रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
असली कोकशास्त्र २६
दो मोटे-मोटे ऊपर की ओर और तीसरा भीतर से पोला दोनों के
नीचे की तरफ होता है। यही मूत्र-मार्ग है। तीनों दंडों में छोटे-
छोटे आशय होते हैं, जिनमें उत्तेजना के समय रक्त भर जाता है,
और लिंग ठोस और कड़ा हो जाता है। मैथुन-क्रिया के समाप्त
होते ही आशयों का रक्त शिराओं से वापस लौट जाता है और
फिर लिंग पूर्ववत् मुलायम हो जाता है।
अण्डकोश
जननेन्द्रिय के नीचे एक थैली लगी रहती है। जिसमें दो मांस
की गोलियें रहती हैं। ध्यानपूर्वक देखने से उनमें एक प्रकार की
क्रिया होती दिखलायी देती है। यह क्रिया त्वचा के संकोच-विकाश
से पैदा होती है।
सर्दी और गर्मी के कारण अण्डकोषों में संकोच-विकाश भी
होता है। वृद्ध और निर्बल मनुष्य के अण्डकोष ढीले पड़ जाते
हैं। कई मनुष्यों को एक ही अण्ड होता है और किन्हीं के वह
भी नहीं। अण्ड-हीन मनुष्य सन्तान नहीं पैदा कर सकता। अण्डों
में अधिक श्रम और चोट लगने से सन्तान उत्पन्न करने में बाधा
पड़ती है। यदि बचपन में अण्ड निकाल दिये जायें तो शरीर की
वृद्धि नहीं होगी। और मूंछें भी नही आयेंगी।
३० असली कोकशास्त्र
स्त्री जननेन्द्रिय
शंखनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्ता सा प्रकीर्तिता ।
तस्यास्तृतीये त्वावर्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता ॥
शंख नाभी के समान आकार वाली, तीन लपेट से युक्त योनि
होती है। उसकी तीसरी लपेट में गर्भ शय्या प्रतिष्ठित है।
यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः ।
तत्संस्थानां तथारूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः ॥
रोहू मछली के मुख के समान भी गर्भाशय का आकार कहा
गया है।
आभुग्नोऽग्रमुखः शेते गर्भो गर्भाशये स्त्रियाः ।
स योनि शिरसा याति स्वभावात्प्रसवं प्रति ॥
गर्भाशय के मुख पर सुकड़ा हुआ गर्भस्थ बालक शयन करता
है। वह स्वभाव से ही प्रसव-काल में शिर के बल योनि से बाहर
निकल आता है।
इसके सम्बन्ध में पुरुषों को विशेष रूप से जानने की आवश्य-
कता है। कारण पुरुषों को इस सम्बन्ध का ज्ञान बहुत कम होता
है। जिस स्थान पर पुरुष को जननेन्द्रिय होती है, ठीक उसी
जगह स्त्री की योनि होती है। इसे ही भग कहते हैं। यह भग दो
असली कोकशास्त्र ३१
ओष्ठ सदृश भागों के समान बना हुआ होता है। इसो लिये
इसको भगोष्ठ भी कहते हैं। यह भगोष्ठ भीतरी अवयवों की रक्षा
करती है। इसमें भी सफेद मैल जम जाता है। उसको साफ न
करते रहने से भी अनेक बीमारियाँ पैदा होती हैं। उन भगोष्ठों के
नीचे दो छोटे-बड़े छिद्र होते हैं। जो बड़ा छिद्र होता है, उसी से
पुरुष का वीर्य योनि में जाता है और बच्चा भी उसी मार्ग से बाहर
निकलता है, तथा मासिकधर्म भी उसी छिद्र से होता है।
दूसरा छोटा छिद्र मूत्र-मार्ग है। जो निचले छिद्र से एक डेढ़
इन्च ऊपर होता है।
