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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 508 में से

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पृष्ठ 211

किष्किन्धाकांड १८९
करके बाहर निकल आया । मुझे वहां न देखकर वह अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और किष्किन्धा में
प्रवेश किया । मेरे प्रणाम को भी स्वीकार किये बिना वह गरज उठा—‘क्यों रे, तुम्हें
अपना अनुज समझकर तुम पर विश्वास करके मैं शत्रुओं से युद्ध करने गया, तो तुम इस
प्रकार मुझे धोखा देकर मेरे राज्य का अपहरण करके, उसका शासन करने लगे ? क्या
तुम्हारे लिए यह उचित है ? तुम महा पापात्मा हो । तुम्हें मारने से भी कोई दोष नहीं
लगेगा ।'
तब मैंने उसके चरणों पर गिरकर भक्ति तथा विनय के साथ निवेदन किया—
'हे भाई, एक वर्ष तक आप और मायावी युद्ध करते रहे । तब (एक दिन) मैंने गुफा से
रक्त का प्रवाह उसके द्वार तक आते देखा, तो भयभीत तथा मतिभ्रष्ट हो भागकर यहाँ
आया । मुझे देखकर मंत्रियों ने विवश करके मेरा राज्याभिषेक कर दिया । इसके अति-
रिक्त मैं कोई कपट नहीं जानता । आपका आगमन मेरे लिए शुभप्रद है । यह वानर-राज्य
आप पुनः ग्रहण कीजिए । मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि नाते से मैं आपका
भाई हूँ, किन्तु वस्तुतः मैं आपका सेवक तथा पुत्र हूँ । हे करुणानिधि, मुझसे कोई भूल
हो गई हो, तो उसे क्षमा कीजिए ।'
इस प्रकार के वचनों से मैंने बालि की बहुत विनती की, किन्तु उसका क्रोध
पग-पग पर बढ़ता ही गया । मंत्रियों ने भी उसे बहुत समझाया कि अनुज के प्रति इतना
क्रोध उचित नहीं है, किन्तु उसने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया । उसने मेरी पत्नी
रूमा को मुझसे छीन लिया, मेरा राज्य ले लिया और मेरा वध करने के लिए तैयार
हो गया । मैं भयभीत होकर भागने लगा, तो वह मेरा पीछा करने लगा । मैं सारे भूलोक में
शरण ढूंढ़ते हुए भागा और अंत में इस पर्वत पर रहने लगा, क्योंकि बालि इस पर्वत
पर चढ़ नहीं सकता ।'
तब राम ने आश्चर्य से पूछा—‘हे सूर्यपुत्र, इस पर्वत पर बालि क्यों नहीं चढ़
सकता ? इसकी कथा मुझे सुनाओ ।" तब सुग्रीव विनम्र भाव से यों कहने लगा—'पूर्व-
काल में दुंदुभि नामक दुष्ट राक्षस, वरदानों के प्रताप से प्रबल होकर तीन लोकों को
भयभीत करने लगा था । वह जंगली भैंसे का रूप धारण करके समुद्र के पीछे पड़ गया
और उसे युद्ध के लिए चुनौती दी । तब समुद्र व्याकुल हो उठा और करोड़ों रत्नों की
भेंट देकर कहा—'तुम्हारे साथ युद्ध करके श्रेष्ठ हिमाद्रि ही जीवित रह सकता है । मैं
तुम से युद्ध नहीं कर सकता ।' तब वह उस हिमाद्रि से युद्ध करने चला गया, जिसके
शृंगों ने इंद्र के बाहुस्तंभ से सम्मानित वज्रायुध के तेज को भग्न किया था । तब उस
पर्वतेश्वर ने कहा—'क्या मैं तुम्हारी बराबरी कर सकता हूँ ? इस संसार में तुम्हारा
सामना करके, तुम्हारे साथ युद्ध करने का बाहुबल केवल बालि में है । वह अपनी प्रबल
शक्ति के साथ किष्किन्धा पर राज्य कर रहा है । यदि तुम युद्ध करने की इच्छा रखते हो,
तो हे महाबली, वहीं जाओ ।'
तब वह राक्षस बड़े उत्साह से किष्किन्धा आया और प्रलय-काल के बादल के समान
गर्जन करके अपने साथ युद्ध करने के लिए बालि को चुनौती दी । तब बालि क्रुद्ध होकर