रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
असली कोकशास्त्र १५७
हुल मैथुन
नीचीकृत्य जघनमुपरिष्टाद्घट्टयेदिति हुलः ।
स्त्री की दोनों जंघाओं को अपने हाथों से नीचे दबाकर कामेन्द्रिय
का धक्का मारने को हुल कहते हैं। यह कुछ कठोर-प्रकिति वाली स्त्री
पसन्द करती है।
अवमर्दन मैथुन
तदेव विपरीतं सरभसमवमर्दनम् ।
हुल विधि के विपरात स्त्रा की जंघाओं को तकिये आदि के
सहारे से ऊपर उठाकर जो जोर से कामेन्द्रिय की ठोकर मारी जाती
है उसे आवमर्दन मैथुन कहते हैं। यह अत्यन्त कठोर प्रकृति वाली
स्त्री को अच्छा लगता है।
पीडितक मैथुन
लिंगेन समाहत्य पीडयंश्चिरमव-
तिष्ठेदितिपीडितकम् ॥
कामेन्द्रिय को भग में डालकर बलपूर्वक दबा रखने का नाम
पीडितक मैथुन है।
निर्घात मैथुन
सुदूरमुत्कृष्य वेगेन स्वजघन-
मवपातयेदिति निर्घातः ।
१५८ असली कोकशास्त्र
पुरुष अपनी कामेन्द्रिय को स्त्री के भगोष्ठ तक खींचकर जोर
से प्रहणन करे । इसको निर्घात मैथुन कहते हैं । यह स्त्री पुरुष
दोनों के अत्यन्त कामपीड़ित हो जाने पर किया जाता है । क्योंकि
वे ही इस चोट को सहन करते हुए आनन्द का अनुभव करते हैं ।
अन्यथा इसका अप्रिय असह्य कटुरस आस्वादन करना पड़ता है ।
वराहघात मैथुन
एकत एव भूपिष्ठमवलिखेदिति वराहघातः ।
स्त्री के मदन-गृह में यदि पुरुष किसी एक ही ओर को चोट
मारे तो उसे कराहघात मैथुन कहते हैं । सूअर सम्भोग करते समय
एक ही ओर को आघात करता रहता है । यह उसका स्वभाव है
इस लिये इस मैथुन का नाम वराहघात पड़ गया है ।
वृषाघात मैथुन
स एवोभयतः पर्यायेण वृषाघातः
यदि वराहघात की भाँति दायें-बायें दोनों ओर ध्वजा घात
किया जाय तो उसे वृषाघात मैथुन कहते हैं । यह बैल के अनुकरण
से वृषाघात कहा गया है ।
चटकविलसित मैथुन
सकृन्निमिश्रितमनिष्क्रम्य द्वित्रिश्चतुरिति घट्टये-
दिति चटकविलसितं रागा वसा निकम् ॥
असली कोकशास्त्र १५६
पुरुष लिंग को यनि से बाहर न निकाल कर भीतर ही भीतर
बारम्बार लगातार आघात करे तो उसे चटकविलसित मैथुन कहते
हैं। यह प्राय रतिक्रिया की समाप्ति पर किया जाता है।
सम्पुट-मैथुन की विधि पहले आसनों में दिखलाई जा चुकी है।
पुरुषोपसृप्त मैथुन दिखाने के बाद अब पुरुसाइट अर्थात
विपरीतासन के भेद दिखाते हैं। जो नीचे दिखाये तीन प्रकार के
हैं। जैसे संदंश भ्रमरक प्रहोलित। जिनका प्रयोग केवल स्त्री की
ओर से किया जाता है।
संदंश मैथुन
वाडवेन लिङ्गमवगृह्य निष्कर्षन्त्या पीडयन्त्या
वा चिरायस्थानं संदंशः ॥
पुरुष के ऊपर चढ़कर संभोग करती हुई नारी अपने भगोष्ठों
में पुरुष की कामेन्द्रिय को जोर से पकड़ कर देर तक खाँचकर पीडन
