रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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हैं उनका असर परस्पर होने लगता है । शुद्ध वृत्तियाँ शुद्ध भाव
को पैदा करती हैं और काम काज को प्रवृद्ध कर डालती हैं । शुद्ध
वृत्तियों का प्रयोग सन्तान वा बहन भाई आदि के साथ होता है
और काम काज का अपनी भार्या के साथ । इस स्पार्शिका क्रिया का
प्रभाव हाथी पर अधिक देखने में आता है । जब हाथी मस्ताकर
मद-मस्त हो जाता है तब आपे से बाहर होकर सब पर हमला
करने लगता है । हजार प्रयत्न करने पर भी रोकना कठिन हो जाता
है । चतुर पीलवान हथिनी लाकर उसके पास छोड़ देते हैं । हथिनी
की सूँड़ का स्पर्श होते ही वह सब उपद्रव छोड़कर ऐसा शान्त हो
जाता है मानो कुछ हुआ ही नहीं था । इस लिए स्पर्श काम-
संदीपिनी कला का प्रधान शस्त्र है ।
जिन स्त्री-पुरुषों को सामान्य स्पर्श से कामोद्दीपन नहीं होता
अथवा विलम्ब लगता है । उनके लिए चुम्बन का प्रयोग किया
जाता है । यदि इतने पर भी काम जागृत न हो तब दन्त-दशन (दाँतों
से स्थान-स्थान पर काटना ) और नखक्षत का व्यवहार किया
जाता है । किन्हीं-किन्हीं को इन दो प्रयोगों के बिना काम जागता
ही नहीं । बिना काम जागे मैथुन करना मृतक-सम्भोग कहाता है ।
आजकल प्रायः मृत-सम्भोग ही देखा जाता है क्योंकि प्रायः स्त्रियाँ
अतृप्त ही रहती हैं । पुरुष अपने वीर्य का बार-बार दुरुपयोग कर
अपने पुंस्त्व को खो बैठता है और स्त्रियाँ अतृप्त रह जाती हैं ।
यह उपरोक्त आलिंगन उन्हीं स्त्री पुरुषों में विशेष रूप से होते