रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
१७६ असली कोकशास्त्र
चौथा—अँगुलियों के अगले हिस्से, पाँवों की एड़ियें, सिर
और बाल के भुजाओं के माँसल भाग गोल होने चाहिएँ।
पाँचवाँ—सिर के बाल, अँगुलियाँ, पलकें और नेत्र लम्बे होने
चाहिएँ।
छठवाँ—जंघा, नितम्ब, गर्दन और पिंडलियाँ, ये स्थान भरे
हुए और स्थूल होने चाहिएँ।—
सातवाँ—स्तन, कन्धे, आँख और मस्तक बड़े विशाल होने
चाहिएँ।
आठवाँ—नाक, कान नोकीले न छोटे न बहुत बड़े समान
आकार वाले होने चाहिएँ।
नवाँ—पेट लम्बा किन्तु बढ़ा हुआ नहीं होना चाहिए।
दसवाँ—कमर पतली किन्तु मजबूत होनी आवश्यक है।
आचार्यों ने शरीर के रंग का विशेष पृथक् वर्णन नहीं किया।
इससे मालूम होता है उन्होंने शरीर की बनावट को विशेष महत्त्व
दिया है। कपोलों के रंग की लाली से कुछ झलक दिखाया देती है
सम्भव है वह सब शरीर पर लागू समझी जाय।
—:०:—
१२ असली कोकशास्त्र १७७
स्त्री के सोलह शृङ्गार
आदौ मज्जन-चीर-चारु-तिलकं नेत्राञ्जनं कुण्डलम् ।
नासा मौक्तिक-हार-केशकुसुमं सिन्दूर वस्त्रं परम् ॥
देहे चन्दनलेप-कञ्चुकमणी क्षुद्रावली घण्टिका ।
ताम्बूलं करकंकणं चतुरता शृङ्गार का षोडश ॥
( १ ) सबसे पहले दाँतों में मञ्जन फिर उबटन तब स्नान
करना चाहिए। मञ्जन और उबटन स्नान के ही अंग हैं इस लिए
उनकी पृथक गणना नहीं की गयी । मञ्जन से दाँतों की सफाई
और उबटन से शरीर की खाल में कोमलता आती है। तत्पश्चात्
स्नान करने से सर्वस्नान कहाता है अन्यथा एकांगी या अर्द्धस्नान
कहा सकता है ।
( २ ) दूसरा स्नान के बाद सुन्दर साड़ी आदि वस्त्र धारण
करना ।
( ३ ) तीसरा तिलक अर्थात् ललाट में सिन्दूर आदि की
बिन्दी लगाना ।
( ४ ) चौथा आँखों में अञ्जन या काजल लगाना । इससे
आँख की ज्योति और सौन्दर्य दोनों बढ़ते हैं। तथा नेत्ररोग नाश
होते हैं ।
( ५ ) पाँचवाँ, कान में कुण्डल या कर्णफूल आदि पहनना ।
१७८ असली कोकशास्त्र
( ६ ) छठवाँ, नाक में मोती पड़ो नथिया या लौंग बुलाक
आदि पहनना ।
( ७ ) सातवाँ, सोने का गले में कण्ठाहार या सिकड़ी आदि
पहनना ।
( ८ ) आठवाँ, बाल सँवार कर चोटी बाँधना ।
( ९ ) नौवाँ, फूलों के बने हुए आभूषण अंगों में पहनना ।
( १० ) दसवाँ, माथे में सिन्दूर भरना ।
( ११ ) ग्यारहवाँ, शरीर में केसर कस्तूरी मिश्रित चन्दनादि
सुगन्धित वस्तुओं का लेप करना ।
( १२ ) बारहवाँ, कुचबन्धिका अर्थात् अँगिया ( चोली )
पहनना ।
( १३ ) तेरहवाँ, कमर में करधनी पहनना ।
( १४ ) चौदहवाँ, हाथों में कङ्कण ( कङ्कन ) या चूड़ी आदि
पहनना ।
( १५ ) पन्द्रहवाँ, अँगुलौक अर्थात् अँगूठी छल्ला आदि
आभूषणों को धारण करना ।
( १६ ) सोलहवाँ, केसर कस्तूरी मिश्रित सुगन्धित पान
खाना ।
ये उपरोक्त स्त्री के नैतिक शृंगार हैं । जो स्त्री प्रतिदिन बिला
नागा सोलहों शृङ्गार करती है। उसका पति कभी विमुख नहीं
हो सकता । स्त्री के ये ही मोहनास्त्र हैं ।
असली कोकशास्त्र १७६
कामोद्बोधक साधन
के गृह्णन्ति कचान्ललाट नयने चुम्बति दन्त-
च्छदं, दन्तोष्ठेन निपीडयन्ति बहुशश्चुम्बति गण्ड-
