रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
असली कोकशास्त्र २६६
रगड़ से शरीर के छिद्रों का मल निकल जाता है और चमड़े पर
रहने वाले कीड़े मर जाते हैं।
व्यायाम करने का सबसे अच्छा समय प्रातःकाल है। शौचादि
से निवृत्त होकर व्यायाम करना चाहिए। कुछ लोग स्नान के
पहले व्यायाम करते हैं और कितने ही लोग स्नान के बाद। स्नान
करने के बाद व्यायाम करना अधिक उत्तम है। यदि व्यायाम के
बाद स्नान करना हो तो कम से कम एक घण्टा ठहर कर स्नान
करना उचित है। साधारण मनुष्य के लिए आधा घण्टा व्यायाम
करना जरूरी है। भोजन करने के बाद किसी प्रकार का व्यायाम
नहीं करना चाहिए।
इतना लिख चुकने के बाद अब हम स्त्रियों के व्यायाम पर
विचार करना चाहते हैं। स्त्रियों को किस प्रकार का व्यायाम करना
चाहिए। इस पर विचार करना आवश्यक है। स्त्रियों का स्वाभा-
विक व्यायाम है घर का काम-काज करना, जैसे चक्की चलाना,
कूटना आदि। इससे बहुत-कुछ कसरत स्त्रियों की हो जाती है।
इसी कसरत के कारण देहात की स्त्रियाँ हृष्ट-पुष्ट और निरोग
रहती हैं तथा शहर में रहनेवाली स्त्रियाँ यह कसरत न करने के
कारण निर्बल और रुग्णा रहती हैं।
किन्तु इतना ही व्यायाम स्त्रियों की स्वस्थता के लिए यथेष्ट
नहीं है। उन्हें उचित है कि वे धन्धे में होनेवाले व्यायाम के अति-
३०० असली कोकशास्त्र
रिक्त थोड़ी देर तक नियमित रूप से केवल शरीर स्वस्थ रहने के
उद्देश्य से व्यायाम किया करें ।
स्त्रियों का व्यायाम पुरुषों के व्यायाम से भिन्न होना चाहिए ।
भिन्न क्यों होना चाहिए, विस्तार-भय से इस पर यहाँ विचार नहीं
किया जायगा; पर इतना तो अवश्य कहा जायगा कि दोनों कार्यों
में विभिन्नता होने के कारण व्यायाम-प्रणाली में विभिन्नता रखना
आवश्यक है । हमारी राय है कि स्त्रियाँ पुरुषों की भाँति दंड-बैठक
न करके तथा मुद्गर न फेरकर यदि निम्नलिखित तरीके से व्यायाम
करें, तो उनकी तन्दुरुस्ती के लिए बड़ा ही लाभ हो सकता है:—
जिस प्रकार बालक को दस वर्ष की अवस्था तक व्यायाम
करने के लिए इस प्रकरण में बतलाया गया है, उसी प्रकार बालि-
काओं को भी इस अवस्था तक वही व्यायाम करना चाहिए । हाँ,
बालकों की अपेक्षा बालिकाओं का दौड़ना-धूपना कम अवश्य होना
चाहिए । कारण यह कि उन्हें और काम भी सीखना रहता है ।
बालकों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए जितना समय मिलता है
उतना बालिकाओं को नहीं; इस लिए उन्हें अधिक समय व्यायाम
की ओर लगाकर और कामों से अनभिज्ञ नहीं रहना चाहिए।
ग्यारह की अवस्था से नीचे के व्यायामों को शुरू करना चाहिए ।
१—सबेरे शौचादि से निवृत्त होकर स्त्रियों को किसी एकान्त
और हवादार कमरे में नियमित रूप से व्यायाम करना चाहिए ।
सीधी खड़ी होकर दोनों हाथ ऊपर उठाओ; इस प्रकार उठाओ,
असली कोकशास्त्र ३०१
