रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
असली कोकशास्त्र १०७
हैं उनका असर परस्पर होने लगता है । शुद्ध वृत्तियाँ शुद्ध भाव
को पैदा करती हैं और काम काज को प्रवृद्ध कर डालती हैं । शुद्ध
वृत्तियों का प्रयोग सन्तान वा बहन भाई आदि के साथ होता है
और काम काज का अपनी भार्या के साथ । इस स्पार्शिका क्रिया का
प्रभाव हाथी पर अधिक देखने में आता है । जब हाथी मस्ताकर
मद-मस्त हो जाता है तब आपे से बाहर होकर सब पर हमला
करने लगता है । हजार प्रयत्न करने पर भी रोकना कठिन हो जाता
है । चतुर पीलवान हथिनी लाकर उसके पास छोड़ देते हैं । हथिनी
की सूँड़ का स्पर्श होते ही वह सब उपद्रव छोड़कर ऐसा शान्त हो
जाता है मानो कुछ हुआ ही नहीं था । इस लिए स्पर्श काम-
संदीपिनी कला का प्रधान शस्त्र है ।
जिन स्त्री-पुरुषों को सामान्य स्पर्श से कामोद्दीपन नहीं होता
अथवा विलम्ब लगता है । उनके लिए चुम्बन का प्रयोग किया
जाता है । यदि इतने पर भी काम जागृत न हो तब दन्त-दशन (दाँतों
से स्थान-स्थान पर काटना ) और नखक्षत का व्यवहार किया
जाता है । किन्हीं-किन्हीं को इन दो प्रयोगों के बिना काम जागता
ही नहीं । बिना काम जागे मैथुन करना मृतक-सम्भोग कहाता है ।
आजकल प्रायः मृत-सम्भोग ही देखा जाता है क्योंकि प्रायः स्त्रियाँ
अतृप्त ही रहती हैं । पुरुष अपने वीर्य का बार-बार दुरुपयोग कर
अपने पुंस्त्व को खो बैठता है और स्त्रियाँ अतृप्त रह जाती हैं ।
यह उपरोक्त आलिंगन उन्हीं स्त्री पुरुषों में विशेष रूप से होते
११८ असली कोकशास्त्र
हैं, जिनमें परस्पर सम्भोग होकर घिशेष परिचिति हो जाती है
इनसे विशेष परस्पर प्रेम की वृद्धि और संकोच भाव की कभी हो
जाती है इस प्रकार जब दोनों की झिझक दूर हो जाती है, तब
लतावेष्टितादि आलिंगन किये जाते हैं।
लतावेष्टित आलिंगन
प्रियमनुकृतवल्लीविभ्रमा वेष्टयन्ती,
द्रुममिव सरलांगी मन्दसीत्का तदीयम् ।
वदनमुदितखे ताक्रन्दमाचुम्बनार्थे,
नमयति विनमन्ती तल्लताबेष्टितं स्यात् ॥
जिस प्रकार एक पेड़ को लता लपेटती हुई ऊपर चढ़ जाती है
उसी प्रकार अपने पैरों से खड़े हुए पुरुष को जंघाओं को और
बाहों से बगल तथा कण्ठ को लपेट कर सीत्कार करती हुई पति के
मुख के सम्मुख अपना मुख चुम्बन के लिये झुका देती है उसको
लतावेष्टित आलिंगन कहते हैं।
वृक्षादि रूढ आलिंगन
स्थितपतिमधिकृत्य प्रोक्तमाश्लेष युग्म
असली कोकशास्त्र ११६
यह भी लतावेष्टित के समान ही आलिंगन होता है; किन्तु
अन्तर इतना ही है कि कामोद्वेग में स्त्री अपने पैर से पुरुष के
एक पैर को दबाकर दूसरे पैर से उसकी जंघाओं को लपेटती हुई,