स्थलीम् । कक्षाकण्ठतटं लिखन्ति नखरैर्गृह्णन्ति
गाढं स्तनौ मुष्ट्या वक्षसि ताडयन्ति ददते नाभौ
चपेटा सनैः ॥
स्त्री के बालों का स्पर्श करना, ललाट और आँखों का चूमना,
दातों तथा ओष्ठों से स्त्री के अधर व ओष्ठों का चुम्बन करना, तथा
गालों का चूमना। नाखून, बगल कण्ठ आदि स्थानों में गुदगुदी
करना, चुटकी भरना कुचों का मर्दन करना या नखच्छेद का
अयोग करना। छातो पर धीरे-धीरे मुष्टिका आघात करना तथा
मुलायम हाथ से नाभि पर थपथपाना और—
कुर्वन्तिस्मरमन्दिरे करिकरक्रीडांस्त्रियोजानुनी,
गुल्फांगुष्ठपदानि च प्रतिमुहुर्निघ्नन्ति तैरात्मनः ।
इत्येवं कलयन्ति ये शशिकलामालिङ्ग्य मज्जन्ति ते,
शीतांशूपलपुत्रिकां शशिकर स्पृष्टामिव प्रेयसीम् ॥
स्त्री को योनि में हाथी की सूँड की तरह क्रीड़ा करना, अपने
जानु, गुल्फ अंगूठे तथा पावों से स्त्री के अंगों को मस्ती के साथ
रगड़ना, इन्हीं क्रियाओं द्वारा स्त्री के अंगों में सोये हुए कामदेव को
जगाकर कामी-जन आनन्द लेकर स्त्री को भी आनन्दित करते हैं।
१८० असली कोकशास्त्र
पति के कर्त्तव्य
१—पति का सबसे पहला कर्त्तव्य है कि वह पत्नी को अपना
सच्चा मित्र तथा सहायक समझता हुआ उसके साथ अपने समान
बर्त्ताव करे। उसने कभी छल-कपट युक्त व्यवहार न करे। अपने
हृदय से उसका सच्चा सत्कार करता हुआ प्रेमपूर्वक बर्त्तें।
२—स्त्री चाहे सरूपा हो या विरूपा, उसे त्याग कर दूसरी से
सम्बन्ध न करे। जैसे कहा है—"एका भार्य्या सुन्दरी वा दरी वा"
उसी में सन्तुष्ट रहे और सुख-स्वर्ग सममे। वह यथार्थ ही सुखी
हो जायगा।
३—पुरुष की सच्चरित्रता, दुश्चरित्रा स्त्री को भी सच्चरित्रा
बना लेती है। कहा है—"शस्त्रं शास्त्रं वीणा वाणी नरश्चनारी
पुरुष विशेषं प्राप्य योग्यायोग्या भवन्ति" ये उपरोक्त वस्तुएँ जैसे
पुरुष को प्राप्त होती हैं वैसी ही हो जाती हैं। इस लिए पुरुष
का सच्चरित्र होना परम आवश्यक है।
४—स्त्रियें प्रायः अपने पंत को साफ-सुथरा देखना पसन्द
करती हैं। इस लिये पुरुष को चाहिए कि वह यदि अपने लिये
स्वच्छ वस्त्र या स्वच्छता न रखता हो तो अपनी स्त्री के लिये
अवश्य पवित्र रहे और स्वच्छ वस्त्र धारण करे। जैसे स्त्री की
मलीनता उसे पसन्द नहीं, वैसे ही पति की गन्दगी पत्नि को
भी नहीं भाती।
असली कोकशास्त्र १८१
५—पति को कभी पत्नी के साथ निर्लज्जता का व्यवहार न
करना चाहिए। नहीं तो पत्नी का इतना निर्लज्जतापूर्ण कटु व्यवहार
बढ़ जायगा कि वह असह्य हो जायगा। कारण पति पत्नी का
शिक्षक होता है। वह जैसा आचार व्यवहार करता है, पत्नी शिष्या
की भाँति वैसा ही स्वरूप धारण कर लेती है। इस लिये पति को
जैसा आचार-विचार अच्छा प्रतीत होता हो, वैसा ही बर्ते, उसे
पत्नि की ओर से तदनुरूप ही प्रतिध्वनित होता दिखायी देगा।
६—हास्य-विनोदात्मक-कला का प्रयोग पति को पत्नी के
साथ प्रतिदिन करना चाहिए। अन्यथा वह किसके साथ विनोद
करेगी। मनहूस और नीरस-हृदय पति से पत्नी विरक्त हो जाती
है। इस कला का परिमित व्यवहार होना चाहिए। इतना उच्छृ-
ङ्खल न हो कि असह्य हो उठे और विनोद के स्थान पर कलह का
रूप धारण कर ले !
