन से
सन्निपात ज्वर और कफ ज्वर नष्ट हो जाता है। इन चारों चीजों
का योग बड़ा ही पाचक और दस्तावर है।
काली मिर्च, कायफल, काकड़ासिंगी, पोखरमूल, छोटी पीपल
इन चीजों में से एक या दो को अथवा सबको लेकर चूर्ण बनावे।
बाद उस चूर्ण को अदरक के रस और शहद के साथ चटाने से
बालक का कफ ज्वर, अरुचि, श्वास और शूल नष्ट हो जाता है।
फालसा, कमलनाल, धान की खील और मिश्री को रात में
भिगो दे। सबेरे कपड़े से छानकर शहद मिलाकर पिलाने से बालक
का वात-पित्त-ज्वर, दाह, प्यास, मूर्च्छा, अरुचि, भ्रम रक्त-पित्त
असली कोकशास्त्र ३५६
आदि का शमन होता है ।
नागरमोथा, गिलोय, पित्तपापड़ा, पोहकरमूल, परवल, धनियाँ,
चिरायता, लाल चन्दन, खस, खरेटी, नेत्रवाला का क्वाथ पिलाने
से पित्त-कफ ज्वर नष्ट हो जाता है ।
बाँसा, कटहली की जड़ और पीपल का अवलेह शीत ज्वर को
नष्ट कर देता है । या कटहली की जड़, गिलोय, जवासा, कुटकी,
चिरायता का क्वाथ भी शीघ्र शीत ज्वर का संहार करता है ।
इस बात का ध्यान रहे कि चढ़े ज्वर में किसी प्रकार की भी
दवा नहीं देनी चाहिए। यदि दवा देने से एक-दो दिन पहले रेंडी
का तेल देकर दस्त करा दिया जाय तो बहुत उत्तम हो। दस्त हो
जाने से लाद की गर्मी शान्त हो जाती है, ज्वर का वेग भी कम
हो जाता है और दवा अधिक तेजी से रोग का नाश करने में
समर्थ होती है ।
कंजे की पिसी हुई भींगी एक माशा और काली मिर्च दो रत्ती
पीसकर अथवा अतीस डेढ़ माशा और काली मिर्च दो रत्ती ये
एक बार की मात्रायें हैं । यदि शरीर ठण्ढा हो और बुखार न हो
तो ठण्ढे पानी के साथ फँका देना चाहिए। सुबह और शाम दो में
से एक दवा सेवन कराने से बालक का बुखार छूट जाता है। यदि
शाम के वक्त बालक का शरीर गरम हो आता हो तो छटाँक भर
पानी में चार रत्ती सोरा और एक माशा पक्की चीनी घोलकर पिला
दे । बाद कम्बल से शरीर ढँक दे, ताकि पसीना हो जाय । यदि
३६० असली कोकशास्त्र
बुखार के साथ आँव के दस्त भी आते हों तो हींग एक रत्ती,
अफीम चौथाई रत्ती और काली मिर्च आधी रत्ती की एक-एक
गोली बनाकर सुबह-शाम एक गोली खिलावे । आँव पड़ते समय
तक रोटी आदि न खिलाकर चावल और दही खिलाना चाहिए ।
ऊपर की मात्रा युवक मनुष्य की है । बालक की मात्रा इससे कम
होनी चाहिए ।
—०—
लार गिरना
बहुत से बच्चों के मुख से लार गिरा करता है, यहाँ तक कि
कितने ही बालकों की छाती पर रूईदार टुकड़ा बँधा रहता है ओर
वह थोड़ी ही देर में भीग जाता है। ऐसे लड़कों के लिए दो तोले
मस्तगी, दो तोले बड़ी इलाइची के दाने कूट कर पावभर चीनी की
चाशनी में जमाकर रख दे और प्रतिदिन एक या दो माशे खिलाना
चाहिए । इससे लार का गिरना बन्द हो जाता है ।
—:०:—
कर्ण रोग
कमेरा, बिजौरा का अर्क, अदरक का अर्क इन सब चीजों को
गरम करके कान में डालने से कान की पीड़ा शान्त हो जाती है ।
आक के पीले पत्ते पर तेल पोतकर उसे तप्त तवे के ऊपर गरम
करना चाहिए । बाद उसका अर्क कान में निचोड़ देना चाहिए ।
असली कोकशास्त्र ३६१
यह दवा भी कान के दर्द को बहुत शीघ्र हर लेती है।
