रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
असली कोकशास्त्र ३०३
७—शान्ति के साथ बैठकर हवा की ओर मुख करके पाँच
मिनट तक साँस खींचो और छोड़ो। इसमें इतनी धीरता से काम
लो कि श्वास-प्रच्छ्वास की आवाज दूसरे को कौन कहे स्वयं तुम्हें
भी सुनायी न पड़े और न हृदय पर उसका धक्का लगने पावे। इस
क्रिया से फेफड़ा शुद्ध रहता है अतः शरीर के रक्त में कोई विकार
उत्पन्न नहीं हो पाता।
स्त्रियों को खूब तड़के उठकर शौच और व्यायाम से निवृत्त हो
जाना चाहिये। गर्भिणी स्त्रियों को अधिक व्यायाम नहीं करना
चाहिए किन्तु कुछ अवश्य करना चाहिए। इस पर पीछे काफी
प्रकाश डाला गया है। गर्भाधान होने के पन्द्रह दिन पहले से
व्यायाम घटा देना उचित है और गर्भ धारण कर चुकने पर एक
महीने तक बड़ी सावधानी से बहुत कम व्यायाम करना चाहिए।
बाद चार महीने तक बचाकर व्यायाम किया जा सकता है; पाँच
महीने का गर्भ हो जानेपर फिर व्यायाम कम कर देना उत्तम है।
३०४ असली कोकशास्त्र
व्यायाम से लाभ
ब्यायाम करने से स्त्रियों का स्वास्थ्य कभी बिगड़ने नहीं पाता
और किसी प्रकार का रोग होने की बहुत ही कम सम्भावना रहती
है। शरीर हल्का और सबल रहता है। भोजन अच्छी तरह हजम
होता है ।
मुख और शरीर की कान्ति हमेशा बनी रहती है । समय से
पहले बुढ़ापा पास नहीं फटकने पाता । कसरत न करने तथा संयम
न रखने के कारण आजकल युवावस्था में ही स्त्रियों के चेहरे पर
वृद्धावस्था झलकने लगता है, कपोल चिचुक जाते हैं, आँखें नीचे
धँस जाती हैं, मस्तक पर शिकन पड़ जाती है और अंग-प्रत्यंग में
शिथिलता आ जाती है। यदि स्त्रियाँ नियमित रूप से ब्यायाम
करें और संयम से रहें तो ऐसा कभी नहीं हो सकता ।
तन्दुरुस्ती ठीक रहने से प्रसव-वेदना बहुत ही कम होती है
तथा हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर सन्तान पैदा होती है । सुखी जीवन
बनाने के लिए तन्दुरुस्ती का ठीक रहना सबसे अधिक आवश्यक
है । तन्दुरुस्ती पर ही दुनियाँ का सुख-दुख निर्भर है। पहले तन्दु-
रुस्ती, पीछे और सब । अमित धन हो, सुन्दर और शिक्षित परि-
वार हो, घर में दास-दासियों की भरमार हो, पर एक तन्दुरुस्ती न
हो तो सारी वस्तुएँ फोकी पड़ जायें । धन का उपभोग कौन कर
सकता है ? तन्दुरुस्त या स्वस्थ मनुष्य । परिवार का आनन्द कध
असली कोकशास्त्र ३०९
मनुष्य हो गये। छः महीने तक तो उनकी स्त्री ने खूब सुश्रूषा
की। बाद उसकी ओर से कुछ लापरवाही होने लगी। घर के और
लोग पहले ही से हाथ खींच बैठे थे। लगातार ग्यारह महीने तक
वह बीमार रहे। कितनी यातना सहकर उनका प्राण निकला,
उसका कारुणिक वर्णन करके पाठक-पाठिकाओं का दिल दुखाना
नहीं चाहता। तन्दुरुस्ती नष्ट होने पर उनकी लाखों की सम्पत्ति