अपनी भुजा को पति के कक्ष भाग से कन्धे को पकड़ कर ऊपर की
ओर उठती हुई पति का चुम्बन करती है, इसको वृक्षादि रूढ़
आलिंगन कहते हैं ।
तिलतण्डुल आलिंगन
असकृदपि विगाढाश्लेषलीलां वितन्वन्,
जनितजघनबाहुव्यत्ययंस्पर्धयेव ।
मिथुनमथ मिथोऽङ्गे लीयते निस्तरंगं,
निगदति तिलपूर्वं तण्डुलं तन्मुनीन्द्रः ॥
यह आलिंगन लेटकर और खड़े होकर दोनों प्रकार से होता
है इसकी क्रिया प्रायः लतावेष्टित या वृक्षादिरूढ़ के समान ही
होती है। इसमें केवल अन्तर इतना ही है कि वे दोनों आलिंगन
मुख चुम्बन मात्र के लिये किये जाते हैं, और यह प्रत्येक अंग को
जोर से दबाकर एक रूपता लाने के लिए किया जाता है इससे
सम्पूर्ण शरीर में रति की जागृति हो जाती है। इस लिए इसको
तिल तण्डुल आलिंगन कहते हैं ।
१२० असली कोकशास्त्र
क्षीरनीरालिंगन
अभिमुखमुपविष्टा योषिदंकेऽथ तल्पे,
रुचिररुचिरगाढालिंगनो वल्लभश्च ।
प्रसरदसम गावेशनश्यद्विचारौ,
विशत इव मिथोऽङ्गे क्षीरनीरं तदाहूः ॥
वही तिल तण्डुल आलिंगन करते हुए जब स्त्री पुरुष काम
पीड़ित होकर अपने आपको भूल जाते हैं अर्थात् जिस प्रकार दुध
और जल एक होकर भेद-भाव को मिटा देता है, उसी प्रकार स्त्री
पुरुष का अपनी अवस्था के भेद को भूल जाने से यह क्षीरनीरा-
लिंगन कहाता है।
उरुपगूढालिंगन
तत्रोरुसंदंशेनैकमूरूमूरुद्वयं वा सर्वप्राणं-
पीडयेदित्यूरूपगूढनम् ॥
काम-पीड़िता अबला की जंघाओं को अपनी जंघाओं में दबा-
कर जो पीड़न-क्रिया किया जाता है, उसको ऊरूपगूढ़ालिंगन कहते
हैं। यह आलिंगन आमने-सामने करवट लेते हुए स्त्री-पुरुषों में
किया जाता है। इससे मांसल भाग दबने से बहुत आनन्द
मालूम होता है।
असली कोकशास्त्र
चित्र नं० २, ३
वृषभ पुरुष मृग पुरुष
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असली कोकशास्त्र १२१
जघनोपगूहन आलिंगन
जो स्त्री अपने बालों को फैलाकर अपनी जंघाओं के उभरे हुए
भाग से पुरुष की जंघा को दबाती है, नखक्षत, दन्तक्षत और चुम्बन
करती हुई ग्रहण करती है उसको जघनोपगूहन आलिंगन कहते हैं।
यह आलिंगन स्त्री के बढ़े हुए कामोद्वेग का सूचक है। जो पुरुष के
मन्द कामोद्वेग को तीव्र करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
लालाटिक आलिंगन
जब स्त्री पति की छाती में लिपट कर स्तनों का स्पर्श करती
है, और मुख से मुख, आँख से आँख लड़ाकर मस्तक से मस्तक
रगड़ती है तब उसको लालाटिक आलिंगन कहते हैं। यह प्रायः
अकस्मात लेटे हुए पति के साथ किया जाता है। यह भी स्त्री में
कामोद्वेग का सूचक होता है।
चुम्बन
यह भी सुरत जगाने में परम सहायक है। नायक या नायिका