जिन स्त्रियों की योनि क्षत नहीं हुई होती, उनका योनि-मुख
एक पतली खाल से ढका रहता है। पूरे युवती होने पर मासिक-
धर्म के निकलने से वह द्वार कुछ खुल जाता है। प्रसंग के समय
वह पर्दा फट जाता है। इससे स्त्रियों को दर्द भी होता है और
रक्त भी निकलता है। बाज लोग पर्दे का फटा हुआ होना स्त्री-
मैथुन की साक्षी मानते हैं। किन्तु कभी-कभी चोट लग जाने से
भी पर्दा फट जाता है।
भगोष्ठ ऊपर से मिला और उभरा हुआ होता है। बारह-
तेरह वर्ष की अवस्था में उस पर बाल आने लगते हैं। इन भगोष्ठों
के नीचे और मूत्र-द्वार के ऊपर एक छोटा-सा अंकुर होता है, जिसे
भगनासा कहते हैं। स्त्री का यह अंग पुरुष के शिश्न के समान
होता है। इसमें तीन डंडों के स्थान में दो ही दंड होते हैं और
३२ असली कोकशास्त्र
आकृति में शिश्न से बहुत छोटा होता है। लिंग पर जिस प्रकार
हटने-बढ़ने वाली त्वचा होती है, वैसी ही इस पर भी होती है।
मैथुनकाल में इसकी नालियों में भी रक्त भर जाता है। शिश्न
और भगनासा की रगड़ से स्त्री को वहुत आनन्द मालूम होता है।
मैथुन के बाद शिश्न की भाँति भगनासा का रक्त भी लौट जाता
है और वह शि शिल हो जाती है।
पुरुष की शुक्र-ग्रन्थियों की तरह स्त्री के भी डिम्ब-ग्रन्थियाँ
होती हैं। पुरुष के शुक्र और डिम्ब के मिलने से ही गर्भ स्थिर
होता है। ये डिम्ब ग्रन्थियाँ वस्ति-गह्वर की दाहिनी-बायीं दीवारों
से सटी रहती हैं। ग्रन्थि की शक्ल और तौल कबूतर के अंडे की
तरह होती है और इसकी लम्बाई एक इन्च तथा चौड़ाई पौन इन्च
के लगभग होती है। मोटाई आध इन्च तथा छः से आठ माशे
तक वजन होता है।
योनि का रूप एक नली के समान होता है। उसके ऊपर का
सिरा गर्भाशय की गर्दन के निचले हिस्से में चारो ओर लगा
होता है। उसके भीतर गर्भाशय का बाह्यद्वार रहता है। उस
नली की लम्बाई लगभग तीन-चार इन्च के होती है। उसके सामने
वाली दीवार पिछली दीवार की अपेक्षा कुछ मोटी होती है। योनि का
द्वार तंग होता है। भीतर कुछ फैलाकर फिर गर्भाशय के पास
तंग होता है। योनि-द्वार में बहुत सी शिराएँ होती हैं, जो मैथुन-
काल में रक्त से भरकर मोटी हो जाती हैं।
३ असली कोकशास्त्र ३३
गर्भाशय
योनि-मुख से मिला हुआ गर्भाशय होता है। वह वस्ति-गह्वर
में ही होता है। उसके सम्मुख मूत्र-स्थान और पीछे मल-स्थान होता
है। गर्भाशय के कुछ ही दूर पर दोनों डिम्ब ग्रन्थियाँ भी रहती
हैं। गर्भाशय की शक्ल नासपाती के समान होती है। किन्तु
उसका स्थूल भाग गोल होने की अपेक्षा कुछ चपटा होता है।
वस्ति-गह्वर में गर्भाशय सीधा खड़ा न रहकर मूत्राशय की
ओर झुका रहता है। गर्भाशय अन्दर से पोला रहता है और
उसमें भी जगह बहुत कम होती है। गर्भ धारण करने के पूर्व
गर्भाशय छोटा रहता है, किन्तु गर्भ स्थित हो जाने पर वह धीरे-
धीरे बढ़ जाता है। तीसरे महीने में टटोल कर देखने से प्रतीति भी
की जा सकती है। सामान्यतया गर्भाशय का दिग्दर्शन कराकर
