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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 508 में से

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पृष्ठ 208

१७८ रंगनाथ रामायण
मन-ही-मन हर्षित हुए और हनुमान् की प्रशंसा करने लगे । तत्पश्चात् एक पुण्य मुहूर्त्त म
अपने अनुज के साथ वे हनुमान् के कंवों पर बैठकर ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचकर अत्यत
हर्षित हुए । हनुमान ने उन्हें किसी निर्जन स्थान में ठहरा दिया और मलयाद्रि पर पहुँचकर,
श्रीराम के दर्शनों के लिए उत्कंठित सुग्रीव को देखकर कहा—'हे देव, तुम्हारी इच्छा पूर्ण हुई ।
राम और लक्ष्मण ऋष्यमूक पर आ गये । तुम अब चलो । तब सूर्यपुत्र ने आनंद से
फूलकर मनुष्य-रूप धारण किया । मुकुट, केयूर आदि आभूषणों से सुसज्जित होकर अपने
मंत्रियों के साथ शीघ्र ही ऋष्यमूक पर जा पहुँचा । वह बड़ी भक्ति के साथ राम के
सामने पहुँचा और साष्टांग प्रणाम करके संतुष्ट होकर, हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़ा
रहा ।
तब राम ने सुग्रीव को गले से लगाया और मद हास की अमृत-वृष्टि करते हुए
वे सुग्रीव से बोले—'हे सूर्यपुत्र, में वायु-पुत्र के मुख से तुम्हारे पराक्रम, बाहुबल आदि को
सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुआ । अब तुम भयभीत मत होओ । तुम पर आक्रमण करनेवाल
तुम्हारे - शत्रु का संहार मैं करूँगा । अब तुम्हारे सिवा मेरा आप्तबंधु और विश्वास-
पात्र मित्र दूसरा कौन है ?'
इस प्रकार सांत्वना देने पर सूर्यनंदन ने कहा—'हे देव, आपने मुझे अपना प्रिय
सेवक स्वीकार किया है, आपकी करुणापूर्ण दृष्टिमात्र से में धन्य हुआ । हे सूर्य-कुल-नाथ,
मेरे जैसा सेवक आपको मिल गया है, अब आप निश्चय जानिए कि आपने रावण का वध
करके सीता को प्राप्त कर लिया । तब राम तथा सुग्रीव अग्नि के समक्ष परस्पर (एक
दूसरे की सहायता करने का) वचन देकर संतुष्ट हुए ।
उस समय अंगद ने, जो क्रीड़ा करने योग्य आयु का था, और जो विनोदार्थ वहीं
पर विचरण करते हुए खेल रहा था, राम तथा सुग्रीव के अग्नि-समक्ष दिये हुए वचनों को
सुन लिया । उसने घर जाकर अपनी माता तारा से सभी बातें कह सुनाईं । वह मन-ही-
मन अत्यंत दुःखी होती हुई कितनी ही दुःशंकाओं से पीड़ित हो उठी ।
४. सुग्रीव का सीता के आभूषणों को देना
तब वायुपुत्र ने एक विशाल वृक्ष की शाखा को तोड़कर, सुग्रीव तथा राघव के
लिए एक आसन बनाया । उस पर बैठकर वे दोनों वार्तालाप करने लगे । कुछ समय के
पश्चात् सूर्यपुत्र दोनों राजकुमारों को गुफा के भीतर ले गया और बड़े प्रेम से उन सभी
आभूषणों को लाकर दिखाया, जिन्हें सीता ने फेंका था । उसने कहा—'हे देव, जिस समय
राक्षस दण्डकवन में आपको धोखा देकर, आपकी देवी को आकाश-मार्ग से उठाकर लिये
जा रहा था, उन्होंने (सीता ने) हमें इस पहाड़ पर देखकर, ऊँचे स्वर में आपका नाम
लेकर पुकारा और अपने झीने अंचल का एक भाग फाड़कर इन आभूषणों को बाँधा और
उन्हें यहाँ गिरा दिया ।'
इतना कहते ही राम शोक-सागर में डूब गये और अश्रुधारा बहाकर उन आभूषणों
का सारा मैल धो दिया । उन्होंने उन आभरणों को अपने वक्ष पर जहाँ-तहाँ रखकर देखा।
सीता का स्मरण आते ही उनके सभी अंग शिथिल-से हो गये । उन्होंने लड़खड़ाते हुए