रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र १११
संकोच नष्ट हो जाने पर धीरे-धीरे उसके कटि-भाग से ऊपरि
अंगों का स्पर्श करे । जब वह इतना सहन कर ले और किसी बात
की बाधा उपस्थित न करे तब उसके सिर के बालों को सम्भालता
हुआ उसके मस्तक का चुम्बन करे, और उसके मुख पर हाथ फेरते
हुए उसके कपोल पर कपोल मले । इसी प्रकार धीरे-धीरे अधरोष्ठ
का चुम्बन करे । इतनी क्रिया निर्विघ्न समाप्त होने पर पुरुष को
चाहिए कि वह धीरे-धीरे अपने हाथ से स्त्री के कुचों का मर्दन
करते हुए नाभि-स्थल पर हाथ फेरे । इससे स्त्री को जब रोमांचित
होता हुआ दिखायी दे और उसकी आँखों में झपकी-सी आने लगे
तथा वह अपने शरीर का पूरा बोझ पुरुष पर, छोड़ दे, तब समझ
लेना चाहिए कि अब स्त्री रति योग्य हो गयी ।
प्रथम रात्रि क्रिया में प्रवृत्त होने समय पुरुष को ध्यान रखना
चाहिए कि प्रथम सम्भोग में स्त्री को कष्ट होता है । कभी-कभी
उस कष्ट का परिणाम स्त्री को सदा के लिए सम्भोगेच्छा से ऐसा
निवृत्त करता है कि उसे पति के पास जाने की इच्छा होते हुए भी
भूतपूर्व कष्ट की स्मृति से अनिच्छा उत्पन्न हो जाती है । इस लिए
अत्यन्त सावधानता के साथ स्त्री की शक्ति अनुसार रति-क्रिया
आरम्भ करनी चाहिए। जब स्त्री में कामोद्वेग अत्यन्त बढ़ जाता
है, तब वह मद-विह्वला होकर कष्ट का अनुभव नहीं करती है
पुरुष को उस समय भी बड़ी सावधानी से काम लेना चाहिए
एक बार सम्भोग हो जाने पर फिर स्त्री को उतना कष्ट मालूम न