करती हुई मैथुन करतो है उसे संदंश मैथुन कहते हैं। घोड़ी घोड़े
के साथ इसी प्रकार मैथुन करती है।
भ्रमरक मैथुन
युक्तयन्त्रा चक्रवद्भ्रमेदिति भ्रमरक आभ्यासिकः।
सम्भोग के समय यन्त्रयोग को अलग न करते हुए जो स्त्री
चक्र के समान घूमती है उसे भ्रमरक मैथुन कहते हैं, यह अभ्यास
१६० असली कोकशास्त्र
से सिद्ध हो सकता है। स्त्री को जिस प्रकार चक्कर लगाने में सरलता
पड़े उस प्रकार पुरुष को सहायता करनी चाहिए।
प्रेङ्खोलित मैथुन
जघनमेव दोलायमानं सर्वतो भ्रमयेदिति प्रेङ्खोलितम्
युक्तयन्त्रैव ललाटे ललाटं निधाय विश्राम्येत् ॥
भ्रमरक मैथुन करते हुए यदि स्त्री अपने नितम्बभाग को झूले
की तरह झुलाती रहे तो उसे प्रेङ्खोलित मैथुन कहते हैं। उपरोक्त
मैथुन करते हुए जब नारी थक जाय तब यन्त्रयुक्त रहती हुई पुरुष
के माथे पर अपना माथा रखकर थकावट मिटाये। जब रतिक्रिया
समाप्त हो जाय तब अलग हो जाय।
कामकला के स्थान
आकाशस्थ चन्द्रकला के समान स्त्रियों के शरीर में कामकला
का विकास और अन्त होता है। ऐसा कामकला विशारदों का
निर्णय है। इस निर्णय से लोग प्रायः यह समझ लेते हैं कि चन्द्र
जिस तिथि का हो उस तिथि में बतलाये हुए अंग में काम वास
करता है। यह उनके समझने की भूल है। स्त्री के शरीर में काम
के स्थान परिवर्त्तन का कोई सम्बन्ध नहीं है। चन्द्रकला की वृद्धि
के समान, काम शरीर में स्थान परिवर्त्तन करता रहता है, इस
उपमा से ही यह भ्रम पैदा हुआ। यथार्थतः स्त्री जब ऋतु स्नान से
११ असली कोकशास्त्र १६१
जिस दिन शुद्ध हो जाती है, वह पहला दिन शुक्ल प्रतिपदा का
समझना चाहिए। तत्पश्चात् द्वितीया आदि क्रम से कृष्ण प्रतिपदा
तक किन-किन अंगों में काम वास करता हुआ घूमता है उसका
वर्णन जैसा आचार्यों ने किया है वैसा आगे दिखाया जाता है।
अंगुष्ठे पदगुल्फजानुजघने नाभौ च वक्षः स्तने ।
कक्षाकण्ठकपोलदन्तवसने नेत्रालिके मूर्द्धनि ॥
शुक्लाशुक्लविभागतो मृगदृशामङ्गेष्वनङ्गस्थिति-
रूर्ध्वाधोगमनेन वामपदतः पक्षद्वये लक्षयेत् ॥
ऋतुस्नान का दिन शुक्ल प्रतिपदा का समझा गया। उस दिन
कामदेव स्त्री के बायें अंग में पाँव के अँगुठे से आरम्भ होकर क्रमशः
ऊपर को चढ़ता हुआ पन्द्रह दिन में शिर पर पहुँच जाता है और
फिर सोलहवें दिन से दाहिने अंग से नीचे का ओर उतरता हुआ
अँगूठे पर पहुँच जाता है। इस प्रकार महीनाभर काम सम्पूर्ण शरीर
में चक्कर लगाया करता है। जिस दिन जिस अंग में वास करता
हो उस अंग को उस दिन विशेषरूप से मर्दन-स्पर्शन करने से स्त्री
शीघ्र स्रवित होती है। उन अंगों के स्थान क्रमशः दिखाये जाते हैं।
पाँव का अँगूठा, पाँव का तलभाग, घुटना, जाँघ, योनि, कमर,
नाभि, हृदय, कुच, बगल, कण्ठ, कपोल, ओष्ठ, नेत्र, पलक,