मानो तुम ऊपर की कोई चीज पकड़ने के लिए प्रयत्न कर रही हो
इस समय दोनों पैर जुड़े रहें। पूरे तनाव के साथ दो मिनट तक
हाथ ऊपर उठाये खड़ी रहो; बाद धीरे-धीरे कड़ाई के साथ दोनों
हाथ के पंजों को कन्धे पर लाओ फिर बल डालते हुए उन्हें छाती
की सीध में ले जाओ और समेट कर पंजों को छाती पर लाओ;
पश्चात् दोनों हाथ नीचे गिराओ और तनाव के साथ ही पीछे की
ओर ले जाकर सीध में लाओ। इस प्रकार चार-पाँच बार करने से
भुजाएँ सुडौल और बलयुक्त हो जाती हैं।
२—दोनों पैर सटाकर एड़ियों को ऊपर उठाओ और पैरों के
पंजों पर शरीर का सारा भार लाद दो। पैरों को खूब तना रक्खो।
फिर पंजों से ही पाँच सात कदम आगे जाकर पीछे लौट आओ।
लेकिन जाने और लौटने में पैरों का तनाव जरा भी कम न होने
पावे। दो तीन बार प्रतिदिन ऐसा करने से पैर मजबूत हो जाते हैं
और जंघाओं में चिकनाहट आ जाती है। दो-तीन बार का मतलब
यह न समझो कि दिनभर में दो-तीन बार ऐसा करने के लिए कहा
जा रहा है बल्कि व्यायाम के समय में बतलाये क्रमों से कई बार
करने के लिए कहने कहने का तात्पर्य है।
३—साँस खींचकर छाती जितनी फूल सके उतनी उसे फुलाओ।
बाद कुछ देर तक यानी जितनी देर तक सांस को रोक रखने में
कष्ट न हो, उतनी देर तक रोके रहो और छोड़ दो। इस प्रकार
तीन-चार बार करो। इससे छाती चौड़ी हो जाती है। प्रत्येक अंग
३०२ असली कोकशास्त्र
का ब्यायाम करते समय यह धारणा रक्खो कि मेरे अमुक अंग में
शक्ति आ रही है। जैसे, साँस खींचकर छाती की कसरत करते
समय यह सोचो कि सीना चौड़ा और पुष्ट होता जा रहा है; हाथ
की कसरत (नं० १) करते समय यह सोचो कि मेरे हाथों में खूब
ताकत भर रही है; इसी प्रकार अन्यान्य अंगों के लिए समझो ।
४—सीधी खड़ी हो जाओ और दाहिने हाथ की मुट्ठी बाँध-
कर दाहिनी ओर उसे जमीन तक झुकाओ; इसी प्रकार बायें हाथ
को भी बायीं ओर झुकाना चाहिए। दस-बारह बार करते जाने से
कमर पतली, पुष्ट और लचकदार हो जाती है तथा पेट में चर्बी
नहीं बढ़ने पाती ।
५—चौरस जमीन पर बैठकर दोनों पैर सामने की ओर फैला
दो। बाद झुक कर दोनों हाथ से पैर के दोनों अंगूठे पकड़े। थोड़ी
देर के बाद छोड़ दो। ऐसा करने से पेट में कोई बीमारी जल्द नहीं
पैदा होती। सम्भव है पहले-पहल तुम पैरों के अंगूठे न पकड़
सको; इस लिए इसे त्याग न दो । अभ्यास करने से १५-२०
दिन में ही तुम आसानी से अंगूठे पकड़ने लग जाओगी । पेट में
दर्द होता हो ओर यह क्रिया की जाय तो तुरन्त ही पेट की पीड़ा
शान्त हो जाती है ।
६—प्रतिदिन कम से कम दस-बारह बार गर्दन को चारो ओर
फेरना चाहिए। इससे कण्ठ में कोई रोग नहीं होता, आवाज
रसीली हो जाती है और गर्दन में अपने-आप ही सुन्दरता आ जाती है।
असली कोकशास्त्र ३०३
७—शान्ति के साथ बैठकर हवा की ओर मुख करके पाँच
मिनट तक साँस खींचो और छोड़ो। इसमें इतनी धीरता से काम
