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रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

असली कोकशास्त्र २१५
प्रमेह के लक्षण
यह रोग जब होने वाला होता है, तब पहले दाँतों में मैल
अधिक जमने लगती है। कण्ठ जीभ और तालू में भारीपन मालूम
होने लगता है, हाथ पैर में जलन शुरू हो जाती है, मुँह में मिठास
होती है, प्यास अधिक लगती है, बाल आपस में चिपक जाते हैं,
तथा समूचे शरीर में चिकनाहट आ जाती है। आयुर्वेद के ग्रन्थों
में यह रोग २० तरह का बतलाया गया है। कफज १० पित्तज ६
और वातज ४ प्रकार का होता है।
कफज प्रमेह
इक्षु प्रमेह—पेशाब गन्ने के रस की तरह मीठा होता है। यह
याद रहे कि हर प्रमेह में पेशाब के आगे पीछे या पेशाब में मिल-
कर वीर्य गिरता है। किसी किसी प्रमेह में तो उसका गिरना प्रतीत
होता है और किसी किसी में बिलकुल दिखलायी नहीं पड़ता।
सान्द्र प्रमेह—यदि रात को पेशाब किसी बर्तन में रख दिया
जाय और सबेरे वह बिलकुल गाढ़ा हो जाय तो समझना चाहिए
कि सान्द्र प्रमेह है।
उदक प्रमेह—पेशाब एकदम सफेद, शीतल, गन्धहीन, थोड़ा
और चिकना होता है।
शुक्र प्रमेह—पेशाब वीर्य के समान होता है।

२१६ असली कोकशास्त्र
सुरा प्रमेह—पेशाब ऊपर से शराब की तरह साफ और नीचे
गाढ़ा होता है ।
पिष्ट प्रमेह—पिसे हुए चावल के पानी के समान और अधिक
पेशाब होता है । मूत्र-त्याग करते समय रोमाञ्च हो आता है ।
शीत प्रमेह—पेशाब मीठा और अधिक होता है तथा ठण्ढक
बहुत रहती है ।
सिकता प्रमेह—पेशाब में बालू के समान कड़े कण गिरते हैं ।
शीशी में रखने से ये कण मालूम होते हैं ।
शनैर्मेह—पेशाब थोड़ा और रुक रुक कर उतरता है ।
लार प्रमेह—मुख की लार के समान चिकना पेशाब उतरता है ।
पित्तज प्रमेह
मांञ्जिष्ठ प्रमेह—पेशाब का रंग मजीठ के काढ़े के समान और
दुर्गन्धयुक्त होता है ।
रक्त प्रमेह—पेशाब खून के समान लाल, खारा और दुर्गन्ध-
युक्त होता है ।
हरिद्र प्रमेह—पेशाब करते समय जलन होती है और उसका
रंग हल्दी की तरह पीला होता है ।
नील प्रमेह—नीले रंग का पेशाब होता है ।
क्षार प्रमेह—खारे जल के समान वर्ण, रस, स्पर्श और गन्ध
का पेशाब होता है ।
काल प्रमेह—काले रंग का पेशाब होता है ।

असली कोकशास्त्र
चित्र नं० ७
शंखिनी स्त्री

कामशास्त्र
[पहला भाग]

असली कोकशास्त्र २१७
वातज प्रमेह
वसा प्रमेह—चर्बी के समान पेशाब होता है ।
मज्जा प्रमेह—मज्जा मिला हुआ पेशाब होता है ।
क्षौद्र प्रमेह—शहद के रंग का, मीठा, रूखा और कषैला
पेशाब होता है । यह पेशाब जहाँ गिरता है, वहाँ चींटियाँ और
मक्खियाँ आ जाती हैं ।
हस्ति प्रमेह—रुक रुक कर तारदार और हाथी के मद जैसा
पेशाब होता है । कभी कभी पेशाब रुक भी जाता है ।
──:०:──
प्रमेह नष्ट के उपाय
१—छः माशे महुआ वृक्ष की छाल को ४ दाने काली मिर्च
के साथ पानी में पीस छानकर पीने से सब प्रकार के प्रमेह नष्ट
होते हैं ।
२—आँवला, हड़, और बहेड़े का चूर्ण १ तोला, शहद मिला-
कर चाटने से पुराना प्रमेह नष्ट हो जाता है ।
३—शुद्ध लौह-भस्म, शहद के साथ चाटने से प्रमेह जाता
रहता है । मात्रा बलाबल देखकर निर्धारित करनी चाहिए ।
४—शुद्ध वङ्ग-भस्म दो रत्ती जाड़े के दिनों में तो किसी
साधारण गर्म चीज के साथ या केले के साथ और गर्मी के दिनों में