मस्तक। इसी आरोह अवरोह भेद से काम का चक्कर बराबर बना
रहता है। उस-उस तिथि में क्या-क्या करना चाहिए अब उसका
वर्णन नीचे किया जाता है।
१६२ असली कोकशास्त्र
प्रतिपदा तिथि
कंठे संश्लिष्य गाढं शिरसि विदधतश्चुम्ब-
मोष्ठौरदाग्रै, रापीड्याचुम्ब्य गण्डौ विरचितपुलकाः
पृष्ठतःपार्श्वयोश्च। दत्त्वा सूक्ष्मं नखांकं मृदुकरज-
मुखैरश्रयन्तो नितम्ब, प्राग्भारं मन्दसीत्काः प्रतिपदि
युवतीं नागरा द्रावयन्ति ॥
ऋतुस्नाता की प्रथम तिथि अर्थात् प्रतिपदा को भोगी पुरुष
स्त्री के कण्ठ का आलिंगन करता हुआ ललाट ओर गाल का चुम्बन
करे, फिर अपने दाँतों से ओष्ठों को दबाकर होठों का चुम्बन करे ।
तत्पश्चात् अगल-बगल के स्थानों को मृदु तीव्र स्पर्श द्वारा अर्थात्
चिकोटी नखच्छेद आदि से रोमाञ्चित करे ओर नितम्ब आदि देशों
के अग्रभाग को गुदगुदा कर सीत्कार करती हुई युवती को द्रवित
करे । किन्तु इस तिथि में स्त्रो-सहवास न करना चाहिए । कारण
गर्भ नहीं ठहरता । यदि स्थिर भी हो जाय तो बालक जन्मते ही
मर जाता है और मैथुन करनेवाले पुरुष की आयु घटती है ।
द्वितीया तिथि
स्तनमिलतसुखार्त्तौ गण्डगण्डौ विचुम्बन्,
नयनकुचयुगं चाकृष्य पार्श्वं नखाग्रैः
असली कोकशास्त्र १६३
अधरमवलिहन् दोर्मूलचञ्चन्नखाग्रू,
कृतघनपरिरम्भो द्रावयेदहियुग्मे ॥
द्वितीया को स्तनमर्दन तथा उनका आकर्षण विकर्षण करता
हुआ गालों और आँखों का चुम्बन करे । अधरपान करता हुआ
नितम्बों पर चुटकी तथा कन्धों पर नखदान करे । ततः गाढ़ आलि-
ङ्गन द्वारा स्त्री को स्खलित करे । यह तिथि भा सहवास के योग्य
नहीं । कारण यह कि इस दिन संयोग से स्त्री के गर्भाशय को
हानि पहुँचती है । गर्भ रह जाय तो बच्चा गर्भ ही में मर जाता है ।
पुरुष को भी उपदंश रोग हो जाया करता है ।
तृतीया तिथि
तृतीयायां श्लिष्यन्निबिडनममासाद्य पुलकं,
मुहुर्बाहोर्मूले मृदुलिखितपार्श्वः कररुहैः ।
भुजापीडं कण्ठे दशनवसनास्वादतरलः,
स्तनोपान्तारब्धच्छुरितमबलां विह्वलयति ॥
तृतीया को गले में बाहु डालकर आलिंगन करता हुआ नितम्ब
और कन्धों को नखक्षत करे । स्थान-स्थान पर दन्त-दशन का
प्रयोग करता जाय । इस तिथि को भी त्याज्य समझा गया है ।
इस दिन के सहवास से जो सन्तान उत्पन्न हो जाती है, वह किसी
न किसी अंग से हीन होती है । सदैव रोगी रहने वाली तथा
अल्पायु भी होती है ।
- u u - - - u - - u -
दत्त्वा चूचकयोः सखेलपुलकं (12 syllables):
दत्- (-) त्वा (-) चू (-) च (u) क (u) योः (-) स (u) खे (-) ल (u) पु (u) ल (u) कम् (-)
Wait:
दत्त्वा (-) चू (-) च (u) क (u) योः (-) = - - - u u - (Ma-gana, Sa-gana!)
सखेलपुलकं = u - u u u -?
