रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
१७८ रंगनाथ रामायण
मन-ही-मन हर्षित हुए और हनुमान् की प्रशंसा करने लगे । तत्पश्चात् एक पुण्य मुहूर्त्त म
अपने अनुज के साथ वे हनुमान् के कंवों पर बैठकर ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचकर अत्यत
हर्षित हुए । हनुमान ने उन्हें किसी निर्जन स्थान में ठहरा दिया और मलयाद्रि पर पहुँचकर,
श्रीराम के दर्शनों के लिए उत्कंठित सुग्रीव को देखकर कहा—'हे देव, तुम्हारी इच्छा पूर्ण हुई ।
राम और लक्ष्मण ऋष्यमूक पर आ गये । तुम अब चलो । तब सूर्यपुत्र ने आनंद से
फूलकर मनुष्य-रूप धारण किया । मुकुट, केयूर आदि आभूषणों से सुसज्जित होकर अपने
मंत्रियों के साथ शीघ्र ही ऋष्यमूक पर जा पहुँचा । वह बड़ी भक्ति के साथ राम के
सामने पहुँचा और साष्टांग प्रणाम करके संतुष्ट होकर, हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़ा
रहा ।
तब राम ने सुग्रीव को गले से लगाया और मद हास की अमृत-वृष्टि करते हुए
वे सुग्रीव से बोले—'हे सूर्यपुत्र, में वायु-पुत्र के मुख से तुम्हारे पराक्रम, बाहुबल आदि को
सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुआ । अब तुम भयभीत मत होओ । तुम पर आक्रमण करनेवाल
तुम्हारे - शत्रु का संहार मैं करूँगा । अब तुम्हारे सिवा मेरा आप्तबंधु और विश्वास-
पात्र मित्र दूसरा कौन है ?'
इस प्रकार सांत्वना देने पर सूर्यनंदन ने कहा—'हे देव, आपने मुझे अपना प्रिय
सेवक स्वीकार किया है, आपकी करुणापूर्ण दृष्टिमात्र से में धन्य हुआ । हे सूर्य-कुल-नाथ,
मेरे जैसा सेवक आपको मिल गया है, अब आप निश्चय जानिए कि आपने रावण का वध
करके सीता को प्राप्त कर लिया । तब राम तथा सुग्रीव अग्नि के समक्ष परस्पर (एक
दूसरे की सहायता करने का) वचन देकर संतुष्ट हुए ।
उस समय अंगद ने, जो क्रीड़ा करने योग्य आयु का था, और जो विनोदार्थ वहीं
पर विचरण करते हुए खेल रहा था, राम तथा सुग्रीव के अग्नि-समक्ष दिये हुए वचनों को
सुन लिया । उसने घर जाकर अपनी माता तारा से सभी बातें कह सुनाईं । वह मन-ही-
मन अत्यंत दुःखी होती हुई कितनी ही दुःशंकाओं से पीड़ित हो उठी ।
४. सुग्रीव का सीता के आभूषणों को देना
तब वायुपुत्र ने एक विशाल वृक्ष की शाखा को तोड़कर, सुग्रीव तथा राघव के
लिए एक आसन बनाया । उस पर बैठकर वे दोनों वार्तालाप करने लगे । कुछ समय के
पश्चात् सूर्यपुत्र दोनों राजकुमारों को गुफा के भीतर ले गया और बड़े प्रेम से उन सभी
आभूषणों को लाकर दिखाया, जिन्हें सीता ने फेंका था । उसने कहा—'हे देव, जिस समय
राक्षस दण्डकवन में आपको धोखा देकर, आपकी देवी को आकाश-मार्ग से उठाकर लिये
जा रहा था, उन्होंने (सीता ने) हमें इस पहाड़ पर देखकर, ऊँचे स्वर में आपका नाम
लेकर पुकारा और अपने झीने अंचल का एक भाग फाड़कर इन आभूषणों को बाँधा और
उन्हें यहाँ गिरा दिया ।'
इतना कहते ही राम शोक-सागर में डूब गये और अश्रुधारा बहाकर उन आभूषणों
का सारा मैल धो दिया । उन्होंने उन आभरणों को अपने वक्ष पर जहाँ-तहाँ रखकर देखा।
सीता का स्मरण आते ही उनके सभी अंग शिथिल-से हो गये । उन्होंने लड़खड़ाते हुए
स्वर में लक्ष्मण को बुलाकर कहा—'लक्ष्मण, देखा तुमने ? सीता के सभी श्रृंगार इस
प्रकार मिट्टी में मिल गये हैं । भला, आभूषणों को गिरा देने का क्या अर्थ है ? इनको
साथ रखने में उसे क्या कष्ट होता ? सीता तो मेरी प्राणेश्वरी है । हाय, इस अंचल की
दशा को तो देखो ! जो भीना अंचल उसके सुडौल कुचों पर सतत रहता था, उसकी ऐसी
दशा हुई ! मेरे चरणों को गुलाबजल से धोकर, उन्हें इसी से वह पोछती थी । इसे
विजन बनाकर, अत्यन्त सुंदर ढंग से मेरे श्रम-बिंदुओं को सुखा देती थी । अपनी प्रभा-
समन्वित तनुलता की कांति बिखेरती हुई वह इसी के पाँवड़े बिछा देती थी ।' इस प्रकार
शोक करते हुए राम अश्रु बहाने तथा बार-बार मूर्च्छित होने लगे । फिर संभलकर भक्ति
के साथ सिर झुकाये खड़े सुग्रीव को देखकर रघुनाथ बोले—'हे सुग्रीव, बतलाओ कि मेरी
देवी को लेकर आनेवाला वह इन्द्र का शत्रु किस देश में रहता है ? उसका नगर कौन-सा है ?
मैं अभी उस राक्षस का संहार करके सीता को छुड़ा लाऊँगा ।'
यह सुनकर सुग्रीव बोला—'हे देव, मैं उस द्रोही का निवास नहीं जानता । फिर
भी कोई चिंता नहीं । अब मैं सब बातें जानने का प्रयत्न करूँगा । आप शोक त्यागकर
धैर्य धारण कीजिए । अत्यंत पराक्रमी वालि के द्वारा अपनी पत्नी के हरे जाने पर भी
मैं इतना दुखी नहीं हूँ । हे देव, विपत्ति-रूपी सागर को आत्मधैर्य-रूपी नौका से ही पार
किया जा सकता है । हे प्रभो, हम जैसे साधारण मानवों की तरह आप भी शोक करें,
यह कहाँ उचित है ?'
सुग्रीव के आप्त वचन सुनकर रघुवीर धैर्य धारण करते हुए सोचने लगे—'सीता के
खो जाने का ढंग जानने के पश्चात् मन-ही-मन दुखी होते रहना शूरता नहीं है । यों सोचकर
उन्होंने संताप त्याग कर सीता को किसी भी प्रकार प्राप्त करने के कार्य में प्रवृत्त होने
का निश्चय किया । किन्तु उसके पूर्व उन्होंने सुग्रीव के शत्रु का अंत करने का निश्चय
किया । सीता के आभूषण लक्ष्मण को सौंपकर वे सुग्रीव को देखकर बोले—'हे मित्र,
विद्वानों का कहना है कि विपत्ति के समय मित्र के समान कोई सहायक नहीं होते । चाहे
मित्र गुणवान् हो, या गुणहीन, विपत्ति के समय वही सहायक होता है । तुम्हारी मित्रता
प्राप्त करके मुझे किसी भी वस्तु के अभाव की चिंता नहीं रही, यह तो निश्चित है ।
अब मैं उस पापी वालि का वध करूँगा, जो तुम्हारी स्त्री का अपहरण करके तुम्हारा वध
करना चाहता है । भाइयो में स्नेह का भाव हो, तो उससे श्रेष्ठ सुख और कुछ नहीं है ।
किन्तु ऐसा स्नेह तुम में क्यों नहीं रह पाया ? तुम्हारे और तुम्हारे अग्रज में शत्रुता
क्यों हुई ? इसका वृत्तांत मुझे सुनाओ ।'
तब सुग्रीव ने कहा—'हे राम, मैं अपने और वालि की शत्रुता का वृत्तांत सुनाता हूँ,
सुनिए । (समुद्र-मंथन के समय) मंद्राचल को मथानी बनाकर, वासुकि को नेती बनाकर
जब देवताओं ने हमारे बाहुबल को जानकर हमसे प्रार्थना की, तब मैं और वालि, दोनों
मंथन के लिए एक ओर खड़े हो गये और दूसरी ओर देवता, गरुड़, उरग, असुर, सिद्ध
आदि थे । इस प्रकार जब हम क्षीरसागर का मंथन करने लगे, तब उसमें से हलाहल
निकलकर समस्त लोक को जलाने लगा, तो महादेव ने सबको आश्चर्यचकित करते हुए
उसे पी गये । उसके पश्चात् उसमें से ज्येष्ठा देवी का जन्म हुआ, तो उसे कलि
महाराज ने बड़े प्रेम से अपनाया । इसके उपरान्त कितनी ही वस्तुए उसमें से उत्पन्न हुई ।
सब ने अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार उन वस्तुओ को बडे हर्ष से ग्रहण किया । आगे
चलकर ऐरावत, मेष, महिष, मकर, करेणु (हथिनी), हय, वृषभ आदि उस सागर से उत्पन्न हुए,
तो इन्द्रादि दिक्पालो ने बडे हर्ष से उन्हें अपने-अपने वाहनो के रूप में ग्रहण किया ।
महनीय सौभाग्यवती तथा महिमामयी लक्ष्मी का जब जन्म हुआ, तब लक्ष्मीनारायण ने उन पर
आसक्त होकर अपनी पत्नी के रूप में उन्हें ग्रहण किया । तत्पश्चात् चन्द्र तथा देव-
कामिनियो का जन्म हुआ । देवताओ ने उन सुदरियो में से 'तारा' नामक सुदरी को हमें दिया,