किसी काम न आयी, इस बात की शिक्षा उक्त घटना से अच्छी
तरह मिल सकती है।
व्यायाम से शरीर में बल बढ़ता है और भीरुता दूर होती है।
मौका पड़ने पर दुष्टों के नीच शब्दों का जवाब लात-घूंसे से देने
का साहस होता है। जल्द किसी नीच की बुरी निगाह डालने की
हिम्मत नहीं पड़ती। इससे भोग-विलास की ओर रुचि नहीं बढ़ती
और सदा तबियत मस्त रहती है।
कसरत के द्वारा स्त्रियाँ अपने रूप-यौवन को अधिक दिनों तक
कायम रखकर अपने पति को प्रसन्न रख सकती हैं और पति की
प्रसन्नता से स्वयं भी प्रसन्न रहती हैं।
—:०:—
३०८ असली कोकशास्त्र
स्वस्थ रहने के सरल उपाय
स्वस्थ रहने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है—प्रसन्न रहने
की। मनुष्य के मनोविकार, वृत्तियाँ, इच्छाएँ, बुरे-भले विचार
जिस तरह बदलते रहते हैं, उसी तरह शरीर के अवयवों में भी
परिवर्त्तन होता रहता है। प्रोफेसर एल० मर्गेंट ने वैज्ञानिक प्रयोगों
द्वारा यह सिद्ध करके बतलाया है कि भय, चिन्ता, क्रोध, ईर्ष्या,
द्वेष और उदासीनता से पसीने में, थूक में, श्वास में, तथा खून में
जहरीले पदार्थ पैदा होते हैं और इसके विपरीत प्रेम, दया, आनंद,
सन्तोष, आरोग्य तथा प्रसन्नतापूर्ण विचारों से बलवान बनाने वाले
तत्त्व उत्पन्न होते हैं।
इसीसे इस पुस्तक में स्थल-स्थल पर उत्तम सन्तान पैदा करने
के लिए माता-पिता को उक्त बात पर सदा ध्यान रखने के लिए
चेतावनी दी गयी है। बच्चों की माँ के क्रोधित होने पर उसका दूध
जहरीला हो जाता है और उस समय दूध पीने से कितने ही बालकों
को मूर्छा आ जाती है। शास्त्रकारों ने आदेश किया है कि भोजन
करते समय खूब प्रसन्नचित्त रहना चाहिए । उनके कथन का
असली रहस्य यहाँ है कि भोजन के समय क्रोध, चिन्ता, दुःख
आदि करने से उत्तम से उत्तम बलकारक भोजन भी विष हो
जाता है।
यदि प्रारम्भ से ही स्वास्थ्य-रक्षा के खास-खास नियमों का
असली कोकशास्त्र ३०८
पालन किया जाय और बालकों में आरम्भ से ही इन नियमों पर
चलने की आदत डाली जाय, तो जीवन विशेष सुख और शान्ति से
व्यतीत हो सकता है। बचपन में जिस बात की आदत पड़ जाती
है, वह कभी नहीं छूटती। स्वास्थ्य-रक्षा के साधारण नियम ऐसे
नहीं हैं, जिनका सरलतापूर्वक पालन न किया जा सके, किन्तु जब
मनुष्य की आदत कुछ और ही ढंग की हो जाती है, तब वे ही
सरल नियम पहाड़ से मालूम होने लगते हैं।
अब हम स्वास्थ्य-रक्षा के कुछ उपायों का उल्लेख यहाँ करेंगे,
जिनका पालन करना आलसी मनुष्य के लिए तो अवश्य ही दुरूह
है, पर और किसी भी मनुष्य के लिए कठिन नहीं है —
१—रहने का स्थान खूब हवादार होना चाहिए; किन्तु दूषित
और गन्दी हवा जरा भी न आने पावे। गन्दी हवा और गन्दा
पानी ही नाना प्रकार के रोगों का घर है।
२—अपना प्रत्येक कार्य नियमित समय पर करना चाहिए।