चुम्बेत्कुचौ भावतः (7 syllables):
चुम् (-) बेत् (-) कु (u) चौ (-) भा (-) व (u) तः (-) = - - u - - u - (Ta-gana, Ga!)
YES! IT IS SHARDULAVIKRIDITA!
Shārdūlavikrīḍita has 12 + 7 = 19 syllables!
Now let's check Line 1:
12 syllables pause, then 7 syllables!
The last 7 syllables are:
चुम्बेत्कुचौ भावतः (7 syllables)
So the end of Line 1 must be:
...कृष्य दष्ट्वाऽधरं (7 syllables): -
- u - - u -
कृष् (-) य (u) दष् (-) ट्वा (-) ऽ (u) ध (u) रम् (-)?
Wait:
...करेणाकृष्य दष्ट्वाऽधरं:
- u - - u -
असली कोकशास्त्र १६५
षष्ठी तिथि
षष्ठ्यां गाढविगूढगात्रमधरं दष्ट्वाऽर्थ नाभीतले,
प्रारब्धच्छुरितो लिखेत्कररुहैरूर्वोस्तटी रुन्मदः ॥
षष्ठी तिथि में स्त्री को द्रवित करते समय नाभी के अधोभाग
में नखच्छेद करे। अधरपान और जंघाओं के सन्धिस्थल में नख-
छुरित करे। इस दिन का गर्भज बालक मध्यम श्रेणी के गुणों
वाला होता है।
सप्तमी तिथि
मृदितमदनवासो दन्तवासो लिह्हानः,
करजकलितकण्ठोपान्तवक्षःकपोलः ।
कृतघनपरिरम्भः संभृतानंगरंगो,
गमयति मृदुभावं भामिनीमन्हि भानोः ॥
सप्तमी के दिन प्रसन्न चित्त होकर स्त्री के ओष्ठों का चुम्बन
करे, जंघा का सन्धिस्थल, कण्ठ, वक्ष और कपोलों पर नख
विलेखन करे। यह भी निषिद्ध रात्रि है, इस तिथि के सम्भोग से
जो कन्या होती है वह कुल को दाग लगाने वाली होती है । कोई
इस तिथि में सन्तानाभाव मानते हैं ।
१६६ असली कोकशास्त्र
अष्टमी तिथि
अष्टम्यां परिरभ्य कण्ठमसकृन्नाभिं नखैरश्चन्,
दष्टौष्ठः पुलकं ददत्कुचतटीं चुम्बेद्विमृष्ट्योच्चकैः ॥
अष्टमी के रोज नखों से नाभि को खींचकर नारी को पुलकित
अधरपान करता हुआ, कुचों को मले तथा विविध चुम्बन से स्त्री को
द्रवित करे। इस दिन के संयोग से जो संतान होती है वह धनी-
मानी होती।
नवमी तिथि
नाभीमूलं विलोलपाणिरधरं दष्ट्वा स्तनौ पीडयन्,
मृद्गीयान्मदनालयंचार्वलिखन् पार्श्वे नवम्यांनखैः ॥
नवमी के दिन स्त्री द्रवित करनेके लिये, अधरपान करता हुआ
नाभि और पेडू पर हाथ फेर कर मृदु मर्दन करे। भगोष्ठों को अंगु-
लियों से सहलाता हुआ स्तन और नितम्बों पर नखदान करे ।
नवमी तिथि के सहवाश की कन्या सौभाग्यवती सुन्दरी होती है।
दशमी तिथि
ललाटमाचुम्ब्य नखैर्लिखन्तः,
शिरोधरां आमितवामहस्ताः ।
कटिस्तनोरः स्थलपृष्ठमध्ये,
स्मरं दशम्यां प्रतिबोधयन्ति ॥
असली कोकशास्त्र १६७
दशमी के दिन स्त्रियों का काम जगाने के लिये माथे का चुम्बन,
अन्य सभी कामोत्तेजक स्थानों पर दन्त-दशन, नखच्छेद, मर्दन
आदि करते हुए कड़ा आलिंगन करने से काम जाग जाता है ।
दशमी के सहवास का पुत्र हमेशा स्वस्थ बल-पौरुषयुक्त होता है ।
एकादशी तिथि
एकादश्यां करकलितग्रीवमालिङ्ग्य गाढं,
