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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 440 में से

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पृष्ठ 178

असली कोकशास्त्र १७३
रूप बाण
रूप बाण का असर आँख से होता है, अन्धे को नहीं । रूप
का प्यासा पतंग, रूप-राशि अग्निज्वाला में अपने प्राणों की बलि
देता है। यह रूप बाण का असर है कि वह पंख जल जाने पर भी
रूपज्वाला की ओर देखता-देखता प्राण विसर्जन कर देता है ।
उसका उस ओर ताकना इस बात का सबूत है कि वह पंख न रहने
से लाचार है नहीं तो वह वहाँ पहुँचने में कुछ उठा न रखता। इसी
रूप बाण के चक्कर में पड़कर हजारों नर-नारी, लोक-लज्जा कुल-
मर्यादा से हाथ धो बैठते हैं। अपने तन मन धन को इस रूपज्वाला
में भस्म कर गली-गली में ठोकरें खाते फिरते हैं। जिसको यह रूप
का बाण लग जाता है वह अपना सर्वस्व नाश करके भी पर-जले
पतंग की भाँति उसी ओर टुकुर-टुकुर निहारता रहता है । उसकी
आशालता तबतक नहीं सुखाती जबतक वह चिता पर नहीं पहुँच
जाता । ब्रह्मचारी को इस बाण से बचाने के लिए मनुजी ने कहा है,
( प्रेक्षणम् ) अर्थात् स्त्री की रूपराशि को देखने का निषेध किया ।
रस बाण
रस शब्द से अनेक रसों का ग्रहण होता है । जैसे जिह्वा से
मधुर शब्द द्वारा व्यक्त मधुररस, जिह्वा से चखा हुआ मधुररस,
मधुरध्वनि जनित मधुररस, इत्यादि अनेक मधुर रस हैं जो समय