से जब चुम्बन किया जाता है, तब चुम्बन करने वाले में पहले
कामोद्वेग उत्पन्न होता है। इसका आरम्भ आलिंगन के बाद ही
होता है। यथार्थतः यह आलिंगन का एक भेद-मात्र है। प्रथम
चुम्बन मस्तक और फिर गण्डस्थल तथा अन्य स्थलों पर होता
१२२ असली कोकशास्त्र
हुआ मुख चुम्बन तक आ पहुँचता है । उसके भेद क्रमशः नीचे
लिखे जाते हैं ।
निमित्तक चुम्बन
बलात्कारेण नियुक्ता मुखे मुखमाधत्ते-
न तु विचेष्टत इति निमित्तकम् ॥
नव-वधू को आग्रह पूर्वक जब पुरुष चूमने के लिये उसके
कपोलों पर मुख रख देता है, किन्तु वह संकोचवश कुछ चेष्टा नहीं
करती तो उस चुम्बन को निमित्तक चुम्बन समझना चाहिए । यह
चुम्बन सुहागरात को किया जाता है ।
स्फुरितक चुम्बन
वदने प्रवेशितं चौष्ठं मनागपत्रपाऽनुग्रहीतुमिच्छन्ती ।
स्पन्दयति स्वमोष्ठं नो नरमुत्सहते इति स्फुरितकम् ॥
नवोढ़ा स्त्री के अधरोष्ठ पर जब उसका पति अपने ओष्ठ रख
देता है, और वह उसके प्रत्युत्तर में चूमने की इच्छा करती हुई
लज्जावश केवल ओष्ठ हिलाकर रह जाती है, अथवा उद्वेग भाव से
ओष्ठ काँप जाते हैं, तब उस चुम्बन को स्फुरितक चुम्बन कहते हैं ।
घट्टितक चुम्बन
पत्नी पती के मुख पर रक्खे हुए ओष्ठ को कुछ पकड़ कर
२. परिच्छेद ५-८: चान्द्र-कला, मदन-स्थान, आलिङ्गन, चुम्बन एवं काम-उद्दीपन
असली कोकशास्त्र १२३
अपनी आँख बन्द करती हुई और पति की आँखों को भी अपने
हाथों से ढाँप कर पति के ओठ को अपनी जिह्वा के अग्रभाग से
धीरे-धीरे रगड़ती है, इस लिए उसको घट्टितक चुम्बन कहते हैं ।
सम चुम्बन
जब पति-पत्नि परस्पर एक दूसरे के चुम्बन का जवाब चुम्बन
में यथास्थान देते हैं, उस चुम्बन को सम चुम्बन कहते हैं ।
तिर्यक चुम्बन
पति-पत्नि अपने मुख को कुछ टेढ़ा करके जब परस्पर मुख का
चुम्बन करते हैं, तब उसे तिर्यक चुम्बन कहते हैं । यह चुम्बन
किसी वाटिका में बेंच या घास पर पाँव फैलाकर बैठे हुए किया
जाता है ।
उद्भ्रान्त चुम्बन
नायक या नायिका जब किसी एकान्त स्थान में बैठी हो, तब
उनमें से एक बैठे हुए के पृष्ठ भाग से आकर अपने दाहिने हाथ से
ठुड्डी को और बायें से सिर को पकड़ और अपनी ओर घुमाकर
जो चुम्बन किया जाता है उसको उद्भ्रान्त चुम्बन कहते हैं ।
अवपीडितक चुम्बन
यह चुम्बन दो प्रकार का है । पहला पति-पत्नी परस्पर एक
दूसरे के ओठों को ओठों में दबाकर चुम्बन करते हैं, उसको अव-
१२४ असली कोकशास्त्र
पीड़ितक चुम्बन कहते हैं। दूसरा पत्नी के अधरोष्ठ को अंगुलियों
में पकड़ कर पति अपने ओष्ठों से खूब पीड़ित करे, किन्तु दाँत न
लगने दे । इसे भी अवपीडितक चुम्बन कहते हैं ।
उत्तर चुम्बन