पायं पा यं दशनवसनं किंचिदालीढलोलम् ।
घातंघातं हृदि सहसितं मन्मथागारमुद्रा-
भङ्गक्रीडातरलितकराः कामिनीं द्रावयन्ति ॥
एकादशी को नितम्ब देश में काम का वास होता है । अतः
अन्य सभी स्थानों में यथाविधि कामोत्पादन-कलाओं का प्रयोग
करते हुए नितम्ब का खूब मर्दन करे । इससे स्त्री रतिसुख को प्राप्त
होती हुई स्रवित होगी । इस तिथि में भी सम्भोग न करना चाहिए ।
एकादशी के सहवास से उत्पन्न कन्या गुप्त-व्यभिचारिणी अथवा
वेश्या होती है ।
द्वादशी तिथि
द्वादश्यां परिरभ्य गाढमसकृच्चुम्बन् कपोलौ दृशो-
रुन्मेषं विदधीत सीत्कृतिजुषो व्यादष्टदन्तच्छदः ॥
द्वादशी को बार-बार गले लगाकर आलिंगन चुम्बन आदि करे ।
१६८ असली कोकशास्त्र
अधर का चुम्बन करता हुआ युवती की आँखें खोले । इस क्रिया
से वह द्रवित हो जायगी । इस तिथि का गर्भज पुत्र गुणवान शील
स्वभाव वाला होता है ।
त्रयोदशी तिथि
चुम्बन् गण्डततीं मनोभवतिथौ मृद्गन् ससीत्कं कुचौ
कान्तां द्रावयति द्रुतंकररुहैर्भिन्दन् शनैःकन्धराम् ॥
त्रयोदशी को स्त्री के उरु केन्द्र में काम का अधिवास होता
है । अतः अन्य अंग मदन करता हुआ उस प्रदेश का विशेष मर्दन
करे । इससे स्त्री तृप्त होती है । स्त्री-प्रसंग में यह भी वर्जित तिथि
है । इस रात्रि के गर्भ से उत्पन्न कन्या कुल में दाग लगाने वाली
कुलटा होती है ।
चतुर्दशी तिथि
कन्दर्पारितिथौ विचुम्बितदृशो दोर्मूलचश्वन्नखाः,
कामागारनिवेशितद्विपकराः क्रीडन्ति कान्तातनौ ॥
चतुर्दशी के दिन स्त्री के सब शरीर में काम का वास होता
है । अतः सम्पूर्ण कलाओं का प्रयोग करना चाहिए । इस दिन
दोनों को विशेष आनन्द का अनुभव होता है । इस चौदहवीं रात्रि
का गर्भज पुत्र धार्मिक, यशस्वी और सुशील होता है ।
असली कोकशास्त्र १६६
पूर्णिमा और अमावस्या
दर्शे पूर्णेतिथौ च नर्तितानखाः स्कन्धस्थलीरङ्गतोऽ
नङ्गागारचुचूलिकाञ्चितकराः कुर्युः स्त्रियांविह्वलाम् ॥
पूर्णिमा और अमावस्या को यदि पुरुष स्त्री-प्रसंग करे तो उन्हें
सम्पूर्ण कलाओं का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि काम सम्पूर्ण
शरीर में व्याप्त होता है। पन्द्रहवें दिन सम्भोग से जो कन्या पैदा
होती है वह पतिव्रता, धार्मिका सुन्दरी और यशस्विनी होती है।
इस दिन के गर्भाधान से बड़ा प्रतापी पुण्यवान् पुत्र उत्पन्न होता
है। जैसे कहा है—
षोडशे दिवसे गर्भो जायते यदि वै स्थिरः ।
चक्रवर्ती भवेद्राजा जायते नात्र संशयः ॥
निषिद्ध मैथुन
रजसाभिप्लुतां नारीं यो नरो ह्युपगच्छति ।
प्रज्ञातेजोबलं चक्षुरायुस्तस्य प्रहीयते ॥ मनु०
रजस्वला स्त्री से सम्भोग करने से पुरुष की आयु, बल, बुद्धि,
तेज और नेत्रशक्ति क्षय को प्राप्त होती है। इस लिए रजस्वला
स्त्री से कभी भूलकर भी मैथुन न करना चाहिए और जिन-जिन