२१८ असली कोकशास्त्र
कुम्हड़े के मुरब्बे के साथ सेवन करने से सब तरह के प्रमेह नष्ट
हो जाते हैं ।
प्रदर या प्रमेह के रोगी को लाल मिर्च, खट्टी मीठी तथा
कड़वी चीजें बादी और गरिष्ट वस्तुएँ भूलकर भी न खानी चाहिएँ ।
मैथुन करना भी एकदम छोड़ देना उचित है । दवा का सेवन करते
समय पूर्णरीति से ब्रह्मचारी बन जाना उचित है । तभी यह रोग
दूर हो सकते हैं, अन्यथा दवा का सेवन करना व्यर्थ हो जाता है ।
सौ दवाओं से बढ़कर एक परहेज से रहना है ।
-:०:-
बल वीर्य बर्द्धकमहौषधि
इस प्रकरण में कुछ ऐसी औषधियाँ लिखी जायँगी, जिनसे
शरीर में काफी बल-वीर्य की वृद्धि हो सकती है । किन्तु ये दवायें
सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए हैं, जो दुराचार करके अधिक वीर्य क्षीण
कर चुके हैं । यों तो ये औषधियाँ सबके लिए लाभदायक हैं, पर
संयमी और हृष्ट पुरुष को इनके करने की आवश्यकता ही क्या
है ? संयमी पुरुष को तो जी-जान से बस एक ही दवा का सेवन
करना चाहिए, बस वही संयम । संयम से बढ़कर दूसरी दवा
संसार में कोई भी नहीं है ।
१—जिस मनुष्य का धातु कम हो गया हो । उसे इस दवा
का सेवन करना चाहिए—धाय के फूल, बड़ी हड़, बहेड़ा और

असली कोकशास्त्र २१६
आँवला। इन चारों चीजों को बराबर बराबर लेकर ईख के रस में
भावना दे। बाद धूप में सुखा कर उसी के बराबर मिश्री मिला
शहद में रात को चाटे और ऊपर से शुद्ध शुद्ध दूध पी ले। इससे
बल-वीर्य की वृद्धि होती है।
२—कौंच वृक्ष की जड़ दूध में पीसकर प्रति दिन सबेरे पीने
से भी पुरुष का शरीर बलवान हो जाता है और खूब वीर्य पैदा
हो जाता है।
३—कौंच वृक्ष की जड़, सफेद तिल, असगन्ध, विदारी कन्द,
सांठी चावल, इनको बराबर बराबर लेकर कूट डाले। बाद कपड़े
से छानकर प्रति दिन ६ माशे चूर्ण खाकर ऊपर से गरम दूध में
घी डालकर पी ले। इसका एक महीने तक सेवन करने से शरीर
में विचित्र परिवर्त्तन हो जाता है। हमेशा सेवन करे तो और
भी अच्छा हो।
४—सूखे आँवले का चूर्ण ईख के रस में भिगोकर छाया में
सुखा ले। इस प्रकार सात बार रस में भिगोकर सुखा ले। बाद
उसके बराबर शहद और मिश्री मिलाकर पका डाले और उसका
प्रति दिन सेवन करे। यह दवा स्त्री और पुरुष दोनों के लिए एक
समान गुणकारी है।
५—शतावरी तेल बनाने की रीति—हरी शतावर को कूट कर
२ सेर रस निकाल लेना चाहिए। बाद उसमें एक सेर तिल का
तेल और ४ सेर गोदुग्ध डालकर मन्दाग्नि से धीरे धीरे पकावे