अब रज और वीर्य पर विचार किया जायगा।
वीर्य की उत्पत्ति
मनुष्य-शरीर के सार-तत्त्व का नाम वीर्य है। वैद्यक शास्त्र ने
जीवन का मूल तत्त्व इस वीर्य को ही माना है। यह वीर्य आहार
का अन्तिम तत्त्व है। आयुर्वेद का मत है:—
३४ असली कोकशास्त्र
रसाद्रक्तं ततोमांसं मांसान्मेदः प्रजायते ।
मेदस्यास्थिस्ततो मज्जा मज्जायाः शुक्र सम्भवः ।
—सुश्रुताचार्य
अर्थात्—भोजन के पचने पर रस, रस से रक्त, रक्त से मांस,
मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से वीर्य
पैदा होता है। इससे लेकर मज्जा तक प्रत्येक धातु पाँच दिन-रात
और डेढ़ घड़ी तक अपनी अवस्था में रहती है। बाद तीस दिन
रात ओर नौ घड़ी में रस से वीर्य बनता है। ऐसा भोज तथा अन्य
आचार्यों ने लिखा है। स्पष्ट रीति से यों समझना चाहिए कि
मनुष्य जो कुछ आज भोजन करता है, उसका वाय बनने में पूरा
एक महीना लगता है। इसी प्रकार ओर इतने ही समय में स्त्री-
शरीर में रज पैदा होता है। शरीर के बलाबल के अनुसार इस
समय में न्यूनाधिकता भी हो जाती है।
इसी पुरुष-वीर्य और स्त्री-रज के अधीन स्त्री-पुरुष की शारी-
रिक और मानसिक सारी शक्तियाँ रहती हैं। इसी के प्रभाव से
ब्रह्मचारी पुरुषों ओर ब्रह्मचारिणी स्त्रियों का शरीर बल-वीर्य से
पूर्ण, सुन्दर, हृष्ट-पुष्ट तथा पवित्र देखा जाता है। यदि यह न
रहे, तो शरीर एक क्षण भी न टिके। शरीर-स्थिति का मूल-तत्त्व
यही है। अब यहाँ यह प्रश्न किया जा सकता है कि वीर्य की
उत्पत्ति शरीर में किस अवस्था से होती है। यों तो शरीर की
असली कोकशास्त्र ३५
उत्पत्ति ही वीर्य से होती है। अतः वीर्य-शून्य तो कभी शरीर
रहता ही नहीं और न वीर्य-हीन शरीर जीवित रह सकता है।
पर स्पष्ट रूप से १२—१३ वर्ष की अवस्था से शरीर में वीर्य बनने
लगता है। इससे पहले शरीर में जो वीर्य बनता है, वह सब का
सब शरीर की वृद्धि और उसके विकास में खर्च हो जाया करता
है और किशोरावस्था के आरम्भ में वह दिखलायी पड़ने लगता
हैं। पचीस वर्ष की अवस्था तक पुरुष-शरीर का वृद्धि-क्रम जारी
रहता है। तत्पश्चात् उसमें पुष्टता आती है। इसी अवस्था में
वीर्य परिपक्व भी होता है। जो मनुष्य इस अवस्था से पहले ही
वीर्य-पात करना प्रारम्भ कर देता है, उसका वीर्य कभी भी पुष्ट
नहीं होता और साथ ही उसके शरीर की बाढ़ भी मारी जाती
है। अतएव पचीस वर्ष की अवस्था तक वीर्य का संचय करना
अत्यन्तावश्यक है। सुश्रुताचार्य ने लिखा है—
ऊन षोडशवर्षायामप्राप्तः पंचविंशतिम् ।
यद्याधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विनश्यति ॥
अर्थात्—सोलह वर्ष से कम उम्र की स्त्री और पचीस से कम
अवस्था के पुरुष के रज-वीर्य से जो गर्भाधान होता है वह नष्ट
हो जाता है। अभिप्राय यह है कि उससे जो सन्तान पैदा होती
है, वह सर्वगुण-सम्पन्न और दीर्घायु नहीं होती। यह वीर्य बहुत
ही कम मात्रा में तैयार होता है। कुछ लोगों का कहना है कि ४०
