रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
पृष्ठ 377, कुल 440 में से
संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र ३६७
करना उचित है। जब चेचक के दाने बालक के शरीर पर दिख-
लायी पड़ने लग जायँ तब माता को चार चार तोला गोला स्वयं
खाना चाहिए और यदि बालक दो वर्ष का हो तो दो तोला गोला
उसे भी खिलाना लाभदायक है। दो वर्ष के ऊपर के बालक को
जितने वर्ष की अवस्था हो उतना तोला खिलाना चाहिए। इसके
सेवन से चेचक के दाने अधिकता से नहीं निकलते।
मोती अथवा मोती के सीप, कछुए की खोपड़ी तथा मूँगा इन
चीजों को जल से पीसकर बालक को पिलाने से चेचक से होने
वाली पीड़ा शान्त हो जाती है। उक्त वस्तुओं को लौंग के जल में
घिसकर पिलाने से छोटी शीतला शान्त हो जाती है। पीछे कही
गयी नाल में भरी हुई मोती का सेवन दस दिन तक करा देने से
तो बालक को चेचक का भय रही नहीं जाता।
इस बीमारी में बालक को बहुत स्वच्छ और हवादार स्थान में
रखना चाहिए। कुछ लोगों की राय है कि अँधेरे मकान में रखना
चाहिए, जिसमें शीतला के रोगी पर किसी की परछाहीं न पड़ने
पावे; क्योंकि परछाहीं पड़ने से बालक के मुख पर दाग पड़ जाते हैं।
हैं। पर वास्तव में यह बात ठीक नहीं है। दाग पड़ने का कारण
छाया नहीं है, बल्कि घाव का देर में अच्छा होना है। जब खाज
चलने पर बालक उसे खुजला देता है अथवा और किसी कारण से
घाव देर में अच्छा होता है, तब वहाँ दाग पड़ जाता है। इसलिए
दाग न पड़ने देने के लिए बालक के हाथों में कपड़े की थैली लगा