रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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१९—पति को सदैव संयमी होकर रहना चाहिए। ऋतु अनु-
सार जैसा स्त्री-प्रसंग बतलाया गया है वैसा बर्त्तने से दोनों को
आनन्द मिलता है। अन्यथा लम्पट पुरुष को स्त्री प्यार नहीं करती।
२०—पति को काम-काज में ही समय न बिता देना चाहिए।
प्रत्युत कुछ समय बचाकर अपनी सहधर्मिणी के साथ भी हास्य-
विनोद करना चाहिए। अच्छी-अच्छी कविता या पुस्तकों का
स्वाध्याय करना चाहिए। जिससे स्त्री का ज्ञान बढ़े और मनो-
विनोद भी हो।
२१—माता पिता या अन्य सम्बन्धियों के शिकायत कर देने
मात्र से स्त्री को डाँट-डपट न दिखा देना चाहिए। प्रत्युत कारण
की खोज करनी चाहिए, पश्चात् जैसा उचित हो वैसा एकान्त में
समझा देना चाहिए। कभी-कभी बिना अपराध भी स्त्रियाँ सन्देह
मात्र में अपराधिनी ठहरा दी जाती हैं। वे अपने बड़े-बूढ़ों से कुछ
कह नहीं पातीं।
२२—स्त्रियाँ प्रायः अपने रोग को छिपाया करती हैं। यहाँ
तक कि वे अपनी सखियों से भी नहीं कहतीं। जब रोग इतना बढ़
जाता है कि दबाये नहीं दबता तब वह स्वयं प्रगट हो जाता है।
उस समय प्रायः असाध्य अवस्था में पहुँच जाता है। इस लिये
स्त्रियों के इस सलज्ज या भययुक्त अविवेकी स्वभाव को जानकर
पति को चाहिए वह प्रतिदिन सूक्ष्म दृष्टि से निरीक्षण करता रहे।
अथवा इतनी गाढ़ मैत्री उत्पन्न करे जिससे वह स्वयं अपना रोग