रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकांड [१८९]
करके इस प्रकार पृथ्वी पर पडा हुआ हूँ । क्रोध के आवेश में मैंने मूर्ख हो, आपको अप-
शब्द कहे हैं । आप मुझे क्षमा कीजिए । हे राजन्, मैं अपनी दुर्दशा की चिन्ता नही
करता, तारा के लिए भी चिन्ता नहीं करता, किन्तु अपने पुत्र अगद के लिए मैं व्याकुल
हो रहा हूँ । मेरी पत्नी और पुत्र की न जाने क्या दशा होगी । मैंने नही सोचा था कि
मेरी ऐसी दुर्दशा होगी।' इस प्रकार कहते और शोक तथा मोह-रूपी समुद्र में डूबे हुए
(मूक की तरह) मूर्च्छित हो पडा रहा ।
यह समाचार जब (वालि के) रनवास में पहुँचा, तब तारा आदि स्त्रियां वालि के
वध का हाल जानकर अधीर हो उठी और उनके हृदयो पर वज्र के समान आघात हुआ ।
वे सब पछाड़ खाकर पृथ्वी पर गिर पड़ी । वे एक क्षण होग में आती, फिर दूसरे ही
क्षण मूर्च्छित हो जाती । वे अत्यधिक सतप्त हो, वालि का नाम ले-लेकर पुकारती हुई
चिल्ला-चिल्लाकर विलाप करने लगी--'हे अगद, हाय, आज वालि का स्वर्गवास हो गया है।'
फिर वे अत्यधिक शोक में डूबी हुई उच्च स्वर में रोती हुई अगद को साथ लेकर
किष्किंधा नगर से बाहर निकली । चलते समय उनके पैर लडखडाने लगे, उनके अंचल
खिसक गये, उनकी वेणियाँ खुल गईं, होठ कंपित होने लगे, आँखो से अश्रु-धारा बहने लगी
और उनकी क्षीण कटियाँ इधर-उधर हिलने लगी । इस प्रकार जब वे आ रही थी, तब
मार्ग में ही वानरो ने उन्हें सूचना दी कि राघव के हाथो से वालि का वध हो गया है ।
अब तुमलोग क्यो जा रही हो ? यदि वहाँ जाओगी, तो अवश्य कोई-न-कोई विपत्ति
आयगी । क्या तुम नही जानती कि राम तथा सुग्रीव मिल गये हैं । न जाने, वे इस अगद
को पकड़कर क्या करेंगे ? हमें शत्रुओ के मन का विश्वास नही करना चाहिए । अत.
हम अब अगद को ही अपना राजा बनायेंगे । वैसे तो हमारे यहाँ अनेक बुद्धिमान्
मन्त्री हैं । तुम वहाँ मत जाओ ।'
८. तारा का शोक
तब तारा, औचित्य का विचार करके, उन कपियो की बार-बार निंदा करती हुई
बोली—'यदि मैं अपने प्राणनाथ वालि को न देख सकूँ तो मुझे यह अगद किस लिए और
यह राज्य ही किस लिए है ?' इस प्रकार उनकी बातो की परवाह न करके, वह चन्द्रमुखी
तारा मन-ही-मन वालि का स्मरण करती हुई अपने कुचो को देखकर अत्यत शोक-सतप्त
होकर कहने लगी—'दूर से ही अमरैन्द्र-पुत्र का आगमन देखकर, यत्न करके, उनके निकट
पहुँचकर, रति-क्रीडा की अभिलाषा करके उनसे टकराते रहने के कारण ही तो आज तुम
उस सुरराज के पुत्र को खो बैठे । अपने किये का फल तुम अब भोगो ।' यो कहकर
अत्यधिक क्रोध से वह अपनी छाती पीटने लगी । उमडते हुए शोक से जब वह चलने लगी,
तब उसके हार छिन्न-भिन्न होकर गिरने लगे । वेणी खुल गई । जैसे कमल में मकरद
भरता है, वैसे ही उसकी आंखो से अश्रु गिरने लगे । वह पवन के वेग से वालि के निकट
पहुँच गई और तरु से टूटकर गिरनेवाली पुष्प-लता के समान वालि पर जा गिरी और
बार-बार परितप्त होती हुई इस प्रकार विलाप करने लगी—'हे कपिकुलाधीश, हे कपि-
राजचंद्र, हे कपिराजशेखर, हे कपिसार्वभौम, समस्त मृगसुर-समूहों में तुम अवलक शक्ति-शाली हो,