२२० असली कोकशास्त्र
इन दवाइयों को एक एक तोला लेकर कल्क बनाकर उसमें पकते
समय ही डाल देना चाहिए । सौंफ, देवदारु, बालछड़, छालछरीला,
बच, लाल चन्दन, तगर, कूट, इलायची, अंशुमती, खरेटी, रासना,
असगन्ध, वायविडंग, स्याह मिच, पीलपर्णी, दालचीनी, पत्रज,
रेडी की जड़ का छिलका, सेंधा नमक और सोंठ । थोड़ी देर के
बाद अदरख का अर्क डाल देना चाहिए । जब पक जावे, तब उसे
उतार ले और स्वच्छ पात्र में छानकर रख दे । फिर इस तेल का
मर्दन करे । यह तेल इतने रोगों पर जादूकी तरह असर करता है—
जो कुबड़े हों, बौने हों, पंगुल हों, महावात रोग से भग्न हों
या विसर्प रोग से पिडित हों, उनके लिए यह तेल बड़ा लाभ-
दायक है । शरीर के संकुचित हो जाने में, सन्निपात में गठिया में,
हृदय शूल में, यह तेल तत्क्षण गुण दिखलाता है । गले के भीतर
होने वाले सब रोगों का यह तेल नाश करता है । वीर्य-हीनता,
नपुंसकता, चित्तभ्रम, इन्द्रिय निर्बलता, बुद्धिहीनता, मन्दाग्नि को
यह फौरन दूर कर देता है । वन्ध्यात्व को भी यह दूर करने में
समर्थ है । प्रमेह रोग, अंडवृद्धि रोग, पिल्ली रोग, समलवाय, मृगी,
कुष्ठ, दाह, ज्वर आदि रोगों को भी यह तेल नष्ट कर देता है ।
इस तेल को एक महीने तक पीने से वृद्ध मनुष्य भी यौवनत्व
प्राप्त कर सकता है । इस तेल को सूँघने, पीने और मालिश करने
में नित्य बर्त्तना चाहिये । यह शतावरी तेल स्त्री और पुरुष दोनों
के लिए लाभदायक है ।

३. परिच्छेद ९-१२: विचित्र रति-बन्ध, विविध आसन, कन्या-वरण एवं प्रीति-संवर्धन

असली कोकशास्त्र १२१
६—सफेद् घुँघची का कपड़छान किया हुआ चूर्ण दूध के
साथ सेवन करना भी वीर्य के लिए बड़ा गुणकारी है ।
७—मुलहठी का चूर्ण एक तोला घी मिलाकर शहद् में चाटे
और ऊपर से दूध पी लिया करे तो बड़ा ही लाभ हो ।
८—गोखरू, तालमखाना, सफेद् मुसरी, कौंच के बीज,
गंगेरण की छाल और सहदेई जड़ी की जड़, इन सब चीजों को
कूट-कपड़छान कर चूर्ण के बराबर की मिश्री मिला प्रतिदिन दूध के
साथ सेवन करना चाहिए ।
९—गरम दूध में घी डालकर प्रतिदिन सेवन करना भी बड़ा
ही बलवर्द्धक है ।
१०—सिम्बल की मुसली का रस ४ तोला लेकर उसमें एक
तोला मिश्री मिलाकर पी जाया करे । यह दवा सात दिन में ही
प्रभाव दिखलाती है ।
११—शतावर, गोखरू, डाभ की जड़, सिंघाड़ा, गंगेरण की
छाल, कौंच के बीज, इनको सम मात्रा में कूट-कपड़छान कर
बराबर की मिश्री मिला एक तोला चूर्ण रोज रात को फाँक कर
ऊपर से दूध पी लिया करे तो वीर्य पुष्ट हो और शरीर में ताकत
आवे ।
—:०:—

