रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसे पी गये । उसके पश्चात् उसमें से ज्येष्ठा देवी का जन्म हुआ, तो उसे कलि
महाराज ने बड़े प्रेम से अपनाया । इसके उपरान्त कितनी ही वस्तुए उसमें से उत्पन्न हुई ।
सब ने अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार उन वस्तुओ को बडे हर्ष से ग्रहण किया । आगे
चलकर ऐरावत, मेष, महिष, मकर, करेणु (हथिनी), हय, वृषभ आदि उस सागर से उत्पन्न हुए,
तो इन्द्रादि दिक्पालो ने बडे हर्ष से उन्हें अपने-अपने वाहनो के रूप में ग्रहण किया ।
महनीय सौभाग्यवती तथा महिमामयी लक्ष्मी का जब जन्म हुआ, तब लक्ष्मीनारायण ने उन पर
आसक्त होकर अपनी पत्नी के रूप में उन्हें ग्रहण किया । तत्पश्चात् चन्द्र तथा देव-
कामिनियो का जन्म हुआ । देवताओ ने उन सुदरियो में से 'तारा' नामक सुदरी को हमें दिया,
तो हमने उसे ग्रहण किया । उसके उपरान्त हमारे मथने पर अमृत का जन्म हुआ ।
देवताओ ने बड़े प्रेम से उस सुधारस को कामधेनु और कल्पवृक्ष के साथ चन्द्र को भी लेकर
अपने निवास-स्थानो में चले गये । हम भी वहाँ से विदा हुए ।
हम अपने निवास को लौटकर बडे आनन्दपूर्वक उस सुदरी के साथ रहने लगे ।
कुछ दिनो के पश्चात् सुषेण की प्रिय पुत्री रुमा के साथ विवाह करके बड़े उत्साह से मै
जीवन व्यतीत करने लगा । मेरे पिता तथा अन्य मत्रियो ने ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण
वालि को वानर-राज्य का अधिपति बना दिया । वालि भी मेरा बडा आदर करते हुए,
राज्य करने लगा और मै भी उसका सेवक बनकर उसे पिता के समान मानते हुए दिन-
रात उसकी सेवा में लगा रहा । इस प्रकार हम परस्पर प्रेम-भाव रखते हुए जीवन व्यतीत
करने लगे ।
एक दिन की बात है कि पुरानी शत्रुता से प्रेरित होकर दुदुभि का पुत्र मायावी
नामक भयंकर राक्षस अर्द्ध-रात्रि के समय किष्किंधा नगर को भयभीत करते हुए आया,
और दुर्वार गर्व मे उसने हमें युद्ध के लिए चुनौती दी । अनुपम शील-सपन्न वालि ने क्रुद्ध
होकर मुझे साथ लेकर युद्ध के लिए निकला । हम दोनो को आक्रमण करने के लिए आते
देखकर वह राक्षस भयभीत होकर भागा और अपनी गुफा में छिप गया । तब वालि ने
मुझसे कहा—'मै इस गर्वोद्धत राक्षस को पकडकर उसका वध करके लौटूँगा, मेरे आने
तक तुम सावधान होकर यहाँ रहो, जिससे अन्य कोई यहाँ प्रवेश न कर पाये । इस प्रकार,
मुझे गुफा के द्वार पर नियुक्त करके वालि ने गुफा में प्रवेश किया । एक वर्ष पर्यन्त गुफा
में घोर युद्ध होता रहा । रक्त उमडकर गुफा के द्वार तक बहने लगा और राक्षस के
हुंकार मुझे सुनाई पडने लगे । तब मैने निश्चय कर लिया कि वालि राक्षस के हाथो मे
मारा गया है । यदि वह जान जाय कि मै यहाँ हूँ, तो वह बाहर आकर मेरा भी वध कर
डालेगा । इस प्रकार सोचकर मै एक पहाडी से उस गुफा का द्वार बद कर दिया और
वालि की तिलोदक-क्रिया करके किष्किंधा लौट आया । मत्रियो ने यह कहकर कि -वालि
की मृत्यु के बाद इस राज्य के अधिकारी तुम ही हो, विवश करके मुझे वानर-राज्य का
राजा अभिषिक्त किया । तब से मै वानरो का चक्रवर्त्ती होकर राज्य करता रहा ।
'हे राजन्, वहाँ वालि मायावी (राक्षस) का सहार करके, मुझे पुकार-पुकार कर,
हार गया । उसके पश्चात् वह द्वार पर मेरे द्वारा स्थापित पहाडी को पदाँघातो से चूर-चूर