तिथियों को निषेध किया गया है उन-उन का सर्वदा त्याग कर देना
आवश्यक है।
१८० असली कोकशास्त्र
काम के पाँच बाण
'कामः पञ्चशराः स्मृतः'
कामदेव के पाँच बाण माने गये हैं। वे कौन-कौन से हैं इस पर
विचार किया जायगा। यह पञ्चशरी कामदेव अपने किसी न किसी
बाण से नर-नारियों को बींध लेता है । उन बाणों का कोई क्रम
नहीं निश्चित किया जा सकता, क्योंकि उनका प्रयोग अलग-अलग
होता है। शब्द, स्पर्श, रूप रस, गन्ध, ये कान, त्वचा, आँख,
जिह्वा और नासिका आदि के विषय हैं। इन्हीं को बाण समझना
चाहिए। प्राणी इनके पीछे अन्धा होकर प्राण गँवा बैठता है. इस
लिये इनको बाण कहा गया है।
शब्द बाण
यह ऐसा बाण है जिस समय इसका प्रहार होता है उस समय
प्राणी अपने आपे में नहीं रहता। जब यह व्यंग या कठोर रूप से
प्रयोग में लाया जाता है तब यह कलह या युद्ध उत्पन्न कर विनाश
का हेतु बन जाता है। उस समय इसे वाग्बाण कहते हैं। वह काम
बाण नहीं कहाता। शब्द बाण से विद्ध प्राणी मूक की भाँति प्राण
गँवाता है। जिसका नीचे एक उदाहरण दिखाया जाता है।—
जंगली मृग को पकड़ने के लिए जब बहेलिये बन में जाते हैं,
तब वे जंगल के किसी भाग में जाल लगा देते हैं और आप किसी
असली कोकशास्त्र १७१
मधुर वाद्य को लेकर वन में बजाते फिरते हैं। जब मृगों का झुण्ड
दिखायी देता है तब उसके पास से वाद्य-स्वर उत्तान कर निकलते
हैं। मृगों का झुण्ड का झुण्ड उस वाद्य-स्वर की मधुर तान को
सुनते ही खाना-पीना छोड़कर मस्त हो जाता है और उस बहेलिये
के पीछे-पीछे चलने लगता है। मीलों का चक्कर लगाते-लगाते जब
वह बहेलिया जाल के पास आकर कुछ आगे बढ़ जाता है और
मृग-झुण्ड जाल के फन्दे के नीचे आ जाता है तब दूसरे लताकुञ्ज
में छिपे हुए बहेलिये जाल की रस्सी खींचकर उस झुण्ड को जाल
में फँसा लेते और मार डालते हैं। यह है काम का शब्द-बाण जो
पशुओं पर भी काम करता है। इसी शब्द-बाण के फेर में पड़कर
मनुष्य तवायफों के फन्दे में फँसकर अपना सर्वस्व नाश कर देते
हैं। इसी बाण के प्रभाव से कृष्णचन्द्रजी ने काले विषधर साँप को
नाथा था, यह जगत-प्रसिद्ध बात है। आभूषणों की झँकार कामी
जनों के हृदय में काम का संचार करती है। इसीलिए ब्रह्मचर्य-
अवस्था में ( कीर्त्तनम् ) स्त्रियों का गुण कीर्त्तन करना या सुनना
मना किया है।
स्पर्श बाण
स्पर्श विषयक बाण भी कामज-बाण है। कोमल त्वचा का
स्पर्श कामोत्पादक है, क्योंकि कोमल त्वचा में स्पर्श बाण का शीघ्र
प्रयोग होता है। युवक-युवतियों के स्पर्श-मात्र से उनके शरीर में
१७२ असली कोकशास्त्र
बिजली दौड़ जाती है। यही स्पर्श बाण का प्रहार है। इसका
विशेषोद्वेग हाथी में देखा जाता है। मदोन्मत्त हाथी जब बिगड़
जाता है, तब उसे वश में लाने के लिए हथिनी को छोड़ते हैं। उसके