२२२ असली कोकशास्त्र
गर्भ ज्ञान
गर्भ स्थिति हो गयी या नहीं, यह जानने के लिए पहला चिह्न
तो यह है कि जब गर्भ रह जाता है तब किसी किसी स्त्री का जी
दूसरे ही दिन मिचलाने लगता है, मुख का रंग बदल जाता है,
शरीर में भारीपन आ जाता है। सबसे अच्छी पहचान महीनेभर
में होती है। वह इस तरह कि यदि मासिकधर्म टल जाय, तब
समझ लेना चाहिए कि गर्भ रह गया। क्योंकि गर्भ स्थित हो जाने
पर ऋतुधर्म बन्द हो जाता है। किन्तु जिन स्त्रियों का मासिक-धर्म
अनियमित रूप से होता है उनके लिए यह लक्षण ठीक नहीं है।
गर्भ रहने पर स्वाभाविक ही भोजन में अरुचि हो जाती है, शरीर
में आलस्य आता है कोई काम करने को जी नहीं चाहता, पुरुष
की ओर से भी रुचि हट जाती है, उल्टी होने लगती है, झूठी
ओक भी आती है, लेटने के लिए इच्छा करती है, कमर के नीचे
सुस्ती अधिक आ जाती है, कभी-कभी सिर भी दुखने लगता
है। गर्भिणी को खट्टा तथा मीठी चीजें खाने के लिए बहुत
उत्सुक रहती है। दस्त खुलासा नहीं होता, नींद अच्छी तरह नहीं
आती, स्तनों के मुख छोटे हो जाते हैं और उन पर श्यामलता
छा जाती है। गर्भ के पहचानने की रीति एक यह भी है कि
थोड़ा सी शहद पानी में मिलाकर पी लेने पर यदि थोड़ी देर के बाद
टूँड़ी में कुछ दर्द होने लगे तो समझना चाहिए कि गर्भ अवश्य है

असली कोकशास्त्र २२३
ओर यदि दर्द न हो तो जान ले गर्भ कदापि नहीं है । इस पहचान
से बढ़कर कोई भी पहचान नहीं है ।
संयोग के बाद ही पुरुष से तृप्ति, गर्भाशय में भारीपन, थक-
वट, छाती का फड़कना, रोम खड़े हो जाना आदि मालूम
होता है ।
कितनी ही स्त्रियों को तो गर्भ रहने के २-४ दिन बाद ही कै होने
लगती है और कितनी को मासिक-धर्म टलने के बाद यह चिह्न
दिखलायी पड़ता है । किन्तु बहुत सी स्त्रियाँ गर्भ धारण करते हुए
भी इन दोनों बातों से बरी रहती हैं; उनके सिर्फ मुख में थूक
अधिक आता है । ढाई-तीन महीने का गर्भ हो जाने पर स्तनों का
आकार भी बढ़ने लगता है; किन्तु बहुत-सी स्त्रियों के स्तन में
चार-पाँच महीने तक कोई परिवर्त्तन ही नहीं होता । तीसरे महीने
से गर्भिणी का पेट भी बढ़ने लगता है और नाभि का गढ़ा धीरे-
धीरे भरने लगता है । छः महीने तक गर्भ नाभिके नीचे रहता है,
बाद सातवें महीने से वह ऊपर चढ़ने लगता है । कभी-कभी रोग
से भी पेट बढ़ जाता है । इसकी खास पहचान यह है कि गर्भ
से बढ़ने वाला पेट बीच में ऊपर को कुछ उठा हुआ रहता है और
रोग से बढ़ा हुआ पेट सर्वत्र समान रूप से बढ़ता है । चार-पाँच
महीना बीत जाने पर तो गर्भ की पहचान और भी अधिक स्पष्टता
से की जा सकती है । क्योंकि फिर तो पेट में बालक का फड़कना
मालूम होने लगता है । किन्तु कई स्त्रियों के पेट में छः सात

२२४ असली कोकशास्त्र
महीने तक किसी प्रकार की फड़कन नहीं प्रतीत होती । भूख-
प्यास की अवस्था में गर्भ अधिक डोलता है ।
—०—