लो कि श्वास-प्रच्छ्वास की आवाज दूसरे को कौन कहे स्वयं तुम्हें
भी सुनायी न पड़े और न हृदय पर उसका धक्का लगने पावे। इस
क्रिया से फेफड़ा शुद्ध रहता है अतः शरीर के रक्त में कोई विकार
उत्पन्न नहीं हो पाता।
स्त्रियों को खूब तड़के उठकर शौच और व्यायाम से निवृत्त हो
जाना चाहिये। गर्भिणी स्त्रियों को अधिक व्यायाम नहीं करना
चाहिए किन्तु कुछ अवश्य करना चाहिए। इस पर पीछे काफी
प्रकाश डाला गया है। गर्भाधान होने के पन्द्रह दिन पहले से
व्यायाम घटा देना उचित है और गर्भ धारण कर चुकने पर एक
महीने तक बड़ी सावधानी से बहुत कम व्यायाम करना चाहिए।
बाद चार महीने तक बचाकर व्यायाम किया जा सकता है; पाँच
महीने का गर्भ हो जानेपर फिर व्यायाम कम कर देना उत्तम है।
३०४ असली कोकशास्त्र
व्यायाम से लाभ
ब्यायाम करने से स्त्रियों का स्वास्थ्य कभी बिगड़ने नहीं पाता
और किसी प्रकार का रोग होने की बहुत ही कम सम्भावना रहती
है। शरीर हल्का और सबल रहता है। भोजन अच्छी तरह हजम
होता है ।
मुख और शरीर की कान्ति हमेशा बनी रहती है । समय से
पहले बुढ़ापा पास नहीं फटकने पाता । कसरत न करने तथा संयम
न रखने के कारण आजकल युवावस्था में ही स्त्रियों के चेहरे पर
वृद्धावस्था झलकने लगता है, कपोल चिचुक जाते हैं, आँखें नीचे
धँस जाती हैं, मस्तक पर शिकन पड़ जाती है और अंग-प्रत्यंग में
शिथिलता आ जाती है। यदि स्त्रियाँ नियमित रूप से ब्यायाम
करें और संयम से रहें तो ऐसा कभी नहीं हो सकता ।
तन्दुरुस्ती ठीक रहने से प्रसव-वेदना बहुत ही कम होती है
तथा हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर सन्तान पैदा होती है । सुखी जीवन
बनाने के लिए तन्दुरुस्ती का ठीक रहना सबसे अधिक आवश्यक
है । तन्दुरुस्ती पर ही दुनियाँ का सुख-दुख निर्भर है। पहले तन्दु-
रुस्ती, पीछे और सब । अमित धन हो, सुन्दर और शिक्षित परि-
वार हो, घर में दास-दासियों की भरमार हो, पर एक तन्दुरुस्ती न
हो तो सारी वस्तुएँ फोकी पड़ जायें । धन का उपभोग कौन कर
सकता है ? तन्दुरुस्त या स्वस्थ मनुष्य । परिवार का आनन्द कध
असली कोकशास्त्र ३०९
मनुष्य हो गये। छः महीने तक तो उनकी स्त्री ने खूब सुश्रूषा
की। बाद उसकी ओर से कुछ लापरवाही होने लगी। घर के और
लोग पहले ही से हाथ खींच बैठे थे। लगातार ग्यारह महीने तक
वह बीमार रहे। कितनी यातना सहकर उनका प्राण निकला,
उसका कारुणिक वर्णन करके पाठक-पाठिकाओं का दिल दुखाना
नहीं चाहता। तन्दुरुस्ती नष्ट होने पर उनकी लाखों की सम्पत्ति
किसी काम न आयी, इस बात की शिक्षा उक्त घटना से अच्छी
तरह मिल सकती है।
व्यायाम से शरीर में बल बढ़ता है और भीरुता दूर होती है।
मौका पड़ने पर दुष्टों के नीच शब्दों का जवाब लात-घूंसे से देने
का साहस होता है। जल्द किसी नीच की बुरी निगाह डालने की
हिम्मत नहीं पड़ती। इससे भोग-विलास की ओर रुचि नहीं बढ़ती
