रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र १६१
क्योंकि पति से उनका विश्वास उठ गया—पति को उन्होंने पुत्र
उत्पन्न करने के योग्य नहीं समझा। इस लिए वे दूसरों के पास
जाने लगीं। वह सन्तान पति की न होने से हरामी कहलायेगी ।
क्या यह कुलग्नकार्य ( कुल को नाश करने वाला ) नहीं है ? पति
देवता और पत्नी ही देवी होती है। इन दोनों की प्रसन्नता से जो
सन्तान होती है, वह सदाचारिणी और कुल को तारने वाली होती
है। रहे मियाँ मदार—जो स्वयं मर चुके अपनी रक्षा न कर सके।
जिनकी हड्डियाँ भी कबर में शेष हों, इसमें सन्देह है, न मालूम कब
की गल-सड़ कर मिट्टी में मिल गयी होंगी । उनसे सन्तान की
आशा करना कितनी मूर्खता की बात है ? इसलिये पतिव्रता नारी
को अपने पति के अतिरिक्त किसी से पुत्र की कामना न करनी
चाहिए। नहीं तो उसका पतिव्रत धर्म भंग समझा जायगा ।
४—किसी के मुख से चाहे वह कितना भी हितु क्यों न हो
पति-निन्दा न सुननी चाहिए। इससे अपना प्रेम पति की ओर से
घटता है और परस्पर कलह उत्पन्न हो जाती है। यदि सच्चा प्रेम
और श्रद्धा स्थिर रखना चाहें तो पति-निन्दक को डपट कर रोक दें।
५—पत्नी को चाहिए कि वह पति के मनोगत-भावों का प्रति-
क्षण स्वाध्याय करती रहे। पति का जैसा स्वभाव हो उसके अनु-
सार चलकर उन्हें अपना प्रेम-पात्र बना ले। तुम उनसे खूब प्रेम
करो, उनकी किसी बात को मत काटो, जल्दी-से-जल्दी उनकी
आज्ञा का पालन करो। उनकी बात को बड़ी सावधानी से सुनो,