रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 218, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें१९८ रंगनाथ रामायण ,
भरत का हैं । आपका इससे क्या संबंध हैं ? क्या आप राजा हैं ? आपने मुझे नहीं
अपनाकर मेरा वध कर डाला । अपनी पत्नी को हरकर ले जानेवाले नीच रावण को
जीतने के उद्देश्य से आप आये हैं । आपने मेरी अवहेलना की और सूर्य-पुत्र को अपनाया ।
इस प्रकार आप इस लोक में नीति-रहित-से हो गये । यदि यह समाचार आप मुझे देते,
तो क्या मैं आपकी पत्नी को छुड़ाकर नहीं ला देता ? जो महाबलवान् की तरह आकर
सीताजी को चुराकर ले गया, उसे मैंने अपनी पूँछ की रोमावली से बाँधकर सभी समुद्रों
में डुबोया था और अंत में उसपर कृपा करके उसे छोड़ दिया था । मेरा बाहुबल सारा
संसार जानता है और सुग्रीव भी जानता है । हाय ! मुझे भयभीत करके मार डालने की
शक्ति रखनेवाले आप, मेरे सामने खड़े होकर, मुझे ललकार कर, मुझपर आक्रमण
करके मार न सके । भय से आड़ में छिपकर आपने मुझे मारा । क्या यही
राजधर्म है ?'
बालि के इन वचनों को सुनकर राम ने कहा—'हे बालि, ये बातें तुम्हें शोभा नहीं
देतीं । तुम कपि के वंश में पैदा हुए और कपियों के बीच में पले हो । धर्मशास्त्र की
नीति न जानते हुए भी वाचाल के समान मेरे दोष गिना रहे हो । यह न्यायसंगत नहीं है ।
तुमने जो वचन कहे, उनके प्रत्युत्तर में मेरी कुछ बातें ध्यान देकर सुनो । संसार के
धर्माचार्यों की सम्मति है कि अग्रज को चाहिए कि वह अपने अनुज को अपने तनुजवत्
(पुत्रवत्) पाले । तुमने उस नियम का उल्लंघन किया । निरपराध सूर्य-पुत्र को तुमने
नगर से निर्वासित किया । ऐसा कामांध, तुम्हारे सिवा इन तीनों लोकों में और कौन हो
सकता है । दूसरी बात यह है कि जब हम दोनों (मैं और सुग्रीव) मित्र हैं, तो तुम मेरे
मित्र के शत्रु होने के कारण तुम्हारा वध करना मेरे लिए उचित ही था । मृगया खेलने-
वाले निष्कलंक राजा, सजातीय पशु-पक्षियों की सहायता से मृगों का शिकार करते हैं, या
एक मृग को किसी दूसरे के साथ लड़ते समय उसको मारते हैं, या झाड़ी में छिपकर
उसका शिकार करते हैं या जाल फैलाकर मारते हैं, या अकारण ही मारते हैं, या आड़ में
खड़े होकर शिकार खेलते हैं, या कटघरा सजाकर शिकार खेलते हैं । इसलिए मुझे किसी
भी प्रकार से इसका दोष नहीं लगेगा । तुम तो शाखा-मृग ठहरे । तुम्हारा वध मैं किसी
भी प्रकार करूँ, तो उसका दोष मुझे क्यों लगेगा ? अपने श्रेष्ठ बाहुबल से समस्त जगत्
के स्वामी (बने हुए) भरत की आज्ञा से हम दुष्ट मृग तथा राक्षसों का वध करते रहते हैं ।
तुम अपने अनुज की पत्नी को बलात् छीननेवाले पापात्मा हो । इसलिए हमने तुम्हारा
वध किया । राजाज्ञा से दण्डित व्यक्ति नरक के संकटों को प्राप्त नहीं होते । इसलिए
तुम दुःखी न होओ और स्वर्ग-सुख को प्राप्त करो ।'
रघुराम के इन वचनों को सुनकर बालि थोड़ी देर तक आँखें बंद किये हुए विवश
पड़ा रहा और उसके पश्चात् कांतियुक्त पूर्णचंद्र रामचंद्र को देखकर कहा—'हे शुभ नाम-
वाले राम, हे भयंकर किरणवाले, हे चंद्रसम मुखवाले, मेरी पत्नी तारा ने आप प्रभु के
शौर्य का परिचय देकर मुझसे अनुरोध किया था कि आप युद्ध में मत जाइए । मैंने अपनी
दुर्बुद्धि के कारण, विधि की प्रेरणा से, उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और आपसे शत्रुता