स्त्री के दूध में रसोत घिसकर उसमें शहद मिला, कान में
डालने से कान का बहना, बदबू, पीड़ा, कर्णशूल से होने वाला शिर
दर्द आदि रोग फौरन अच्छे हो जाते हैं।
लोध को महीन पीसकर कान में डाल देने से कान का बहना
और दर्द होना बन्द हो जाता है।
लड़के वाली स्त्री के दूध की चार-पाँच बूँदे कान में टपका
देने से कान का दर्द आसानी से मिट जाता है।
यदि कान के इर्द-गिर्द सूजन हो तो वटवृक्ष की जटा को तीन
दाने काली मिर्च के साथ पीसकर आग पर गरम कर ले और
कपड़े पर रखकर उसका रस कान में टपका दे। थोड़ा सा कान के
आस-पास भी लगा देना चाहिए। दिनभर में तीन-चार बार डालने
से कान का रोग दूर होने लग जाता है।
यदि कान बहता हो तो हाइड्रोजन पराक्साइड अंग्रेजी दवा है)
से साफ कर डालना चाहिए। कान की पीड़ा में भी इस दवा से
काम लेना बड़ा ही लाभदायक है; क्योंकि इससे कान की सब मैल
फूल जाता है और रुई से बड़ी सरलता पूर्वक बाहर निकल आती है।
बहुत से बच्चों के कान में बहुधा पोड़ा हुआ करती है। इस
लिए ऐसे बच्चों पर सदा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि
लकड़ी से कान खोदते तो नहीं; कारण यह कि कान खोदने से
बहुत जल्द उसमें रोग पैदा हो जाता है।
३६२ असली कोकशास्त्र
दाँत निकलना
दाँतो का निकलना जब प्रारम्भ होता है, तब बालकों को बड़ा
कष्ट होता है। प्रायः सात-आठ महीने की आयु में दाँत का निक-
लना शुरू होता है। इस समय तरह-तरह के विकार पैदा होते हैं
बहुत सी माताएं अपनी मूर्खता के कारण इस बात पर ध्यान ही
नहीं देतीं कि ये सब उपद्रव दांत निकलने के हैं ओर वे अंट-संट
औषधियाँ करने में लग जाती हैं। जिसका परिणाम बहुत ही बुरा
होता है। दाँत निकलते समय बड़ी सावधानी से काम लेना चाहिए
जब बालक के दाँत निकलने वाले होते हैं, तब साधारणतया ये
लक्षण दिखलायी पड़ते हैं:—
१—बालक के मुख से लार गिरने लगती है और उसके मसूड़े
गरम और लाल हो जाते हैं।
२—बच्चा अपनी अंगुलियों को चबाता है। प्यास अधिक
लगती है। इसीसे वह बार-बार दूध पीने को करता है परन्तु
पिलाने पर पीता नहीं। माता का स्तन मुख में ले-लेकर छोड़ दिया
करता है।
३—रोते समय उसके गालों का रंग लाल हो जाता है।
४—किसी-किसी बच्चे को दस्त भी होने लगता है।
जब ये लक्षण दिखलायी पड़े, तो समझना चाहिए कि अब
बहुत जल्द दाँत निकलने वाले हैं। सुगमता से दाँत निकलने के
असली कोकशास्त्र ३६३
लिए उत्तम उपाय यह है कि शहद में सुहागा और नमक पीसकर
मिला दे और फिर उसे मसूड़ों पर दिन भर में कई बार चुपड़ दिया
करे। अथवा मुलहठी छीलकर बालक के गले में बांध दे, जिसमें
वह उसको चूसा करे।
दाँत निकलते समय बालक को खट्टी चीज न खिलावे। इस
समय यदि माता स्तन-पान न करावे तो बड़ा ही अच्छा हो। इसके
छुड़ाने का सरल उपाय यह है कि माता चार-छः दिन भोजन कम
करे जिसमें दूध का उतरना बन्द हो जाय और छः माशे सफेद खरी
और चार रत्ती कपूर पानी में पीसकर स्तनों पर मल दिया करे।
दस-बारह दिन ऐसा करने से बालक अपने अपने-आप ही दूध
पीना छोड़ देता है। परन्तु गाय का दूध बालक को मजे में पिला