तो हमने उसे ग्रहण किया । उसके उपरान्त हमारे मथने पर अमृत का जन्म हुआ ।
देवताओ ने बड़े प्रेम से उस सुधारस को कामधेनु और कल्पवृक्ष के साथ चन्द्र को भी लेकर
अपने निवास-स्थानो में चले गये । हम भी वहाँ से विदा हुए ।
हम अपने निवास को लौटकर बडे आनन्दपूर्वक उस सुदरी के साथ रहने लगे ।
कुछ दिनो के पश्चात् सुषेण की प्रिय पुत्री रुमा के साथ विवाह करके बड़े उत्साह से मै
जीवन व्यतीत करने लगा । मेरे पिता तथा अन्य मत्रियो ने ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण
वालि को वानर-राज्य का अधिपति बना दिया । वालि भी मेरा बडा आदर करते हुए,
राज्य करने लगा और मै भी उसका सेवक बनकर उसे पिता के समान मानते हुए दिन-
रात उसकी सेवा में लगा रहा । इस प्रकार हम परस्पर प्रेम-भाव रखते हुए जीवन व्यतीत
करने लगे ।
एक दिन की बात है कि पुरानी शत्रुता से प्रेरित होकर दुदुभि का पुत्र मायावी
नामक भयंकर राक्षस अर्द्ध-रात्रि के समय किष्किंधा नगर को भयभीत करते हुए आया,
और दुर्वार गर्व मे उसने हमें युद्ध के लिए चुनौती दी । अनुपम शील-सपन्न वालि ने क्रुद्ध
होकर मुझे साथ लेकर युद्ध के लिए निकला । हम दोनो को आक्रमण करने के लिए आते
देखकर वह राक्षस भयभीत होकर भागा और अपनी गुफा में छिप गया । तब वालि ने
मुझसे कहा—'मै इस गर्वोद्धत राक्षस को पकडकर उसका वध करके लौटूँगा, मेरे आने
तक तुम सावधान होकर यहाँ रहो, जिससे अन्य कोई यहाँ प्रवेश न कर पाये । इस प्रकार,
मुझे गुफा के द्वार पर नियुक्त करके वालि ने गुफा में प्रवेश किया । एक वर्ष पर्यन्त गुफा
में घोर युद्ध होता रहा । रक्त उमडकर गुफा के द्वार तक बहने लगा और राक्षस के
हुंकार मुझे सुनाई पडने लगे । तब मैने निश्चय कर लिया कि वालि राक्षस के हाथो मे
मारा गया है । यदि वह जान जाय कि मै यहाँ हूँ, तो वह बाहर आकर मेरा भी वध कर
डालेगा । इस प्रकार सोचकर मै एक पहाडी से उस गुफा का द्वार बद कर दिया और
वालि की तिलोदक-क्रिया करके किष्किंधा लौट आया । मत्रियो ने यह कहकर कि -वालि
की मृत्यु के बाद इस राज्य के अधिकारी तुम ही हो, विवश करके मुझे वानर-राज्य का
राजा अभिषिक्त किया । तब से मै वानरो का चक्रवर्त्ती होकर राज्य करता रहा ।
'हे राजन्, वहाँ वालि मायावी (राक्षस) का सहार करके, मुझे पुकार-पुकार कर,
हार गया । उसके पश्चात् वह द्वार पर मेरे द्वारा स्थापित पहाडी को पदाँघातो से चूर-चूर
किष्किन्धाकांड १८९
करके बाहर निकल आया । मुझे वहां न देखकर वह अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और किष्किन्धा में
प्रवेश किया । मेरे प्रणाम को भी स्वीकार किये बिना वह गरज उठा—‘क्यों रे, तुम्हें
अपना अनुज समझकर तुम पर विश्वास करके मैं शत्रुओं से युद्ध करने गया, तो तुम इस
प्रकार मुझे धोखा देकर मेरे राज्य का अपहरण करके, उसका शासन करने लगे ? क्या
तुम्हारे लिए यह उचित है ? तुम महा पापात्मा हो । तुम्हें मारने से भी कोई दोष नहीं
लगेगा ।'
तब मैंने उसके चरणों पर गिरकर भक्ति तथा विनय के साथ निवेदन किया—
'हे भाई, एक वर्ष तक आप और मायावी युद्ध करते रहे । तब (एक दिन) मैंने गुफा से
रक्त का प्रवाह उसके द्वार तक आते देखा, तो भयभीत तथा मतिभ्रष्ट हो भागकर यहाँ
आया । मुझे देखकर मंत्रियों ने विवश करके मेरा राज्याभिषेक कर दिया । इसके अति-
रिक्त मैं कोई कपट नहीं जानता । आपका आगमन मेरे लिए शुभप्रद है । यह वानर-राज्य
आप पुनः ग्रहण कीजिए । मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि नाते से मैं आपका
भाई हूँ, किन्तु वस्तुतः मैं आपका सेवक तथा पुत्र हूँ । हे करुणानिधि, मुझसे कोई भूल
हो गई हो, तो उसे क्षमा कीजिए ।'
इस प्रकार के वचनों से मैंने बालि की बहुत विनती की, किन्तु उसका क्रोध
पग-पग पर बढ़ता ही गया । मंत्रियों ने भी उसे बहुत समझाया कि अनुज के प्रति इतना
क्रोध उचित नहीं है, किन्तु उसने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया । उसने मेरी पत्नी
रूमा को मुझसे छीन लिया, मेरा राज्य ले लिया और मेरा वध करने के लिए तैयार
हो गया । मैं भयभीत होकर भागने लगा, तो वह मेरा पीछा करने लगा । मैं सारे भूलोक में
शरण ढूंढ़ते हुए भागा और अंत में इस पर्वत पर रहने लगा, क्योंकि बालि इस पर्वत
पर चढ़ नहीं सकता ।'
तब राम ने आश्चर्य से पूछा—‘हे सूर्यपुत्र, इस पर्वत पर बालि क्यों नहीं चढ़
सकता ? इसकी कथा मुझे सुनाओ ।" तब सुग्रीव विनम्र भाव से यों कहने लगा—'पूर्व-
काल में दुंदुभि नामक दुष्ट राक्षस, वरदानों के प्रताप से प्रबल होकर तीन लोकों को
भयभीत करने लगा था । वह जंगली भैंसे का रूप धारण करके समुद्र के पीछे पड़ गया
और उसे युद्ध के लिए चुनौती दी । तब समुद्र व्याकुल हो उठा और करोड़ों रत्नों की
भेंट देकर कहा—'तुम्हारे साथ युद्ध करके श्रेष्ठ हिमाद्रि ही जीवित रह सकता है । मैं
तुम से युद्ध नहीं कर सकता ।' तब वह उस हिमाद्रि से युद्ध करने चला गया, जिसके
शृंगों ने इंद्र के बाहुस्तंभ से सम्मानित वज्रायुध के तेज को भग्न किया था । तब उस
पर्वतेश्वर ने कहा—'क्या मैं तुम्हारी बराबरी कर सकता हूँ ? इस संसार में तुम्हारा
सामना करके, तुम्हारे साथ युद्ध करने का बाहुबल केवल बालि में है । वह अपनी प्रबल
शक्ति के साथ किष्किन्धा पर राज्य कर रहा है । यदि तुम युद्ध करने की इच्छा रखते हो,
तो हे महाबली, वहीं जाओ ।'
तब वह राक्षस बड़े उत्साह से किष्किन्धा आया और प्रलय-काल के बादल के समान
गर्जन करके अपने साथ युद्ध करने के लिए बालि को चुनौती दी । तब बालि क्रुद्ध होकर
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बाहर आया और गर्जन करते हुए दुंदुभि के समान ध्वनि करनेवाले उस दुंदुभि का सामना
करके बोला—'देखूँ अब तुम कहाँ जाते हो ?' इस प्रकार कहकर वालि ने शिलाओ तथा
वृक्षों को उखाड़-उखाड़कर फेंका और मुष्टि के प्रहारो से उसे व्याकुल कर दिया । जब
उसने अपने तीक्ष्ण शृंगो से वालि पर आक्रमण करना आरंभ किया, तब वालि ने क्रुद्ध
होकर, भयंकर रूप धारण करके एक पर्वत उठाकर उस पर फेंका । राक्षस ने उसे बचाकर,
स्वयं एक और पहाड़ उठाकर वालि पर फेंका । तब कपिराज ने एक बहुत बड़ा पर्वत
उस पर फेंका । राक्षस ने अपने सींगों से उन पहाड़ो को हटाते हुए, वालि के कंठ को
पकड़कर ऐसा धक्का दिया कि वालि विचलित हो उठा । तब वालि ने उसका पीछा किया
और एक वृक्ष उखाड़कर उस राक्षस पर फेंका । राक्षस उससे भी बच गया और छिपकर
वालि पर आक्रमण करने लगा । तब वालि ने एक मोटे ताड़ के वृक्ष से उस पर प्रहार
किया । राक्षस ने अपने सींगो से उसे भी उठाकर फेंक दिया, तो कपिराज ने अपनी
कठोर मुष्टिसे उस पर प्रहार करना आरंभ किया । राक्षस भी अपने सींगो से वालि को मारने लगा ।
इस प्रकार एक दूसरे पर प्रहार करते हुए एक सौ वर्ष तक दोनो घोर युद्ध करने लगे ।
तब वालि ने उसके दोनो सींगो को पकड़ कर नीचे गिरा दिया और उसका वध कर डाला ।
उसके पश्चात् उसने अपना सारा बल लगाकर लात मारी, तो उसका शव मुंह तथा
नाक से रक्त बहाते हुए वज्राघात से गिरनेवाले पर्वत की तरह, एक योजन दूर पर
जा गिरा । गेरू रंग के झरने के समान गिरनेवाली उस रक्त-धारा की कुछ बूंदें, इस