७—जैसे पुरुष स्त्री के मुख से पुरुष-जाति की निन्दा सुनना
नहीं चाहता, वैसे ही स्त्रियें भी पुरुष के मुख से स्त्री-जाति की
निन्दा सुनना पसन्द नहीं करतीं। इस लिये पति को चाहिए कि
वह पत्नी के सन्मुख कभी स्त्री-जाति की निन्दा न करे। अन्यथा
व्यर्थ विरोध उत्पन्न हो जायगा।
८—पति को उचित है कि पत्नी के सामने कभी पर-स्त्री की
गुणावली बखान न करे। क्योंकि स्त्रियें अपने पति के मुख से
दूसरी स्त्री की प्रशंसा सुनना नहीं चाहतीं, कारण कि वे समझती
१८२ असली कोकशास्त्र
हैं, पति मुझमें इन गुणों की कमी देखकर उसकी प्रशंसा दिखाकर
मेरी निन्दा कर रहा है। यह स्वाभाविक ही है क्योंकि पुरुष भी
अपनी स्त्री के मुख से पर-पुरुष-स्तुति सुनना नहीं चाहता । वह
भी इसमें अपनी बेइज्जती का ही अनुभव करता है और कभी-कभी
इसका ऐसा परिणाम निकलता है कि स्त्री समझती है क्या कारण
जो पति पर-स्त्री की प्रशंसा कर रहे हैं सम्भव है इनका मन उसपर
आ गया हो और ये उससे फँस गये हों या फँसने की इच्छा रखते
हों अन्यथा इन्हें उसकी प्रशंसा की क्या आवश्यकता थी ? पुरुष
भी अपनी स्त्री के मुख से पर-पुरुष-स्तुति सुनकर मन में सन्देह
करने लगता है कि इसमें अवश्य दाल में काला है । इससे नतीजा
यही साफ निकलता है कि स्त्री-पुरुष दोनों ही इस बात को निन्दनीय
समझते हैं। इस लिए इस हानिप्रद कार्य को दोनों में से किसी को
भी न करना चाहिये ।
९—स्त्री अपनी प्रशंसा पति के मुखसे सुनना चाहती है। पति
को चाहिए, पत्नी के बनाये भोजन पक्वान्न आदि की प्रशंसा करे।
जिससे उसका उत्साह बढ़े और वह भविष्य में उत्तमोत्तम पदार्थ
बनाने की चेष्टा करे और प्रशंसा लाभ करने की इच्छा करे । जब
कभी पत्नी नये ढंग के मन लुभानेवाले शृंगार और वस्त्र धारण
करे तब उसकी खूब बड़ाई करनी चाहिये । क्योंकि वह पति से
मान पाने के लिए ही केशविन्यास आदि विविध रचना करती है ।
पति से मान पाकर उसकी अन्तरात्मा फूल उठती है और वह सम-
असली कोकशास्त्र १८३
झती है, पति मुझमें अनुराग रखते हैं। अतः विकसित पुष्प की
भाँति सदैव प्रफुल्लित होकर वह प्रत्येक गृह-कार्य तथा शृंगारादि
कलाओं को सम्पन्न करती है। इससे उसका स्वास्थ्य और प्रेम
चन्द्रकला की भाँति दिन-बदिन बढ़ता रहता है और गृहस्थ की
उन्नति होती है।
१०—परायी स्त्री से हँसी-मजाक भूलकर भी न करना चाहिए,
चाहे वह अपनी कितनी ही सन्निकट सम्बन्धिनी भी क्यों न हो,
इससे वह दूसरों की नजरों से गिर जाता है और अपनी स्त्री की
नजर से भी। कभी कभी इसका बड़ा विषद परिणाम देखा गया
है। पुरुष अपनी स्त्री को निकट-सम्बन्धी के साथ मजाक करती
देखकर हृदय से क्रोध-विह्वल हो उठता है। वह नहीं चाहता कि
उसकी स्त्री किसी पर-पुरुष से उपहास करे या दूसरा कोई पुरुष
उससे ऐसा व्यवहार करे। इससे स्पष्ट यही परिणाम निकला कि