गर्भस्थ पुत्र पुत्री का ज्ञान

पेट में बालक पहले ही महीने में गोल जान पड़ता है ।
दाहिनी आँख कुछ बड़ी सी दीखती है। गर्भ में लड़का रहने पर
दाहिनी जंघा भी मोटी और भारी मालूम होती है। उसमें कुछ
दर्द भी हुआ करती है। दाहिने स्तन में दूध पहले उतरता है, मुख
का रंग अच्छा रहता है। स्वप्न में पुल्लिंग वस्तुएँ ही दिखलायी
पड़ती हैं, यदि मनुष्य का स्वप्न भी होता है तो पुरुष का ही ।
यदि गर्भवती के दूध में जूँ अथवा चींटी डालने पर वे जीती रहें
और चलती फिरती नजर आवें तो समझना चाहिए कि पुत्र उत्पन्न
होगा और यदि मर जाय तो कन्या की उत्पत्ति होगी । लड़का
दाहिनी कोख में रहता है। गर्भ में लड़का रहने पर स्त्री जो-कुछ
भी कार्य करेगी, वह दाहिने अंग से ही प्रारम्भ करके। यदि चलेगी
तो पहिले दाहिना पैर उठेगा, उठेगी तो दाहिना हाथ टेक कर
इत्यादि ।
यदि पेट में कन्या होती है तो स्त्री का मस्तक भारी रहता है,
तथा स्तनों का दूध पतला होता है। गर्भिणी के मुख का रङ्ग पीला
रहता है। इसके सिवा पुत्र के लक्षणों के ठीक विपरीत सब लक्षण
दिखलायी पड़ते हैं ।

१५ असली कोकशास्त्र २२५
यदि गर्भवती स्त्री को राजा का दर्शन करने की इच्छा
निरन्तर हुआ करे तो समझना चाहिए कि महा भाग्यशाली और
धनी सन्तान पैदा होगी । भूषण तथा रेशमी वस्त्र धारण करने
की इच्छा होने पर सुन्दर और शौकीन तबीयत की सन्तान पैदा
होती है । देव-मन्दिरों में जाने, महात्माओं के दर्शन करने तथा
धार्मिक कथायें सुनने की इच्छा होने पर शान्त स्वभाव की और
धर्मपरायण सन्तान पैदा होती है । साँप, सिंह आदि हिंसक
जानवरों के देखने की इच्छा होने पर हिंसक सन्तान उत्पन्न होती
है। किन्तु इसमें कभी-कभी सन्देह भी रह जाता है, पर पाँचवें महीने
में गर्भवती की जो इच्छा होती है, उससे अच्छी-बुरी सन्तान
भलीभाँति जानी जाती है और वह जानकारी कभी भी झूठी नहीं
होती—सदा सत्य उतरती है । इसका कारण यह है कि इसी
पाँचवें महीने में गर्भस्थ सन्तान में जीव का प्रवेश होता है ।
पुत्र-कन्या पहचानने की एक और रीति है, इसकी सैकड़ों
बार परीक्षा ली गयी है, एक बार भी झूठी नहीं हुई । वह यह है
कि यदि किसी स्त्री के गर्भ का बालक जानना हो तो भँड़भाँड़
नाम की बूटी को सन्ध्या समय स्नान करा रक्षा लपेट शान्त-चित्त
हो कह आवे कि "हे प्रभो, मैं इसे कल यह जानने के लिए उखाडूंगा
कि अमुक स्त्री के गर्भ में पुत्र है या कन्या।" यह कहकर
चला आवे । दूसरे दिन स्नानादि से निवृत्त होकर जाय और उसे
उखाड़ ले । (उसके काँटे अधिक कड़े हों तो कई तह करके कपड़े

२२६ असली कोकशास्त्र
लगाकर उखाड़ ले ) यदि सीधी एक जड़ निकले तो पुत्र और दो
जड़ निकलने पर कन्या जाने । किन्तु यदि वह जड़ ऊपर से ही
टूट जाय तो समझना चाहिए कि सन्तान पैदा होकर मर जायगी
या जियेगी भी तो बहुत ही कम दिनों तक । प्रसव वेदना के समय
इसकी जड़ कपड़े में लपेट कर स्त्री की कमर में बाँध देने से तत्क्षण
प्रसव हो जाता है, जरा भी देर नहीं लगती । किन्तु यह जड़ी
तभी बाँधनी चाहिए जब यह अच्छी तरह से मालूम हो जाय कि
अब प्रसव होने में कुछ ही समय की देर है ।
—:०:—
गर्भरक्षा के उपाय
गर्भरक्षा के उपाय बतलाने के पहले यह बतलाना आवश्यक
प्रतीत होता है कि बालक गर्भ में किस प्रकार रहता और क्रमशः
बढ़ता है । गर्भाधान से चार महीने तक गर्भाशय का मुख बन्द
रहता है । ज्यों ज्यों गर्भ बढ़ता जाता है, त्यों त्यों गर्भाशय भी
बढ़ता जाता है और अंडाकार होकर नीचे को खिसकता आता
है । छठे महीने गर्भाशय की नार बहुत छोटी और चिपटी होकर
फैल जाती है । आठवें महीने में बिलकुल चिपटी हो जाती है ।
कभी तो सातवें महीने से ही और कभी नव महीने से गर्भाशय का
मुख खुलने लगता है और बालक उत्पन्न होने के समय एकदम
खुल जाता है ।