और सदा तबियत मस्त रहती है।
कसरत के द्वारा स्त्रियाँ अपने रूप-यौवन को अधिक दिनों तक
कायम रखकर अपने पति को प्रसन्न रख सकती हैं और पति की
प्रसन्नता से स्वयं भी प्रसन्न रहती हैं।
—:०:—
३०८ असली कोकशास्त्र
स्वस्थ रहने के सरल उपाय
स्वस्थ रहने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है—प्रसन्न रहने
की। मनुष्य के मनोविकार, वृत्तियाँ, इच्छाएँ, बुरे-भले विचार
जिस तरह बदलते रहते हैं, उसी तरह शरीर के अवयवों में भी
परिवर्त्तन होता रहता है। प्रोफेसर एल० मर्गेंट ने वैज्ञानिक प्रयोगों
द्वारा यह सिद्ध करके बतलाया है कि भय, चिन्ता, क्रोध, ईर्ष्या,
द्वेष और उदासीनता से पसीने में, थूक में, श्वास में, तथा खून में
जहरीले पदार्थ पैदा होते हैं और इसके विपरीत प्रेम, दया, आनंद,
सन्तोष, आरोग्य तथा प्रसन्नतापूर्ण विचारों से बलवान बनाने वाले
तत्त्व उत्पन्न होते हैं।
इसीसे इस पुस्तक में स्थल-स्थल पर उत्तम सन्तान पैदा करने
के लिए माता-पिता को उक्त बात पर सदा ध्यान रखने के लिए
चेतावनी दी गयी है। बच्चों की माँ के क्रोधित होने पर उसका दूध
जहरीला हो जाता है और उस समय दूध पीने से कितने ही बालकों
को मूर्छा आ जाती है। शास्त्रकारों ने आदेश किया है कि भोजन
करते समय खूब प्रसन्नचित्त रहना चाहिए । उनके कथन का
असली रहस्य यहाँ है कि भोजन के समय क्रोध, चिन्ता, दुःख
आदि करने से उत्तम से उत्तम बलकारक भोजन भी विष हो
जाता है।
यदि प्रारम्भ से ही स्वास्थ्य-रक्षा के खास-खास नियमों का
असली कोकशास्त्र ३०८
पालन किया जाय और बालकों में आरम्भ से ही इन नियमों पर
चलने की आदत डाली जाय, तो जीवन विशेष सुख और शान्ति से
व्यतीत हो सकता है। बचपन में जिस बात की आदत पड़ जाती
है, वह कभी नहीं छूटती। स्वास्थ्य-रक्षा के साधारण नियम ऐसे
नहीं हैं, जिनका सरलतापूर्वक पालन न किया जा सके, किन्तु जब
मनुष्य की आदत कुछ और ही ढंग की हो जाती है, तब वे ही
सरल नियम पहाड़ से मालूम होने लगते हैं।
अब हम स्वास्थ्य-रक्षा के कुछ उपायों का उल्लेख यहाँ करेंगे,
जिनका पालन करना आलसी मनुष्य के लिए तो अवश्य ही दुरूह
है, पर और किसी भी मनुष्य के लिए कठिन नहीं है —
१—रहने का स्थान खूब हवादार होना चाहिए; किन्तु दूषित
और गन्दी हवा जरा भी न आने पावे। गन्दी हवा और गन्दा
पानी ही नाना प्रकार के रोगों का घर है।
२—अपना प्रत्येक कार्य नियमित समय पर करना चाहिए।
स्वास्थ्य के लिए अनियमित समय पर काम करना पूरा घातक
है। ऐसे आदमी कभी स्वस्थ नहीं कहे जा सकते जो एक दिन तो
तड़के मल-मूत्र त्याग कर निवृत्त हो जाते हैं और दूसरे दिन दोपहर
को टट्टी जाते हैं। इसी प्रकार उनका प्रत्येक कार्य होता रहता है।
ऐसे मनुष्य सम्भव है कि ऊपर से देखने में हृष्ट-पुष्ट और पूर्ण