दिया करे और अन्न कम खिलावे। मजे में पिलाने का यह मतलब नहीं
है कि ऐसा पिला दे जिससे बच्चे को अपच हो जाय—जैसा कि
आजकल बहुधा स्त्रियाँ करती हैं। यदि दांत निकलते समय बालक
को दस्त होने लगें तो बहुत ही उत्तम हो। हां, यदि अधिक दस्त
आते हों तो बेलगिरी और रूमी मस्तगी मिलाकर जरा-जरा सा
खिला देना चाहिए।
कभी-कभी बालक को इसमें बड़ा कष्ट होता है। मसूड़े लाल
होकर फूल आते हैं, गरम रहते हैं, दर्द करते हैं, दूध नहीं पिया
जाता, कण्ठ सूखा रहता है, ज्वर हो आता है, हर वक्त चेहरा लाल
रहता है, सोते-सोते बालक चिहुँक कर रोने लगता है और पेट
३६४ असली कोकशास्त्र
जोरों से चलने लगता है। ऐसी दशा में किसी अच्छे डाक्टर से
मसूड़ों को चिरवा देना बड़ा ही लाभदायक है। इससे बालक का
कष्ट बहुत ही कम हो जाता है और दाँत जल्द निकल आते हैं।
इन्हीं दिनों बच्चों के कान के पीछे गिल्टी भी निकल आती
है। उस गिल्टी को गरम पानी में दूध डालकर धो देना चाहिए।
इस समय बालक का आहार भी घटा देना चाहिए।
—०—
संग्रहणी
यदि बालक को खिलायी-पिलायी चीज हजम न हो तो आधी
छटाँक खाने का चूना परात में रखकर पतला धार से उसके ऊपर
ढाई सेर पानी का तरेग दे; ऐसा करने से सब चूना पानी में मिल
जाता है। दो घण्टे के बाद जब चूना नीचे बैठ जाय तब उस पानी
को दूसरे बर्तन में निथार ले। आधे घण्टे के बाद फिर दोबारा इस
पानी को किसी साफ बर्तन में निथारे—ताकि चूने का जरा भी
अंश पानी में न रह जाय। फिर यही जल थोड़ा-थोड़ा बालक के
दूध में मिलाकर पिलाया करे। इससे बालक की उल्टी और फटे
दस्तों का आना बन्द हो जाता है।
अजवाइन, सफेद जीरा, सोंठ मिर्च, छोटी पीपल और कूड़े
की छाल का चूर्ण शहद के साथ चटाने से भी बालकों की संग्रहणी
बहुत जल्द नष्ट हो जाती है।
असली कोकशास्त्र ३६५
मुख में छाले
शीतल चीनी और सफेद कत्था पीसकर शहद के साथ
चटाने से मुख के छाले अच्छे हो जाते हैं।
केले पर पड़ी हुई ओस चाटने से भी मुँह में पड़े हुए छाले
बहुत जल्द अच्छे हो जाते हैं।
कपूर और शीतल चीनी पीसकर मुख के भीतरी भाग में
लगाना भी बड़ा लाभदायक है।
यदि बालक के मुख में सफेद छाले पड़ गये हों और मुख का
रंग लाल हो गया हो तथा लार अधिक गिरता हो तो बालक के
मुख में पड़े हुए छालों के ऊपर छोटी इलायची के बीज, सफेद
कत्था और वंशलोचन पीसकर बुरक देना चाहिए। अथवा दो
रत्ती सुहागा और सात रत्ती गेहूँ का सत पीसकर मुख में मल दें।
—*—
चेचक
यदि बालक को आजन्म के लिए इस रोग से बचाना हो तो
माता पिता का कर्त्तव्य है कि रजोदर्शन से सोलहवें दिन गर्भाधान
करें। सोलहवें रात में गर्भाशय होने से जो बालक उत्पन्न होता है
उसे प्रायः चेचक की बीमारी नहीं होती। कारण यह कि उस दिन
का रज बिलकुल शुद्ध होता है और शीतला रोग माता के रज
३६६ असली कोकशास्त्र
विकार के कारण ही बालकों को हुआ करता है। माता के उदर में
बालक जिस रुधिर से पलता है, उसी के विकार से शीतला रोग
होता है।
यह रोग छुआछूत से भी हो जाता है। यदि घर में एक बच्चे