असली कोकशास्त्र २२७
गर्भाधान हो जाने पर पहले महीने में वीर्य जमता है । दूसरे
महीने में उस पर पतली झिल्ली चढ़ती है । तीसरे महीने में शरीर
का आकार बनने लगता है । चौथे में पूरा शरीर बन जाता है ।
पाँचवें महीने में हृदय और जीव पड़ता है । छठे और सातवें महीने
में बालक का शरीर पुष्ट होता है । गर्भस्थ बालक पेट में उकरू बैठा
हुआ दोनों हाथों को पैरों से मिलाये रहता है । उसके दोनों घुटने
छाती और पेट से लगे होते हैं और उसका माथा उन्हीं घुटनों के
बीच में रहता है । यदि पुत्री रहती है, तब तो उसका मुख माँ की
पीठ की ओर होता है और यदि पुत्र होता है तो उसका मुख माँ
के पेट की ओर रहता है । गर्भस्थ बालक अपने हाथों की अँगुलियों
से आँख, कान, नाक और मुख मूंदे रहता है । इसका कारण यह
है कि जिन सात झिल्लियों के भीतर गर्भाशय में बालक रहता है,
उसमें एक प्रकार का ऐसा पानी होता है कि यदि वह बालक की
आँख से छू जाय तो सूर, कान में चला जाय तो बहिरा, मुख में
जाय तो गूँगा, पेट में जाय तो मुर्दा और मस्तक में जाय तो वह
पागल हो जाता है । इसलिए दयालु परमात्मा ने अपने सब छिद्र
मूँद रखने की शक्ति बालक को प्रदान की है ।
बच्चे का कौन-सा अङ्ग पहले बनता है इस विषय में विद्वानों
का कथन भिन्न-भिन्न प्रकार का है । कोई तो कहता है कि शारी-
रिक इन्द्रियों का मूल स्थान मस्तक है और इसकी रचना पहले
होती है ; कोई कहता है, हृदय, बुद्धि और मन है, इसलिए सबसे

२२८ असली कोकशास्त्र
पहले हृदय की रचना होती है। कोई कहता है कि बच्चे का पोषण
नाभि द्वारा होता है, इस लिए पहले नाभि बनती है। भारतीय
चिकित्सकों के आचार्य धन्वन्तरिजी का कहना है कि बालक के
अंग-प्रत्यंग एक साथ ही उत्पन्न होते हैं; किन्तु अधिक सूक्ष्म
होने के कारण लक्ष्य में आना कठिन है। समय पाकर वे यथाक्रम
प्रकट होते हैं। यदि विचार कर देखा जाय तो यही सिद्धान्त युक्ति-
संगत भी मालूम होता है। बड़ी खोज के बाद अर्वाचीन विद्वानों
ने भी इसी सिद्धान्त की पुष्टि की है। गर्भ स्थित होने के समय से
प्रायः नौ महीने में गर्भस्थ बालक की शारीरिक तथा मानसिक
शक्तियों तथा अवयवों की रचना हो चुकती है। इन नौ महीनों को
इस विषय के विद्वानों ने प्राकृतिक नियमानुसार दो भागों में विभक्त
किया है। पहले भाग में छः मास रक्खा है और दूसरे में तीन
मास। पहले भाग में बच्चे के प्रायः सारे शारीरिक अवयव बनते
हैं और दूसरे भाग में मानसिक शक्तियों का विकास होता है।
इस लिए पहले छः महीने में बच्चे की शारीरिक रचना में और
पिछले तीन महीने में उसकी मानसिक शक्तियों में माता अपनी
इच्छा के अनुसार परिवर्त्तन कर सकती है।
तीसरे सप्ताह में गर्भ का आकार बाजरे के दाने के बराबर
हो जाता है। महीना समाप्त होते-होते सिर तथा पैर का आकार
मालूम होने लगता है। लम्बाई भी उस समय चौथाई इञ्च तक
हो जाती है। डेढ़ महीना बीत जाने पर उसका आकार ऐसा हो