दिखायी पड़ें, पर वास्तव में वे कदापि स्वस्थ नहीं हैं।
३—शुद्ध, सादा और थोड़ा भोजन करना चाहिए। ठूँस-ठूँस
३१० असली कोकशास्त्र
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कर खाने से स्वस्थता कभी नहीं रह सकती । भोजन धीरे-धीरे
और खूब चबा-चबा कर करना चाहिए । एक ग्रास को चालीस
बार कुचल कर निगलना, पेट में अमृत डालने के समान गुण करता
है । इससे कई लाभ होते हैं । एक तो यह कि थोड़े आहार से
अधिक रक्त तैयार होता है और उस रक्त में किसी प्रकार का दोष
नहीं रहता और दूसरा लाभ यह होता है कि दाँत मजबूत होते
हैं । इस प्रकार चबाकर भोजन करने से पाचन क्रिया बहुत ठीक
काम करती है; मल की रुकावट कभी नहीं होती, चित्त प्रसन्न रहता
है, अच्छी भूख लगती है, पेट में कभी शिकायत नहीं पैदा होती ।
४—भोजन करने के पहले और पीछे हाथ, पैर तथा मुख का
धोना बड़ा ही हितप्रद है ।
५—मल-मूत्र के वेग को कभी न रोको । हमेशा पेट साफ
रक्खो । कबज कभी मत होने दो । यदि कभी इसकी शिकायत
जान पड़े तो फौरन यत्न करो ।
६—दाँत, मसूड़े और जीभ की हमेशा सफाई रक्खो । तथा
कोई ऐसी चीज न खाओ जिससे मुख में जलन पैदा हो । हाँ काली
मिर्च आदि खाने की बात दूसरी है; पर लाल मिर्च को भूलकर
भी मुख में नहीं डालना चाहिए ।
७—प्रति दिन सबेरे उठते ही मल-मूत्र त्याग करके मुख की
सफाई कर डालनी चाहिए । स्नान हमेशा ठण्डे पानी से तड़के कर
लेना बहुत ही लाभदायक है । शरीर की त्वचा को मैल-मिट्टी
और पसीने से बिलकुल साफ रक्खो। नदी के स्वच्छ जल में
स्नान करना सबसे उत्तम है।
८—अपने काम और मौसम के अनुसार हमेशा साफ और
ढीले कपड़े पहनो तथा हर मौसम में खुली हवा में मुख खोलकर
सोने के अभ्यासी बनो।
९—प्रतिदिन नियमित रूप से थोड़ा समय धूप में बिताओ।
और सूर्य से शक्ति लिया करो।
१०—सदा प्रसन्नचित्त रहो और चिन्ता आदि से दूर रहो।
किसी की बुराई मत करो और सृष्टि की प्रत्येक वस्तु से कुछ न
कुछ शिक्षा लेने की चेष्टा करो।
११—ब्रह्मचर्य से रहा करो। वेश्यागामी और पर-स्त्री-गामी
न बनो। इसी प्रकार से जो स्त्रियाँ स्वस्थ रहना चाहें वे पराये
पुरुष को बुरी निगाह से न देखें।
१२—नशे की चीजों से सदा दूर रहो। नशीली चीजों के
सेवन से फेफड़े खराब हो जाते हैं।
१३—भोजन करते समय जितना कम जल पी सको; उतना
ही अच्छा। भोजन करने के घण्टा आध घण्टा बाद इच्छा के
अनुसार जल पिया करो।
१४—प्रतिदिन शुद्ध गोदुग्ध का सेवन किया करो। एक
मनुष्य के लिए २४ घण्टे में सेर भर दूध पीना अत्यन्त
आवश्यक है।
३१२ असली कोकशास्त्र
१५—थोड़ा-सा छाछ (मट्ठा) का सेवन करना बड़ा ही
लाभदायक है। वैद्यक ग्रन्थों में इसकी बड़ी प्रशंसा लिखी है।
स्वास्थ्य के लिए यह बड़ी ही उपयोगी वस्तु है।
१६—अपनी सुविधा के अनुसार ताजे और आरोग्य फलों
का सेवन किया करो।
१७—सबेरे कुछ रात शेष रहते ही उठने की आदत डालो।