पर्वत पर भी गिरी । तब इस पर्वत पर तपस्या में निरत भयंकर शक्तिशाली मतंग मुनि ने
क्रोध में आकर शाप दिया कि वालि इस पर्वत पर न चढ़ सकेगा । हे जगन्नाथ, मैं इसी
कारण से निर्भय हो सतत इस ऋष्यमूक पर ही निवास करता हूँ । हे राजन्, दुंदुभि के
उस शरीर को एक योजन तक फेंक सकने की शक्ति वालि के सिवा और किसी में नही हैं।
यदि आप उस शव को, उससे भी दूर, न फेंक सकें, तो मैं आपकी शक्ति पर विश्वास
नही कर सकता ।'
तब राम ने मंद-मंद हँसकर कहा—'हे सूर्यपुत्र, मैं उस दुंदुभि के शरीर को वैसे ही
फेंककर तुम्हारा संदेह दूर करूँगा । मुझे वह शव दिखाओ । मेरु-मंदराकारवाले उस शव को
सुग्रीव के दिखाने पर, राम उसके पास पहुँचे और उसकी परवाह किये बिना ही, केवल
अपने अंगूठे से उठाकर उसे दस योजन दूर फेंक दिया । तब भी सुग्रीव को रघुराम की
शक्ति के महत्व पर विश्वास नही हुआ । उसने कहा—'हे देव, जब वालि ने इसे फेंका
था तब यह बहुत से रक्त-मांस से भरा था, आज तो केवल इसकी अस्थियाँ रह गईं हैं।
इसलिए आप इसे बड़े वेग से फेंक सके, इसलिए विश्वास नही होता कि आपका
बल वालि से भी अधिक है । इतना ही नही, बिना थके वालि पहाड़ो को गेंदो की तरह
उछाल सकता है; चारो समुद्रो में संध्या-वंदन करता है और शिवजी के चरणो को अपने
सिर पर धारण करता है । वायु से भी अधिक वेग से वह सभी समुद्रो को पार कर
सकता है । ऐसे वालि की, जिसे इन्द्र ने स्वर्ण-माला प्रदान की थी, कौन समता कर
सकता है ? हे राजन्, और एक बात सुनिए । यहाँ जो सात ताल-वृक्ष खड़े है, इन सभी
को बालि अपनी वर-शक्ति से एक साथ अपने हाथो में पकड़कर उनके सभी पत्तो को तोड
सकता है । इन्द्रादि देवता इन में से किसी एक ताल को भी हिला नही सकते । हे वसुधेश,
यदि आप एक बाण से इस सातो ताल-वृक्षो को गिरा सकते है, तो हम विश्वास कर सकते है
कि आपकी शक्ति बालि की शक्ति स भी अधिक है । मातग मुनि ने मुझसे कहा था कि
जो इन सातो ताल-वृक्षो को एक ही बाण से गिराने की शक्ति रखता है, उस व्यक्ति
के हाथो से बालि का नाश होगा ।'
तब राम ने मदहास करके कहा—'हे वनेचरेश्वर, उन ताल-वृक्षो को तुम अवश्य
मुझे दिखाओ । तब निपुण राम ने वज्र-सम अद्वितीय तथा निशित बाण सधान करके
चलाया, तो वह बाण, पृथ्वी पर टेढे-मेढे ढग से खडे उन ताल-वृक्षो को एक साथ ऐसे
काटकर गिरा दिया, मानो रावण की नाडियो को ही काट दिया हो । उसके पश्चात् वह
शर निकट के पर्वत को भी पार करके पृथ्वी में प्रवेश किया और पाताल तक पहुँचकर
किंचित भी अपनी गति मद किये बिना, बडे वेग से रघुराम के तूणीर में वापस आ गया ।
यह देखकर सुग्रीव आश्चर्यचकित हो अत्यधिक आनद में डूब गया और मन-ही-मन यह
सोचकर फूल उठा कि जिन ताल-वृक्षो के मूल सप्त पातालो तक गये थे, जिनके पत्र सप्त
वायुमडलो तक फैले थे, ऐसे तालो को इन्होने एक ही शर से गिरा दिया । अब मेरा सदेह
दूर हो गया । अब अवश्य ही राघव के हाथो वालि का वध होगा । मैं अब वानर-राज्य
पर शासन कर सकूँगा । तब सूर्यवश के प्रभु राम को देखकर सूर्यपुत्र ने हाथ जोडकर
कहा—'हे देव, आपका रूप देखकर मैने आपकी शक्ति की कल्पना नही करके पशु-बुद्धि
का परिचय दिया । मै सूर्यपुत्र हूँ और आप सूर्य-वश-म्भव है । अत मैने आपकी समानता
करने का विचार करने का अपराध किया । आप त्रिलोकीनाथ है । मुझ मूर्ख को अपना
सेवक मानकर मेरे शत्रु का संहार कीजिए और मुझे मेरा राज्य दिलाकर मेरा दुख दूर
कीजिए ।'
५ वालि-सुग्रीव का द्वंद्व-युद्ध
तब राम ने अत्यधिक कृपा-दृष्टि से सुग्रीव को देखकर कहा—'हे सुग्रीव, तुम शीघ्र
ही किष्किंधा को जाओ और वहाँ बालि से युद्ध करते रहो । मैं एक ही वाण से ( वालि
का वध करके) सहज ही तुम्हें राज्य दिला दूँगा । तुम निर्भय होकर जाओ । तब विना
किसी सकोच के तथा अत्यत उत्साह से सुग्रीव ने, नल, नील, हनुमान् तथा बलवान् तार
आदि को साथ लिये युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर किष्किंधा के लिए प्रस्थान किया । राम
तथा लक्ष्मण उसके पीछे-पीछे चले । किष्किंधा के निकट एक वन में प्रवेश करके उन्होने
वहाँ से सुग्रीव को वालि पर आक्रमण करने के लिए भेजा । सुग्रीव शीघ्र किष्किंधा पहुँचा
और नगर के बाहर खडे होकर भयकर गर्जन किया और अपने साथ युद्ध करने के लिए
बालि को चुनौती दी । हाथी का चिघाडना सुनकर जिस प्रकार सिंह क्रोध में आ जाता है,
वैसे क्रुद्ध होकर, शिवजी के चरण-कमलो को प्रणाम करके, रावण के कठो को अपनी
बगल में दबानेवाले वालि ने आकर सुग्रीव का सामना किया । अप्रतिहत पराक्रमी, समान
रूप, समान क्रोध, समान शक्ति तथा समान पराक्रम रखनेवाले दोनो वानर जूझ गये और
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एक दूसरे के घुटनो, जांघो, वक्षो, नाभियो तथा कटि-प्रदेशो को विचित्र ढंग से झुकाकर
इस प्रकार युद्ध करने लगे, जैसे पूर्व तथा पश्चिम के समुद्र आपस में युद्ध करते हो ।
उसी समय राम ने अपने धनुष पर वाण का संधान करके, उसे चलाने के विचार से,
उन दोनो को देखा । किंतु उनके वदन तथा रदन, पूँछ तथा बाहु, उदर तथा अवर, उरु
तथा पार्श्व, कक्ष तथा वक्ष, पैर तथा उँगली, वीक्षण तथा शिक्षण, वेष तथा भाषा, नाक
तथा गाल, सिर तथा स्कंध, पिंडली तथा चरणयुग्म, कर्ण तथा वर्ण, कठ तथा अग, इन
सब को एक समान देखकर, यह निर्णय नही कर सके कि इन दोनो में वालि कौन है
और सुग्रीव कौन ? तब राम ने मन-ही-मन आश्चर्यचकित होकर सोचा कि यदि में
वाण चलाऊँ, तो न जाने इनमें से कौन मृत्यु-मुख को प्राप्त हो जायें । यो सोचकर वे
बिना वाण चलाये ही रह गये ।
युद्ध करते-करते अत्यधिक थक जाने पर भी सुग्रीव ने अपनी सारी शक्ति तथा
निपुणता लगाकर युद्ध किया, किन्तु वालि से परास्त हो गया । वालि की बलिष्ठ मुष्टियो
के आघातो के कारण वह घोघो की थैली के समान हो गया और लबी साँसें लेता हुआ
सोचने लगा—‘हाय रे, राम का विश्वास करके में क्यो आया ? इसका मुझे अच्छा
पुरस्कार मिला । वस, वस, अव अपना रास्ता नापने में ही मेरा कल्याण है।' यो सोचते
हुए वह सुध-बुध खोकर, अपनी पूँछ को कठ में लपेटे हुए, चारो ओर देखते तथा भूलते
हुए ऋष्यमूक पर्वत पर भागा और मन-ही-मन दुःखी होने लगा ।
ठीक इसी समय राम वहाँ पहुँचे । अनन्त विक्रमधाम राम को देखकर सूर्यपुत्र ने
सिर झुकाकर कहा—‘हे राजन्, मैने आपका विश्वास करके अपना असमान बल-विक्रम
दिखाकर वालि से युद्ध किया । किन्तु आपने मेरी उपेक्षा की, मेरी रक्षा नही की, चुप-
चाप देखते ही रह गये । सूर्य-वंश में जन्म लेकर ऐसा अधर्म करना, क्या, आपको शोभा
देता है ? हे देव, आपके सत्य तथा तेज का विश्वास करके मैंने वालि को छेडा । नहीं
तो में कहाँ और वालि कहाँ ? वालि को चुनौती देकर फिर बचकर आना असंभव था ।
शायद किसी पूर्व-पुण्य के फल से बचकर में पूर्ववत् इस पर्वत पर पहुँच सका। आपका विश्वास
करने के कारण शत्रु के हाथो से पराजय और जग-हँसाई मुझे प्राप्त हुई । आपमें दया,
साहस और शक्ति की अधिकता देखकर मैंने आपका विश्वास किया था ।'
इन वचनो को सुनकर राम बोले—'हे सुग्रीव, तुम अपने मन में इतना संदेह क्यो
करते हो ? इसमें मेरा कोई दोष नही है । क्या मैं तुम्हें शत्रु के हाथ में सौंप दूंगा ?