परस्पर प्रेम चाहने वाले स्त्री-पुरुषों को एक दूसरे की इच्छा विरुद्ध
ऐसा कोई काम न करना चाहिये जिससे उनमें किसी प्रकार का
मनमुटाव पैदा हो।
११—पति का कर्त्तव्य है, वह स्त्री के जिन वस्त्राभूषणों की
कमी हो, उनका प्रबन्ध स्त्री के बिना कहे ही स्वयं करे। स्त्री की
शोभा में कमी आने से उसी को बुरा लगेगा और यदि स्त्री कहेगी
तो भी अच्छा मालूम नहीं होगा। इस लिए पहले ही प्रबन्ध कर
देने से दो लाभ होते हैं, एक तो स्त्री के सजने-धजने में किसी प्रकार
१८४ असली कोकशास्त्र
की बाधा उपस्थित नहीं होती और दूसरे बिना माँगे वस्त्र आभूष-
णादि पाकर स्त्री बहुत प्रसन्न होती है और वह कभी आवश्यकता
रहने पर भी किसी चीज की फरमाइश नहीं करेगी। इस प्रकार
बर्त्तन से पति-पत्नी में उत्तरोत्तर प्रीति बढ़ती ही रहेगी।
१२—जो अपनी स्त्री को पतिव्रता देखना चाहें वे स्वयं पत्नी-
व्रती बन जायें। उनके सामने राम का आदर्श मौजूद है।
१३—प्रायः मनुष्य स्त्रियों से गृह-सम्बन्धी कार्य न लेकर,
मजदूरनी आदि से काम ले लेते हैं। वे समझते हैं स्त्रियों को कष्ट
न हो किन्तु इसका परिणाम बड़ा बुरा यह होता है कि स्त्रियाँ
इतनी सुकुमार और आलसी हो जाती हैं जो आड़े वक्त पर अर्थात्
धनाभाव दशा में अपनी गृहस्थी का भार उठा नहीं पातीं। उस
समय अपनी करनी पर मनुष्य को पछताना पड़ता है। सुकुमारिता
और आलस्यता के कारण उनके शरीर निर्बल, निस्तेज तथा रोगी
होकर अकालकवलित हो जाते हैं। निर्बलता के कारण गर्भ स्थिर
नहीं होता, यदि गर्भ रह भी जाय तो कुछ समय बाद वह गिर
जाता है और यदि न गिरा तो बच्चा-जच्चा दोनों को जनमते समय मृत्यु
से युद्ध करना पड़ता है। प्रथम दोनों परलोक यात्रा कर जाते हैं,
बच रहे तो दोनों डॉक्टरों की सेवा में हमेशा उपस्थित रहते हैं।
यदि स्त्रियाँ घर के सभी काम में लगा दी जायें तो वे बलवती रहें,
उन्हें गर्भधारण से लेकर बच्चा जनने तक कोई आपत्ति उठानी न पड़े
और न डाक्टर वैद्यों की सेवा ही करनी पड़े। उदाहरण में आप
असली कोकशास्त्र
चित्र नं० ६
पद्मिनी स्त्री
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असली कोकशास्त्र १८४
ग्राम्य या जंगली सपरिश्रम जीविका उपार्जन करनेवाली स्त्रियों को
ले लीजिए। उन्हें कोई भी शिकायत नहीं होती, रास्ते चलते किसी
आड़ में बच्चा जन लेती हैं। न उन्हें प्रसव वेदना होती है और न
धाय की आवश्यकता होती है। थोड़ी देर के बाद बच्चा उठाकर घर
जा पहुँचती हैं। परमात्मा ने सृष्टि के सभी नियम समान बनाये हैं,
हम अपनी गलती से हेर-फेर कर दुःख उठाते हैं। समस्त संसार
के जीवों को ले लीजिये उनको गभ धारणासे लेकर गर्भ मोचन तक
किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ती। न उनके पास
धाय, न सेविका, न डाक्टर-वैद्य, सदैव समान परिश्रम करते हुए
निरोग अपनी जाति के अनुसार बल पुरुषार्थ उनमें पाया जाता है