३६ असली कोकशास्त्र
ग्रास आहार से १ बूँद रक्त और ४० बूँद रक्त से १ बूँद वीर्य
तैयार होता है। वैज्ञानिकों का मत है कि २ तोला वीर्य के लिए
१ सेर रक्त और १ सेर रक्त के लिए १ मन आहार की आवश्य-
कता होती है।
अब यह बात मालूम हो गयी कि यदि निरोग मनुष्य सेर-
भर अन्न रोज खाये तो ४० दिन में वह ४० सेर अन्न खा सकेगा।
अतएव उसकी ४० दिनकी कमाई दो तोला वीर्य है। इस
हिसाब से ३० दिन की कमाई में केवल डेढ़ तोला वीर्य ही हृष्ट-
पुष्ट मनुष्य को प्राप्त होता है। ऐसे मूल्यवान पदार्थ को शरीर से
निकाल देना कितना अनर्थ है। इस पर लोग पूछ सकते हैं कि
जब यह इतना कम तैयार होता है, तब रात-दिन विषय करने-
वालों के शरीर में यह आता कहाँ से है ? प्रश्न बहुत ही ठीक है।
बात यह है कि मनुष्य के शरीर में वीर्य सदा कुछ-न-कुछ तैयार
रहता है। हम पहले ही कह आये हैं कि वीर्य के बिना शरीर
जीवित नहीं रह सकता। दूसरी बात यह है कि रात-दिन विषय
करने वाले मनुष्य का वीर्य अच्छी तरह से पकने तो पाता नहीं,
वह तो अपने असली रूप में आने से पहले बाहर निकल जाता है;
अतः उनके वीर्य को तो वीर्य कहना ही अनुचित है।
यहाँ पर एक बात का और उल्लेख कर देना आवश्यक है।
वह यह कि बहुत लोग समझते होंगे, यदि वीर्य हमेशा बनता है;
और वह आहार का अन्तिम सार है तो कुछ समय में बहुत
असली कोकशास्त्र ३७
अधिक मात्रा में एकत्र हो जाता होगा। यदि उसे काम में न लाया
जाय तो अन्ततः वह किस काम आवेगा। इसका साधारण
उत्तर यही है कि आहार किये हुए पदार्थ से रस, रस से रक्त,
रक्त से मांस, मांस से मेदा, मेदा से अस्थि (हड्डी) हड्डी
से मज्जा और फिर उससे वीर्य बनता है। बाद वीर्य की
भी पाचन क्रिया होती है। स्थूल भाग तो वीर्य में रहता है और
सूक्ष्म भाग का 'ओज' बन जाता है। कहने का अभिप्राय
यह है कि सब धातुओं में सर्वश्रेष्ठ वस्तु वीर्य है और वीर्य का
श्रेष्ठ भाग ओज है। इसी ओज का दूसरा नाम बल भी है।
इस ओज की ज्यों-ज्यों वृद्धि होती है, त्यों-त्यों शरीर की वृद्धि
होती है और इसकी न्यूनता से शरीर का नाश होता है।
उत्साह, साहस, धैर्य, लावण्य, संयम, तेज, सौन्दर्य, प्रसन्नता,
बुद्धि आदि इसी ओज की विभूतियाँ हैं। अधिक मात्रा में वीर्य
का नाश करने वालों में ये विभूतियां नहीं रहतीं। यही कारण है
कि हमारे शास्त्रकारों ने सन्तानोत्पत्ति के लिए छोड़कर और किसी
भी अवस्था में वीर्यनाश करने की आज्ञा नहीं दी है।
───:❉:───
३८ असली कोकशास्त्र
वीर्य का स्थान
वीर्य सारे-शरीर में फैला रहता है—इसके रहने का कोई
विशेष स्थान नहीं है। जिस प्रकार दूध में मक्खन रहता है, उसी
प्रकार शरीर में वीर्य। जिस प्रकार दूध को मथने से मक्खन
बाहर आ जाता है, उसी प्रकार रति करने से सारी शारीरिक
इन्द्रियों का मथन होकर वीर्य अंडकोष में जमा हो जाता है और
'उपस्थेन्द्रिय' द्वारा बाहर निकलता है।
—:*:—
वीर्य में कौनसे पदार्थ हैं ?