शय्या से उठते ही परमात्मा का ध्यान किया करो। बाद शौचादि
से निवृत्त होकर व्यायाम करो। व्यायाम उतना ही करो, जितने से
थकावट न मालूम हो।
१८—चटपटी, मसालेदार और बाजार की बनी हुई चीजें
(मिठाई पूड़ी आदि) कभी मत खाओ।
१९—मुँह से कभी साँस मत लो। यदि इसकी आदत पड़
गयी हो तो शीघ्र इस दोष से अपना पिण्ड छुड़ाओ। मुँह से साँस
लेना बड़ा ही हानिकारक है। कारण यह कि मुँह के रास्ते से जो
हवा भीतर जाती है, वह छनकर नहीं जाती। अतः वायु में उड़ने
वाले अनेक सूक्ष्म तथा विषैले जीवाणु एवं समन्वित धूलि-कण या
ऐसा ही कोई दूसरा मल शरीर के भीतर चला जाता है जो कि
नाना प्रकार के रोग उत्पन्न करने का कारण होता है; किन्तु नासिका
द्वारा साँस लेने से उक्त चीजें नासिका-द्वार में ही अटक जाती हैं।
मुख द्वारा श्वासन-क्रिया करनेवालों के फेफड़े में रोगों को उत्पन्न
करनेवाले नाना प्रकार के परमाणु एकत्र हो जाते हैं। नासिका के
असली कोकशास्त्र
चित्र नं० ११
द्वितीय सप्ताह
चित्र नं० १२
तृतीय सप्ताह
इस पृष्ठ पर मुद्रित पाठ अत्यधिक जीर्ण-शीर्ण, फीका (faded) तथा जल-क्षतिग्रस्त होने के कारण स्पष्ट रूप से पठनीय नहीं है। पृष्ठ पर केवल अत्यंत धुंधले हरे रंग के रेखाचित्र/मुद्रा (emblem/illustration) और अस्पष्ट अक्षरों के अवशेष मात्र दिखाई दे रहे हैं:
[अत्यधिक धुंधला एवं अपाठ्य पाठ]
[अस्पष्ट शीर्षक/मुद्रा]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
असली कोकशास्त्र ३१३
छिद्रों में प्रकृति ने बहुत से बालों की रचना की है । ये बाल हवा
में समन्वित धूलि के कणों को रोगजनक जन्तुओं को तथा ऐसे ही
दूसरे कचरे को फेफड़ों में जाने से रोकते हैं। यह रुका हुआ कचरा
जब मनुष्य वायु को बाहर निकालता है, तब बाहर निकल जाता
है। जो लोग नासिका के भीतर के बालों को कटवाते हैं, वे भारी
भूल करते हैं। इतना ही नहीं, नासिका में एक गुण और भी बड़ा
विचित्र है, वह यह कि शीतकाल में जब बिलकुल ठण्डी हवा
चलती है, तब उसे गर्म करके फेफड़े में पहुँचाती है। इससे फेफड़े
को किसी तरह की हानि नहीं पहुँचती है । किन्तु मुख द्वारा
श्वासन-क्रिया करने से ठण्डी हवा ज्यों की त्यों फेफड़े में जाकर
हानि पहुँचाती है। ठण्डी हवा पहुँचने से कभी कभी फेफड़ों में
सूजन हो आती है । हवा को शुद्ध करने के लिए नासिका एक
प्राकृतिक यन्त्र है, इसका सदा ध्यान रखना चाहिए ।
२०—काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्य आदि विकारों को
प्रतिक्षण दूर रखने के लिए सतर्क रहना चाहिए और दया,
परोपकार, आदि गुणों को धीरे-धीरे अपने हृदय में भरने का प्रयत्न
करना चाहिए ।
२१—भोजन करने के बाद थोड़ा टहल कर चारपाई पर लेटा
करो, किन्तु तुरन्त ही नींद में अचेत न हो जाओ ।
२२—डाक्टर उडली का कहना है कि,—"आरोग्यता प्राप्त
