रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
असली कोकशास्त्र १११
संकोच नष्ट हो जाने पर धीरे-धीरे उसके कटि-भाग से ऊपरि
अंगों का स्पर्श करे । जब वह इतना सहन कर ले और किसी बात
की बाधा उपस्थित न करे तब उसके सिर के बालों को सम्भालता
हुआ उसके मस्तक का चुम्बन करे, और उसके मुख पर हाथ फेरते
हुए उसके कपोल पर कपोल मले । इसी प्रकार धीरे-धीरे अधरोष्ठ
का चुम्बन करे । इतनी क्रिया निर्विघ्न समाप्त होने पर पुरुष को
चाहिए कि वह धीरे-धीरे अपने हाथ से स्त्री के कुचों का मर्दन
करते हुए नाभि-स्थल पर हाथ फेरे । इससे स्त्री को जब रोमांचित
होता हुआ दिखायी दे और उसकी आँखों में झपकी-सी आने लगे
तथा वह अपने शरीर का पूरा बोझ पुरुष पर, छोड़ दे, तब समझ
लेना चाहिए कि अब स्त्री रति योग्य हो गयी ।
प्रथम रात्रि क्रिया में प्रवृत्त होने समय पुरुष को ध्यान रखना
चाहिए कि प्रथम सम्भोग में स्त्री को कष्ट होता है । कभी-कभी
उस कष्ट का परिणाम स्त्री को सदा के लिए सम्भोगेच्छा से ऐसा
निवृत्त करता है कि उसे पति के पास जाने की इच्छा होते हुए भी
भूतपूर्व कष्ट की स्मृति से अनिच्छा उत्पन्न हो जाती है । इस लिए
अत्यन्त सावधानता के साथ स्त्री की शक्ति अनुसार रति-क्रिया
आरम्भ करनी चाहिए। जब स्त्री में कामोद्वेग अत्यन्त बढ़ जाता
है, तब वह मद-विह्वला होकर कष्ट का अनुभव नहीं करती है
पुरुष को उस समय भी बड़ी सावधानी से काम लेना चाहिए
एक बार सम्भोग हो जाने पर फिर स्त्री को उतना कष्ट मालूम न
११२ असली कोकशास्त्र
होता । धीरे-धीरे कष्ट का अभाव हो ही जाता है ।
स्त्री को चाहिए कि वह पुरुष की रुचि की ओर ध्यान दे ।
ऐसे समय में उदासीन रहने से पुरुष के विचारों में भी अन्तर आ
जाता है। स्त्री को वन्ध्या समझ कर अथवा रति के अयोग्य जान
कर उसका मन विरक्त हो जाता है । प्रायः इसी का परिणाम
देखने में आता है कि गृह-पत्नि अत्यन्त सुन्दरी युवती होती हुई
भी पुरुष पर-स्त्री-गामी हो जाता है । स्त्री की यह कमजोरी उसी
की घातिका हो जाती है । फिर हजार चेष्टा करने पर भी एक
सूत्रता नहीं होती । इस लिए स्त्री को चाहिए कि सुन्दर वस्त्र
आभूषण पहन कर, सुगन्धित द्रव्यों से वस्त्रों को सुवासित कर
मनोहर हाव-भाव के साथ पति को अपनाने की चेष्टा करे । वह
इस बात को मन में निश्चय कर ले कि पति को मेरी किसी प्रकार
की कमजोरी दिखाई न दे । पति की इच्छापूर्ति में किसी प्रकार की
त्रुटि न हो । पति को किसी प्रकार की कलह का भाव दिखायी न
दे । अधिक मान या हठ न करे । पति की गति-विधि को समझने
की खूब चेष्टा करे । जो रमणी इन बातों पर विशेष ध्यान रखती
है, उसका पति उसके खिलाफ कभी नहीं होता, वह उसका दास
बन जाता है । उस घर में कभी कलह या मत-भेद नहीं होने पाता ।
———*———
पु
८ असली कोकशास्त्र ११३
सम्भोग गृह
जिस कमरे में सोहागरात का आयोजन किया जाय, वह