जिस भाँति पति जिस स्थान का चुम्बन करे ठीक उसी प्रकार
पत्नी का उस स्थान का चुम्बन करना उत्तर चुम्बन कहाता है ।
इस चुम्बन का आरम्भ दोनों ओर से हो सकता है ।
प्रातिबोध चुम्बन
यदि सुचिरसमेतः प्रेयसीमग्रसुप्तां,
रहसि कृतकनिद्रां चुम्बति प्राणनाथः ।
कथितविधमिदं स्याच्चुम्बनं प्रातिबोधं,
द्वयमिदमपरं स्याच्चुम्बनं छायिकाख्यम् ॥
पति के घर पर देर से लौटने पर सोई हुई अथवा सोने के
बहाने से लेटी हुई पत्नी का एकान्त में किया हुआ चुम्बन प्राति-
बोध चुम्बन कहाता है । इस प्रकार का चुम्बन दोनों ओर से किया
जा सकता है ।
छायातथा संक्रान्ति चुम्बन
अभिनवमनुरागं व्यञ्जितुं दर्पणादौ,
प्रतिकृतिविषयं वा चुम्बनं पुंस्त्रियोः स्यात् ।
असली कोकशास्त्र १२५
प्रतिकृतिशिशुचित्राश्लेषणं चुम्बनं वा,
द्वयमुपहितभावं तच्च संक्रान्तमाहुः ॥
दर्पण आदि में प्रतिबिम्ब को देखकर, चित्रों या बालक
बालिकाओं को प्रतिनिधि मानकर जो चुम्बन किया जाता है उसे
छाया चुम्बन और संक्रान्त चुम्बन कहते हैं । ये चुम्बन अत्यन्त
मुग्ध अवस्था में किये जाते हैं ।
चुम्बन द्यूत
यह चुम्बन हार जीत की नियत से किया जाता है । इससे
दम्पति में प्रेम की वृद्धि होती है । इसमें पत्नी की हार ही शोभा
देती है । स्त्री-पुरुषों में से जो कोई ग्रहणक विधि से दूसरे के अधर
ओष्ठ को पकड़ ले उसी की जीत समझी जाती है । इस क्रीड़ा में
अनेक विध छल-कपट से काम लेना पड़ता है । यह अन्य चुम्बनों
की भाँति सीधी-साधी सरल रीति से नहीं किया जाता । जब
पत्नी हार जाती है तब उसकी क्या हालत होती है इसका आचार्य
वर्णन करते हैं—
तत्र जिता सार्धरुदितंकरं विधुनुयात्प्रणुदेद्दशे-
त्परिवर्तयेद्वलादाहृता विवदेत पुनरप्यस्तु पण इति
ब्रूयात्, तत्रापि जिताद्विगुणमाधस्येत् ॥
वह हाथ पाँव को पीटती और सिसकियाँ भरती हुई खिन्न
होकर प्रणयी को धक्का देकर दूर हटाती है और दन्त-दशन या
१२६ असली कोकशास्त्र
नखच्छेद का प्रयोग भी करती है। पुनः पुनः पति से छेड़े जाने पर
फिर चुम्बन द्यूत के लिए तैयार हो जाती है। संयोगवश अथवा
पति उसका मान रखने के लिए उसे जिता देता है। उस अवस्था
का वर्णन आचार्य करते हैं—
विश्रब्धस्य प्रमत्तस्य वाऽधरमवगृह्य दशनान्त-
र्गतमनिर्गमं कृत्वा हसंदुत्क्रोशेत्तर्जयेद्गोदाहयेन्मु-
त्येत्प्रनर्तितभ्रु णा च विचलनयनेन मुखेन विहसन्ती
तानि तानि च ब्रूयादिति चुम्बनद्यू तकलहः॥
अधरोष्ठ को पकड़े हुए हँसती है ओर कहती कि यदि छुड़ाने
की चेष्टा करोगे तो काटे बिना न छोड़ूँगी। उन्मत्त की भाँति
उत्तेजित होकर भ्रुवों को नचाती, नयन मटकाती, तथा व्यंग बाण