स्वास्थ्य के लिए अनियमित समय पर काम करना पूरा घातक
है। ऐसे आदमी कभी स्वस्थ नहीं कहे जा सकते जो एक दिन तो
तड़के मल-मूत्र त्याग कर निवृत्त हो जाते हैं और दूसरे दिन दोपहर
को टट्टी जाते हैं। इसी प्रकार उनका प्रत्येक कार्य होता रहता है।
ऐसे मनुष्य सम्भव है कि ऊपर से देखने में हृष्ट-पुष्ट और पूर्ण
दिखायी पड़ें, पर वास्तव में वे कदापि स्वस्थ नहीं हैं।
३—शुद्ध, सादा और थोड़ा भोजन करना चाहिए। ठूँस-ठूँस
३१० असली कोकशास्त्र
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कर खाने से स्वस्थता कभी नहीं रह सकती । भोजन धीरे-धीरे
और खूब चबा-चबा कर करना चाहिए । एक ग्रास को चालीस
बार कुचल कर निगलना, पेट में अमृत डालने के समान गुण करता
है । इससे कई लाभ होते हैं । एक तो यह कि थोड़े आहार से
अधिक रक्त तैयार होता है और उस रक्त में किसी प्रकार का दोष
नहीं रहता और दूसरा लाभ यह होता है कि दाँत मजबूत होते
हैं । इस प्रकार चबाकर भोजन करने से पाचन क्रिया बहुत ठीक
काम करती है; मल की रुकावट कभी नहीं होती, चित्त प्रसन्न रहता
है, अच्छी भूख लगती है, पेट में कभी शिकायत नहीं पैदा होती ।
४—भोजन करने के पहले और पीछे हाथ, पैर तथा मुख का
धोना बड़ा ही हितप्रद है ।
५—मल-मूत्र के वेग को कभी न रोको । हमेशा पेट साफ
रक्खो । कबज कभी मत होने दो । यदि कभी इसकी शिकायत
जान पड़े तो फौरन यत्न करो ।
६—दाँत, मसूड़े और जीभ की हमेशा सफाई रक्खो । तथा
कोई ऐसी चीज न खाओ जिससे मुख में जलन पैदा हो । हाँ काली
मिर्च आदि खाने की बात दूसरी है; पर लाल मिर्च को भूलकर
भी मुख में नहीं डालना चाहिए ।
७—प्रति दिन सबेरे उठते ही मल-मूत्र त्याग करके मुख की
सफाई कर डालनी चाहिए । स्नान हमेशा ठण्डे पानी से तड़के कर
लेना बहुत ही लाभदायक है । शरीर की त्वचा को मैल-मिट्टी
और पसीने से बिलकुल साफ रक्खो। नदी के स्वच्छ जल में
स्नान करना सबसे उत्तम है।
८—अपने काम और मौसम के अनुसार हमेशा साफ और
ढीले कपड़े पहनो तथा हर मौसम में खुली हवा में मुख खोलकर
सोने के अभ्यासी बनो।
९—प्रतिदिन नियमित रूप से थोड़ा समय धूप में बिताओ।
और सूर्य से शक्ति लिया करो।
१०—सदा प्रसन्नचित्त रहो और चिन्ता आदि से दूर रहो।
किसी की बुराई मत करो और सृष्टि की प्रत्येक वस्तु से कुछ न
कुछ शिक्षा लेने की चेष्टा करो।
११—ब्रह्मचर्य से रहा करो। वेश्यागामी और पर-स्त्री-गामी
न बनो। इसी प्रकार से जो स्त्रियाँ स्वस्थ रहना चाहें वे पराये
पुरुष को बुरी निगाह से न देखें।
१२—नशे की चीजों से सदा दूर रहो। नशीली चीजों के
सेवन से फेफड़े खराब हो जाते हैं।
१३—भोजन करते समय जितना कम जल पी सको; उतना
ही अच्छा। भोजन करने के घण्टा आध घण्टा बाद इच्छा के
अनुसार जल पिया करो।