हवादार और स्वच्छ होना चाहिए । उसमें हलका और मधुर
प्रकाश हो । वह ऋतु अनुसार वस्तुओं से सुसज्जित होना चाहिए
शूर-वीर, त्यागी महात्माओं के चित्र स्थान-स्थान पर लगे रहने
चाहिएँ । किसी प्रकार के गन्दे चित्र उसमें न होने चाहिएँ । सुन्दर
सुगन्धयुक्त मालाओं से सजा हुआ और सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित
होना चाहिए । उसमें उपयोगी वस्तु से अधिक सामान न होना
चाहिए । दो पलंग, मुलायम बिस्तर से सुसज्जित जलपूर्ण पात्र,
और कुछ खाद्य सामग्री जैसे—मेवा, फल इत्यादि अवश्य रहना
चाहिए, और सम्भोग के पूर्व निम्न बातों का ध्यान रखना परम
आवश्यक है:—
१—जिस रात स्त्री-पुरुष को सम्बन्ध करना हो, उसके पूर्व
उन दोनों को चाहिए कि वे उबटन आदि मलकर खूब अच्छी
प्रकार शीतकाल हो तो किंचित-उष्ण जल और गरमी हो तो खूब
ठण्डे जल से स्नान करें । तत्पश्चात् सुगन्धित वस्तु लेपन करें ।
पुरुष श्वेत वस्त्र धारण करे, और स्त्री हलके रंगीन वस्त्र पहने ।
वस्त्र गहरे रंग से रंगे हुए न होने चाहियें । स्त्री पूर्ण श्रृङ्गार से
अपने-आपको सजाये ।
२—हलका, किन्तु बल-वर्द्धक भोजन करना चाहिए । भूखे
११४ असली कोकशास्त्र
रहना अच्छा नहीं। भोजन करने के पश्चात् कम से कम दो घण्टा
ठहर कर सम्भोग कार्य में संलग्न होना चाहिए। अन्यथा स्वास्थ्य
को हानि पहुँचती है ।
३—किसी प्रकार के परिश्रम से थके हुए स्त्री पुरुष को
कदापि सम्भोग न करना चाहिए ।
सम्भोग काल
१—वसन्त ऋतु सबसे उत्तम ऋतु है । क्योंकि इसमें
स्वभावतः स्त्री पुरुषों में काम जागृत रहता है ।
२—ग्रीष्मऋतु की रात्रि मैथुन के लिए सर्वथा हेय है।
३—वर्षाऋतु में भी स्त्री सम्बन्ध कम करना चाहिए। क्योंकि
उसमें वायु कुपित रहती है ।
४—शरद् ऋतु में यथा रुचि सम्भोग करना चाहिए।
५—जाड़े में रात को, ग्रीष्म में दिन को, वसन्त में हर समय,
और वर्षा में जब बादल उमड़ रहे हों, पानी बरसते समय सम्भोग
करना चाहिए ।
काम संदीपिनी कलाएँ
जब तक स्त्री पुरुष में काम सन्दीप्त नहीं हो जाता, तब तक
रति क्रिया का आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता, और न तो गर्भ
स्थिति हो सकती है। इन कलाओं को जान लेने से कमजोर पुरुष
असली कोकशास्त्र ११५
बलवती स्त्री से तथा कमजोर स्त्री बलवान पुरुष से भी सरलता
पूर्वक तृप्त हो सकती है। इन्हीं कलाओं का विशेष निरूपण काम-
शास्त्र विशारद कोका पण्डित ने निम्न प्रकार किया है ।
स्पृष्टक आलिङ्गन
यद्योषितः संमुखमागताया,
अन्यापदेशाद्व्रजतो नरस्य ।
गात्रेण गात्रं घटते रतज्ञा,
आलिङ्गनं स्पृष्टकमेतदाह ॥
जब तक स्त्री पुरुष आपस में अपरिचित होते हैं और संकोच-
वश एक दूसरे से विशेष बातचीत नहीं कर पाते, उस समय घर
के किसी एकान्त स्थान में भेंट हो जाने पर एक दूसरे की देह को