असली कोकशास्त्र २२६
जाता है कि जिसे देखने पर यह मालूम किया जा सकता है कि
यह मनुष्य जाति का बच्चा है । इस समय शरीर की अपेक्षा
मस्तक बड़ा होता है । हाथ-पैर ढूठे से रहते हैं, यानी उनमें हथेलों
और तलवे नहीं रहते । आँख, कान, नाक और मुख की जगह
सिर्फ काले दाग मालूम होते हैं । दूसरे महीने के अन्त में प्रायः
सारे अवयव ( अंग ) साफ दिखायी पड़ने लगते हैं । लम्बाई एक
इंच तक हो जाती है ।
तीसरे महीने में आँख की पलकों का आकार बन जाता है ।
बल्कि यों कहना चाहिए कि एक प्रकार से वे तैयार ही हो जाती
हैं । इस समय मुख बन्द रहता है । इसी महीने में स्त्री पुरुष में
भेद बतलाने वाले अंगों की रचना होती है । इस समय तक लंबाई
प्रायः ३।। इंच तक हो गयी रहती है । चौथे महीने में मस्तक
और कलेजे की अपेक्षा दूसरे अवयव अधिक बढ़ते हैं । इस महीने
में बच्चा कुछ कुछ हिलना भी शुरू कर देता है । साढ़े चार महीना
होते होते लम्बाई भी ५-६ इंच तक हो जाती है । पाँचवें महीने
से अन्त तक पुट्ठे वगैरह ठीक ठीक बन जाते हैं । इस समय तक
शरीर की अपेक्षा सिर ही बड़ा रहता है और उस पर कोमल सफेद
( चाँदी के रंग के ) बाल निकल आते हैं । लम्बाई ७-८ इंच तक
और वजन ६ से ८ औंस तक हो जाता है । छठे महीने में चमड़े
की दोनों परतें दिखायी पड़ने लगती हैं, किन्तु वे बहुत ही नाजुक
और रक्तवर्ण होती हैं । लम्बाई १० इंच और वजन लगभग ३।।

२६० असली कोकशास्त्र
पाव हो जाता है । नाखून निकल आते हैं । यदि इस समय बच्चा
पैदा हो जाय तो वह कुछ देर तक अवश्य साँस ले सकता है ।
सातवें महीने में बच्चे के सब अंग बन चुकते हैं । इस समय
बच्चे का सिर नीचे और पैर ऊपर हो जाता है । आँख की पलकें
खुलने योग्य होती हैं । लम्बाई लगभग १३-१४ इंच और वजन
सवा पाँच पाव तक हो जाता है । आठवें महीने में बच्चे के प्रत्येक
अंग की समान रूप से वृद्धि होती है । लम्बाई १६ इञ्च तक और
वजन पौने दो सेर तक हो गया रहता है । इस महीने में ही यदि
बच्चा पैदा हो जाय तो वह जीवित रह सकता है । हाँ थोड़े दिनों
तक कमजोर अवश्य रहेगा । नवें महीने में लम्बाई १८-२० इञ्च
और वजन तीन साढ़े तीन सेर तक हो जाता है ।
कभी-कभी बारह महीने तक भी बच्चे गर्भ में रह जाते हैं,
किन्तु ऐसा बहुत कम होता है । वैद्यक ग्रन्थों में बारह मास तक
गर्भ रह जाने का उल्लेख पाया जाता है । ग्यारह महीने के बाद
बच्चा पैदा होते देखा भी गया है । इस लिए इसकी सत्यता में
सन्देह नहीं है । अस्तु; उत्तम सन्तानोत्पत्ति विषयक नियमों के
साथ गर्भ की वृद्धि का क्रम जानना विशेष प्रयोजनीय है, इसीलिए
उसका संक्षिप्त वर्णन कर दिया गया । अब आगे यह दिखलाया
जायगा कि गर्भ की रक्षा किन किन उपायों से हो सकती है, तथा
कोई उपद्रव खड़ा होने पर किस महीने में कौन-सा यत्न करना
श्रेयस्कर है ।