१४—प्रतिदिन शुद्ध गोदुग्ध का सेवन किया करो। एक
मनुष्य के लिए २४ घण्टे में सेर भर दूध पीना अत्यन्त
आवश्यक है।
३१२ असली कोकशास्त्र
१५—थोड़ा-सा छाछ (मट्ठा) का सेवन करना बड़ा ही
लाभदायक है। वैद्यक ग्रन्थों में इसकी बड़ी प्रशंसा लिखी है।
स्वास्थ्य के लिए यह बड़ी ही उपयोगी वस्तु है।
१६—अपनी सुविधा के अनुसार ताजे और आरोग्य फलों
का सेवन किया करो।
१७—सबेरे कुछ रात शेष रहते ही उठने की आदत डालो।
शय्या से उठते ही परमात्मा का ध्यान किया करो। बाद शौचादि
से निवृत्त होकर व्यायाम करो। व्यायाम उतना ही करो, जितने से
थकावट न मालूम हो।
१८—चटपटी, मसालेदार और बाजार की बनी हुई चीजें
(मिठाई पूड़ी आदि) कभी मत खाओ।
१९—मुँह से कभी साँस मत लो। यदि इसकी आदत पड़
गयी हो तो शीघ्र इस दोष से अपना पिण्ड छुड़ाओ। मुँह से साँस
लेना बड़ा ही हानिकारक है। कारण यह कि मुँह के रास्ते से जो
हवा भीतर जाती है, वह छनकर नहीं जाती। अतः वायु में उड़ने
वाले अनेक सूक्ष्म तथा विषैले जीवाणु एवं समन्वित धूलि-कण या
ऐसा ही कोई दूसरा मल शरीर के भीतर चला जाता है जो कि
नाना प्रकार के रोग उत्पन्न करने का कारण होता है; किन्तु नासिका
द्वारा साँस लेने से उक्त चीजें नासिका-द्वार में ही अटक जाती हैं।
मुख द्वारा श्वासन-क्रिया करनेवालों के फेफड़े में रोगों को उत्पन्न
करनेवाले नाना प्रकार के परमाणु एकत्र हो जाते हैं। नासिका के
असली कोकशास्त्र
चित्र नं० ११
द्वितीय सप्ताह
चित्र नं० १२
तृतीय सप्ताह
इस पृष्ठ पर मुद्रित पाठ अत्यधिक जीर्ण-शीर्ण, फीका (faded) तथा जल-क्षतिग्रस्त होने के कारण स्पष्ट रूप से पठनीय नहीं है। पृष्ठ पर केवल अत्यंत धुंधले हरे रंग के रेखाचित्र/मुद्रा (emblem/illustration) और अस्पष्ट अक्षरों के अवशेष मात्र दिखाई दे रहे हैं:
[अत्यधिक धुंधला एवं अपाठ्य पाठ]
[अस्पष्ट शीर्षक/मुद्रा]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
असली कोकशास्त्र ३१३
छिद्रों में प्रकृति ने बहुत से बालों की रचना की है । ये बाल हवा
में समन्वित धूलि के कणों को रोगजनक जन्तुओं को तथा ऐसे ही
दूसरे कचरे को फेफड़ों में जाने से रोकते हैं। यह रुका हुआ कचरा
जब मनुष्य वायु को बाहर निकालता है, तब बाहर निकल जाता
है। जो लोग नासिका के भीतर के बालों को कटवाते हैं, वे भारी
भूल करते हैं। इतना ही नहीं, नासिका में एक गुण और भी बड़ा
विचित्र है, वह यह कि शीतकाल में जब बिलकुल ठण्डी हवा
चलती है, तब उसे गर्म करके फेफड़े में पहुँचाती है। इससे फेफड़े
को किसी तरह की हानि नहीं पहुँचती है । किन्तु मुख द्वारा
श्वासन-क्रिया करने से ठण्डी हवा ज्यों की त्यों फेफड़े में जाकर
हानि पहुँचाती है। ठण्डी हवा पहुँचने से कभी कभी फेफड़ों में