करने के दो मार्ग हैं—(१) ग्राम्य-जीवन, उद्यान-भ्रमण, नियमित
३१४ असली कोकशास्त्र
व्यायाम और स्वच्छ वायु का सेवन (२) सादा तथा हलका
भोजन और निर्मल जल।" ऐसा कौन मूर्ख मनुष्य होगा जो
आरोग्य प्राप्ति के इन प्राकृतिक नियमों को छोड़कर वैद्यों और
डाक्टरों की तरह तरह की औषधियों का सेवन करके धन और
आरोग्य का नाश करेगा।
२३—ऋतु के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को आहार-विहार
करना चाहिए। यह सौभाग्य भारतवर्ष को ही प्राप्त है कि यहाँ
ठीक समय पर गर्मी पड़ती है, ठीक समय पर वर्षा होती है और
ठीक समय पर सर्दी पड़ती है। पाश्चात्य देशों में यह बात नहीं
है। वर्ष में छः ऋतुएँ होती हैं, जिनका क्रम इस प्रकार है।
फाल्गुन और चैत—वसन्त ऋतु
वैशाख और ज्येष्ठ—ग्रीष्म ऋतु
आषाढ़ और श्रावण—वर्षा ऋतु
भाद्रपद और आश्विन—शरद ऋतु
कार्तिक और मार्गशीर्ष—हेमन्त ऋतु
पौष और माघ—शिशिर ऋतु
कुछ आचार्यों ने चैत्र-वैशाख को वसन्त ऋतु मानकर छहों
ऋतुओं का उल्लेख किया है; पर इस विपरीतता में कोई खास
बात नहीं है, अतः कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं।
ऋतु के अनुसार आहार-विहार करने के लिए उनका ज्ञान
असली कोकशास्त्र ३१५
होना अत्यन्तावश्यक है, इस लिए प्रत्येक ऋतु का संक्षेप में परि-
चय करा देना जरूरी है।
वसन्त
वसन्त ऋतु का दूसरा नाम ऋतुराज है। इस ऋतु में दिशाएँ
निर्मल हो जाती हैं तथा सृष्टि की प्रत्येक वस्तु ही नया रूप धारण
करती है। यह ऋतु स्निग्ध है; अतः कफ की वृद्धि होती है और
उसके द्वारा अन्य रोगों की उत्पत्ति होती है। इस ऋतु में कफ का
प्रकोप होता है, इस लिए कफ का शमन करने वाली वस्तुओं का
सेवन करना लाभदायक है।
पौष और माघ में शीत के कारण कफ सञ्चय होता है और
वही संचित कफ वसन्त ऋतु में सूर्यताप से कुपित हो पाचक
अग्नि को दूषित कर रोग को उत्पन्न करता है। इस लिए इस ऋतु
में वमन-विरेचन द्वारा कफ को बाहर निकाल देना चाहिये। वसन्त
ऋतु में चटपटे, रूखे, कड़वे, कसैले और हलके पदार्थों का सेवन
करना हितकर है। खट्टी, मीठी, चिकनी और कष्ट से पचाने वाली
वस्तुओं का सेवन कदापि न करनी चाहिए।
इस ऋतु में गेहूँ, चावल, मूँग, परवल, बैंगन, शहद, जीरा,
अदरख, मूली आदि खाना तथा सोंठ, मिर्च, पीपर, पीपलामूल,
त्रिफला, असगन्ध और हल्दी का सेवन करना विशेष लाभदायक है।
ग्रीष्म
बैसाख और ज्येष्ठ में गर्मी बहुत अधिक पड़ती है। इस ऋतु
३८ असली कोकशास्त्र
लेने से पित्त-जन्य रोगों के उत्पन्न होने की आशंका नहीं रहती ।
इन महीनों में भी, चीनी, मिश्री, जौ, गेहूँ, मूँग, चावल, गरम
दूध, आँवला, परवल, धनियाँ, कमलगट्टा, मुनक्का, नारियल, गुड़-
मिश्रित हड़का चूर्ण, गोभी आदि वस्तुएँ विशेष लाभ पहुँचाती हैं।
शिशिर
पोष और माघ ये दोनों महीने शीतल, स्निग्ध, प्रायः सब