किसी बहाने से स्पर्श करें, उस मुलायम स्पर्श को स्पृष्टक आलिंगन
कहते हैं ।
बिद्धक आलिङ्गन
यद्गृह्णती किश्चन वांचिताक्षं,
स्थितोपविष्टं पुरुषं स्तनाभ्याम् ।
नितम्बिनी विध्यति तां च गाढं,
गृह्णात्यसौ विद्धकमुच्यते तत् ॥
स्त्री पुरुषों के कुछ विशेष परिचित हो जाने पर दूसरों की
११६ असली कोकशास्त्र
नजर बचाकर एकान्त में बैठी हुई स्त्री के स्तनों का मर्दन या
बगल आदि में गुदगुदा देना अथवा एकान्त में बैठे पुरुष को स्त्री
का गोदना या अपने स्तनों का उसके शरीर पर मर्दन करना
विद्धक आलिंगन कहाता है ।
पीडित आलिङ्गन
यात्रोत्सवादौ तिमिरे घने वा,
यदृच्छतः स्याच्चिरमङ्गसङ्गः ।
उद्घृष्टकं तत्पुनरेव कुड्ये,
निपीडनात्पीडितसंज्ञकं स्यात् ॥
प्रकाश में अथवा घने अन्धकार में किसी विशेष बात को देख
कर एक दूसरे के किसी अंग को दबाना या मसलना उद्घृष्ट
आलिंगन कहाता है और यदि हलका धक्का देकर फिर उसे खींचकर
आलिंगन किया जाय तो उसे पीडित आलिंगन कहते हैं ।
कामादीपिका प्रधान कला
मनसिज को जगाने वाली प्रधान कला स्पर्शिका ही है ।
जिसके आलिंगन चुम्बन दन्त-दशन, और नखक्षत आदि अनेक
भेद हैं । जिनका दिग्दर्शन आगे किया जायगा ।
आलिंगन से दो शरीरों का संघर्ष होने पर दोनों में विद्युत
प्रवाह दौड़ने लगता है । उस प्रवाह में मानसिक वृत्तियों का भी
संचार होने लगता है । उन वृत्तियों में जैसे मानसिक विचार होते
असली कोकशास्त्र १०७
हैं उनका असर परस्पर होने लगता है । शुद्ध वृत्तियाँ शुद्ध भाव
को पैदा करती हैं और काम काज को प्रवृद्ध कर डालती हैं । शुद्ध
वृत्तियों का प्रयोग सन्तान वा बहन भाई आदि के साथ होता है
और काम काज का अपनी भार्या के साथ । इस स्पार्शिका क्रिया का
प्रभाव हाथी पर अधिक देखने में आता है । जब हाथी मस्ताकर
मद-मस्त हो जाता है तब आपे से बाहर होकर सब पर हमला
करने लगता है । हजार प्रयत्न करने पर भी रोकना कठिन हो जाता
है । चतुर पीलवान हथिनी लाकर उसके पास छोड़ देते हैं । हथिनी
की सूँड़ का स्पर्श होते ही वह सब उपद्रव छोड़कर ऐसा शान्त हो
जाता है मानो कुछ हुआ ही नहीं था । इस लिए स्पर्श काम-
संदीपिनी कला का प्रधान शस्त्र है ।
जिन स्त्री-पुरुषों को सामान्य स्पर्श से कामोद्दीपन नहीं होता
अथवा विलम्ब लगता है । उनके लिए चुम्बन का प्रयोग किया
जाता है । यदि इतने पर भी काम जागृत न हो तब दन्त-दशन (दाँतों
से स्थान-स्थान पर काटना ) और नखक्षत का व्यवहार किया
जाता है । किन्हीं-किन्हीं को इन दो प्रयोगों के बिना काम जागता
ही नहीं । बिना काम जागे मैथुन करना मृतक-सम्भोग कहाता है ।
आजकल प्रायः मृत-सम्भोग ही देखा जाता है क्योंकि प्रायः स्त्रियाँ
अतृप्त ही रहती हैं । पुरुष अपने वीर्य का बार-बार दुरुपयोग कर
अपने पुंस्त्व को खो बैठता है और स्त्रियाँ अतृप्त रह जाती हैं ।
यह उपरोक्त आलिंगन उन्हीं स्त्री पुरुषों में विशेष रूप से होते