बरसाती हुई विनोद भरे तिरस्कार पूर्ण वाक्य बोलती है।
राग संदीपक चुम्बन
काम पीड़िता नारी भोग की अभिलाषा से जब सोते हुए पति
[L16
असली कोकशास्त्र १२७
चलितक चुम्बन
प्रमत्तस्य विवदमानस्य वाऽन्यतोऽभिमुखस्य
सुप्ताभिमुखस्य वा निद्राव्याघातार्थं चलितकम् ॥
उन्मत्त पुरुष स्त्री से विवाद कर रहा हो अथवा अन्य किसी
ओर मन लगाये हुए हो या तन्द्रा से झपकियाँ ले रहा हो । उस
समय उसे सावधान कर अपनी ओर आकृष्ट करने के लिये जो
स्त्री से चुम्बन किया जाता है उसे चलितक चुम्बन कहते हैं ।
उपरोक्त किसी प्रकार विक्षिप्त पति को काम चेष्टार्थ आह्वाहन करने
के लिये पत्नी को चाहिए कि वह ऊपर कहे साधारण चुम्बन का
अवलम्बन करे ।
प्रातिबोधित चुम्बन
चिरात्रादागतस्य शयनसुप्तायाः
स्वाभिप्रायचुम्बनं प्रातिबोधिकम् ।
रात्रि को देर करके घर आने पर, सोयी हुई स्त्री को जगाने
की इच्छा से जो चुम्बन किया जाता है उसे प्रातिबोधित चुम्बन
कहते हैं । इस प्रकार मृदु उपचार से जगाने पर स्त्री को किसी
प्रकार का कष्ट नहीं होता ओर वह पुरुष के अभिप्राय को समझ
जाती है । तथा स्त्री को इस बात का अभिमान होता है कि पति
उससे प्रेम करता है ।
१२८ असली कोकशास्त्र
समौष्ठ चुम्बन
पति के दोनों ओष्ठों को पत्नि अपने ओष्ठों में दबाकर जब
उस पर जिह्वा घर्षण करती है, उसको समौष्ठ चुम्बन कहते हैं।
यह पंचशायक का कथन है।
नखक्षत
यह प्रयोग भी कामाग्नि प्रज्ज्वलिका करने के लिए ही काम में
लाया जाता है। जिन स्त्री पुरुषों की स्पार्शन शक्ति कमजोर होती
है, और उनमें कामोद्वेग की उत्पत्ति नहीं हो पाती, उनमें नखच्छेद
से ही रति का आविर्भाव हो आता है अथवा जिस समय स्त्री पुरुष
अत्यन्त उन्मत्त होकर अपने आपको भूल से जाते हैं, उस समय
इसके प्रयोग से विषय-जनित आनन्द उत्पन्न किया जाता है।
इसका प्रयोग इस समय प्रायः लुप्त-सा हो गया है, इस कारण
रति के एक अंग की हानि ही समझनी चाहिए। इसके अभाव से
स्पार्शन शक्ति विहीन नर-नारियों की तृप्ति नहीं हो पाती। और
उन्मत्त नारि की भी वही दशा होती है, इस लिए इस कला का
जानना अत्यन्त उपयोगी है। जिसका दिग्दर्शन आचार्यों ने जिस
प्रकार किया है। नीचे दिया जाता है।
आच्छुरित नखच्छेद
प्रयोज्यायाश्च तस्याङ्गसंवाहने शिरसः कण्डूयने
पिटकभेदने व्याकुलीकरणे भीषणे च प्रयोगः ॥
६ असली कोकशास्त्र १२६
जिस समय नायक के अंगों को नायिका दबा रही हो, अथवा
तैल मर्दन कर रही हो, या मुहासे फोड़ रही हो, उस समय
नायिका आच्छुरित नखच्छेद का प्रयोग करती है । नायक भी
ऐसी ही किन्हीं दशाओं में इस कला का प्रयोग करता है ।
अर्धचन्द्र नखच्छेद