स्पर्श-मात्र से शान्त होकर हाथी खड़ा हो जाता है। जंगली हाथी
को पकड़ने के लिये जंगल में एक गहरा गढ़ा खोदकर उस पर
पतली लकड़ियों की छत बना देते हैं। बाद उसके ऊपर जौ आदि
बो देते हैं। हाथी हरी-हरी जौ की खेती समझ कर खाने आता है
और उसमें गिर पड़ता है। जब भूख-प्यास से व्याकुल होकर क्रोध
से चिन्हाड़ने लगता है तब सिखायी हुई हथिनियों की सूँड़ से फँसवा
कर बाहर निकाला जाता है। भूखा-प्यासा और क्रुद्ध होने पर भी
हथिनियों के स्पर्श से वह शान्त हो जाता है। स्पर्श बाण के सामने
वह सब दुःख भूल जाता है। पुरुष भी इस कोमल स्पर्श का
अनुभव जब कामिनी में करता है तब उन्मत्त की भाँति सब कुछ
भूल जाता है और उसके सामने काम ही काम दिखाई देता है।
इसी लिए ब्रह्मचारी को (केलिः) स्त्रियों के साथ खेलने को मना
किया है। क्योंकि उसमें अंग-स्पर्श होना सम्भव होने से स्पर्श
बाण का प्रयोग अनिवार्य है।
—:※:—
असली कोकशास्त्र १७३
रूप बाण
रूप बाण का असर आँख से होता है, अन्धे को नहीं । रूप
का प्यासा पतंग, रूप-राशि अग्निज्वाला में अपने प्राणों की बलि
देता है। यह रूप बाण का असर है कि वह पंख जल जाने पर भी
रूपज्वाला की ओर देखता-देखता प्राण विसर्जन कर देता है ।
उसका उस ओर ताकना इस बात का सबूत है कि वह पंख न रहने
से लाचार है नहीं तो वह वहाँ पहुँचने में कुछ उठा न रखता। इसी
रूप बाण के चक्कर में पड़कर हजारों नर-नारी, लोक-लज्जा कुल-
मर्यादा से हाथ धो बैठते हैं। अपने तन मन धन को इस रूपज्वाला
में भस्म कर गली-गली में ठोकरें खाते फिरते हैं। जिसको यह रूप
का बाण लग जाता है वह अपना सर्वस्व नाश करके भी पर-जले
पतंग की भाँति उसी ओर टुकुर-टुकुर निहारता रहता है । उसकी
आशालता तबतक नहीं सुखाती जबतक वह चिता पर नहीं पहुँच
जाता । ब्रह्मचारी को इस बाण से बचाने के लिए मनुजी ने कहा है,
( प्रेक्षणम् ) अर्थात् स्त्री की रूपराशि को देखने का निषेध किया ।
रस बाण
रस शब्द से अनेक रसों का ग्रहण होता है । जैसे जिह्वा से
मधुर शब्द द्वारा व्यक्त मधुररस, जिह्वा से चखा हुआ मधुररस,
मधुरध्वनि जनित मधुररस, इत्यादि अनेक मधुर रस हैं जो समय
१७४ असली कोकशास्त्र
पर कामबाण का काम करते हैं इस लिए उन्हें रस बाण भी कहते
हैं । नानाविध रसों का आस्वादन कर मनुष्य रस बाण के लक्ष्य
होकर काम के शिकार हो जाते हैं । इसी कारण मनु भगवान् ने
खट्टे आदि कामोत्तेजक रसों का निषेध ब्रह्मचर्य अवस्था में किया है ।
गन्ध बाण
बढ़िया सुगन्धित मालाओं के हार इत्र फुलेल व्यवहार करने
वाले स्त्री-पुरुष गन्धबाण से बिद्ध होकर काम के शिकार हो जाते
हैं । यथार्थतः कामोत्तेजना के लिए इनका व्यवहार किया भी जाता
है । इन्हीं रसबाण और गन्धबाण से बिंधा हुआ भ्रमर, काठ जैसी