एक बात सुनो । विश्व-विमोहक आकारवाले विख्यात अश्विनीकुमारो के समान तुम्हारी
और वालि की रूप-रेखा समान होने के कारण मैं तुम दोनो में भेद नहीं कर सका और
बाण चलाने में मुझे भय हुआ; क्योकि यह अस्त्र अमोघ है । इसलिए तुम इसे बुरा मत
समझो । इस बार तुम इन गज-पुष्पो की माला पहनकर वालि से युद्ध करो । मैं अवश्य
ही वालि का वध करूँगा । संदेह मत करो, दृढ़ निश्चय से युद्ध के लिए किष्किंधा
के लिए प्रस्थान करो।' यो कहकर उन्होने अपने प्रिय अनुज से गज-पुष्पो की माला मँगवाकर
उसे सुग्रीव के कंठ में पहनाया । तब सुग्रीव नक्षत्रो से घिरे हुए चन्द्र के समान,
वक-पक्तियो से अलकृत सध्या-गगन के समान, शरत्काल के वादलो के साथ विलम्बित मेरु-
पर्वत के समान सुशोभित दीखने लगा ।
तब राम तथा उनके अनुज बडे हर्ष से युद्ध के लिए सन्नद्ध हुए । उसके पश्चात्
वे नल, नील, तारा तथा हनुमान् के साथ सुग्रीव को साथ लिये हुए नदियो, पुष्पो से युक्त
लता-समूहो, पुन्नाग, नारगी, कदली तथा सहकार-वृक्षो से भरे वनो को देखते हुए उज्ज्वल
कैरव, पद्म तथा कह्लारो से शोभायमान, बहु सरोवरों का दर्शन करते हुए, गज, सिंह,
वराह तथा जगली भैसो को देखते हुए, बहुत दूर तक चल और वहाँ अग्नि-सम तेजस्वी
'सप्त जनाह्न' नामक मुनि के आश्रम का दर्शन किया । सुग्रीव के मुँह से उस आश्रम
का महत्त्व सुना । उसके पश्चात् वालि के शासन में रहते हुए ऐश्वर्य से संपन्न किष्किन्धा-
नगर को देखकर सुग्रीव सं वोले--'तुम पूर्ववत् जाकर वालि के साथ युद्ध करो, में अवश्य
वालि का सहार करूँगा ।' यो कहकर उस पुण्यात्मा सुग्रीव को आदर के साथ भेजकर
राम समीप ही एक पेड की आड में खडे हो गये ।
६. तारा का वालि को रोकना
तब सूर्यनदन ने किष्किंधा की सभी गुफाओ को विदीर्ण करते हुए घोर गर्जन किया
और इन्द्र-सुत वालि को अपने साथ युद्ध के लिए ललकारा । वालि अत्यत क्रोधावेश में
आकर सोचने लगा- 'यह एक मर्द की तरह अपने बाहुबल का गर्व कर रहा है । अब
इसका सहन करना उचित नही है, अब में इसका वध कर डालूँगा ।"
इस प्रकार निश्चय करके वह शक्तिशाली तथा जयशील वालि युद्ध के लिए निकला,
तो अपने पति का मार्ग रोककर तारा कहने लगी,--"हे देवेन्द्रनदन, विना सोचे-विचारे आप
सूर्य-पुत्र पंर आक्रमण करने क्यो जा रहे हैं ? अभी-अभी आपसे युद्ध करके वह घायल
होकर भाग गया था । फिर इतना शीघ्र वह कैसे आ गया ? यदि आपसे कही अधिक
बलवान् की सहायता उसे नही मिलती, तो वह कदापि यहाँ नही आता । हे इन्द्र-पुत्र,
यही नही, मैंने अगद से और एक वात सुनी हैं । अपने पिता की आज्ञा क अनुसार दशरथ-
राम वनवास के लिए आये थे । वहाँ दशकंधर (रावण) ने उनकी पत्नी को हर लिया ।
वे और उनके भाई मुनि-वेश में सीता की खोज में ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचे और सुग्रीव
को अपना सेवक स्वीकार करके तुम्हें मारना चाहते है । राघव स्वय विष्णु है, कमलनाभ है,
वैरियो के लिए भयंकर रूप हैं, दयालु हैं, धीर हैं और धनुविद्या के गुरु ह । उनका शत्रु
बनकर उनको जीतना असभव है । आप प्रेम से सूर्य-पुत्र को अपना राज्य देकर, फिर
राम से संधि कर लीजिए । यदि ऐसा नही हो सकता, तो मुनि-वृत्ति ग्रहण करके अपने
प्राणो की रक्षा कीजिए ।"
तारा के इन वचनो को सुनकर वालि अत्यत क्रुद्ध होकर बोला--'मेरी पत्नी होकर
तुम इतनी भयभीत क्यो होती हो ? में अपने बाहुबल से किसी भी बलवान् पुरुष को
युद्ध में जीतकर विजय प्राप्त कर सकता हूँ । मै कभी किसी से पराजित नही होऊँगा ।
जब शत्रु आकर युद्ध के लिए ललकारे, तब अधीर होकर उससे संधि कर लेना वीरों का
धर्म नही है । हे कमलाक्षी, मेरे-जैसे बलवान् के रहते, मुझे स्वीकार नहीं करके, राम ने
२४
१८६ रंगनाथ रामायण
सुग्रीव को अपनाया है। इसलिए जान पड़ता है कि राम नीतिवान् नहीं है। ऐसी दशा में
राम की मित्रता स्वीकार करना मेरे लिए उचित नहीं है। सुग्रीव अनाथ होकर राम का
सेवक बन गया है। मुझे राम की क्या आवश्यकता है। संधि की क्या आवश्यकता है ?
मैं किसी की प्रार्थना क्यों करूँ ? वह महान् पुरुष तथा धर्मात्मा राम, अकारण ही मेरा
वध क्यों करेंगे ? (तुम्हारी) ये बातें सर्वथा असंगत हैं। मैं अभी जाकर अपने भयंकर
वज्र की समता करनेवाली अपने मुष्टि-प्रहारों से सुग्रीव का वध करके आता हूँ।
तुम निश्चिंत रहो।'
इस प्रकार के वचनों से तारा को संतुष्ट कर इन्द्र-पुत्र वालि अपने पराक्रम, शक्ति
तथा साहस के साथ इस ढंग से (युद्ध के लिए) निकला, मानो कर्मपाश के आकर्षण को
टालने की शक्ति उसमें नहीं रही हो। उसने अपने गर्जन से सभी समुद्रों को क्षुब्ध कर
दिया; भू-वलय को कँपा दिया। उसके बाद वह सुग्रीव को डाँटते हुए भयंकर स्वर में
बोला—'मेरे साथ युद्ध में हारकर, लज्जाहीन हो, फिर युद्ध करने आया है ? कोई बात
नहीं। मैं अभी तुझे यम के मुँह की बरी बनाऊँगा। डींगें मारना छोड़कर तू थोड़ी देर
अटल खड़ा रह। मैं युद्ध में अपने मुष्टि-प्रहारों से तेरे प्राण हरण-करूँगा।'
इस प्रकार कहकर वालि ने वज्र का परिहास करनेवाली, अपनी मुष्टि बाँधकर
उससे ऐसा प्रहार किया कि सुग्रीव नीचे गिरकर रक्त उगलने लगा। तुरत वह सँभल
उठा और साहस के साथ खड़े होकर गर्जन किया और तिरस्कारपूर्ण वचनों से इन्द्र-सुत
की निंदा करते हुए कहा—'मैं अब तक तुम्हारी उद्दण्डता केवल इसलिए सहता आ रहा था
कि तुम मेरे भाई हो और पूज्य हो। ऐसी बात नहीं कि मैं तुमसे युद्ध करने से
डरता हूँ। मैं पहले का सुग्रीव नहीं हूँ। सोच-विचार कर मेरे साथ युद्ध करना। हे वालि,
मैं अवश्य अभी तुम्हारा वध कर दूँगा और कपि-राज्य पर अधिकार करूँगा।'
इतना कहकर सुग्रीव ने अत्यधिक क्रोध से एक साल-वृक्ष को उखाड़कर तेजी से
वालि पर फेंका। उसके लगते ही वालि कंपित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और मूच्छित
हो गया। थोड़ी देर के बाद वालि सचेत होकर दुर्वार गर्व और बड़े शौर्य तथा धैर्य के
साथ एक पर्वत उठाकर उस रवि-पुत्र पर इस प्रकार फेंका कि देवता भी आश्चर्यचकित
रह गये। सुग्रीव ने उस पर्वत को अपनी पूँछ से रोक दिया। तब वालि ने सुग्रीव के
पैरों पर प्रहार किया। सुग्रीव ने अपने तेज नखों से वालि का शरीर नोच डाला। वालि ने
उग्र रूप धरकर सुग्रीव पर मुष्टि का प्रहार किया। क्रमशः दोनों अपनी अमित शक्ति
का प्रदर्शन करते हुए एक-दूसरे की शिखाओं को पकड़कर पदाघातों से, नखों से, मुष्टियों से,
एक-दूसरे पर प्रहार करते हुए, गर्जन करते हुए, हुंकार भरते हुए, घोर युद्ध करने
लगे। उनके अंगों से रक्त की धारा बहने लगी। वे अपनी बाहुओं तथा पूँछों को दूसरों की बाहुओं
तथा पूँछों से फँसाकर, परस्पर धक्का देते हुए, फिर दूर हटते हुए, अपना सारा बल
लगाकर परस्पर प्रहार करने लगे। इस प्रकार अत्यंत भयंकर रीति से जब वे लड़ रहे थे,
तब इन्द्र-सुत वालि के आघातों से रवि-पुत्र सुग्रीव बहुत घायल हुआ। वह गर्व खोकर,
व्याकुल और भयभीत हो, अपने ओठों को आर्द्र करते हुए, दीन दृष्टि से चारों ओर देखने लगा।
किष्किन्धाकाण्ड १८७.
७. वालि का संहार
निग्रह तथा अनुग्रह के निधि राम ने जब देखा कि सुग्रीव अब क्लात तथा खिन्न
हो गया है, तब सोचने लगे कि यदि मैं अब वालि का वध नही करूँ, तो वह अवश्य ही
सुग्रीव को मार डालेगा । तब राम ने सप्त समुद्रो तथा सप्त लोको को क्षुब्ध करते और
समस्त भूतो को कँपाते हुए, अपने धनुष का टकार किया, वालि को तृणवत् मानकर, लक्ष्य
को साधा, और एक अमोघ अस्त्र का सधान करके उसे उस असमान बलशाली वालि पर
चलाया । तब वह वाण अपनी सूर्य-तेज सदृश काति को सारे आकाश-मडल में विकीर्ण
करने तथा भयकर अग्नि-शिखाओ को फैलाते हुए, गरुड, उरग, अमर, गधर्वो को भयभीत
करते हुए ऐसे वेग से चला, मानो अपने पुत्र की रक्षा करने तथा शत्रु को दण्ड देने के लिए
सूर्य ही अस्त्र के रूप में जा रहा हो, अथवा सूर्य-पुत्र होने के कारण यम धर्मराज ने ही
अपने अनुज सुग्रीव की रक्षा करने के लिए, अपना काल-दड वालि पर चलाया हो । वह
वाण सीधे जाकर वालि के उर में लगा । वालि पृथ्वी पर ऐसे गिरा कि दिग्गजो, पर्वतो
तथा वृक्षो के साथ पृथ्वी काँप उठी । वह वाण वालि के उर के पार निकलकर पृथ्वी में
धँस गया । अविरल बहनेवाली रक्त की धाराओ से वानरेश्वर का सारा शरीर भीग
गया और वह इस प्रकार पृथ्वी पर गिरा, मानो पुष्पित अशोक-वृक्ष आँधी में गिर गया हो,
अथवा प्रलय-काल में कातिहीन होकर पृथ्वी पर गिरा हुआ सूर्य हो । तब पृथ्वी पर
विवश पडे हुए उस वालि के पास राम आये ।
अपने समीप पहुँचे हुए रघुराम को देखकर मन-ही-मन कुपित होता हुआ वालि
कहने लगा—'हे राघवेश्वर, हे रामचंद्र, इस पृथ्वी पर लोग आपको धर्मात्मा कहते है ।
आप दम-शम, दया, सत्य, सम-बुद्धि, नीति, सौजन्य आदि सद्गुणो के भाण्डार हैं । ऐसे
होते हुए भी आपने अपनी महत्ता को त्यागकर मेरे और सुग्रीव के युद्ध करते समय
हमारे बीच में आये और मेरे ऊपर वाण चलाया, क्या यह आपके लिए उचित है ?