सूजन हो आती है । हवा को शुद्ध करने के लिए नासिका एक
प्राकृतिक यन्त्र है, इसका सदा ध्यान रखना चाहिए ।
२०—काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्य आदि विकारों को
प्रतिक्षण दूर रखने के लिए सतर्क रहना चाहिए और दया,
परोपकार, आदि गुणों को धीरे-धीरे अपने हृदय में भरने का प्रयत्न
करना चाहिए ।
२१—भोजन करने के बाद थोड़ा टहल कर चारपाई पर लेटा
करो, किन्तु तुरन्त ही नींद में अचेत न हो जाओ ।
२२—डाक्टर उडली का कहना है कि,—"आरोग्यता प्राप्त
करने के दो मार्ग हैं—(१) ग्राम्य-जीवन, उद्यान-भ्रमण, नियमित
३१४ असली कोकशास्त्र
व्यायाम और स्वच्छ वायु का सेवन (२) सादा तथा हलका
भोजन और निर्मल जल।" ऐसा कौन मूर्ख मनुष्य होगा जो
आरोग्य प्राप्ति के इन प्राकृतिक नियमों को छोड़कर वैद्यों और
डाक्टरों की तरह तरह की औषधियों का सेवन करके धन और
आरोग्य का नाश करेगा।
२३—ऋतु के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को आहार-विहार
करना चाहिए। यह सौभाग्य भारतवर्ष को ही प्राप्त है कि यहाँ
ठीक समय पर गर्मी पड़ती है, ठीक समय पर वर्षा होती है और
ठीक समय पर सर्दी पड़ती है। पाश्चात्य देशों में यह बात नहीं
है। वर्ष में छः ऋतुएँ होती हैं, जिनका क्रम इस प्रकार है।
फाल्गुन और चैत—वसन्त ऋतु
वैशाख और ज्येष्ठ—ग्रीष्म ऋतु
आषाढ़ और श्रावण—वर्षा ऋतु
भाद्रपद और आश्विन—शरद ऋतु
कार्तिक और मार्गशीर्ष—हेमन्त ऋतु
पौष और माघ—शिशिर ऋतु
कुछ आचार्यों ने चैत्र-वैशाख को वसन्त ऋतु मानकर छहों
ऋतुओं का उल्लेख किया है; पर इस विपरीतता में कोई खास
बात नहीं है, अतः कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं।
ऋतु के अनुसार आहार-विहार करने के लिए उनका ज्ञान
असली कोकशास्त्र ३१५
होना अत्यन्तावश्यक है, इस लिए प्रत्येक ऋतु का संक्षेप में परि-
चय करा देना जरूरी है।
वसन्त
वसन्त ऋतु का दूसरा नाम ऋतुराज है। इस ऋतु में दिशाएँ
निर्मल हो जाती हैं तथा सृष्टि की प्रत्येक वस्तु ही नया रूप धारण
करती है। यह ऋतु स्निग्ध है; अतः कफ की वृद्धि होती है और
उसके द्वारा अन्य रोगों की उत्पत्ति होती है। इस ऋतु में कफ का
प्रकोप होता है, इस लिए कफ का शमन करने वाली वस्तुओं का
सेवन करना लाभदायक है।
पौष और माघ में शीत के कारण कफ सञ्चय होता है और
वही संचित कफ वसन्त ऋतु में सूर्यताप से कुपित हो पाचक
अग्नि को दूषित कर रोग को उत्पन्न करता है। इस लिए इस ऋतु
में वमन-विरेचन द्वारा कफ को बाहर निकाल देना चाहिये। वसन्त
ऋतु में चटपटे, रूखे, कड़वे, कसैले और हलके पदार्थों का सेवन
करना हितकर है। खट्टी, मीठी, चिकनी और कष्ट से पचाने वाली
वस्तुओं का सेवन कदापि न करनी चाहिए।
इस ऋतु में गेहूँ, चावल, मूँग, परवल, बैंगन, शहद, जीरा,