११८ असली कोकशास्त्र
हैं, जिनमें परस्पर सम्भोग होकर घिशेष परिचिति हो जाती है
इनसे विशेष परस्पर प्रेम की वृद्धि और संकोच भाव की कभी हो
जाती है इस प्रकार जब दोनों की झिझक दूर हो जाती है, तब
लतावेष्टितादि आलिंगन किये जाते हैं।
लतावेष्टित आलिंगन
प्रियमनुकृतवल्लीविभ्रमा वेष्टयन्ती,
द्रुममिव सरलांगी मन्दसीत्का तदीयम् ।
वदनमुदितखे ताक्रन्दमाचुम्बनार्थे,
नमयति विनमन्ती तल्लताबेष्टितं स्यात् ॥
जिस प्रकार एक पेड़ को लता लपेटती हुई ऊपर चढ़ जाती है
उसी प्रकार अपने पैरों से खड़े हुए पुरुष को जंघाओं को और
बाहों से बगल तथा कण्ठ को लपेट कर सीत्कार करती हुई पति के
मुख के सम्मुख अपना मुख चुम्बन के लिये झुका देती है उसको
लतावेष्टित आलिंगन कहते हैं।
वृक्षादि रूढ आलिंगन
स्थितपतिमधिकृत्य प्रोक्तमाश्लेष युग्म
असली कोकशास्त्र ११६
यह भी लतावेष्टित के समान ही आलिंगन होता है; किन्तु
अन्तर इतना ही है कि कामोद्वेग में स्त्री अपने पैर से पुरुष के
एक पैर को दबाकर दूसरे पैर से उसकी जंघाओं को लपेटती हुई,
अपनी भुजा को पति के कक्ष भाग से कन्धे को पकड़ कर ऊपर की
ओर उठती हुई पति का चुम्बन करती है, इसको वृक्षादि रूढ़
आलिंगन कहते हैं ।
तिलतण्डुल आलिंगन
असकृदपि विगाढाश्लेषलीलां वितन्वन्,
जनितजघनबाहुव्यत्ययंस्पर्धयेव ।
मिथुनमथ मिथोऽङ्गे लीयते निस्तरंगं,
निगदति तिलपूर्वं तण्डुलं तन्मुनीन्द्रः ॥
यह आलिंगन लेटकर और खड़े होकर दोनों प्रकार से होता
है इसकी क्रिया प्रायः लतावेष्टित या वृक्षादिरूढ़ के समान ही
होती है। इसमें केवल अन्तर इतना ही है कि वे दोनों आलिंगन
मुख चुम्बन मात्र के लिये किये जाते हैं, और यह प्रत्येक अंग को
जोर से दबाकर एक रूपता लाने के लिए किया जाता है इससे
सम्पूर्ण शरीर में रति की जागृति हो जाती है। इस लिए इसको
तिल तण्डुल आलिंगन कहते हैं ।
१२० असली कोकशास्त्र
क्षीरनीरालिंगन
अभिमुखमुपविष्टा योषिदंकेऽथ तल्पे,
रुचिररुचिरगाढालिंगनो वल्लभश्च ।
प्रसरदसम गावेशनश्यद्विचारौ,
विशत इव मिथोऽङ्गे क्षीरनीरं तदाहूः ॥
वही तिल तण्डुल आलिंगन करते हुए जब स्त्री पुरुष काम
पीड़ित होकर अपने आपको भूल जाते हैं अर्थात् जिस प्रकार दुध
और जल एक होकर भेद-भाव को मिटा देता है, उसी प्रकार स्त्री
पुरुष का अपनी अवस्था के भेद को भूल जाने से यह क्षीरनीरा-
लिंगन कहाता है।
उरुपगूढालिंगन
तत्रोरुसंदंशेनैकमूरूमूरुद्वयं वा सर्वप्राणं-
पीडयेदित्यूरूपगूढनम् ॥
काम-पीड़िता अबला की जंघाओं को अपनी जंघाओं में दबा-
कर जो पीड़न-क्रिया किया जाता है, उसको ऊरूपगूढ़ालिंगन कहते
हैं। यह आलिंगन आमने-सामने करवट लेते हुए स्त्री-पुरुषों में
किया जाता है। इससे मांसल भाग दबने से बहुत आनन्द
मालूम होता है।
असली कोकशास्त्र
चित्र नं० २, ३
वृषभ पुरुष मृग पुरुष