पदार्थों को स्वादिष्ट करनेवाले तथा अग्नि को प्रज्ज्वलित करनेवाले
हैं। इन महीनों में कफ संचय होता है और बल की वृद्धि होती है।
शीत होने से वायु का कोप होता है। इस लिए इन महीनों में
चिकने, रूखे, खट्टे और नमकीन रसों का सेवन ही लाभदायक
है। सुश्रुताचार्य का कथन है:—
“ये दोनों महीने ठण्डे और रूखे हैं। इन महीनों में सूर्य्यताप
मन्द रहता है। हवा तेजी से चलती है। सर्दी के कारण वायु
कुपित होता है। वही वायु सर्दी लगने से कोष्ठ के भीतर पिंडिकासा
हो जाता है और शीघ्र रस को सोख लेता है। इस ऋतु में मधुर,
अम्ल, लवण तथा रस-युक्त पदार्थों का ही भोजन करना चाहिए।
इन महीनों में पौष्टिक, बलवर्द्धक, घी, दूध, मक्खन, मलाई, खाँड़ के
बने हुए पदार्थ अत्यन्त लाभदायक हैं। गेहूँ, उर्द, नये चावलों का
भात, शुद्ध और उत्तम बनी हुई मिठाइयाँ, पाक, बादाम, अखरोट
चिरौंजी, आदि पदार्थों का सेवन मनुष्य को अपनी शक्ति के अनु-
असली कोकशास्त्र ३१६
सार करना चाहिए । सूर्य की धूप तथा आग का सेवन करना बड़ा
ही गुणकारी है ।
इस ऋतु में बर्फ, सत्तू, अत्यन्त वायु सेवन, खट्टे, कड़वे,
कसैले, शीतल तथा वातकारी पदार्थ नहीं खाना चाहिए । कसेरू,
सिंघाड़े, उर्द, आलू आदि का सेवन करना हानिकारक है ।
ऋतु के अनुसार आहार करने में एक बात का ध्यान और
रखना चाहिए । वह यह कि कभी-कभी ऋतु के विपरीत समय
रहता है, जैसे मौसम तो वर्षा का है, किन्तु हवा की अधिकता से
तथा अन्यान्य कारणों से सर्दी काफी पड़ने लगती है । ऐसी दशा
में आहार-विहार में परिवर्त्तन करना आवश्यक होता है ।
—:०:—
३२४ असली कोकशास्त्र
से सब तरह के प्रसूत रोग समूल नष्ट हो जाते हैं ।
७—प्रसूत रोग में यह दवा भी बड़ा लाभ पहुँचाती है । प्रसा-
रिणी को पाँच सेर पानी में औटावे । जब तीन सेर पानी रह जाय,
तब उतार कर छान ले । फिर इस क्वाथ में सोंठ, कालीमिर्च,
पीपल, पीपलामूल, चित्रक, सफेद जीरा, काला जीरा, शालपर्णी,
पृष्टपर्णी, मुग्दपर्णी, गोखरू, रायसन, रेंडी वृक्ष की छाल, खरेंटी,
सेंधा नमक, जवाखार और सज्जी इन सब चीजों को एक-एक
तोला लेकर लुगदी बना ले । ऊपर के काढ़े में इस लुगदी को सेर
भर घी ( गाय का ) डालकर पकावे । पक जाने पर उतार कर
छान डाले । इस घी के सेवन से प्रसूत, संग्रहणी आदि कई तरह के
रोग दूर होते हैं । इस घी के सेवन से प्रसूता की जठराग्नि प्रज्ज्वलित
होकर स्तनों का दूध शुद्ध हो जाता है । उदर-रोग भी इससे नष्ट
हो जाता है ।
८—सुहाग सोंठ, विषगर्भ तैल, अथवा मरीचादि तैल भी इस
रोग में बहुत ही फायदा करते हैं । इनके बनाने की रीति नीचे
लिखी जाती है:—
सुहाग सोंठ बनाने की विधि
बैंतरा सोंठ पावभर कूट-छानकर रख ले । बाद डेढ़सेर गाय
का दूध आँच पर चढ़ाकर औटावे ; जब वह जलकर आधा रह जाय,
तब उसमें सोंठ का चूर्ण डाल दे और बराबर चलाता रहे । जब