अदरख, मूली आदि खाना तथा सोंठ, मिर्च, पीपर, पीपलामूल,
त्रिफला, असगन्ध और हल्दी का सेवन करना विशेष लाभदायक है।
ग्रीष्म
बैसाख और ज्येष्ठ में गर्मी बहुत अधिक पड़ती है। इस ऋतु
३८ असली कोकशास्त्र
लेने से पित्त-जन्य रोगों के उत्पन्न होने की आशंका नहीं रहती ।
इन महीनों में भी, चीनी, मिश्री, जौ, गेहूँ, मूँग, चावल, गरम
दूध, आँवला, परवल, धनियाँ, कमलगट्टा, मुनक्का, नारियल, गुड़-
मिश्रित हड़का चूर्ण, गोभी आदि वस्तुएँ विशेष लाभ पहुँचाती हैं।
शिशिर
पोष और माघ ये दोनों महीने शीतल, स्निग्ध, प्रायः सब
पदार्थों को स्वादिष्ट करनेवाले तथा अग्नि को प्रज्ज्वलित करनेवाले
हैं। इन महीनों में कफ संचय होता है और बल की वृद्धि होती है।
शीत होने से वायु का कोप होता है। इस लिए इन महीनों में
चिकने, रूखे, खट्टे और नमकीन रसों का सेवन ही लाभदायक
है। सुश्रुताचार्य का कथन है:—
“ये दोनों महीने ठण्डे और रूखे हैं। इन महीनों में सूर्य्यताप
मन्द रहता है। हवा तेजी से चलती है। सर्दी के कारण वायु
कुपित होता है। वही वायु सर्दी लगने से कोष्ठ के भीतर पिंडिकासा
हो जाता है और शीघ्र रस को सोख लेता है। इस ऋतु में मधुर,
अम्ल, लवण तथा रस-युक्त पदार्थों का ही भोजन करना चाहिए।
इन महीनों में पौष्टिक, बलवर्द्धक, घी, दूध, मक्खन, मलाई, खाँड़ के
बने हुए पदार्थ अत्यन्त लाभदायक हैं। गेहूँ, उर्द, नये चावलों का
भात, शुद्ध और उत्तम बनी हुई मिठाइयाँ, पाक, बादाम, अखरोट
चिरौंजी, आदि पदार्थों का सेवन मनुष्य को अपनी शक्ति के अनु-
असली कोकशास्त्र ३१६
सार करना चाहिए । सूर्य की धूप तथा आग का सेवन करना बड़ा
ही गुणकारी है ।
इस ऋतु में बर्फ, सत्तू, अत्यन्त वायु सेवन, खट्टे, कड़वे,
कसैले, शीतल तथा वातकारी पदार्थ नहीं खाना चाहिए । कसेरू,
सिंघाड़े, उर्द, आलू आदि का सेवन करना हानिकारक है ।
ऋतु के अनुसार आहार करने में एक बात का ध्यान और
रखना चाहिए । वह यह कि कभी-कभी ऋतु के विपरीत समय
रहता है, जैसे मौसम तो वर्षा का है, किन्तु हवा की अधिकता से
तथा अन्यान्य कारणों से सर्दी काफी पड़ने लगती है । ऐसी दशा
में आहार-विहार में परिवर्त्तन करना आवश्यक होता है ।
—:०:—
३२४ असली कोकशास्त्र
से सब तरह के प्रसूत रोग समूल नष्ट हो जाते हैं ।
७—प्रसूत रोग में यह दवा भी बड़ा लाभ पहुँचाती है । प्रसा-
रिणी को पाँच सेर पानी में औटावे । जब तीन सेर पानी रह जाय,
तब उतार कर छान ले । फिर इस क्वाथ में सोंठ, कालीमिर्च,
पीपल, पीपलामूल, चित्रक, सफेद जीरा, काला जीरा, शालपर्णी,
पृष्टपर्णी, मुग्दपर्णी, गोखरू, रायसन, रेंडी वृक्ष की छाल, खरेंटी,
सेंधा नमक, जवाखार और सज्जी इन सब चीजों को एक-एक
तोला लेकर लुगदी बना ले । ऊपर के काढ़े में इस लुगदी को सेर