इस पृष्ठ पर कोई लिखित या मुद्रित पाठ (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है। यह एक सादा/रिक्त (blank) पुराना पृष्ठ है, जिस पर केवल समय के साथ पड़े दाग-धब्बे (foxing/aging marks) ही दिखाई दे रहे हैं।
असली कोकशास्त्र १२१
जघनोपगूहन आलिंगन
जो स्त्री अपने बालों को फैलाकर अपनी जंघाओं के उभरे हुए
भाग से पुरुष की जंघा को दबाती है, नखक्षत, दन्तक्षत और चुम्बन
करती हुई ग्रहण करती है उसको जघनोपगूहन आलिंगन कहते हैं।
यह आलिंगन स्त्री के बढ़े हुए कामोद्वेग का सूचक है। जो पुरुष के
मन्द कामोद्वेग को तीव्र करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
लालाटिक आलिंगन
जब स्त्री पति की छाती में लिपट कर स्तनों का स्पर्श करती
है, और मुख से मुख, आँख से आँख लड़ाकर मस्तक से मस्तक
रगड़ती है तब उसको लालाटिक आलिंगन कहते हैं। यह प्रायः
अकस्मात लेटे हुए पति के साथ किया जाता है। यह भी स्त्री में
कामोद्वेग का सूचक होता है।
चुम्बन
यह भी सुरत जगाने में परम सहायक है। नायक या नायिका
से जब चुम्बन किया जाता है, तब चुम्बन करने वाले में पहले
कामोद्वेग उत्पन्न होता है। इसका आरम्भ आलिंगन के बाद ही
होता है। यथार्थतः यह आलिंगन का एक भेद-मात्र है। प्रथम
चुम्बन मस्तक और फिर गण्डस्थल तथा अन्य स्थलों पर होता
१२२ असली कोकशास्त्र
हुआ मुख चुम्बन तक आ पहुँचता है । उसके भेद क्रमशः नीचे
लिखे जाते हैं ।
निमित्तक चुम्बन
बलात्कारेण नियुक्ता मुखे मुखमाधत्ते-
न तु विचेष्टत इति निमित्तकम् ॥
नव-वधू को आग्रह पूर्वक जब पुरुष चूमने के लिये उसके
कपोलों पर मुख रख देता है, किन्तु वह संकोचवश कुछ चेष्टा नहीं
करती तो उस चुम्बन को निमित्तक चुम्बन समझना चाहिए । यह
चुम्बन सुहागरात को किया जाता है ।
स्फुरितक चुम्बन
वदने प्रवेशितं चौष्ठं मनागपत्रपाऽनुग्रहीतुमिच्छन्ती ।
स्पन्दयति स्वमोष्ठं नो नरमुत्सहते इति स्फुरितकम् ॥
नवोढ़ा स्त्री के अधरोष्ठ पर जब उसका पति अपने ओष्ठ रख
देता है, और वह उसके प्रत्युत्तर में चूमने की इच्छा करती हुई
लज्जावश केवल ओष्ठ हिलाकर रह जाती है, अथवा उद्वेग भाव से
ओष्ठ काँप जाते हैं, तब उस चुम्बन को स्फुरितक चुम्बन कहते हैं ।
घट्टितक चुम्बन
पत्नी पती के मुख पर रक्खे हुए ओष्ठ को कुछ पकड़ कर
२. परिच्छेद ५-८: चान्द्र-कला, मदन-स्थान, आलिङ्गन, चुम्बन एवं काम-उद्दीपन
असली कोकशास्त्र १२३
अपनी आँख बन्द करती हुई और पति की आँखों को भी अपने
हाथों से ढाँप कर पति के ओठ को अपनी जिह्वा के अग्रभाग से
धीरे-धीरे रगड़ती है, इस लिए उसको घट्टितक चुम्बन कहते हैं ।
सम चुम्बन
जब पति-पत्नि परस्पर एक दूसरे के चुम्बन का जवाब चुम्बन
में यथास्थान देते हैं, उस चुम्बन को सम चुम्बन कहते हैं ।
तिर्यक चुम्बन
पति-पत्नि अपने मुख को कुछ टेढ़ा करके जब परस्पर मुख का
चुम्बन करते हैं, तब उसे तिर्यक चुम्बन कहते हैं । यह चुम्बन