को यह रोग हो जाय तो घरवालों का कर्त्तव्य है कि वे घर के और
बच्चों को चेचक-रोगी के पास हर्गिज न जाने दें और सयानी
खियाँ ही स्वतंत्रता के साथ रोगी की सेवा किया करें। इसे रोकने
के लिए सबसे अच्छा ओर सरल उपाय तो टीका लगवाना है।
टीका लग जाने पर शीतला निकल जाने की बहुत कुछ आशंका जाती
रहती है। ऐसी दशा में यदि यह रोग होता भी है तो अधिक जोर
दार नहीं होता।
शीतला रोग साधारणतया दो प्रकार का होता है यहाँ पर
भेदोपभेद लिखने की आवश्यकता नहीं है। अतः उस उलझन में
न पड़कर रोग का यत्न बतलाना ही विशेष प्रयोजनीय है।
कचनार वृक्ष की छाल के क्वाथ में एक रत्ती सोनामक्खी
भस्म बुरक कर बालक को पिलाने से भोतर बढ़ो हुई शोतला शीघ्र
बाहर निकल आती है। तुलसी की पत्तियां खिलाने से भी शीतला
बाहर निकल आती है। तुलसो को पत्तियों की धूप भो शोतला
रोगी को लाभ पहुँचाती है।
चेचक की बीमारी में उड़द की दाल और मीठा नहीं खिलाना
चाहिये। माता को भी इन चीजों से बचकर ठंढी चीजों का सेवन
असली कोकशास्त्र ३६७
करना उचित है। जब चेचक के दाने बालक के शरीर पर दिख-
लायी पड़ने लग जायँ तब माता को चार चार तोला गोला स्वयं
खाना चाहिए और यदि बालक दो वर्ष का हो तो दो तोला गोला
उसे भी खिलाना लाभदायक है। दो वर्ष के ऊपर के बालक को
जितने वर्ष की अवस्था हो उतना तोला खिलाना चाहिए। इसके
सेवन से चेचक के दाने अधिकता से नहीं निकलते।
मोती अथवा मोती के सीप, कछुए की खोपड़ी तथा मूँगा इन
चीजों को जल से पीसकर बालक को पिलाने से चेचक से होने
वाली पीड़ा शान्त हो जाती है। उक्त वस्तुओं को लौंग के जल में
घिसकर पिलाने से छोटी शीतला शान्त हो जाती है। पीछे कही
गयी नाल में भरी हुई मोती का सेवन दस दिन तक करा देने से
तो बालक को चेचक का भय रही नहीं जाता।
इस बीमारी में बालक को बहुत स्वच्छ और हवादार स्थान में
रखना चाहिए। कुछ लोगों की राय है कि अँधेरे मकान में रखना
चाहिए, जिसमें शीतला के रोगी पर किसी की परछाहीं न पड़ने
पावे; क्योंकि परछाहीं पड़ने से बालक के मुख पर दाग पड़ जाते हैं।
हैं। पर वास्तव में यह बात ठीक नहीं है। दाग पड़ने का कारण
छाया नहीं है, बल्कि घाव का देर में अच्छा होना है। जब खाज
चलने पर बालक उसे खुजला देता है अथवा और किसी कारण से
घाव देर में अच्छा होता है, तब वहाँ दाग पड़ जाता है। इसलिए
दाग न पड़ने देने के लिए बालक के हाथों में कपड़े की थैली लगा
३६८ असली कोकशास्त्र
देना आवश्यक है। यद्यपि इससे कोई विशेष लाभ तो नहीं होता,
क्योंकि हाथ में थैली लगी रहने पर बालक दरेर कर खुजलाता है
और घाव कर ही देता है; तथापि इतना फायदा तो अवश्य ही
होता है कि बालक आसानी से अंग को खुजला नहीं सकता और
जहाँ खुजलाता है वहाँ विषैला नाखून नहीं लगा सकता।
खुजली निवारण करने के लिए कबूतर के पंख से मक्खन या
मलाई खुजली के स्थान पर लगा देना चाहिए। अथवा चूने के पानी
में नारियल का तेल फेट कर लगा देना चाहिए। इसके लगाने से
दाग नहीं पड़ता और रोगी बालक को आराम मिलता है।