पश्चिमी विद्वानों ने 'सूक्ष्म-दर्शक-यन्त्र' द्वारा वीर्य का निरीक्षण
करके पता लगाया है कि पुरुष-वीर्य में एक प्रकार के अत्यन्त
छोटे जन्तु होते हैं जो कि आँखों से दिखलायी नहीं पड़ते। ये
जन्तु किसी बढ़िया यंत्र से स्पष्ट दिखलायी पड़ते हैं। इन जन्तुओं
के केवल सिर और पूँछ होती है। इनमें सजीव जन्तुओं के समान
संचालन शक्ति और स्त्री-कोष में जाकर बच्चे का जीवन बनाने की
शक्ति होती है। पुरुष-वीर्य इसी प्रकार के जन्तुओं का समूह है।
डाक्टर "टाल" का कहना है कि "अबतक स्पष्टतया यह बात नहीं
मालूम हो सकी है। वीर्य की बनावट जहाँतक रसायनिक क्रिया से
सम्बन्ध है, उसके विषय में मैं केवल अपना अभिप्राय ही देना
असली कोकशास्त्र ३६
उचित समझता हूँ कि प्राण-तत्व और रासायनिक पृथक्करण के
तरीक़ों में कोई प्राकृतिक सम्बन्ध नहीं है । रसायन-शास्त्र केवल
इतना ही बतलाता है कि पृथक्करण के बाद शेष क्या रहा ।
सूक्ष्म-दर्शक यंत्र से मालूम होता है कि पुरुष-वीर्य के ये सूक्ष्म
जन्तु ही स्त्री-कोष को गर्भ-रूप में परिणत करने वाले हैं। इन
जन्तुओं को नीचे लिखे नामों से पुकारा जाता है—
१—स्परमेटोजा
२—सेमिनल फिलेमेण्ट
३—जूसपर्मस
४—सेमिनल एनेमल्क्यूल्स
५—स्परमेटोजोएड्स
इसके अतिरिक्त वैनर आदि विद्वानों ने पुरुष-वीर्य में सेमिनल
ग्रेन्यूल्स नाम के दाने भी मालूम किये हैं जो कि सेमिनल फिलेमेण्ट
( वीर्य कीटों ) की अपेक्षा बहुत कम होते हैं। शुद्ध-वीर्य, वीर्य-कीट
और वीर्य के दानों से बना हुआ होता है । कलिकर के मतानुसार
पुरुष-वीर्य का प्रत्येक जन्तु १/६०० इंच का होता है । इन
जन्तुओं का अगला भाग चिपटा और गोला होता है; पिछला भाग
लम्बा और पतला होता है । सिर की लम्बाई १/१०००० इंच और
चौड़ाई भी उतनी ही होती है । इनके सिर की जड़ में एक बहुत
ही नाजुक और बारीक तार भी होता है, जो इसके आकार से
४० असली कोकशास्त्र
तिगुना-चौगुना लम्बा होता है। यह झिल्ली से ढँका हुआ होता
है। इस जन्तु का सिर भी इसी झिल्ली से ढँका रहता है। डॉक्टरों
ने इन जन्तुओं को सजीव माना है। जिस प्रकार मेंढक के नवजात
बच्चे पानी में इधर-उधर अपनी दुम को लहराते हुए तैरते हैं, ठीक
उसी प्रकार वीर्य्य-कीट भी वीर्य्य में विचरते हैं। इनकी गति सदा
आगे की ओर होती है। इन्हें वीर्य्य-कोष की गर्मी के समान काँच
की किसी गरम शीशी में डाल दिया जाय तो ये वहाँ २४ से ७२
घण्टे तक जीवित रह सकते हैं। इसी प्रकार की पिचकारी द्वारा
गर्भ धारण कराया जा सकता है। मृतक मनुष्य के शुक्राशय में
ये वीर्य्य-कीट कभी-कभी २४ घण्टे तक जीवित देखे गये हैं। जब
ये कीड़े मर जाते हैं, तब इनकी दुम सीधी हो जाती है।
—::—
शुद्ध वीर्य की परख
स्फटिकाभ्यं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धि च ।
शुक्रमिच्छन्ति केचित्तु तैलक्षौद्रनिभं तथा ।
बिल्लोरी पत्थर के समान श्वेत रंग का, पतला, चिकना और
मधुर शहद की गन्ध वाला वीर्य शुद्ध होता है !