किसी वाटिका में बेंच या घास पर पाँव फैलाकर बैठे हुए किया
जाता है ।
उद्भ्रान्त चुम्बन
नायक या नायिका जब किसी एकान्त स्थान में बैठी हो, तब
उनमें से एक बैठे हुए के पृष्ठ भाग से आकर अपने दाहिने हाथ से
ठुड्डी को और बायें से सिर को पकड़ और अपनी ओर घुमाकर
जो चुम्बन किया जाता है उसको उद्भ्रान्त चुम्बन कहते हैं ।
अवपीडितक चुम्बन
यह चुम्बन दो प्रकार का है । पहला पति-पत्नी परस्पर एक
दूसरे के ओठों को ओठों में दबाकर चुम्बन करते हैं, उसको अव-
१२४ असली कोकशास्त्र
पीड़ितक चुम्बन कहते हैं। दूसरा पत्नी के अधरोष्ठ को अंगुलियों
में पकड़ कर पति अपने ओष्ठों से खूब पीड़ित करे, किन्तु दाँत न
लगने दे । इसे भी अवपीडितक चुम्बन कहते हैं ।
उत्तर चुम्बन
जिस भाँति पति जिस स्थान का चुम्बन करे ठीक उसी प्रकार
पत्नी का उस स्थान का चुम्बन करना उत्तर चुम्बन कहाता है ।
इस चुम्बन का आरम्भ दोनों ओर से हो सकता है ।
प्रातिबोध चुम्बन
यदि सुचिरसमेतः प्रेयसीमग्रसुप्तां,
रहसि कृतकनिद्रां चुम्बति प्राणनाथः ।
कथितविधमिदं स्याच्चुम्बनं प्रातिबोधं,
द्वयमिदमपरं स्याच्चुम्बनं छायिकाख्यम् ॥
पति के घर पर देर से लौटने पर सोई हुई अथवा सोने के
बहाने से लेटी हुई पत्नी का एकान्त में किया हुआ चुम्बन प्राति-
बोध चुम्बन कहाता है । इस प्रकार का चुम्बन दोनों ओर से किया
जा सकता है ।
छायातथा संक्रान्ति चुम्बन
अभिनवमनुरागं व्यञ्जितुं दर्पणादौ,
प्रतिकृतिविषयं वा चुम्बनं पुंस्त्रियोः स्यात् ।
असली कोकशास्त्र १२५
प्रतिकृतिशिशुचित्राश्लेषणं चुम्बनं वा,
द्वयमुपहितभावं तच्च संक्रान्तमाहुः ॥
दर्पण आदि में प्रतिबिम्ब को देखकर, चित्रों या बालक
बालिकाओं को प्रतिनिधि मानकर जो चुम्बन किया जाता है उसे
छाया चुम्बन और संक्रान्त चुम्बन कहते हैं । ये चुम्बन अत्यन्त
मुग्ध अवस्था में किये जाते हैं ।
चुम्बन द्यूत
यह चुम्बन हार जीत की नियत से किया जाता है । इससे
दम्पति में प्रेम की वृद्धि होती है । इसमें पत्नी की हार ही शोभा
देती है । स्त्री-पुरुषों में से जो कोई ग्रहणक विधि से दूसरे के अधर
ओष्ठ को पकड़ ले उसी की जीत समझी जाती है । इस क्रीड़ा में
अनेक विध छल-कपट से काम लेना पड़ता है । यह अन्य चुम्बनों
की भाँति सीधी-साधी सरल रीति से नहीं किया जाता । जब
पत्नी हार जाती है तब उसकी क्या हालत होती है इसका आचार्य
वर्णन करते हैं—
तत्र जिता सार्धरुदितंकरं विधुनुयात्प्रणुदेद्दशे-
त्परिवर्तयेद्वलादाहृता विवदेत पुनरप्यस्तु पण इति
ब्रूयात्, तत्रापि जिताद्विगुणमाधस्येत् ॥
वह हाथ पाँव को पीटती और सिसकियाँ भरती हुई खिन्न
होकर प्रणयी को धक्का देकर दूर हटाती है और दन्त-दशन या
१२६ असली कोकशास्त्र
नखच्छेद का प्रयोग भी करती है। पुनः पुनः पति से छेड़े जाने पर
फिर चुम्बन द्यूत के लिए तैयार हो जाती है। संयोगवश अथवा