जब शीतला के दाने फूट जायें, तब सिर्सा, पीपल, लिसोरा
और गूलर को छाल को जलाकर उसकी पिसी हुई राख में घी
मिलाकर फफोलों पर लगाना चाहिए। इससे दाने बहुत जल्द
अच्छे हो जाते हैं।
—*—
खुजली
यदि बालक को खुजली हो जाय तो चूने के साफ पानी में
कड़वा तेल डालकर खूब हिलावे। जब वह गाढ़ा हो जाय, तब रुई
के फाहे से खुजली पर लगा दे।
तेली को कोल्हू का पुराना पाचर जो खूब तेल खाये हुए हो,
लाकर उस लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़े करके एक मिट्टी के बर्त्तन
२४ असली कोकशास्त्र ३६६
में नीचे छेद करके भर दे। छेद में कपड़े की बत्ती [...] कर लगा
दे। बाद जमीन में एक गढ़ा खोदकर एक बर्त्तन रख और उसके
ऊपर लकड़ी से भरी हुई छेदवाली हँडी रख दे। फिर उस बर्त्तन
या मुँह अच्छी तरह से बन्द करके उसके ऊपर गोहरी सुलगा दे।
इस प्रकार आँच पाकर जब लकड़ी का तेल नीचे के बर्त्तन में टपक
जाय, तब उसे बोतल में भर कर धर दे ओर वही तेल खुजली में
लगावे। यह तेल स्त्री-पुरुष सबकी खुजली को नष्ट कर देता है;
किन्तु अत्यन्त छोटे बच्चों को यह तेल न लगाना चाहिए; क्योंकि
यह कुछ-कुछ चुन चुनाता है।
—*—
मसान
यह रोग अधिकतर सौर में उत्पन्न होता है। इस रोग की
उत्पत्ति गन्दगी के कारण होती है। इसमें बालक की पसली चलने
लगती है, ज्वर भी हो आता है। पसलियों में कफ जम जाता है।
कभी तो दस्त होते हैं और कभी नहीं होते। बालक अचेत रहता
है। यह सर्द और गर्म दो प्रकार का होता है। इस रोग में दस्त
करा देना बड़ा ही लाभदायक है। गर्म से होने वाले मसान में तो
कोई डर नहीं रहता, परन्तु सर्दी से होने वाले मसान में भय रहता
है। इसकी दवा यह है:—
कबीला, चूना, नीलाथोथा, बड़ी हड़, बहेड़े का छिलका, और
३७० असली कोकशास्त्र
सफेद कत्था इन सबको सम-मात्रा में ले कूट-छान कर गोली बना
ले। फिर इसको घी में मिलाकर बालक की पसली पर लेप कर दे।
अथवा, कंजे का बीज एक, नीलाथोथा एक रत्ती इन दोनों चीजों
को पीसकर सरसो के बराबर की गोली बनाकर रख दे और एक
गोली प्रति दिन बच्चे को खिलाया करे। या रेंडी का तेल बालक
के पेट पर मलकर बकाइन के पत्ते गरम करके बाँध दे।
यदि बालक के शरीर पर लाल चकत्ते पड़ गये हों और ज्वर
भी हो तथा वे ऐसे हों कि आज पेट पर दिखलायी पड़ें तो कल
जाँघों पर दिखलायी पड़ें और परसों मुख पर निकल आवें, तो
बैंतरा सोंठ का चूर्ण पावभर, दही आधपाव, छोटी पीपल आधपाव
इन सबको मिट्टी की हाँड़ी में भर कर उसका मुँह बन्द कर दे।
बाद एक गढ़ा खोदे और उसमें हाँड़ी रखकर चारो ओर से गोहरी
धर के आग लगा दे। जब गोहरी जलकर राख हो जाय तब उस
राख को निकाल कर दूसरी गोहरी भर कर फिर आग लगा दे।
इस प्रकार तीन आँच देकर ठण्ढा हो जाने पर हाँड़ी में से रत्ती-
रत्ती भर सब दवा निकाल कर शीशी में रख मजबूती से काग
लगा दे। फिर यही दवा माता के दूध में चावल भर दे। यदि रोग
का बल अधिक हो तो एक रत्ती अदरक का रस और छः रत्ती
शहद मिलाकर तीन दिन तक दोनों वक्त दे।
—*—
असली कोकशास्त्र ३७१
पसली
यदि बालक की पसली चलती हो तो तुलसीदल के चार रत्ती