ऐसा क्यों ? इसका स्पष्ट उत्तर यही हो सकता है कि वे सृष्टि-नियम
के अनुकूल आचार-विचार करते हैं इस लिए सुखी रहते हैं। मनुष्य
अपनी बुद्धि के अभिमान में प्रकृति विरुद्ध काम करता है और
दुःख उठाता है।
१४—पति को चाहिए पत्नी के स्वच्छ वायु सेवन का प्रबन्ध
करे अर्थात् प्रातः सायं दोनों समय भ्रमणार्थ जहाँ की वायु अच्छी
हो वहाँ ले जाय। इससे मन बहलता है और स्वास्थ्य वृद्धि होती
है। वायु सेवन करनेवाली नारियों को देखा होगा वे कैसी स्वस्थ
होती हैं।
१५—यदि पत्नी से कोई अपराध हो जाय तो उसे प्रेम से
समझा दो, उसकी सखियों में उसे अपमानित मत करो। तुम्हारे
१८६ असली कोकशास्त्र
समान वह भी अपनी इज्जत की रक्षा चाहती है । अपमानित होने
पर उसके हृदय में द्वेष उत्पन्न हो जाता है। सम्भव है क्रोधवश वह
भी तुम्हारा अपमान कर बैठे । मान सबको प्यारा है, अपमान नहीं ।
१६—पुत्रवती पत्नी को पति “बच्चे की माँ” कहकर पुकारने
लगते हैं। यह उनकी भूल है ऐसा उन्हें न करना चाहिए क्योंकि
यह रूखा सम्बोधन है। वह ऐसा शुष्क सम्बोधन पति मुख से
सुनना नहीं चाहती । सच तो यह है कि अगर पत्नी ही पति को
“बच्चे के बाप” कहकर पुकारे तो कितना बुरा मालूम हो। जैसे
पति पत्नी के मुँह से प्राणनाथ ! प्राणवल्लभ आदि प्रिय सम्बोधन
सुनना पसन्द करता है, वैसे ही पत्नी भी पति के मुख से प्राण-
प्यारी प्राणवल्लभे आदि मधुर सम्बोधन सुनना चाहती है ।
१७—जैसे आप अपने इष्ट-मित्रों में बैठकर वार्तालाप का
आनन्द मनाया करते हैं वैसे ही स्त्रियाँ भी अपनी सखी सहेलियों
में बैठकर विनोद किया करती हैं उनके इस कार्य को देखकर पुरुष
बुरा मानकर जली-कटी सुना डालते हैं। उनका यह व्यवहार युक्त
नहीं होता । स्त्रियों का मनोविनोद भी अपने ही समान समझना
चाहिए। अन्यथा वे कैसे मन बहलायेंगी। समान सखियों में
मनोविनोद करने से उनका स्वास्थ्य बनता है ।
१८—धार्मिक उत्सवों में स्त्रियों को साथ ले जाना चाहिए।
इससे उनकी योग्यता बढ़ती है। कथा-वार्त्ता सुनने से वे व्यवहार
कुशला हो जाती हैं।
[Header] असली कोकशास्त्र १८७
१९—पति को सदैव संयमी होकर रहना चाहिए। ऋतु अनु-
सार जैसा स्त्री-प्रसंग बतलाया गया है वैसा बर्त्तने से दोनों को
आनन्द मिलता है। अन्यथा लम्पट पुरुष को स्त्री प्यार नहीं करती।
२०—पति को काम-काज में ही समय न बिता देना चाहिए।
प्रत्युत कुछ समय बचाकर अपनी सहधर्मिणी के साथ भी हास्य-
विनोद करना चाहिए। अच्छी-अच्छी कविता या पुस्तकों का
स्वाध्याय करना चाहिए। जिससे स्त्री का ज्ञान बढ़े और मनो-
विनोद भी हो।
२१—माता पिता या अन्य सम्बन्धियों के शिकायत कर देने
मात्र से स्त्री को डाँट-डपट न दिखा देना चाहिए। प्रत्युत कारण
की खोज करनी चाहिए, पश्चात् जैसा उचित हो वैसा एकान्त में
समझा देना चाहिए। कभी-कभी बिना अपराध भी स्त्रियाँ सन्देह
