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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 440 में से

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११ असली कोकशास्त्र १६१
जिस दिन शुद्ध हो जाती है, वह पहला दिन शुक्ल प्रतिपदा का
समझना चाहिए। तत्पश्चात् द्वितीया आदि क्रम से कृष्ण प्रतिपदा
तक किन-किन अंगों में काम वास करता हुआ घूमता है उसका
वर्णन जैसा आचार्यों ने किया है वैसा आगे दिखाया जाता है।
अंगुष्ठे पदगुल्फजानुजघने नाभौ च वक्षः स्तने ।
कक्षाकण्ठकपोलदन्तवसने नेत्रालिके मूर्द्धनि ॥
शुक्लाशुक्लविभागतो मृगदृशामङ्गेष्वनङ्गस्थिति-
रूर्ध्वाधोगमनेन वामपदतः पक्षद्वये लक्षयेत् ॥
ऋतुस्नान का दिन शुक्ल प्रतिपदा का समझा गया। उस दिन
कामदेव स्त्री के बायें अंग में पाँव के अँगुठे से आरम्भ होकर क्रमशः
ऊपर को चढ़ता हुआ पन्द्रह दिन में शिर पर पहुँच जाता है और
फिर सोलहवें दिन से दाहिने अंग से नीचे का ओर उतरता हुआ
अँगूठे पर पहुँच जाता है। इस प्रकार महीनाभर काम सम्पूर्ण शरीर
में चक्कर लगाया करता है। जिस दिन जिस अंग में वास करता
हो उस अंग को उस दिन विशेषरूप से मर्दन-स्पर्शन करने से स्त्री
शीघ्र स्रवित होती है। उन अंगों के स्थान क्रमशः दिखाये जाते हैं।
पाँव का अँगूठा, पाँव का तलभाग, घुटना, जाँघ, योनि, कमर,
नाभि, हृदय, कुच, बगल, कण्ठ, कपोल, ओष्ठ, नेत्र, पलक,
मस्तक। इसी आरोह अवरोह भेद से काम का चक्कर बराबर बना
रहता है। उस-उस तिथि में क्या-क्या करना चाहिए अब उसका
वर्णन नीचे किया जाता है।