नायक नायिका के स्तनों पर अथवा गर्दन के किसी हिस्से पर
कामोद्वेग के समय नायिका में कामोद्वेग उत्पन्न करने के लिये इस
अर्धचन्द्र नखच्छेद का प्रयोग करता है ।
मण्डलक्षत नख च्छेद
यह गोल आकार वाला नखछत होता है । यह चिंगोटी करने
से आमने सामने दो अँगुलियों के नखच्छेद हो जाने से उत्पन्न हो
जाता है । इस लिए इसको मण्डलछत कहते हैं । इसका प्रयोग
प्रायः नाभि के नीचे भाग में लिया जाता है । नखच्छेद लम्बी रेखा
में न होना चाहिए । इसकी लम्बाई लगभग दो या तीन अँगुल के
हो सकती है, और योनि के उभरे स्थान पर भी इसका प्रयोग
किया जाता है ।
व्याघ्र नखच्छेद
इस रेखा का आकर कुछ खरोंच की भाँति टेढ़ा होने से इसे
व्याघ्र नखच्छेद कहते हैं ।
१३० असली कोकशास्त्र
मयूरपद नखच्छेद
अङ्गुष्ठजं नखमधो विनिवेश्य कृष्टैः,
सर्वाङ्गुलीकररुहैरुपरि स्तनस्य ।
तच्चुचुकाभिमुखमेत्य भवन्ति रेखाः,
तज्ज्ञाः मयूरपद तकंदुदाहरन्ति ॥
रमणी के स्तन-मुख पर जब पाँचो अँगुलियों के नखों के
निशान बन जाते हैं, तब उसे मयूरपद नखच्छेद कहते हैं। अंगूठा
स्तन के नीचे की ओर लगाकर ऊपर की ओर चारों अँगुलियों से
दबाकर स्तन के अग्रभाग को नखों की ओर जोर से दबाकर
उछालने से यह मयूरपद चिह्न बन जाता है।
उत्पलपत्रक नखच्छेद
सर्वैः शशप्लुतमिदं करजैः कुचाग्रे,
ह्यन्वर्थमुत्पलदलं स्तनगुह्यपृष्ठे ।
रेखा घनास्त्रिचतुरा जघने स्तने वा,
स्मर्तुँ प्रवासगमने विदधुर्विदग्धाः ॥
रमणी के कटि भाग तथा स्तनों पर कमल की पत्तियों की
भाँति नखक्षत चिन्ह बना देने से उत्पलपत्रक नखच्छेद कहलाता
है। मांसल भागों पर नखक्षत लाल-लाल रंग के बड़े सुन्दर चित्ता-
कर्षक चिन्ह बन जाते हैं, जिन्हें देखकर नर-नारी दोनों में कामोद्वेग
असली कोकशास्त्र १३१
जागृत हो जाता है। परदेश जाते समय पुरुष स्त्री के जंघा, स्तन
आदि पर नखक्षत स्मृति के लिए चिन्ह कर जाया करते हैं, और
पुरुष के भी अंगों पर रमणी चिन्ह बना देती हैं। जिन स्मारक
चिन्हों को प्रवास अवस्था में देखकर पति-पत्नि एक दूसरे का
स्मरण कर लेते हैं।
नखच्छेदों के भेदों की पूरी गणना कामशास्त्रज्ञ आचार्यों ने नहीं
की। हो भी नहीं सकती। उन लोगों का कथन है कि कामान्ध हो
जाने पर रति-क्रिया में प्रवृत्त पुरुष किन-किन विचित्र कौशलों का
अवलम्बन कर डालता है, उस अवस्था में उसे उनका स्वयं ज्ञान
नहीं होता। शास्त्र-मर्यादा केवल मार्गदर्शिका होती है। उसका
प्रयोजन सिद्ध हो जाने पर फिर उसके क्रम की आवश्यकता नहीं
होती। क्योंकि पुरुष अपनी बुद्धि से अनेक क्रियाओं का आविष्कार
कर लेता है। जिनसे कामानुराग बढ़ जाता है। यही सफलता
