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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 440 में से

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पृष्ठ 186

असली कोकशास्त्र १८१
५—पति को कभी पत्नी के साथ निर्लज्जता का व्यवहार न
करना चाहिए। नहीं तो पत्नी का इतना निर्लज्जतापूर्ण कटु व्यवहार
बढ़ जायगा कि वह असह्य हो जायगा। कारण पति पत्नी का
शिक्षक होता है। वह जैसा आचार व्यवहार करता है, पत्नी शिष्या
की भाँति वैसा ही स्वरूप धारण कर लेती है। इस लिये पति को
जैसा आचार-विचार अच्छा प्रतीत होता हो, वैसा ही बर्ते, उसे
पत्नि की ओर से तदनुरूप ही प्रतिध्वनित होता दिखायी देगा।
६—हास्य-विनोदात्मक-कला का प्रयोग पति को पत्नी के
साथ प्रतिदिन करना चाहिए। अन्यथा वह किसके साथ विनोद
करेगी। मनहूस और नीरस-हृदय पति से पत्नी विरक्त हो जाती
है। इस कला का परिमित व्यवहार होना चाहिए। इतना उच्छृ-
ङ्खल न हो कि असह्य हो उठे और विनोद के स्थान पर कलह का
रूप धारण कर ले !
७—जैसे पुरुष स्त्री के मुख से पुरुष-जाति की निन्दा सुनना
नहीं चाहता, वैसे ही स्त्रियें भी पुरुष के मुख से स्त्री-जाति की
निन्दा सुनना पसन्द नहीं करतीं। इस लिये पति को चाहिए कि
वह पत्नी के सन्मुख कभी स्त्री-जाति की निन्दा न करे। अन्यथा
व्यर्थ विरोध उत्पन्न हो जायगा।
८—पति को उचित है कि पत्नी के सामने कभी पर-स्त्री की
गुणावली बखान न करे। क्योंकि स्त्रियें अपने पति के मुख से
दूसरी स्त्री की प्रशंसा सुनना नहीं चाहतीं, कारण कि वे समझती