मैंने आपका कोई अपकार नही किया है । मैने कभी आपकी बुराई नहीं सोची । मै आपका
शत्रु भी नही हूँ। मैं जानता भी नही हूँ कि आपके शत्रुओ ने आपका क्या अहित किया है।
उन बातो को जानकर मैने आपकी उपेक्षा की हो, सो भी नही । फिर भी आपका
ऐसा करना, क्या उचित है ? हे सूर्य-कुल-तिलक, आप जानते हुए भी अनजान बनकर रहे ।
ससार में राजा लोग, शरभ, सिंह, शार्दूल, कोला, गज, हिरण आदि का सहार करने
के लिए मृगया खेलते हैं । भला, कही कोई वानरो का वध भी करता है ? सूर्य-पुत्र तथा मैं,
दोनो भाई-भाई हैं। गर्वाध हो, क्रूर बनकर, हम चाहें जैसा भी आचरण करें, आपका इस
प्रकार मेरा सहार करने का क्या कारण है ? खरगोश, नेवला, कछुआ, जगली सूअर आदि
जानवर खाद्य होते हैं, किन्तु वानर को कोई खाता नही है । फिर आपने आड में छिपकर
क्यो मेरा वध किया ? हे राजन्, अब आप अपने अनुज के साथ मेरे रक्त-मास का भोग
लगाइए । उज्ज्वल कीर्तिवान्, जगद्विख्यात दशरथ की आज्ञा से वन में तपस्वियो का-सा
जीवन व्यतीत करने के लिए आप आये, फिर भी जीव-हिंसा का त्याग नही किया ।
यदि इस पृथ्वी पर रहते हुए हम कोई अपराध करते हैं, तो उसके लिए दण्ड देने का कार्य
१९८ रंगनाथ रामायण ,
भरत का हैं । आपका इससे क्या संबंध हैं ? क्या आप राजा हैं ? आपने मुझे नहीं
अपनाकर मेरा वध कर डाला । अपनी पत्नी को हरकर ले जानेवाले नीच रावण को
जीतने के उद्देश्य से आप आये हैं । आपने मेरी अवहेलना की और सूर्य-पुत्र को अपनाया ।
इस प्रकार आप इस लोक में नीति-रहित-से हो गये । यदि यह समाचार आप मुझे देते,
तो क्या मैं आपकी पत्नी को छुड़ाकर नहीं ला देता ? जो महाबलवान् की तरह आकर
सीताजी को चुराकर ले गया, उसे मैंने अपनी पूँछ की रोमावली से बाँधकर सभी समुद्रों
में डुबोया था और अंत में उसपर कृपा करके उसे छोड़ दिया था । मेरा बाहुबल सारा
संसार जानता है और सुग्रीव भी जानता है । हाय ! मुझे भयभीत करके मार डालने की
शक्ति रखनेवाले आप, मेरे सामने खड़े होकर, मुझे ललकार कर, मुझपर आक्रमण
करके मार न सके । भय से आड़ में छिपकर आपने मुझे मारा । क्या यही
राजधर्म है ?'
बालि के इन वचनों को सुनकर राम ने कहा—'हे बालि, ये बातें तुम्हें शोभा नहीं
देतीं । तुम कपि के वंश में पैदा हुए और कपियों के बीच में पले हो । धर्मशास्त्र की
नीति न जानते हुए भी वाचाल के समान मेरे दोष गिना रहे हो । यह न्यायसंगत नहीं है ।
तुमने जो वचन कहे, उनके प्रत्युत्तर में मेरी कुछ बातें ध्यान देकर सुनो । संसार के
धर्माचार्यों की सम्मति है कि अग्रज को चाहिए कि वह अपने अनुज को अपने तनुजवत्
(पुत्रवत्) पाले । तुमने उस नियम का उल्लंघन किया । निरपराध सूर्य-पुत्र को तुमने
नगर से निर्वासित किया । ऐसा कामांध, तुम्हारे सिवा इन तीनों लोकों में और कौन हो
सकता है । दूसरी बात यह है कि जब हम दोनों (मैं और सुग्रीव) मित्र हैं, तो तुम मेरे
मित्र के शत्रु होने के कारण तुम्हारा वध करना मेरे लिए उचित ही था । मृगया खेलने-
वाले निष्कलंक राजा, सजातीय पशु-पक्षियों की सहायता से मृगों का शिकार करते हैं, या
एक मृग को किसी दूसरे के साथ लड़ते समय उसको मारते हैं, या झाड़ी में छिपकर
उसका शिकार करते हैं या जाल फैलाकर मारते हैं, या अकारण ही मारते हैं, या आड़ में
खड़े होकर शिकार खेलते हैं, या कटघरा सजाकर शिकार खेलते हैं । इसलिए मुझे किसी
भी प्रकार से इसका दोष नहीं लगेगा । तुम तो शाखा-मृग ठहरे । तुम्हारा वध मैं किसी
भी प्रकार करूँ, तो उसका दोष मुझे क्यों लगेगा ? अपने श्रेष्ठ बाहुबल से समस्त जगत्
के स्वामी (बने हुए) भरत की आज्ञा से हम दुष्ट मृग तथा राक्षसों का वध करते रहते हैं ।
तुम अपने अनुज की पत्नी को बलात् छीननेवाले पापात्मा हो । इसलिए हमने तुम्हारा
वध किया । राजाज्ञा से दण्डित व्यक्ति नरक के संकटों को प्राप्त नहीं होते । इसलिए
तुम दुःखी न होओ और स्वर्ग-सुख को प्राप्त करो ।'
रघुराम के इन वचनों को सुनकर बालि थोड़ी देर तक आँखें बंद किये हुए विवश
पड़ा रहा और उसके पश्चात् कांतियुक्त पूर्णचंद्र रामचंद्र को देखकर कहा—'हे शुभ नाम-
वाले राम, हे भयंकर किरणवाले, हे चंद्रसम मुखवाले, मेरी पत्नी तारा ने आप प्रभु के
शौर्य का परिचय देकर मुझसे अनुरोध किया था कि आप युद्ध में मत जाइए । मैंने अपनी
दुर्बुद्धि के कारण, विधि की प्रेरणा से, उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और आपसे शत्रुता
किष्किन्धाकांड [१८९]
करके इस प्रकार पृथ्वी पर पडा हुआ हूँ । क्रोध के आवेश में मैंने मूर्ख हो, आपको अप-
शब्द कहे हैं । आप मुझे क्षमा कीजिए । हे राजन्, मैं अपनी दुर्दशा की चिन्ता नही
करता, तारा के लिए भी चिन्ता नहीं करता, किन्तु अपने पुत्र अगद के लिए मैं व्याकुल
हो रहा हूँ । मेरी पत्नी और पुत्र की न जाने क्या दशा होगी । मैंने नही सोचा था कि
मेरी ऐसी दुर्दशा होगी।' इस प्रकार कहते और शोक तथा मोह-रूपी समुद्र में डूबे हुए
(मूक की तरह) मूर्च्छित हो पडा रहा ।
यह समाचार जब (वालि के) रनवास में पहुँचा, तब तारा आदि स्त्रियां वालि के
वध का हाल जानकर अधीर हो उठी और उनके हृदयो पर वज्र के समान आघात हुआ ।
वे सब पछाड़ खाकर पृथ्वी पर गिर पड़ी । वे एक क्षण होग में आती, फिर दूसरे ही
क्षण मूर्च्छित हो जाती । वे अत्यधिक सतप्त हो, वालि का नाम ले-लेकर पुकारती हुई
चिल्ला-चिल्लाकर विलाप करने लगी--'हे अगद, हाय, आज वालि का स्वर्गवास हो गया है।'
फिर वे अत्यधिक शोक में डूबी हुई उच्च स्वर में रोती हुई अगद को साथ लेकर
किष्किंधा नगर से बाहर निकली । चलते समय उनके पैर लडखडाने लगे, उनके अंचल
खिसक गये, उनकी वेणियाँ खुल गईं, होठ कंपित होने लगे, आँखो से अश्रु-धारा बहने लगी
और उनकी क्षीण कटियाँ इधर-उधर हिलने लगी । इस प्रकार जब वे आ रही थी, तब
मार्ग में ही वानरो ने उन्हें सूचना दी कि राघव के हाथो से वालि का वध हो गया है ।
अब तुमलोग क्यो जा रही हो ? यदि वहाँ जाओगी, तो अवश्य कोई-न-कोई विपत्ति
आयगी । क्या तुम नही जानती कि राम तथा सुग्रीव मिल गये हैं । न जाने, वे इस अगद
को पकड़कर क्या करेंगे ? हमें शत्रुओ के मन का विश्वास नही करना चाहिए । अत.
हम अब अगद को ही अपना राजा बनायेंगे । वैसे तो हमारे यहाँ अनेक बुद्धिमान्
मन्त्री हैं । तुम वहाँ मत जाओ ।'
८. तारा का शोक
तब तारा, औचित्य का विचार करके, उन कपियो की बार-बार निंदा करती हुई
बोली—'यदि मैं अपने प्राणनाथ वालि को न देख सकूँ तो मुझे यह अगद किस लिए और
यह राज्य ही किस लिए है ?' इस प्रकार उनकी बातो की परवाह न करके, वह चन्द्रमुखी
तारा मन-ही-मन वालि का स्मरण करती हुई अपने कुचो को देखकर अत्यत शोक-सतप्त
होकर कहने लगी—'दूर से ही अमरैन्द्र-पुत्र का आगमन देखकर, यत्न करके, उनके निकट
पहुँचकर, रति-क्रीडा की अभिलाषा करके उनसे टकराते रहने के कारण ही तो आज तुम
उस सुरराज के पुत्र को खो बैठे । अपने किये का फल तुम अब भोगो ।' यो कहकर
अत्यधिक क्रोध से वह अपनी छाती पीटने लगी । उमडते हुए शोक से जब वह चलने लगी,
तब उसके हार छिन्न-भिन्न होकर गिरने लगे । वेणी खुल गई । जैसे कमल में मकरद
भरता है, वैसे ही उसकी आंखो से अश्रु गिरने लगे । वह पवन के वेग से वालि के निकट
पहुँच गई और तरु से टूटकर गिरनेवाली पुष्प-लता के समान वालि पर जा गिरी और
बार-बार परितप्त होती हुई इस प्रकार विलाप करने लगी—'हे कपिकुलाधीश, हे कपि-
राजचंद्र, हे कपिराजशेखर, हे कपिसार्वभौम, समस्त मृगसुर-समूहों में तुम अवलक शक्ति-शाली हो,
१६० रंगनाथ रामायण,
तुम विन्ध्याद्रि को उखाड़कर फेंकने तथा उन्हें व्याकुल करने में समर्थ हो,
तुम महाबलशाली, त्रिभुवनों के पालन करनेवाले, कुल-पर्वतों को भेदनेवाले (इन्द्र) के
पुत्र हो । कोलंबु नामक क्रूर गंधर्व का संहार करनेवाले युद्ध-वीर तुम ही तो हो । ऐसे
तुम, एक मानव के हाथों से ऐसी नीच मृत्यु को प्राप्त हुए । अब में क्या कहूँ ? सूर्य-पुत्र
तुम्हारा सामना करने की शक्ति नहीं रख सकने के कारण तुम्हें युद्ध में मारने के लिए
राम को साथ लेकर आया था । मैंने तुम से कहा था कि राम को जीतना असंभव है;
तुम युद्ध में मत जाओ । मेरी वात तुमने नही मानी, मेरा सर्वस्व तुमने हर लिया ।
मैंने कहा कि वह महात्मा विष्णु ही हैं, उनके निकट मत जाओ । यह भी कहा कि वह
महान् शूर हैं, तुम अपना प्रताप त्याग दो । तुमने नही जाना कि राम तुम्हारा संहार करने
आया हुआ यम ही है । तुमने उनसे दुख पाया । जब समुद्र का मंथन करते-करते देवासुरों
की सारी शक्ति शिथिल हो गई थी और वे क्लान्त होकर पड़े हुए थे, तब तुम्हारी जिन
भुजाओं ने वासुकि को मंदर पर्वत से लपेटकर, समुद्र का मंथन करके तीनों लोकों में
अपनी श्रेष्ठ शक्ति का परिचय दिया था, वे ही आज धूलि से सनी हुई हैं । महान् शक्ति-
शाली राक्षसराज (रावण) को अपनी दृढ़ मुष्टि में पकड़कर उसको व्याकुल करते हुए
सभी समुद्रों में डुबोनेवाली तुम्हारी पूँछ आज मिट्टी में लोट रही है । नीलकंठ के
श्रीचरण-कमलों में भ्रमर के समान झुकनेवाला तुम्हारा सिर आज निरी पृथ्वी पर पड़ा है ।
है हृदयेश्वर, मै तुम्हें छोड़कर जीवित नही रह सकती, जहाँ तुम जाओगे, वही मै भी
जाऊँगी । इस वेदना को सहना मेरे भाग्य में लिखा था । मैं अपनी अनाथ अवस्था के
कारण दुखी नहीं होती । है इन्द्र-नदन, मै आपके प्रिय पुत्र के लिए शोक करती हूँ ।
है स्वामिन्, तुम्हारा पुत्र धूल में सने हुए तुम्हारी गोद में लोट रहा है । उसे क्यों नही अपनाते ?
