रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 216, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें१८६ रंगनाथ रामायण
सुग्रीव को अपनाया है। इसलिए जान पड़ता है कि राम नीतिवान् नहीं है। ऐसी दशा में
राम की मित्रता स्वीकार करना मेरे लिए उचित नहीं है। सुग्रीव अनाथ होकर राम का
सेवक बन गया है। मुझे राम की क्या आवश्यकता है। संधि की क्या आवश्यकता है ?
मैं किसी की प्रार्थना क्यों करूँ ? वह महान् पुरुष तथा धर्मात्मा राम, अकारण ही मेरा
वध क्यों करेंगे ? (तुम्हारी) ये बातें सर्वथा असंगत हैं। मैं अभी जाकर अपने भयंकर
वज्र की समता करनेवाली अपने मुष्टि-प्रहारों से सुग्रीव का वध करके आता हूँ।
तुम निश्चिंत रहो।'
इस प्रकार के वचनों से तारा को संतुष्ट कर इन्द्र-पुत्र वालि अपने पराक्रम, शक्ति
तथा साहस के साथ इस ढंग से (युद्ध के लिए) निकला, मानो कर्मपाश के आकर्षण को
टालने की शक्ति उसमें नहीं रही हो। उसने अपने गर्जन से सभी समुद्रों को क्षुब्ध कर
दिया; भू-वलय को कँपा दिया। उसके बाद वह सुग्रीव को डाँटते हुए भयंकर स्वर में
बोला—'मेरे साथ युद्ध में हारकर, लज्जाहीन हो, फिर युद्ध करने आया है ? कोई बात
नहीं। मैं अभी तुझे यम के मुँह की बरी बनाऊँगा। डींगें मारना छोड़कर तू थोड़ी देर
अटल खड़ा रह। मैं युद्ध में अपने मुष्टि-प्रहारों से तेरे प्राण हरण-करूँगा।'
इस प्रकार कहकर वालि ने वज्र का परिहास करनेवाली, अपनी मुष्टि बाँधकर
उससे ऐसा प्रहार किया कि सुग्रीव नीचे गिरकर रक्त उगलने लगा। तुरत वह सँभल
उठा और साहस के साथ खड़े होकर गर्जन किया और तिरस्कारपूर्ण वचनों से इन्द्र-सुत
की निंदा करते हुए कहा—'मैं अब तक तुम्हारी उद्दण्डता केवल इसलिए सहता आ रहा था
कि तुम मेरे भाई हो और पूज्य हो। ऐसी बात नहीं कि मैं तुमसे युद्ध करने से
डरता हूँ। मैं पहले का सुग्रीव नहीं हूँ। सोच-विचार कर मेरे साथ युद्ध करना। हे वालि,
मैं अवश्य अभी तुम्हारा वध कर दूँगा और कपि-राज्य पर अधिकार करूँगा।'
इतना कहकर सुग्रीव ने अत्यधिक क्रोध से एक साल-वृक्ष को उखाड़कर तेजी से
वालि पर फेंका। उसके लगते ही वालि कंपित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और मूच्छित
हो गया। थोड़ी देर के बाद वालि सचेत होकर दुर्वार गर्व और बड़े शौर्य तथा धैर्य के
साथ एक पर्वत उठाकर उस रवि-पुत्र पर इस प्रकार फेंका कि देवता भी आश्चर्यचकित
रह गये। सुग्रीव ने उस पर्वत को अपनी पूँछ से रोक दिया। तब वालि ने सुग्रीव के
पैरों पर प्रहार किया। सुग्रीव ने अपने तेज नखों से वालि का शरीर नोच डाला। वालि ने
उग्र रूप धरकर सुग्रीव पर मुष्टि का प्रहार किया। क्रमशः दोनों अपनी अमित शक्ति
का प्रदर्शन करते हुए एक-दूसरे की शिखाओं को पकड़कर पदाघातों से, नखों से, मुष्टियों से,
एक-दूसरे पर प्रहार करते हुए, गर्जन करते हुए, हुंकार भरते हुए, घोर युद्ध करने
लगे। उनके अंगों से रक्त की धारा बहने लगी। वे अपनी बाहुओं तथा पूँछों को दूसरों की बाहुओं
तथा पूँछों से फँसाकर, परस्पर धक्का देते हुए, फिर दूर हटते हुए, अपना सारा बल
लगाकर परस्पर प्रहार करने लगे। इस प्रकार अत्यंत भयंकर रीति से जब वे लड़ रहे थे,
तब इन्द्र-सुत वालि के आघातों से रवि-पुत्र सुग्रीव बहुत घायल हुआ। वह गर्व खोकर,
व्याकुल और भयभीत हो, अपने ओठों को आर्द्र करते हुए, दीन दृष्टि से चारों ओर देखने लगा।