असली कोकशास्त्र २३१
गर्भिणी स्त्री को कभी दौड़ना, कूदना, या उछलना नहीं
चाहिए। धमक कर सीढ़ी उतरना या असावधानी से सीढ़ी पर
चढ़ना भी गर्भ के लिए हानिकारक है। इन कामों से गर्भ के गिर
जाने या टेढ़ा हो जाने की सम्भावना रहती है । जिससे गर्भ तो
नष्ट हो ही जाता है, साथ ही स्त्री को भी महान पीड़ा भोगनी
पड़ती है। कभी कभी तो इस पीड़ा से स्त्री मर भी जाती है।
भयावह चीजों से गर्भिणी स्त्री को बचाना चाहिए । उसे दूसरी
स्त्री का प्रसव नहीं देखना चाहिए । गर्भिणी के लिए जल में
तैरना, अधिक परिश्रम और झटके का काम करना, वृक्ष के नीचे
अधिक ठहरना, अधिक सोना, अधिक जागना, दूर की वस्तु को
नजर पर जोर देकर देखना, गर्म चीजें (जैसे लाल मिर्च आदि)
खाना, उपवास-व्रत करना, अधिक भोजन करना, जबर्दस्ती भूख
को रोक रखना, सूखी चीजें (जैसे भूना हुआ चना आदि) खाना
पुरुष के साथ सोना, मल-मूत्र के वेग को रोकना, कुचिष्टता (मैले-
पन) से रहना, अधिक जोर से बोलना, सिर में अधिक तेल
लगाना, क्रोध-शोक करना आदि बड़ा ही हानिकारक है। इसलिए
इन कामों से गर्भिणी स्त्री को सदा बचना चाहिए। गर्भिणी स्त्री
को अधिक पौष्टिक भोजन भी नहीं करना चाहिए; क्योंकि पौष्टिक
भोजन करने से बच्चा पैदा होते समय बड़ा कष्ट होता है।
दाल, भात, रोटी, तरकारी, दूध थोड़ा घी आदि खाना गर्भ-
वती के लिए विशेष लाभदायक है। मक्खन का सेवन करना भी

२३२ असली कोकशास्त्र
बड़ा ही उपयोगी है । खासकर दूध का सेवन तो गर्भिणी को
अवश्य करना चाहिए। हाँ दूध की शुद्धता पर ध्यान रखना जरूरी
है। क्योंकि दूध खराब होने से लाभ के बदले हानि करेगा । बीमार
पशु का दूध भूलकर भी न पीना चाहिए । थोड़ा बहुत फलों का
प्रतिदिन सेवन करना इस समय के लिए अमृत-तुल्य है । हमेशा
मुख साफ रखना चाहिए । स्नान करते समय अंग-प्रत्यंग को खूब
अच्छी तरह से धोकर स्वच्छ कर देना उचित है । आजकल बहुधा
स्त्रियाँ एक-दो लोटे पानी से ही नहा-धो लेती हैं । यह बात बहुत
बुरी है। केवल शरीर भिगो देने का नाम स्नान नहीं है; बल्कि
स्नान का मतलब है, समूचे शरीर को मल-रहित करके शुद्ध कर
डालना । प्रचुर जल से मल-मल कर स्नान करना प्रत्येक मनुष्य के
लिए बड़ा ही लाभदायक है । इससे तन्दुरुस्ती में जल्द कोई खराबी
पैदा नहीं होती । गर्भवती के लिए प्रतिदिन थोड़ा परिश्रम अवश्य
करना चाहिए। गृहस्थी का काम-काज अपने अनुकूल देखकर करने
से परिश्रम हो जाता है। मिहनत करने से स्त्री का शरीर फुर्तीला
रहता है, भोजन ठीक से पच जाता है, नींद अच्छी तरह आती है
तथा प्रसव यानी बच्चा पैदा होते समय कम कष्ट होता है ।
सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण लगने पर गर्भिणी को चाहिए कि
ग्रहण शुरू होने से घण्टा दो घण्टा पहले ही किसी कोठरी में जा
बैठे और जब तक मोक्ष न हो जाय, एकान्त में बैठी उपदेशप्रद
पुस्तक या महात्मा पुरुषों की जीवनी अथवा इन्हीं विषयों का