है राजन्, अपने पुत्र अंगद को अपनी जाँघों पर बैठाकर, प्रेम से उसका सिर सूँघकर,
उसके गालों पर हाथ फेरकर, उसे चूमते हुए, उसको रोने से क्यो नही रोकते ?'
इस प्रकार विलाप करती हुई और उमड़ते हुए शोक से उसने सुग्रीव को संबोधित
करके कहा—'वालि के सामने खड़े रहने की क्षमता न रखने के कारण, कई बार कायर
के समान तुम भाग गये और अनाथ की तरह जाकर राघव को साथ ले आकर कपट-
विजय के बाद तुमने किष्किंधा को जीता । तुमने जो चाहा, वही हुआ । तुम्हारा प्रतिशोध
पूरा हुआ । अब कपियों का राज्य लेकर उसका पालन करो । संधि की वातें (मित्रता
की वातें) करके राघव को यहाँ लाने के लिए हनुमान् तो तुम्हारे साथ हैं ही । मंत्रणा
के लिए तुम्हारे पास नल, नील तथा तार भी हैं । (अब तुम्हें किस बात की कमी है ?)'
इसके पश्चात् उस कमलाक्षी ने रघुराम को देखकर कहा—'हे राजन्, आपने वालि
का संहार क्यों किया ? हे रघुराम, क्या वालि ने आपकी ऐसी दशा कर देने के लिए
(वनवास की आज्ञा देने के लिए) आपके पिता को परामर्श दिया था ? हे रघुराम, क्या
वालि आपके राज्य-सुख को छीननेवाला भरत था ? क्या वालि दुष्टता करके आपकी
पत्नी को चुराकर ले जानेवाला रावण था ? आपने वालि से अकारण वैर ठानकर इस
प्रकार उसका संहार क्यों किया ? आप-जैसे पुण्यात्मा, आप-जैसे प्रभु और, आप-जैसे करुणानिधिको
किष्किन्धाकाण्ड १९१
क्या ऐसा करना उचित है ? क्या जानकी के साथ आपका विवेक भी चला गया ?
क्या घोर विरहाग्नि में आपका ज्ञान भी जल गया ? हे राजन्, मेरा भाग्य ही
आज ऐसा हो गया है। अब मैं क्या करूँ ? होनहार को मैं कैसे दोष दूँ ? मैं वालि को
छोड़कर नहीं रह सकती । हे देव, आप मेरा भी वध कर डालिए।'
इस प्रकार विलाप करती हुई वह अपनी छाती और मुँह को पीटती हुई रुदन
करती रही । तब हनुमान् ने तारा को देखकर कहा—'क्या ऐसी कोई धर्म-नीति है, जिसे
तुम नहीं जानतीं ? युद्ध में स्वर्ग को प्राप्त होनेवाले वीर वालि के लिए इस प्रकार तुम
शोक क्यो करती हो ? ये सब कार्य भगवान् की इच्छा के अनुसार चलते हैं।' इस प्रकार
वह नीति-विलक्षण (हनुमान्) वार-वार तारा को समझाता रहा ।
९. वालि का सुग्रीव को उपदेश देना
इतने में अमरेन्द्र-पुत्र ने आँखें खोलकर अपनी पत्नी का अवर्णनीय शोक तथा अंगद
के उससे भी अधिक कठोर दुख को देखा और फिर सूर्य-नदन को सबोधित करके कहा—
'हे भ
१६२ रंगनाथ रामायण
अंत नहीं है । प्राणों के जाते समय आपने यहाँ पधारकर मुझे दर्शन दिये । परलोक में
जाने पर ही जिसके दर्शन संभव होते हैं, (उनके दर्शन) मैंने अभी प्राप्त कर लिये हैं ।
मैं कृतार्थ हुआ । हे सूर्य-वंश-तिलक, हे परमकल्याण-रूप, अब मेरे प्राण नहीं बचेंगे ।
कृपया यह बाण (मेरे शरीर से) निकालिए ।' राम की आज्ञा पाकर नील ने उस दिव्य
बाण को वालि के शरीर से बाहर निकाला । तब वालि ने पवन की गति को अपने
शरीर में रोककर, उस रुद्ध पवन की सहायता से अपनी चित्त-वृत्ति को निश्चल बनाकर,
उस सुंदरमूर्ति श्रीराम को मन में धारण करके, ब्रह्मानंद का अनुभव करते हुए ब्रह्मरन्ध्र के
द्वारा अपने प्राण छोड़ दिये ।
तब तारा आदि स्त्रियाँ वालि के शरीर पर गिरकर बार-बार हाहाकार करती हुईं
विलाप करने लगीं । अंगद, सुग्रीव तथा वहाँ के सभी कपि-पुंगव 'हाय, वालि तुम हमें
छोड़कर चले गये !' कहते हुए विलाप करने लगे । तब सौमित्र ने सुग्रीव तथा अन्य
कपियों को सांत्वना देते हुए कहा- हे हनुमान्, तुम तुरंत वस्त्र, माला, कर्पूर, चंदन आदि
मँगवाओ । हे तारे, स्वर्ण तथा रत्नों से निर्मित शिविका शीघ्र मँगवाओ ।' उन्होंने वैसा
ही किया । सभी वनचर वहाँ पहुँच गये । सूर्य-पुत्र ने तारा आदि स्त्रियों का दुःख शान्त
किया । रामचन्द्र की आज्ञा प्राप्त करके सुग्रीव, अंगद, हनुमान् आदि ने वालि की उत्तर-
क्रियाएँ यथाविधि समाप्त कीं । दस रात्रियों तक शेष क्रिया-कर्म पूरे किये और परिशुद्ध
होकर रामचंद्र के सम्मुख उपस्थित हुए ।
१०. सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाना
तब राम ने अत्यंत हर्ष से उन कपि-नायकों को देखकर कहा—'अब तुमलोग मेरा
आदेश मानकर किष्किंधा नगर को सजाओ और कपिराज के सिंहासन पर सुग्रीव का राज-
तिलक करो तथा अंगद को युवराज के पद से अभिषिक्त करो ।' तुरन्त सभी वानर-दण्ड-
नायक एकत्र होकर किष्किंधा चले आय । उन्होंने सारा नगर सुंदर ढंग से सजाया ।
सारा नगर, नूतन शृंगारों से सुसज्जित भवन, रत्नों की वेदियाँ, रमणीय हीरों के चौकों
से अलंकृत द्वार, सुरम्य ध्वजाएँ, विशाल तथा सुगंधित जल से सिक्त राज-मार्ग तथा उनमें
संचार करनेवाले निरुपम सुंदराकार पुरजनों से परिपूर्ण दीखने लगा । उन्होंने राजसभा का
भी अलंकार किया, मानो वह अत्यधिक ऐश्वर्य-रूपी समुद्र का आवास हो । नद तथा
नदियों का जल मँगाया और विविध मंगल-द्रव्यों को एकत्र किया । इसके पश्चात् उन्होंने
सुंदर पुण्य मुहूर्त्त में पुण्याह वाचन का उच्चारण करते हुए कपिसिंह (सुग्रीव) को सिंह के
चर्म से अलंकृत सिंहासन पर बिठाया और जिस प्रकार देवता इन्द्र का अभिषेक करते हैं,
वैसे ही उज्ज्वल तथा पवित्र ढंग से श्रेष्ठ वानरों ने सुग्रीव का राज्याभिषेक किया। पुण्य-
स्त्रियाँ रत्नों की वर्षा करने लगीं । तदनंतर उन्होंने अंगद को युवराज के पद पर प्रतिष्ठित
किया । तब सारे अंतःपुर तथा नगर में अत्यधिक आनंद छा गया । नल, नील, तार,
हनुमान् तथा सगे-संबंधी सुग्रीव से बड़े प्रेम से मिले । अन्य वानर-राजाओं ने हाथ जोड़कर
बड़े हर्ष से उसकी प्रशंसा की । तब सुग्रीव ने अपनी विशाल संपत्ति को प्राप्त करके, बड़ी
प्रसन्नता से रत्न-राशि वानरों को भेंट की । तत्पश्चात् सुग्रीव ने अपनी वानर-सेना के
किष्किन्धाकाण्ड [Right: १६३]
साथ रामचंद्र के निकट पहुँचकर बडी भक्ति से उनके चरणो में प्रणाम किया और हाथ
जोडकर बडे प्रेम तथा आनद से कहने लगा—'हे विश्वेश, अब आपको यहाँ ठहरने की
क्या आवश्यकता है ? आप कृपया मेरे नगर में पधारें।'
११. राम का माल्यवंत पर पहुँचना
तब राम ने सुग्रीव को देखकर बडे प्रेम से कहा—'हे सूर्य-पुत्र, तपस्वियो को नगरो
में निवास नही करना चाहिए, इसलिए किष्किन्धा नगर हमारे रहने योग्य नही है । आषाढ
का महीना आ गया है, अत शत्रुओ पर आक्रमण करने के लिए यह समय अनुकूल नहीं है।
मैं वर्षाऋतु में किसी तरह माल्यवंत पर अपने दिन व्यतीत करूँगा । तुम किष्किन्धा
में जाकर रहो । शरत्काल के आते ही हम शत्रुओ पर आक्रमण करने के लिए प्रस्थान
करेंगे।' इन वचनो को कहकर राम ने उसे बड़े आदर के साथ विदा किया और उस
स्थान को छोडकर वे अपने अनुज के साथ माल्यवत पर्वत पर जा पहुँचे ।
पर्वत पर पहुँचकर राम कुसुम सदृश कोमल सीता के गुण, वय तथा असमान रूप-
विलास को मन-ही-मन सोचते हुए अत्यधिक दुख में मग्न हो रहे ।
उस समय आकाश में, सूर्य के प्रकाश को ढँकते हुए बादल इस प्रकार घिर आये,
जैसे सीता के वियोग से दुखी होनेवाले राम को घेरकर दुख बार-बार आता था । बादलों
में से निकलकर बिजली इस प्रकार जहाँ-तहाँ अपनी चचलता दिखाने लगी, मानो वह बता