मात्र में अपराधिनी ठहरा दी जाती हैं। वे अपने बड़े-बूढ़ों से कुछ
कह नहीं पातीं।
२२—स्त्रियाँ प्रायः अपने रोग को छिपाया करती हैं। यहाँ
तक कि वे अपनी सखियों से भी नहीं कहतीं। जब रोग इतना बढ़
जाता है कि दबाये नहीं दबता तब वह स्वयं प्रगट हो जाता है।
उस समय प्रायः असाध्य अवस्था में पहुँच जाता है। इस लिये
स्त्रियों के इस सलज्ज या भययुक्त अविवेकी स्वभाव को जानकर
पति को चाहिए वह प्रतिदिन सूक्ष्म दृष्टि से निरीक्षण करता रहे।
अथवा इतनी गाढ़ मैत्री उत्पन्न करे जिससे वह स्वयं अपना रोग
१८८ असली कोकशास्त्र
प्रगट कर दिया करे ।
२३—पति-पत्नी का कर्त्तव्य है कि धन जोड़-जोड़ कर रखने
की चेष्टा न करें, उसका सदुपयोग अर्थात् बच्चों के पढ़ने-पढ़ाने में
खर्च करें जिससे सन्तान सुयोग्य होकर सुख पा सके, और स्वयं
भी अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण करते रहें । अच्छे कामों में खर्च
करना यह धन का सदुपयोग है । यदि बच्चे को मूर्ख रखकर धन
इकट्ठा करोगे तो वह नालायक रहकर सब धन नष्ट कर देगा ।
२४—कुछ रुपया स्त्री के पास रख छोड़ना चाहिए । प्रतिदिन
के खर्च के लिए पत्नी को तुमसे बार-बार न माँगना पड़े, इससे
बड़ी अंडस होती है और बुरा भी लगता है ।
२५—पति को पत्नी के कर्त्तव्य सदैव चिताते रहना चाहिए
और स्वयं भी अपने कर्त्तव्यों का ध्यान रखना चाहिए । जो इस
प्रकार विवेक से काम लेता रहेगा तो कभी मतभेद उत्पन्न नहीं
होगा और हमेशा प्रेमभाव बना रहेगा ।
२६—पत्नी की कही हुई बात को बड़े ध्यान से सुनना चाहिए
और फिर विचार कर जैसा उचित हो वैसा उत्तर या प्रबन्ध करना
चाहिए ।
२७—जिस प्रकार पत्नी वस्त्राभूषणों से सजाकर पति को प्रसन्न
करने के लिए उसके पास आती है वैसे ही पत्नी भी पति को स्वच्छ
वस्त्र और पुरुष के पहनने योग्य आभूषणों से तथा सुगन्धित पुष्प
इत्र फुलेल आदि द्रव्यों से सुवासित एवं सुसज्जित देखना चाहती
असली कोकशास्त्र १८६
है। इस लिए तुम भी मनोविनोद की सामग्री से सज-धज कर
पत्नी के पास जाओ। स्मरण रहे श्रृङ्गार करते समय किसी को
किसी के पास न रहना चाहिये। दोनों को अलग-अलग एकान्त में
वस्तु रचना करनी चाहिए। अन्यथा बाधा पड़ती है और सजी-
सजायी वस्तु के देखने में जो आकर्षण एवं प्रियता मालूम होती है,
वह सजते समय देख लेने से नहीं रहती। यह मनुष्य-स्वभाव है।
२८—स्त्री को उपहार में बड़ी-से-बड़ी और छोटी-से-छोटी
वस्तु भेंट दी जा सकती है। तुम यह न समझो कि छोटी-सी वस्तु
देने से स्त्री का मन क्या खुश होगा? वह इस छोटे उपहार को
पाकर भी आपके प्रेम का अनुभव करेगी। न होने से होना तो
अच्छा है। कहावत है—"मान का पान भी बहुत बड़ा होता है।"
२९—पतिव्रता स्त्री को पति-प्रेम चाहिये। यदि वह मिल
जाता है तो वह धन, वस्त्र, आभूषण आदि सब भूल जाता है।
उदाहरण में महरानी शैव्या और सती सीता को देखो—बनवास