पति उसका मान रखने के लिए उसे जिता देता है। उस अवस्था
का वर्णन आचार्य करते हैं—
विश्रब्धस्य प्रमत्तस्य वाऽधरमवगृह्य दशनान्त-
र्गतमनिर्गमं कृत्वा हसंदुत्क्रोशेत्तर्जयेद्गोदाहयेन्मु-
त्येत्प्रनर्तितभ्रु णा च विचलनयनेन मुखेन विहसन्ती
तानि तानि च ब्रूयादिति चुम्बनद्यू तकलहः॥
अधरोष्ठ को पकड़े हुए हँसती है ओर कहती कि यदि छुड़ाने
की चेष्टा करोगे तो काटे बिना न छोड़ूँगी। उन्मत्त की भाँति
उत्तेजित होकर भ्रुवों को नचाती, नयन मटकाती, तथा व्यंग बाण
बरसाती हुई विनोद भरे तिरस्कार पूर्ण वाक्य बोलती है।
राग संदीपक चुम्बन
काम पीड़िता नारी भोग की अभिलाषा से जब सोते हुए पति
[L16
असली कोकशास्त्र १२७
चलितक चुम्बन
प्रमत्तस्य विवदमानस्य वाऽन्यतोऽभिमुखस्य
सुप्ताभिमुखस्य वा निद्राव्याघातार्थं चलितकम् ॥
उन्मत्त पुरुष स्त्री से विवाद कर रहा हो अथवा अन्य किसी
ओर मन लगाये हुए हो या तन्द्रा से झपकियाँ ले रहा हो । उस
समय उसे सावधान कर अपनी ओर आकृष्ट करने के लिये जो
स्त्री से चुम्बन किया जाता है उसे चलितक चुम्बन कहते हैं ।
उपरोक्त किसी प्रकार विक्षिप्त पति को काम चेष्टार्थ आह्वाहन करने
के लिये पत्नी को चाहिए कि वह ऊपर कहे साधारण चुम्बन का
अवलम्बन करे ।
प्रातिबोधित चुम्बन
चिरात्रादागतस्य शयनसुप्तायाः
स्वाभिप्रायचुम्बनं प्रातिबोधिकम् ।
रात्रि को देर करके घर आने पर, सोयी हुई स्त्री को जगाने
की इच्छा से जो चुम्बन किया जाता है उसे प्रातिबोधित चुम्बन
कहते हैं । इस प्रकार मृदु उपचार से जगाने पर स्त्री को किसी
प्रकार का कष्ट नहीं होता ओर वह पुरुष के अभिप्राय को समझ
जाती है । तथा स्त्री को इस बात का अभिमान होता है कि पति
उससे प्रेम करता है ।
१२८ असली कोकशास्त्र
समौष्ठ चुम्बन
पति के दोनों ओष्ठों को पत्नि अपने ओष्ठों में दबाकर जब
उस पर जिह्वा घर्षण करती है, उसको समौष्ठ चुम्बन कहते हैं।
यह पंचशायक का कथन है।
नखक्षत
यह प्रयोग भी कामाग्नि प्रज्ज्वलिका करने के लिए ही काम में
लाया जाता है। जिन स्त्री पुरुषों की स्पार्शन शक्ति कमजोर होती
है, और उनमें कामोद्वेग की उत्पत्ति नहीं हो पाती, उनमें नखच्छेद
से ही रति का आविर्भाव हो आता है अथवा जिस समय स्त्री पुरुष
अत्यन्त उन्मत्त होकर अपने आपको भूल से जाते हैं, उस समय
इसके प्रयोग से विषय-जनित आनन्द उत्पन्न किया जाता है।
इसका प्रयोग इस समय प्रायः लुप्त-सा हो गया है, इस कारण
रति के एक अंग की हानि ही समझनी चाहिए। इसके अभाव से
स्पार्शन शक्ति विहीन नर-नारियों की तृप्ति नहीं हो पाती। और
उन्मत्त नारि की भी वही दशा होती है, इस लिए इस कला का
जानना अत्यन्त उपयोगी है। जिसका दिग्दर्शन आचार्यों ने जिस
प्रकार किया है। नीचे दिया जाता है।
आच्छुरित नखच्छेद
प्रयोज्यायाश्च तस्याङ्गसंवाहने शिरसः कण्डूयने
पिटकभेदने व्याकुलीकरणे भीषणे च प्रयोगः ॥