रही हो कि रावण का राज्य राम के द्वारा विचलित हो जायगा । वायु के साथ धूल इस
प्रकार आकाश की तरफ उड़ने लगी, मानो पृथ्वी देवताओ को इस बात की सूचना देने
जा रही हो कि इक्ष्वाकु-वल्लभ (राम) देवलोक के शत्रु (रावण) पर आक्रमण करने जा
रहे हैं । आकाश में इंद्र-धनुष इस प्रकार सुशोभित हो रहा था, मानो युद्ध में राक्षसो का
वध करने के लिए यम ने अपने हाथ का काल-पाश भेज दिया हो । आकाश में जहाँ-तहाँ
मँडराते हुए मेघ ऐसे गर्जन कर रहे थे, मानो राम की सहायता के लिए देवताओ की भेजी
हुई सेना, भेरी-निनाद कर रही हो । प्रथम वर्षा की बूँदें जहाँ-तहाँ इस तरह गिरने लगीं,
मानो वर्षाकाल-रूपी पुरुष के, आकाश-लक्ष्मी से बड़े प्रेम से भेंट होने पर, उसके (मोतियो
के) हार टूटकर उसके मोती पृथ्वी पर गिर रहें हो । जहाँ-तहाँ धरती के भीतर से भांप
इस प्रकार निकलने लगी, मानो (राक्षस के हाथो में) फँसकर कैद में पड़ी हुई अपनी पुत्री
का स्मरण करके धरती माता दुख से पीडित होकर नि श्वास छोड रही हो । आकाश में
उमड-घुमडकर दौडनेवाले बादलो को देखकर चातक पक्षी ऐसे फूल उठे, मानो राम-लक्ष्मण-
रूपी मेघो को देखकर सुर-लोक के चातक आनद से फूल उठे हो । मेघ के 'घर-घर' गर्जन
के साथ लय मिलाकर मयूर केका करते हुए इस प्रकार नृत्य करने लगे, मानो मर्दल की
'धी-धी-घप' की ध्वनि से लय मिलाकर नर्त्तकियां संगीत के साथ नृत्य कर रही हो । भयंकर घोष
करते हुए वज्र पर्वत के शिखरो पर इस प्रकार गिरने लगे, मानो वे यह प्रकट कर रहे हो
कि राक्षसो के अगो पर राम के बाण इसी प्रकार गिरेंगे । अत्यधिक अरुण वर्ण धारण
करके इद्रगोप (वीरबहूटी) पृथ्वी पर इस प्रकार बिखर गये, मानो वे यह प्रकट करते हों
कि राक्षसराज के शरीर के मास के टुकड़े इसी प्रकार रण-भूमि में बिखर जायेंगे ।
२५
१६४ रंगनाथ रामायण
ओले इस प्रकार पृथ्वी पर गिरने लगे, मानो रावण का सहार करते समय देवता हर्षित
होकर दिव्य पुष्पो की वृष्टि करेंगे । राजहसो का झुड इस प्रकार धीरे-धीरे
वहाँ से क्रौंच-गिरि पर चले गये, मानो राम के प्रताप के कारण रावण की कीर्त्ति-परंपरा
लुप्त हो जायगी । सूर्य के चारो ओर का परिवेश ऐसा दीखने लगा, मानो उसने इस विचार
से अपने चारो ओर एक सुदृढ प्राचीर बना लिया हो कि मेरे पुत्र सुग्रीव ने युद्ध में इन्द्र
के पुत्र को मरवा डाला है, इसलिए इन्द्र मेरे ऊपर क्रोध न करें । वर्षा की वारा ऐसी
दीखने लगी, मानो अघट उत्साह से आकाश-गंगा में स्नानार्थ गई हुई नाग-कन्याएँ फिर से
रसातल को लीट रही हों । मेढक जहाँ-तहाँ ऐसे अद्भुत ढंग से स्वर-भेद दिखाते हुए टर-
टराने लगे, मानो वे उस महान् व्यक्ति की भूरि-भूरि प्रगसा कर रहे हों, जिसने उन्हें
प्रचुर मात्रा में जीवन-दान किया है । सारी बरती पर नीला पंक ऐसा दीख रहा था,
मानो मेघों ने वर्षाऋतु-रूपी वधू के गरीर पर कस्तूरी लपेट दी हो । जल-प्रवाह जहाँ-
तहाँ के तालावो में इस कारण से ठहर गया, मानो वह यह सोचकर डर रहा हो कि
समुद्र में मिल जाने से श्रीराम के बाणो की अग्नि से तप्त होना पड़ेगा । बडी-बडी नदियो
का जल इस प्रकार भँवरो में चक्कर काटता हुआ घोर शब्द करता हुआ, समुद्र में प्रवेश
कर रहा था, मानो वह भयभीत हो कह रहा हो कि लोक-कंटक राक्षस को मैने अपनी
गोद में स्यान दिया है; काकुत्स्य-वंशज राम मुझे वधन में डालेंगे ।
कुछ दिनों में वर्षा समाप्त हुई, आकाश में दीखनेवाले मेघ विलीन हो गये ।
अपनी किरणो को सारे लोको में फैलाते हुए सूर्य सर्वत्र प्रकाशमान होने लगा । पृथ्वी
कीचड़ से रहित हो गई । सरोवरों में कमल सुंदर रूप से दीखने लगे । मत्त गज अपने
दाँतो से टीलों को खोद-खोदकर मिट्टी उछालने लगे । रात्रि चन्द्रिका तथा नक्षत्रों से
सुगोभित हो उठी । हंस सरोवरों में निवास करने के लिए लौट आये और मृणालो का
भक्षण कर संतुष्ट हुए । ईख, लाल-लाल धान तथा पकी फसलें प्रचुर हो गईं । वृषभ-
समूह गर्जन करने लगा । जल का गँदलापन दूर हो गया और वह स्वच्छ दीखने लगा तथा
यात्रियो को (इससे) सुख मिलने लगा । आवाश में मेघ निर्मल दीखने लगे । जल कम हो
जाने से नदियाँ पार करने योग्य हो गईं ।
इसके कुछ दिन पूर्व हनूमान सूर्य-पुत्र से मिलकर कहने लगा--'शरत्काल आ गया है,
अब श्रीराम का कार्य संपन्न करना चाहिए । अत सब वानर-राजाओ को बुला भेजो।'
तब रवि-पुत्र ने अपने सेनापति नील को बुलाकर कहा—'विविध पर्वत, नदी तथा द्वीपो
के राजाओ, वानर, लगूर तथा रीछ-राजाओ को बुला भेजो । जो नही आवे, उसे भी आदेश
भेजकर बुला लेना ।'
यहाँ राम ने अनुज की सहायता तथा सांत्वना प्राप्त करते हुए, दुख से पीडित होते
हुए जैसे-तैसे वर्षाकाल को समाप्त किया । शरत्काल का आगमन होते ही कोमलागी
सीता का स्मरण-मात्र से उनके मन में विविध इच्छाएँ उत्पन्न हुईं । मदनातुर हो वे भ्रमित
मन से उदयाद्रि पर स्यित उडुपति को देखकर कहने लगे—'यह कैसा उत्पात है ? यह
कंसी रीति है ? रात्रि के समय सूर्योदय क्यो दुआ ? मेरे शरीर का ताप दुगुना हो
किष्किन्धाकांड १८४
गया है। हे सौमित्र, मुझे पेड़ की छाया में ले चलो ।' तब लक्ष्मण ने कहा-'हे देव,
यह चंद्र है, सूर्य नही । वह देखिए, उसमें हिरण का चिह्न दिखाई दे रहा है।' लक्ष्मण
की बातें सुनकर वे व्याकुल हो कह उठे-'हाय ! हिरण की-सी आँखोंवाली (हमसे )
बिछुड़ गई हैं', और मूर्च्छित हो गये ।
लक्ष्मण ने दाशरथि का शीतलोपचार किया और उनकी मूर्च्छा दूर की । तब राम
संभलकर बोले-'अब हमें तुरंत लंका पर आक्रमण कर देना चाहिए । हे सौमित्र, देखा
तुमने ? सूर्य-पुत्र हमसे क्या कहकर गया था ? वर्षाकाल के समाप्त होते ही आने का
वचन दिया था । वर्षाकाल तो समाप्त हो गया, किन्तु वह आया नहीं है । कदाचित् वह
मेरे किये उपकार को भूलकर तारा के साथ रति-क्रीडा में मग्न रहता हो या राज्य-मद में
अपने आपको भूलकर पडा हो । अन्यथा मेरे कार्य के सबंध में वह अपने मन में सोचता
क्यो नहीं है ? हम इस कृतघ्नता को सहते हुए विलंब क्यो करें ? विबुध जनो का कहना है
कि उपकार को भूल जानेवाले, वचन भंग करनेवाले और अपने मित्र का कार्य नहीं
करनेवाले अधम पुरुष होते हैं । तुम शीघ्र जाकर सुग्रीव को बुलाओ। यदि वह आने से इनकार
करे और अकडता हो, तो उससे कह देना कि जिस शर ने वालि का संहार किया था,
वह कही गया नहीं है । अच्छा, अब तुम जाओ ।'
१२. लक्ष्मण का किष्किंधा में जाना
तब लक्ष्मण ने अपने अग्रज को प्रणाम किया और आँखो से अग्नि-कण उगलते हुए
अपने श्रेष्ठ धनुष-वाण लेकर, लंबे-लंबे डग भरते हुए चले । वे ऐसे लंबे डग भरते हुए जा
रहे थे कि पृथ्वी थर-थर कांपने लगी और उनके पवन-सम वेग के कारण सभी वृक्ष टूटकर
गिरने लगे । वे पुण्यात्मा जब किष्किंधा पहुंचे, तब सभी कपि भयभीत हो जहाँ-तहाँ भागने लगे ।
किले के फाटक पर रहनेवाले वानरो ने यह सोचकर कि न जाने यह कौन है,
तुरंत किले के किवाड बंद कर दिये और वानर-समूह को फाटक की रक्षा के लिए नियुक्त
करके, उसका समाचार अपने राजा को सुनाने के लिए भयभीत होकर दौडे । राजमहल में
पहुँचकर उन्होने हाथ जोडकर तारा की परिचारिकाओ से सारा समाचार कह सुनाया ।