—::—
असली कोकशास्त्र ४१
रज और उसमें मिश्रित पदार्थ
जिस प्रकार पुरुष-शरीर में आहार की हुई वस्तु से वीर्य तैयार
होता है, उसी प्रकार स्त्री-शरीर में आहार की हुई वस्तु से रज
तैयार होता है। यह रज स्त्री-शरीर का सार है। जो स्त्री-पुरुष
संयोग से या अन्य प्रकार से जितना ही अधिक रज नाश करती
है, वह उतना ही निर्बल और अल्पायु हो जाती है। स्त्री-जीवन के
लिए इसकी रक्षा करना नितान्त आवश्यक है।
पुरुषों की भाँति स्त्रियों में भी अंडकोष होते हैं। फर्क इतना
ही है कि पुरुषों के अंडकोष बाहर की तरफ होते हैं और स्त्रियों
के भीतर की ओर। ये दोनों गर्भाशय के दाहिने-बाएँ रहते हैं। जो
ऊपर बतलाया जा चुका है। पुरुष-वीर्य की भाँति स्त्री-रज में भी
जन्तु होते हैं। किन्तु इनका आकार पुरुष वीर्य-जन्तुओं से तिगुना
होता है। ये अंडे के आकार के होते हैं। जिस प्रकार अंडे के
भीतर सफेदी और जर्दी होती है, उसी प्रकार इन जन्तुओं में
न्यूक्लियस और प्रोटोप्लाज्म नाम के दो पदार्थ होते हैं।
४२ असली कोकशास्त्र
शुद्ध रज की परख
शशासृक्प्रतिभं यत्तु यद्वा लाक्षारसोपमम् ।
तदार्तवं प्रशंसन्ति यद्वासो न विरंजयेत् ॥
जिससे कपड़ा रंग देने पर किसी प्रकार की बदरंगी पैदा न
हो, खरगोश के खून के समान लाल रंग या लाख की तरह रंगीन
आर्त्तव शुद्ध रज कहाता है।
सन्तान उत्पन्न करने के लिए शुद्ध वीर्य, शुद्ध गर्भाशय और
शुद्ध रज की नितान्त आवश्यकता है। यदि ये शुद्ध न हों—
विकार-युक्त हों, तो गर्भ रहना कठिन हो जाता है। यदि गर्भ रह
भी जाता है तो सन्तान रोगी, कमजोर और अल्पायु होती है।
पहले हम शुद्ध वीर्य की पहचान बतलाते हैं। जो वीर्य सफेद हो,
न बहुत पतला हो और न गाढ़ा, चिकना हो, जिसमें सहद के
समान गन्ध हो, जिसके स्खलित होने पर किसी प्रकार की
वेदना न हो और जो पानी में डालने पर डूब न जाय उसे शुद्ध वीर्य
समझना चाहिये। यदि इससे भिन्न प्रकार के लक्षण पाये जायें
तो समझना चाहिए कि वीर्य में विकार है, गर्भाधान करने के
योग्य नहीं है। फिर किसी अनुभवी मनुष्य से वीर्य की शुद्धि के
लिए उपचार कराना चाहिए।
यह वीर्य पित्त, कफ, बात और रक्त आदि के प्रकोप से
असली कोकशास्त्र ४३
दूषित होता है। दूषित वीर्य की सुश्रुतसंहिता में यह पहचान
लिखी है:—
पित्त-दूषित वीर्य—इसमें वीर्य का रंग नीला और जर्द होता है
तथा स्खलित होते समय जलन होती है ।
कफ-दूषित वीर्य—यदि वीर्य का रंग सफेद हो किन्तु कुछ
जर्दी लिए हुए हो तथा स्खलित होते समय हलकी सी वेदना
( पीड़ा ) हो तो उसे कफ दूषित समझना चाहिए ।
वात दूषित वीर्य—यदि कुछ सुर्खी और कालिमा हो तथा
रुक-रुक कर स्खलित हो तो वात दूषित समझना चाहिए ।
रक्त-दूषित वीर्य—यह मटमैला और सुर्खी लिए हुए होता है ।
और इसमें मुर्दे की सी गंध होती है । स्खलित होते समय जलन
होती है तथा एक बार में बहुत सा वीर्य निकल जाता है ।
कफ-बात-मिश्रित दोष—यह दोष हो जाने पर वीर्य में गांठें
पड़ जाती हैं । इसी प्रकार कफ और पित्त का दोष होने पर वीर्य
मवाद ( पीप ) के समान होकर दुर्गन्ध-युक्त हो जाता है । जब
वीर्य में त्रिदोष होता है, तब उसमें मल-मूत्र की सी बू आने
लगती है तथा इनका कुछ अंश भी उसमें आ जाता है ।
५४ असली कोकशास्त्र
रजोदर्शन