भर घी ( गाय का ) डालकर पकावे । पक जाने पर उतार कर
छान डाले । इस घी के सेवन से प्रसूत, संग्रहणी आदि कई तरह के
रोग दूर होते हैं । इस घी के सेवन से प्रसूता की जठराग्नि प्रज्ज्वलित
होकर स्तनों का दूध शुद्ध हो जाता है । उदर-रोग भी इससे नष्ट
हो जाता है ।
८—सुहाग सोंठ, विषगर्भ तैल, अथवा मरीचादि तैल भी इस
रोग में बहुत ही फायदा करते हैं । इनके बनाने की रीति नीचे
लिखी जाती है:—
सुहाग सोंठ बनाने की विधि
बैंतरा सोंठ पावभर कूट-छानकर रख ले । बाद डेढ़सेर गाय
का दूध आँच पर चढ़ाकर औटावे ; जब वह जलकर आधा रह जाय,
तब उसमें सोंठ का चूर्ण डाल दे और बराबर चलाता रहे । जब
असली कोकशास्त्र ३२५
खोवा हो जाय, तब पावभर गाय का घी उसमें डालकर भूने। बाद
थाली में निकाल कर रख ले। फिर एक सेर चीनी की चाशनी
करके उसमें भुने खोवे को डाल दे और ऊपर से केशर छः माशे,
कस्तूरी डेढ़ माशे, भोमसेनी कपूर तीन माशे, पिस्ता चार तोला,
छिला बादाम आठ तोला छोड़कर लड्डू बना ले। प्रति दिन गरम
दूध के साथ एक तोला इसे खा लिया करे।
दूसरी विधी—पावभर बैतरा सोंठ का चूर्ण, दही चक्का आध
पाव, छोटी पीपल आधपाव, धतूरे के बीज आधपाव, इन सबको
हाँड़ी में रखकर उसका मुख मजबूती के साथ बन्द कर दे। एक
गढ़े में उसे रखकर ऊपर से कंडी रखकर आग लगा दे। जब वे
कंडे जलकर खाक हो जावें, तब राख को हटाकर फिर पूर्ववत्
कंडी रखकर सुलगा दे। इस प्रकार तीन बार करे। पश्चात् हाँडी
को खूब सावधानी के साथ निकाल कर बाहर कर ले और उसमें
से दवा निकाल कर शीशी में रख काग लगा दे। यह साधारण
मात्रा है। यदि इसको बहुत तीक्ष्ण करना हो तो इसमें सात-सात
पुट अदरख, बँगला पान के पत्ते का रस, थूहर के दूध के क्रम से
दे और फिर ऊपर की भाँति चौदह आँच दे।
तीसरी विधी—बैतरा सोंठ का चूर्ण पाव भर, आधा पाव सज्जी
और छटाँक भर लौंग को थूहर के दुध में पीसकर लुगदी बना ले
और मिट्टी के उतने ही बड़े बर्त्तन में इसे रखे, जिसमें अँट
जाय। बाद ऊपर की भाँति इसे गढ़े में रखकर फूँक दे। जब
३२६ असली कोकशास्त्र
आधे कंडे जल जायँ तब उसमें और कंडे डालकर मिट्टी से आग
को ढंक देना चाहिए। आग देने से आठ पहर पीछे इसे निकाले ।
बाद इनको थूहर के दूध, बँगला पान के रस और भारंगी के रस
में क्रम से आठ-आठ पहर घोंटे। (रस में पानी या छिलका कुछ
भी न रहने पावे।) ज्यों-ज्यों रस सूखता जाय त्यों-त्यों उसमें
रस डालता जाय और खरल करता जाय। पश्चात् फिर मिट्टी के
बर्तन में रखकर ऊपर की भाँति फूँक दे और आठ पहर के बाद
उसे बाइर निकाल दे। पीछे उन्हें पीसकर शीशी में रखकर काग
लगा दे। यदि कमर में दर्द हो अथवा छाती या पेट में दर्द हो तो
छः माशे अदरख के रस में इसे तीन रत्ती डालकर देना चाहिये।
यदि कफ की खाँसो हो तो छः माशे अदरख का रस, छः माशे