की हालत में वे दोनों कैसी अवस्था में थीं। किन्तु उनका मन कभी
उदास नहीं हुआ। इस लिए सच्चा पति-प्रेम उत्पन्न करना पति का
कर्त्तव्य है। उसीके प्रेमभरे व्यवहार से उसकी उत्पत्ति होती है।
३०—कोई लोग बलपूर्वक कठोर शासन द्वारा स्त्री को वश में
रखना चाहते हैं। यह उनकी अज्ञता है। उनके वश में लाने का
सिर्फ एक उपाय सच्चा प्रेम और मीठा बचन है। कहा है—"वशी-
करण इक मन्त्र है, तज दे वचन कठोर" "प्रेमरस सान्यो कभी
१६० असली कोकशास्त्र
विलगे ना विलगाय से, उलझन बड़ी बैर की, जो सुलझे ना सुल-
-झाय ते” । इस लिए पत्नी को प्रेम से ही वश में करना चाहिये,
बल से नहीं ।
पत्नी-कर्त्तव्य
अभिवादन शीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलम् ॥
१—स्त्री का कर्त्तव्य है कि वह अपने से बड़े माता, पिता,
सास श्वसुर और पति को नित्य प्रति प्रातः और सायंकाल, आदर
और श्रद्धापूर्वक प्रणाम करे । तथा उनकी तन मन से सेवा करे ।
इससे उसकी आयु, विद्या, यश और बल चारों की वृद्धि होगी ।
२—“पतिरेको गुरुः स्त्रीणाम्” स्त्रियों का पति ही एक गुरु
है । इस लिए गृहस्थ सम्बन्धी जो परामर्श करना हो वह पहले
पति से ही कर लेना चाहिये । उस परामर्श में जैसा निश्चय हो
वैसा करना उचित है । इससे लाभालाभ होने पर किसी को उल-
हना देने का अवसर नहीं मिलता ।
३—पत्नी को चाहिए कि वह पति के अतिरिक्त और किसी
से सन्तान की इच्छा न करे । देवी देवता या मियाँ मदार से जो
स्त्रियाँ सन्तान माँगती फिरती हैं वे पतिव्रता नहीं कही जा सकतीं ।
असली कोकशास्त्र १६१
क्योंकि पति से उनका विश्वास उठ गया—पति को उन्होंने पुत्र
उत्पन्न करने के योग्य नहीं समझा। इस लिए वे दूसरों के पास
जाने लगीं। वह सन्तान पति की न होने से हरामी कहलायेगी ।
क्या यह कुलग्नकार्य ( कुल को नाश करने वाला ) नहीं है ? पति
देवता और पत्नी ही देवी होती है। इन दोनों की प्रसन्नता से जो
सन्तान होती है, वह सदाचारिणी और कुल को तारने वाली होती
है। रहे मियाँ मदार—जो स्वयं मर चुके अपनी रक्षा न कर सके।
जिनकी हड्डियाँ भी कबर में शेष हों, इसमें सन्देह है, न मालूम कब
की गल-सड़ कर मिट्टी में मिल गयी होंगी । उनसे सन्तान की
आशा करना कितनी मूर्खता की बात है ? इसलिये पतिव्रता नारी
को अपने पति के अतिरिक्त किसी से पुत्र की कामना न करनी
चाहिए। नहीं तो उसका पतिव्रत धर्म भंग समझा जायगा ।
४—किसी के मुख से चाहे वह कितना भी हितु क्यों न हो
पति-निन्दा न सुननी चाहिए। इससे अपना प्रेम पति की ओर से
घटता है और परस्पर कलह उत्पन्न हो जाती है। यदि सच्चा प्रेम
और श्रद्धा स्थिर रखना चाहें तो पति-निन्दक को डपट कर रोक दें।
५—पत्नी को चाहिए कि वह पति के मनोगत-भावों का प्रति-
क्षण स्वाध्याय करती रहे। पति का जैसा स्वभाव हो उसके अनु-
सार चलकर उन्हें अपना प्रेम-पात्र बना ले। तुम उनसे खूब प्रेम