इसका दूसरा नाम है मासिक-धर्म । भारत की स्त्रियाँ
साधारणतया १२-१३ वर्ष की अवस्था में ऋतुमती होती हैं ।
गर्म प्रान्तों में इससे कुछ पहले और ठंडे प्रान्तों में इससे कुछ
अधिक समय में स्त्रियाँ ऋतुमती होती हैं । किन्तु दुर्भाग्य की बात
है कि जहाँ शास्त्रकारों ने १६ वर्ष के पहले गर्भाधान करना निषेध
किया है, वहाँ ८-१० वर्ष की अवस्था में ही कितनी स्त्रियों को
गर्भ रह जाता है । इसका मूल कारण सामाजिक बुराई है ।
स्त्रियों तथा पुरुषों की अज्ञता के कारण ही यह अनर्थ होता है ।
बात यह है कि छोटी-छोटी कन्याओं को नीच पुरुष ऐसी बातें
सिखलाने लगते हैं और बड़ी उम्र की स्त्रियाँ भी कन्याओं के
सामने इस तरह की गोप्य बातें करने लगती हैं, जिसका
फल यह होता है कि लड़कियाँ उचित अवस्था से पहले ही
रजस्वला होने लगती हैं और कुसंगति में पड़कर दुराचारिणी
हो जाती हैं ।
मासेनोपचितं काले धमनोभ्यां तदार्तवम् ।
ईषत्कृष्णं विदग्धं च वायुर्योनिमुखं नयेत् ॥
महीने में एक बार स्त्रियों के गुह्यस्थान से एक प्रकार का
कुछ काला और दुर्गन्धयुक्त रक्त निकलता है, उसी को आर्त्तव
या ऋतु कहते हैं । इस रक्त का निकलना ३ से ६ दिन तक
असली कोकशास्त्र ४५
जारी रहता है। यदि इसके बाद भी रज का निकलना बन्द
न हो तो मासिक धर्म का दोष समझना चाहिए। यह क्यों
निकलता है, यह जानने के लिए पाठक-पाठिकाओं का उत्सुक
होना स्वाभाविक है; बात यह है कि स्वाभाविक नियमानुसार
१२-१३ वर्ष की अवस्था में बालिकाओं के गर्भाशय के
भीतर रक्त का संचार हेना शुरू होता है। इन दिनों गर्भाशय का
मुख कुछ-कुछ खुल जाता है और रक्त योनि मार्ग से होकर
बाहर निकलता है। इसको मासिक-धर्म कहते हैं, क्यों कि यह
हर महीने में होता है। यह लाल रंग का ओर तरल होता है।
इसका पहले-पहल निकलना रजोदर्शन कहलाता है और बाद
उसका नाम ऋतु, आर्त्तव, रजस्वला या मासिक-धर्म हो
जाता है। यहाँ पर यह जान लेना आवश्यक है कि गर्भाशय का
योनि से क्या सम्बन्ध है, क्योंकि यह जाने बिना इस बात का
समझना असम्भव हो जायगा कि गर्भाशय से वह आर्त्तव किस
प्रकार बाहर निकलता है।
जब गर्भ-स्थिति हो जाती है, तब मासिक-धर्म बन्द हो
जाता है। कितनी ही स्त्रियों को गर्भ-स्थिति में भी मासिक-धर्म
होता रहता है, पर ऐसा बहुत कम देखने में आता है।
तद्वर्षाद्द्वादशात्काले वर्तमानमसृक्पुनः ।
परिपक्वशरीराणां याति पंचाशतः क्षयम् ॥
४६ असली कोकशास्त्र
१२-१३ वर्ष से लेकर ४५-५० वर्ष की आयु तक स्त्रियों
का मासिक-धर्म प्रतिमास जारी रहता है, बाद बन्द हो जाता है ।
फिर स्त्रियाँ गर्भ धारण नहीं कर सकतीं। इसे रजो निवृत्ति कहते हैं ।
हम पहले ही कह आये हैं कि मासिक-धर्म में ऋतु-स्राव की
अवधि कम से कम १ दिन और अधिक से अधिक ६ दिन है ।
तथा इससे अधिक स्राव का होना रोग का लक्षण है । किन्तु बहुधा
३-४ दिन ही स्राव होता है। यह मासिक-धर्म रजो-दर्शन होने
के बाद २८-३० दिन पर बराबर होता रहता है। अधिक मैथुन
से अथवा रोगी शरीर होने से आर्त्तव आगे पीछे भी होता है
किन्तु यह बड़ा ही हानिकारक है। मासिक-धर्म ठीक महीने
भर बाद होना तन्दुरुस्ती का लक्षण है, यों तो एक दिन आगा-
पीछा हो जाय तो बात दूसरी है। मासिक-धर्म की गड़बड़ी से
गर्भाशय भी विकार-युक्त हो जाता है । अतः ऐसी अवस्था में