शहद, आधी गाँठ छोटी पीपल पीसकर उसमें दो रत्ती यह दवा
मिलाकर दे। इसी प्रकार सन्निपात में छः माशे अदरख का रस
एक पीपल और तोन रत्ती यह दवा पीसकर दे तथा पैरों के तलवे
में अदरख का रस, लहसन का रस और अजवायन को गरम
करके मर्दन करे। सर्दी हुई हो तो तीन माशे शहद में दो रत्ती दवा
चटा दे। हिचकी आती हो तो तीन माशे शहद और तीन माशे
अदरख के रस के साथ डेढ़ रत्ती यह दवा मिलाकर चटावे। इस
प्रकार भिन्न-भिन्न अनुपान के साथ यह दवा देने से अनेक तरह के
रोगों से प्रसूता की मुक्ति होती है।
—:०:—
असली कोकशास्त्र ३२७
विषगर्भ तैल बनाने की विधि
धतूरे की जड़, निर्गुण्डी, कड़वी तूँबी की जड़, अरंड की जड़,
असगन्ध, पमार, चित्रक, सहिजन की जड़, काग लहरी, करिहारी
की जड़, नीम की जड़, बकाइन की छाल, दशमूल, शतावरि,
चिरपोटन, गोरीसर, बिदारीकन्द, थूहर का पत्ता, आक का पत्ता,
सनाय, दोनों कनेर की छाल, अज्जभारा (अपामार्ग या चिरायता
भी इसे कहते हैं) ओर सीप इन सबको तीन-तीन रुपये भर लेकर
कूट डाले। बाद इनके बराबर काले तिल का तेल, उतना ही रेंडी
का तेल और सबका चौगुना पानी एक बर्त्तन में रख उसी में सब
चीजों को छोड़कर मधुर आँच से पकावे। जब पकते-पकते सब
औषधियाँ पानी के सहित जल जायँ—तेल मात्र रह जाय, तब
उतार ले। फिर उसमें सोंठ, मिर्च, पीपल, असगन्ध, रास्ना, कूट,
नागरमोथा, वच, देवदारु, इन्द्रजव, जवाखार, पाँचो नमक, नीला-
थोथा, कायफल, पाढ़, भारंगी, नौसादर, गन्धक, पुष्कर मूल,
शिलाजीत और हरताल इन सब चीजों को आध-आधे पैसे भर ले
और सिंगीमुहरा टकेभर लेकर महीन पीसकर उक्त तेल में मिला
दे। फिर इस तेल का मर्दन करे। इससे वात के सब रोग दूर हो
जाते हैं। यह याद रहे कि प्रसूत रोग वात के ही प्रकोप से होता
है। इसकी मालिश से पीठ जंघा और सन्धियों की सूजन तथा
हड़फूटन, कर्णशूल, गण्डमाला इत्यादि रोग नष्ट होते हैं।
४. परिच्छेद १३-१५: वाजीकरण कल्प, यौवन-सुरक्षा, काम-चिकित्सा एवं ग्रन्थ उपसंहार
३२८ असली कोकशास्त्र
मरिच्यादि तैल बनाने की विधि
काली मिर्च, निसोथ, दातूर्णी, आक का दूध, गोबर का रस,
देवदारु, दोनों हल्दी, छड़, कूट, रक्तचन्दन, इन्द्रायन की जड़,
नागरमोथा, वायविडंग, पमार, सिरस की जड़, कलौंजी, हरताल,
मैनसिल, कनेर की जड़, चित्रक, कलिहारी की जड़, कुड़े की छाल,
नीम की छाल, सतौप की छाल, गिलोय, थूहर का दूध, किरमाला
की गिरी, खैरसार, बावची, वच, मालकांगनी, इन सबको दो-दो
टके भर, सिंघी मुहरा चार टके भर, कड़वा तेल चार सेर, गो-
मूत्र सोलह सेर इन सब चीजों को मधुर आँच से पकावे । जब
तेल मात्र रह जाय, तब उतार कर छान ले । और फिर उसी तेल
की मालिस करे तो प्रसूत रोग अच्छा हो जाता है । यह तेल भी
वायु का नाश करने में एक ही है ।