रस में एक माशा शहद मिलाकर देना चाहिए और नीचे लिखे
तेल को पेट पर मलकर सेंक देना चाहिए ।
तेल बनाने की रीति
अदरख और लहसुन के दो-दो तोले रस में आधी छटाँक
मीठा तेल मिलाकर मधुर आँच से पकावे । जब जलकर केवल तेल
रह जाय, तब उसे एक शीशी में भरकर रख दे । जिस बालक को
बहुधा पसली का रोग हो जाता हो उसके पेट पर ऊपर की रीति
से मालिश किया करे ।
पेट बढ़ना
यदि बालक का पेट बढ़ आवे तो शहद का शर्बत थोड़ा-थोड़ा
करके पिलाना चाहिए । कुछ दिनों तक इसका सेवन करने से पेट
पचकर ठीक हो जाता है ।
३७२ असली कोकशास्त्र
चिलहक
अगर पेशाब करते समय बालक रोने लगे और इन्द्रिय को
पकड़-पकड़ कर नोचे तो जान लेना चाहिए कि पेशाब करने में
चिलहक पैदा हो रही है। इसके लिए थोड़े से बबूल के गोंद को
कपड़े में बाँधकर पानी में भिगो दे। बाद उस पानी में मिश्री मिला-
कर दिनभर में पाँच-छः बार पिलावे। अथवा धनियाँ को पानी में
भिगोकर रातभर रहने दे और सबेरे छानकर मिश्री मिला मिट्टी के
नये बर्त्तन में रख दे और थोड़ा-थोड़ा करके पिलावे । यह इन्द्रिय
जुलाब है। इससे गर्मी शान्त हो जाती है और पेशाब के समय
होने वाला चिलहक फौरन ही शान्त हो जाता है। या पत्थर की
बेर (यह यहूद देश का पत्थर है और इसे 'हजरुल यहूद' कहा
जाता है—पंसारियों के यहाँ मिलती है) को पानी में घिसकर
पिलाने से भी चिलहक दूर हो जाती है।
—०—
नाक से रुधिर बहना
शंखपुष्पी (कौड़ेनी) को मिर्च के साथ पीसकर सेवन करने
से विनाश का फूटना बन्द हो जाता। बच्चों को बहुत थोड़ी मात्रा
में यह चीज देनी चाहिए; क्योंकि यह बहुत ही तर चीज है।
अनार के फूल का रस और सफेद दूब का रस इन दोनों से
असली कोकशास्त्र १७३
दिनभर में दो-तीन बार नास लेने से भी रुधिर का गिरना बन्द
हो जाता है। अथवा फिटकिरी का पानी सूँघे।
यदि नाक में कीड़े पड़ गये हों तो पिंडोल मिट्टी की डली कूट
कर रोगी के मुख पर एक कपड़ा डाल उसी के ऊपर वह मिट्टी
रख दे। आँख बन्द कराकर उसके मस्तक पर भी मिट्टी डाल दे।
बाद धीरे-धीरे उसके ऊपर पानी छिड़के। जब मिट्टी तर हो जाय,
तब पानी छिड़कना बन्द कर दे। इस मिट्टी की सोंधी महक नाक
में जाने से कीड़े बाहर निकल आते हैं। तीन-चार दिन ऐसा करने
से सब कीड़े निकल जाते हैं और रोगी आराम हो जाता है।
—०—
विषूचिका
यदि बालक को हैजा हो जाय तो उसकी दवा बड़ी सावधानी
से करनी चाहिए और सबसे अधिक ध्यान उसकी सफाई पर रखना
चाहिए। कै या दस्त होने पर फोरन उस स्थान को अँगोठी से
तप्त कर देना बहुत ही आवश्यक है इससे हैजे के विषैले कीड़े
मर जाते हैं—बढ़ने नहीं पाते। वमन होने पर उस स्थान को
लीपना बहुत ही बुरा है।
१—प्याज का अर्क सालभर के बच्चे को पाव तोला पन्द्रह-
पन्द्रह मिनट के बाद दस्त-कै बन्द न होने तक देना चाहिए जब
दस्त और कै बन्द हो जाय तब धीरे-धीरे इसे भी दो-तीन खुराक
३७४ असली कोकशास्त्र
देकर बन्द कर देना उचित है। यदि प्यास न बन्द हो तो एक
फूल कच्ची और आधा फूल भुनी हुई लौंग को घिसकर दे देना
