रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र १८३
झती है, पति मुझमें अनुराग रखते हैं। अतः विकसित पुष्प की
भाँति सदैव प्रफुल्लित होकर वह प्रत्येक गृह-कार्य तथा शृंगारादि
कलाओं को सम्पन्न करती है। इससे उसका स्वास्थ्य और प्रेम
चन्द्रकला की भाँति दिन-बदिन बढ़ता रहता है और गृहस्थ की
उन्नति होती है।
१०—परायी स्त्री से हँसी-मजाक भूलकर भी न करना चाहिए,
चाहे वह अपनी कितनी ही सन्निकट सम्बन्धिनी भी क्यों न हो,
इससे वह दूसरों की नजरों से गिर जाता है और अपनी स्त्री की
नजर से भी। कभी कभी इसका बड़ा विषद परिणाम देखा गया
है। पुरुष अपनी स्त्री को निकट-सम्बन्धी के साथ मजाक करती
देखकर हृदय से क्रोध-विह्वल हो उठता है। वह नहीं चाहता कि
उसकी स्त्री किसी पर-पुरुष से उपहास करे या दूसरा कोई पुरुष
उससे ऐसा व्यवहार करे। इससे स्पष्ट यही परिणाम निकला कि
परस्पर प्रेम चाहने वाले स्त्री-पुरुषों को एक दूसरे की इच्छा विरुद्ध
ऐसा कोई काम न करना चाहिये जिससे उनमें किसी प्रकार का
मनमुटाव पैदा हो।
११—पति का कर्त्तव्य है, वह स्त्री के जिन वस्त्राभूषणों की
कमी हो, उनका प्रबन्ध स्त्री के बिना कहे ही स्वयं करे। स्त्री की
शोभा में कमी आने से उसी को बुरा लगेगा और यदि स्त्री कहेगी
तो भी अच्छा मालूम नहीं होगा। इस लिए पहले ही प्रबन्ध कर
देने से दो लाभ होते हैं, एक तो स्त्री के सजने-धजने में किसी प्रकार