करो, उनकी किसी बात को मत काटो, जल्दी-से-जल्दी उनकी
आज्ञा का पालन करो। उनकी बात को बड़ी सावधानी से सुनो,
१६२ असली कोकशास्त्र
ताकि उन्हें दुबारा कहने की आवश्यकता न पड़े । जब बोलो तब
बड़े प्रेम के साथ बोलो । ये सब मोहनास्त्र हैं, इनका प्रयोग करना
जो स्त्री जान जाती है वह शीघ्र ही पति को अपने वश में कर
लेती है ।
६—अपनी भी शकल-सूरत किसी को मनचाही नहीं मिलती ।
यदि पति ही मनचाही शकल का नहीं मिला तो इसमें किसका
दोष कहा जाय । इस पर भी अपनी सूरत सभी को प्यारी मालूम
होती है । भाग्य-रेखा से पति-पत्नी का संयोग होता है, उसी पर
सन्तोष रखना चाहिए, चाहे वह सरूप हो या कुरूप । यदि तुम
उससे अधिक रूपवती होगी तो वह तुमसे अधिक प्रेम करेगा ।
तुम रूपगर्विता होकर उसके प्रेम की उपेक्षा न करो, बल्कि अपनाओ
और दूने उत्साह से उसका स्वागत करो, वह तुम्हें प्यारा लगने
लगेगा । सच्चे प्रेम का पाना बड़ी तपस्या का फल है। वह समान
रूप वाले या कुछ कम रूप वाले पुरुष से प्राप्त हो सकता है,
अधिक रूपवाले से नहीं । अधिक रूपवान् पुरुष भ्रमर की तरह
अनेक कलियों का रस चूसना चाहते हैं। उन्हें अपने रूप का गर्व
होता है । वे किसी एक रमणी से प्रेम नहीं करते; उनका क्षणिक-
प्रेम होता है, स्थिर नहीं । विरला ही कोई स्वरूपवान् पुरुष
पत्नी-व्रती होता है ।
७—पति जब बाहर से घर आये, उसका प्रसन्न मुख होकर
अभिवादन करते हुए स्वागत करो। पति तुम्हारे इस व्यवहार से
१३ असली कोकशास्त्र १६३
आन्तरिक दुःखों को भूल जायगा, उसकी थकावट दूर हो जायगी
और वह सच्चे प्रेम का अनुभव कर परम सुखी होगा। वह सुखी
होकर तुम्हारी शुभ कामनायें सोचने लगेगा। जब वह घर से जाने
लगे तब भी प्रेमपूर्वक प्रसन्न-मुख होकर नमस्ते करना चाहिए।
इसका प्रभाव उस पर यह होता है कि वह बाहर काम से छुट्टी
पाने पर घर की ओर आने के लिए व्याकुल हो जाता है और कोई
उपहार में देने योग्य नयी वस्तु भी लाने से नहीं चूकता।
८—सुन्दर वस्त्र और आभूषणों को पहन कर पत्नी को चाहिए
कि वह हाव-भाव के साथ वेश्या की तरह पति को रिझाये। वेश्या
धन की लालसा से झूठा प्रेम दिखाकर पुरुषों को मोहती हैं और
उनका छल, बल, कल से सब धन हरण कर लेती हैं। कहना
चाहिए कि उनकी इच्छा पूरी हो जाती है। यदि स्त्री भी उपरोक्त-
बलाओं से काम लेकर पति को मोह ले तो उसे भी रति-सुख और
प्रेम की प्राप्ति अवश्य हो जायगी, और उनका अटूट सम्बन्ध
स्थिर रहेगा।
९—जिस प्रकार माता बड़े प्रेम के साथ बच्चे को भोजन
कराते हुए मीठे-मीठे बचन कहती और तरह-तरह के मन बहलाने
वाले चुटकले कहती है। प्रत्येक खाद्य-पदार्थ की तारीफ कर अधिक
खिलाने की तरकीब करती है। कहती है—अभी तुमने कुछ नहीं
खाया, तुम्हारी भूख घट गयी है, ऐसा करने से शरीर कैसे बना
रहेगा, इत्यादि अनेकविध बचनों से उत्साहित करती है तथा