उचित है, पर यह मात्रा बड़ी अवस्था वालों की है, बालकों को
कम मात्रा में देनी चाहिए।
२—अफीम, हींग, कपूर और कालीमिर्च पीसकर डेढ़-डेढ़
रत्ती की गोली बनाकर घण्टे-घण्टे पर एक गोली बालक को दे।
कपूर का अर्क पिलाना भी बहुत ही लाभदायक है।
४—कपूर को सुँघाया करे और माता स्वयं भी सूँघा करे।
यदि वह थोड़ा-थोड़ा कपूर खा लिया करे तो और भी अच्छा हो।
बालक के पास रहने में माता को अपने शरीर पर भी पूरी दृष्टि
रखनी चाहिए।
—०—
फूली
यदि आँख में फूली पड़ जाय तो चिरचिटे की जड़ का रस
शुद्ध शहद में मिलाकर आँखों में अंजन लगावे। इससे फूली कट-
कर आँखें निरोग हो जाती हैं।
—०—
असली कोकशास्त्र ३७५
स्वास्थ्य-रक्षा के नियम
१—हर एक खाद्य पदार्थ दाँतों से इतना अधिक पीसकर
खाओ कि उसमें लार पैदा हो जाय । वह शीघ्र पचनेवाला पौष्टिक
और स्वास्थ्यप्रद होता है ।
२—मशीन का आटा तत्त्व-हीन कब्ज करने वाला होने से
रोगकर है और हाथ की चक्की का आटा बल-पुष्टि देनेवाला सुपच
तथा पेट साफ रखने वाला होने से निरोग है ।
३—मशीन में साफ किये चावलों का पोषक तत्त्व निकल
जाता है । इस लिए इस प्रकार की चीजों का खाना निरर्थक है ।
४—आग पर पकाये पदार्थों की अपेक्षा स्वयं सूर्य ताप से पके
पदार्थ अधिक लाभकर होते हैं, जैसे फल आदि ।
५—भोजन के आदि और अन्त में केवल आचमन मात्र
करना चाहिए और इससे अधिक पानी पीना हानिप्रद है । भोजन
के मध्य में थोड़ा जल पीना चाहिए ।
६—जिनको पेट की शिकायत रहती हो उनको पाखाना जाने
के आध घण्टा पूर्व आध सेर पानी पीकर टहल लेना चाहिए । इस
नियम से उनकी शिकायत जाती रहेगी ।
७—सब दालों की अपेक्षा अरहर की दाल देर हजम है ।
८—सब आहारों की अपेक्षा दुग्धाहार उत्तम आहार है तथा
दुग्धाहार की अपेक्षा फलाहार और भी उत्तम है ।
३७६ असली कोकशास्त्र
९—तमाखू, बीड़ी, सिगरेट, गाँजा, चरस, भाँग, शराब,
चाय, काफी आदि जितने मादक द्रव्य हैं, इनको भूलकर भी कभी
सेवन न करे। ये उत्तेजक और स्वास्थ्य बिगाड़ने वाले हैं ।
१०—जब तक पहला भोजन अच्छी प्रकार हजम होकर पेट
साफ न हो जाय तब तक दूसरा भोजन कभी न खाय। इस प्रकार
करने से कभी पेट खराब नहीं होगा ।
११—जिनकी पाचन-शक्ति निर्बल पड़ गयी हो वे निरन्तर
गदरे ( अधकचरे ) फलों का सेवन करें। उनमें फिर यथार्थ-शक्ति
लौट आयगी ।
१२—फलों के पूर्ण पक जाने पर उनमें शक्तियों का हास
आरम्भ हो जाता है अतएव स्वास्थ्य के लिए गदरे अर्थात् अधपके
फल ही अधिक लाभदायक हैं ।
१३—बथुआ, सोआ, पालक आदि हरे शाक-पात सूखे आलू
लौकी आदि की अपेक्षा अधिक शरीर-पोषक और हितकर होते हैं।
छिलकेदार तरकारी अधिक लाभदायक होती है। हरएक शाक को
मन्द-मन्द आंच से अपने ही पानी में गला देना अच्छा है ।
१४—दिन में थोड़ा-थोड़ा कर अनेक बार जल पीना चाहिए ।
जिसका कुल परिमाण तीन सेर तक होना उचित है ।
१५—भूख प्यास लगने पर भोजन और जल का सेवन अवश्य
करना चाहिए। नहीं तो स्वास्थ्य बिगड़ता है ।
१६—पाखाना, पेशाब, जम्हाई, नींद और छींक रोक देने से
असली कोकशास्त्र
चित्र नं १६
चौथा महीना