कठोर वस्तु में छेद करने की सामर्थ्य वाला होकर भी, अति कोमल
पद्मपुष्प में सूर्य छिपते ही बन्द हो जाता है और भीतर बैठा गन्ध
रस का भोग करता हुआ मन-ही-मन सोचता है कि सबेरा होते ही
सूर्य उदय होगा तब फूल खिल जायगा और मैं उड़कर दूसरे फूल
पर जाऊँगा । किन्तु पुष्प की उन मुलायम पंखड़ियो को सामर्थ्य
रहते हुए भी नहीं काटता । प्रातःकाल होने के पहले ही, हाथियों
का एक झुण्ड आता है और पानी पोते समय कलोल करता हुआ
उस मृणालमय पुष्प को सूँड से उखाड़ कर खा जाता है । भ्रमर
का न वह पुष्प खिलता है और न वह दूसरे पुष्प पर जाता है ।
उसकी सम्पूर्ण आशायें मन में समाप्त हो जाती हैं । ठीक यही
अवस्था इन उपरोक्त बाणों से बिद्ध, कामदेव के शिकार कामी पुरुषों
असली कोकशास्त्र १७५
की होती है। उनको कामनायें पूर्ण नहीं होतीं, वे अपूर्ण-की-अपूर्ण
मन में रह जाती हैं क्योंकि शास्त्र का कथन है—
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते ॥
काम भोग से शान्त नहीं होता प्रत्युत भोगने से ओर भी बढ़ता
है । जिस तरह की अग्नि में घी डालने से अग्नि और भी बढ़ती है ।
—:०:—
स्त्री सौन्दर्य
स्त्री शरीर के किन-किन अवयवों की कैसी गठन होनी चाहिये
जिससे शरीर सुन्दर प्रतीत होने लगे । आचार्यों ने इन बातों पर
विचार करते हुए कुछ बातें दर्शायी हैं ।
पहला—आँख, सरस, और चमकीली, एवं साफ होनी चाहिये ।
मुख कान्तिवान् अर्थात् पुरजलाल हो, दाँत उज्ज्वल चमकीले और
समान पंक्तिबद्ध हों, अंगुलियों के नाखून स्वच्छ और गोलाई लिये
हुए होने चाहिएँ ।
दूसरा—आँखों की पुतलियाँ, पलकों के बाल, भृकुटी के बाल,
तथा सिर के बाल, ये सब भौंरे के ससान काले-स्याह होने चाहिएँ ।
तीसरा—अधर, जिह्वा, मसूड़े ओर कपोल ( गाल ) ये सब
बिम्ब-फल के समान लाल होने चाहिएँ ।
१७६ असली कोकशास्त्र
चौथा—अँगुलियों के अगले हिस्से, पाँवों की एड़ियें, सिर
और बाल के भुजाओं के माँसल भाग गोल होने चाहिएँ।
पाँचवाँ—सिर के बाल, अँगुलियाँ, पलकें और नेत्र लम्बे होने
चाहिएँ।
छठवाँ—जंघा, नितम्ब, गर्दन और पिंडलियाँ, ये स्थान भरे
हुए और स्थूल होने चाहिएँ।—
सातवाँ—स्तन, कन्धे, आँख और मस्तक बड़े विशाल होने
चाहिएँ।
आठवाँ—नाक, कान नोकीले न छोटे न बहुत बड़े समान
आकार वाले होने चाहिएँ।
नवाँ—पेट लम्बा किन्तु बढ़ा हुआ नहीं होना चाहिए।
दसवाँ—कमर पतली किन्तु मजबूत होनी आवश्यक है।
आचार्यों ने शरीर के रंग का विशेष पृथक् वर्णन नहीं किया।
इससे मालूम होता है उन्होंने शरीर की बनावट को विशेष महत्त्व
दिया है। कपोलों के रंग की लाली से कुछ झलक दिखाया देती है
सम्भव है वह सब शरीर पर लागू समझी जाय।
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