का चिन्ह है।
—:०:—
१३२ असली कोकशास्त्र
दन्तक्षत
चुम्बन में ओष्ठों के कोमल स्पर्श से जब काम विशेष उद्दीप्त
हो जाता है, तब चुम्बन स्पर्श का आनन्द तिरोहित-सा हो जाता
है, और नर-नारी उस समय विशेष कठोर स्पर्श से काम लेने की
चेष्टा करते हैं। उस अवस्था में दन्तक्षत की आवश्यकता पड़ती
है। जिन स्थानों पर चुम्बन किया जाता है, उन्हीं मांसल स्थानों
को ओठ और दाँतों में पकड़ कर जोर से दबाते हैं। यह क्रिया
दोनों की ओर से समान ही होती है। कभी-कभी दाँतों का निशान
बहुत गहरा हो जाता है। जो कई दिन तक बना रहता है। उसको
देखकर उन्हें रति-सुख का स्मरण हो आता है। यह क्रिया भी
रति उत्पन्न करने में परम सहायिका है।
गूढक दन्तक्षत
रागैःकलिङ्गमधरे किल गूढकं स्यादुच्छूनकं-
दशनवाससि वामगण्डे।
स्यात्पीडनात्तदधरोष्ठबिशेषयोगात्,
तत्र प्रवालामणिरभ्यसनेन साध्यः ॥
रमणी के अधर पर दाँत का चिन्ह मात्र कर देने को गूढ़क
दन्तक्षत कहते हैं। यह चिन्ह इतना स्वल्प होता है, कि जिसका
दर्शन ध्यान देने से ही हो सकता है। यथार्थतः ऐसा ही दन्तदशन
प्रशंसनीय समझा गया है।
असली कोकशास्त्र १३३
उच्छूनक दन्तक्षत
यह भी गूढ़क के समान ही होता है। किन्तु इसमें विशेषता
केवल इतनी ही होती है कि यह कुछ गूढ़क की अपेक्षा तीव्र होता
है। इसका प्रयोग विशेष काम वृद्धि पर अनायास हो जाता है।
प्रवालमणि दन्तक्षत
यह अधर तथा गालों पर दाँतों की पंक्ति की माला के समान
बन जाता है। इस लिए इसको प्रवालमणि दन्तक्षत कहते हैं।
विन्दु दन्तक्षत
अल्पदेशायाश्चत्वचो दशनद्वयसन्दंशजा विन्दुसिद्धिः
अधर, ओष्ठ के मध्यभाग में तिलमात्र दोनों दाँतों से काटने
पर जो विन्दु बन जाता है, उसको विन्दु दन्तक्षत कहते हैं।
विन्दुमाला दन्तक्षत
विन्दु दशन की भाँति अनेक दाँतों के क्षत विन्दुओं की पंक्ति
को विन्दुमाला दन्तक्षत कहते हैं। इस प्रकार विन्दुमाला, मणि-
माला नाम के दन्तक्षत, वक्षस्थल, कुक्षि और कपोल आदि स्थानों
पर निर्माण किये जाते हैं। प्रायः मांसल स्थान ही इसके लिए
उपयुक्त समझे जाते हैं।
१३४ असली कोकशास्त्र
खण्डाभ्रक दन्तक्षत
खण्डाभ्रकं स्तनतटे दशनाग्रलेख्यं,
स्यान्मण्डलाकृतियुतं विषमैश्च कूटैः ।
ताम्रान्तरा रदनराजिरखर्वसान्द्रा,
स्यात्कोलचर्वितमिदं स्तनपृष्ठभूषा ॥
स्तनों के नीचे ऊपर दाँतों से क्षत किया हुआ गोल आकार
वाला चिन्ह पड़ जाता है। जो मध्य में लाल, आभायुक्त होता है।
वह बिखरी हुई मणिमाला के समान स्थान-स्थान पर दृष्टिगोचर
होता है। उसको खण्डाभ्रक दन्तक्षत कहते हैं।
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