परिचारिकाओ ने, यह सोचकर कि राजा को समाचार देने के लिए यह उचित समय नही है,
अगद के पास जाकर हाथ जोडकर कहा- 'हे विख्यात तेजस्वी युवराज, हमारे किले के
फाटक पर कोई महाबलशाली मुनि-वेश में जटा-वल्कल धारण किये, हाथ में धनुष-वाण
लिये हुए यम के समान आकर खड़ा हुआ है ।' तब अगद ने मन-ही-मन निश्चय कर
लिया कि अवश्य राम के भाई होगे । उसने तुरत फाटक पर आकर लक्ष्मण को देखा ।
तब लक्ष्मण ने उसे देखकर कहा-'हे अगद, मेरे आगमन का समाचार सूर्यपुत्र को (सुग्रीव
को) सुना दो ।'
अंगद तुरंत उस सुग्रीव के पास पहुँचा, जो मन्मथ के विकार-सागर में निमग्न
पडा था । रूमा अपने कर-पल्लवो से उनके चरणो को दबा रही थी । तारा तथा मूदूर
उसके तकिये के समान बैठी थी । इस प्रकार के सुख-भोग में निमग्न सुग्रीव को देखकर
अंगद ने कहा- 'लक्ष्मण हमारे किले के फाटक पर, क्रोधाग्नि में जलते हुए खडे हैं ।'
१६६ रंगनाथ रामायण
सुग्रीव ने शकाकुल चित्त से अपने मत्रियो को बुलाकर कहा—'क्या कारण है कि सौमित्र
मित्रता छोडकर इस प्रकार आ गये है ? मेरे जाने, मेरे द्वारा कोई अपराध नही हुआ है ।'
इस प्रकार दुविधा में पडे सुग्रीव को देखकर हनुमान् ने कहा—"राम ने उस महेन्द्रसुत वालि
का युद्ध में सहार करके तुम्हें कपियों का राज्य दिया था । ऐसे राम के कार्य को भुलाकर
तुम इस प्रकार भोग-विलास में निमग्न रहते हो ? क्या यह उचित है ? इसमें कोई
सदेह नही कि इसी कारण से सौमित्र यहाँ उग्र रूप धारण करके आये होगे । ऐसे वीर को
द्वार पर ही खडा रखना उचित नही । लोकवद्य उस महात्मा का स्वागत-करो, उनकी
सेवा करो, राम के कार्य का विचार करो और अपना वचन पूरा करो ।"
इन बातो को सुनकर सूर्य-पुत्र ने रामानुज को लिवा लाने का आदेश दिया । तब
लक्ष्मण ने स्वर्ण-गोपुरों के हर्म्य-समूह, विश्वकर्मा के द्वारा निर्मित चित्रो का कला-कौशल,
कैलास पर्वत के समान दीखनेवाले सौध, मध्यभाग में निर्मित क्रीडा-सरोवरों से युक्त उपवन
देव-गंधर्व के अवतार, वानरो के आवास आदि से पूर्ण उस नगर में प्रवेश किया और वहाँ
की अनुपम वस्तुओं की उत्कृष्टता पर आश्चर्य प्रकट करते हुए, इन्द्र के गृह की समता
रखनेवाले वानरराज के प्रासाद में प्रवेश किया । वहाँ पहुँचकर उन्होंने उमडते हुए
क्रोध से, अप्सराओं का सौंदर्य देखा और सुंदर स्त्रियो का स्निग्ध संगीत, उनकी वीणा,
वेणु एव मृदगो की ध्वनि, तथा उनके गहनो की मधुर ध्वनि सुनी । वे यम के समान
अत्यधिक क्रुद्ध होकर अत पुर के द्वार पर आकर खडे हुए ।
उनके आगमन का वृत्तात सुनकर, सुग्रीव अकेले ही न आकर, तारा को भी अपने
साथ लिये हुए शीघ्र वहाँ आया । अत्यधिक भय के साथ उनका क्रोध तथा उनका रूप
देखकर बड़ी भक्ति से उनके चरणो पर गिरकर उचित अर्घ्य-पाद्य देने का उपक्रम किया ।
इतन में ही उसे देखकर लक्ष्मण गरज उठे—'हे रामद्रोही, हे कृतघ्न, क्या यह उचित है
कि तुम मेरी पूजा-अर्चना करो । तुमने सत्यात्मा जानकीनाथ को वचन दिया था कि वर्षा-
काल के समाप्त होते ही आऊँगा । किन्तु तुम नही आये । तुमने अपने वचन का भग
किया । रघुराम की आज्ञा का तुमने विचार नही किया । तुम पशुबुद्धिवाले हो । राम
के जिस शर ने वालि का वध किया था, वह कालाग्नि उगल रहा है । वह तुम्हारा
सर्वनाश किये बिना नही रहेगा । हे नीच वनचर, मूर्ख बनकर तुम स्वय अपना नाश कर
रहे हो ।'
तब तारा ने अत्यत भयभीत होकर कहा—'हे अनघ, यह सूर्य-पुत्र आपका दास है ।
यह राज्य-सपत्ति, यह ऐश्वर्य आप ही के दिये हुए है । ये रविसुत आपके ही लगाये हुए
पौधे के समान है । ये सूर्य-पुत्र, रण विशारद राम की आज्ञा का पालन नही कर रहे हैं,
सो बात नही है । इस कार्त्तिक-पूर्णिमा तक सारी कपि-सेना को एकत्र करने के लिए उन्होंने
सेनापति नील को भेज दिया है और स्वय युद्ध में जाने के लिए सन्नद्ध होकर बैठे हैं । ये न राम-
द्रोही हैं, न असत्यभाषी, न कृतघ्न ही हैं । अत आप इनपर कृपा कीजिए ।'
इन बातो को सुनकर लक्ष्मण का क्रोध शान्त हुआ और उन्होंने सुग्रीव की पूजा-
अर्चना स्वीकार की । उसके पश्चात् सुग्रीव ने राजकुमार को एक स्वर्ण-पीठ पर आसीन
किष्किन्धाकांड १८७
कराया और उनकी आज्ञा लेकर मृदु-मधुर वचन कहने लगा—'हे सौमित्र, क्या में प्रभु
राघव के कार्य का विस्मरण करूँगा । में अभी सभी वानरो को एकत्र करूँगा और वैदेही
के अन्वेषण के लिए सभी दिशाओ में आदमी भेजूँगा । चलिए, में अभी आपके पीछे-पीछे
चलता हूँ । जिस शर से वालि पृथ्वी पर गिरा, जिस शर से सातो ताल-वृक्ष पृथ्वी पर
गिरे, वही शर सभी दानवो का नाश करने के लिए तथा साध्वी को मुक्त करने के लिए
पर्याप्त हैं । फिर भी में अत्यत भक्ति के साथ प्रभु राम की सेवा करूँगा और यश प्राप्त
करूँगा ।'
१३. सुग्रीव का माल्यवंत पर पहुँचना
इतना कहकर सुग्रीव ने नीतिवान् हनुमान् को देखकर कहा—'अब विलव करना
उचित नही है । वचन-पालन के निमित्त यत्न करो । हमारे राज्य के सभी वानरो को
सूचित करके, उनको रवाना करने का प्रयत्न करो । अब हमें प्रभु राम के दर्शनार्थ जाना है ।'
यों कहकर अत्यधिक उत्साह से सूर्यनंदन ने तारा आदि पत्नियो को विदा किया
और सब दिशाओ में रहनेवाले वानर-सेनापतियो को बुलाकर, उन्हें प्रस्थान करने की
आज्ञा दी ।
उस समय प्रस्थान की भेरी की जो ध्वनि हुई, वह पृथ्वी, आकाश तथा दिशाओं
को विदीर्ण करने लगी । सुग्रीव ने स्वर्ण तथा रत्नो से निर्मित एक रम्य शिविका में लक्ष्मण
को बड़े आदर के साथ बिठाया, श्वेत छत्र तथा चामर उस महात्मा के निकट सजाये, और
स्वयं एक शिविका पर आरूढ होकर लक्ष्मण के पीछे-पीछे चला । (लक्ष्मण के) आगे मगल-
वाद्य बज रहे थे और वंदी-मागधो की स्तुतियो की गंभीर ध्वनि हो रही थी । कपियो के
नेता आ-आकर सुग्रीव के दर्शन कर रहे थे । नक्षत्रो के मध्य में विलसित होनेवाले चन्द्र
के समान वह सुग्रीव, सभी वानर-वीरो की सेना को साथ लिये हुए, समस्त पृथ्वी को
कँपाते हुए, लक्ष्मण की सेवा में निरत-होकर वहाँ से चला ।
माल्यवत पर रामचन्द्र ने जब सेना का कोलाहल सुना, तब मन-ही-मन कहने लगे—
'लो कपि-सेना आ गई ।' अब उनका क्रोध शान्त हुआ और रवि-पुत्र के प्रति उनका
हृदय कोमल बन गया । सुग्रीव कुछ दूर पर ही सुदर तथा स्वर्ण-मणिमय शिविका से
उतरकर, सौमित्र के साथ राम के पास आया और बड़ी भक्ति के साथ हाथ जोड़कर
राम से कहा—'हे देव, सेनाओ को एकत्र करने में मैने अपने वीरो को भेजा था । उनके
एकत्र होते-होते इतना समय लग गया है । इसलिए आपके यहाँ आने में विलव हुआ,
अन्य किसी कारण से नही ।' तब राम ने सुग्रीव को कृपा की दृष्टि से देखकर उसको
आदर से अपनाया ।
तब कैलास-पर्वत, मेरु-पर्वत, नीलाचल, निष्धाद्रि, द्रोणाचल, ऋक्षाद्रि, पारियात्र,
उदयाद्रि, रत्नगिरि, अस्ताद्रि, मलयाचल, मथाद्रि आदि पर्वतो पर रहनेवाले महान् बाहुबली
(वानर), पवनसुत (हनुमान्), पनस, अगद, गवय, नील, गधमादन, पावकाक्ष, कालपाश,
प्रधन, वेगदर्शी, गवाक्ष, नल, मैन्द, महानाथ, धूम्र, जघ, गिरिभेदी, सुमुख, केसरी, ज्योतिर्मुख,
विमुख, तार, विनत, गज, जाववान्, सपाति, रभ, समुद्र-पुत्र सुवेण, शतवली, शरभ, सन्नाध