उपचार करना बहुत ही आवश्यक है । बहुत सी स्त्रियों को
मासिक धर्म के समय कुछ पीड़ा होती है। यह भी रोग का लक्षण
है । मासिक-धर्म में जरा भी वेदना नहीं होनी चाहिए। बहुधा
स्त्रियाँ मूर्खता के कारण इस बात को जानती ही नहीं कि मासिक-
धर्म का निश्चित समय पर होना तथा उस समय एक प्रकार
की वेदना का होना भी कोई रोग है । और जो जानती भी हैं, वे
इस बात को प्रकट करने में संकोच करती हैं । किन्तु यह बहुत
बुरी बात है । मासिक-धर्म में जरा भी गड़बड़ी होने पर उन्हें
असली कोकशास्त्र ४१
फ़ौरन प्रगट कर देना उचित है और फिर सावधानी के साथ किसी
अनुभवी व्यक्ति की दवा से उस गड़बड़ी को दूर कर देना उनका
कर्त्तव्य है। यदि इस दोष को बहुत जल्द नहीं हटाया जाता तो
स्त्री की तन्दुरुस्ती आजन्म के लिये नष्ट हो जाती है। फिर तो
दुनियाँ उनके मासिक-धर्म की खराबी को जान जाती है—जिसे
बतलाने में वे संकोच करती थीं, और रोग भी पुराना हो जाने पर
बड़ी कठिनाई से अच्छा होता है। इस लिए प्रत्येक स्त्री का
कर्त्तव्य है कि इस बात की शिकायत मालूम होने पर वह उपचार
करने में जरा भी विलम्ब न करे। इस बात को अनुचित लज्जा के
कारण छिपाना कदापि उचित नहीं। रोग में लज्जा किस बात की ?
भला जिस बात के ऊपर जीवन का सारा आनन्द, सुख और
शान्ति निर्भर है, उसको लज्जा के कारण छिपा कर जीवन को
चौपट करके जन्मभर कष्ट भोगना मूर्खता नहीं तो और क्या
है ? शरीर में व्याधि को पाल-पोस कर बढ़ाना ही मूर्खता है।
शत्रुको बढ़ाना उचित नहीं। जिस स्त्रीके मासिक-धर्म में अनिय-
मितता होती है यानी कभी दस-बीस दिन महीना भर अवधि के
आगे होता है और कभी दस पाँच दिन अवधि के पहले उस
स्त्री से पैदा होने वाली सन्तान कभी भी जीवित नहीं रहती—
अवश्य थोड़ी अवस्था में ही मर जाती है।
स्मरण रहे कि सन्तान पैदा करने में मासिक-धर्म की नियमता
प्रधान चीज है। मासिक-धर्म में स्त्रियों के शरीर का विकार
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निकल जाता है। ठीक समय पर रजस्वला होनेवाली स्त्रियों
का चित्त हमेशा प्रसन्न रहता है और महीने-महीने स्राव
बन्द होने के बाद तो उनका काया-कल्प सा हो जाता है। उस
समय उनके चेहरे पर स्वाभाविक ही रौनक आ जाती है, शरीर
हल्का हो जाता है, चित्त में प्रसन्नता का समावेश हो जाता है
और हृदय में अपूर्व शान्ति का स्रोत बहने लगता है। इसी से
रजो-धर्म होने पर स्त्रियों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं
इस बात की महर्षियों ने पूरी ताकीद की है; जो कि आगे चलकर
बतलाया जायगा। यह कोई ऐसी-वैसी चीज नहीं है कि इस
पर ध्यान न दिया जाय।
यह आर्त्तव रक्तमय स्राव है और गर्भाशय से निकलता है।
यह रक्त की भाँति शीघ्र नहीं जम सकता। इसका रंग लाल
और कुछ कालिमा लिये होता है। आर्त्तव का परिमाण सब स्त्रियों
में समान नहीं होता। अधिकतर इसका परिमाण एक छटाँक से
चार छटाँक तक होता है। वैद्यक ग्रन्थों ने एक दिन में इस से
अधिक या कम स्राव का होना भी रोग का चिह्न बतलाया है।
ऋतुमती रहने तक प्रायः स्त्रियों की शारीरिक और मानसिक
दशा में परिवर्तन हुआ करता है; आलस्य और अरुचि की
अधिकता रहती है, कमर नितम्ब और पेडू में भारीपन रहता है।