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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 508 में से

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पृष्ठ 224

१६४ रंगनाथ रामायण
ओले इस प्रकार पृथ्वी पर गिरने लगे, मानो रावण का सहार करते समय देवता हर्षित
होकर दिव्य पुष्पो की वृष्टि करेंगे । राजहसो का झुड इस प्रकार धीरे-धीरे
वहाँ से क्रौंच-गिरि पर चले गये, मानो राम के प्रताप के कारण रावण की कीर्त्ति-परंपरा
लुप्त हो जायगी । सूर्य के चारो ओर का परिवेश ऐसा दीखने लगा, मानो उसने इस विचार
से अपने चारो ओर एक सुदृढ प्राचीर बना लिया हो कि मेरे पुत्र सुग्रीव ने युद्ध में इन्द्र
के पुत्र को मरवा डाला है, इसलिए इन्द्र मेरे ऊपर क्रोध न करें । वर्षा की वारा ऐसी
दीखने लगी, मानो अघट उत्साह से आकाश-गंगा में स्नानार्थ गई हुई नाग-कन्याएँ फिर से
रसातल को लीट रही हों । मेढक जहाँ-तहाँ ऐसे अद्भुत ढंग से स्वर-भेद दिखाते हुए टर-
टराने लगे, मानो वे उस महान् व्यक्ति की भूरि-भूरि प्रगसा कर रहे हों, जिसने उन्हें
प्रचुर मात्रा में जीवन-दान किया है । सारी बरती पर नीला पंक ऐसा दीख रहा था,
मानो मेघों ने वर्षाऋतु-रूपी वधू के गरीर पर कस्तूरी लपेट दी हो । जल-प्रवाह जहाँ-
तहाँ के तालावो में इस कारण से ठहर गया, मानो वह यह सोचकर डर रहा हो कि
समुद्र में मिल जाने से श्रीराम के बाणो की अग्नि से तप्त होना पड़ेगा । बडी-बडी नदियो
का जल इस प्रकार भँवरो में चक्कर काटता हुआ घोर शब्द करता हुआ, समुद्र में प्रवेश
कर रहा था, मानो वह भयभीत हो कह रहा हो कि लोक-कंटक राक्षस को मैने अपनी
गोद में स्यान दिया है; काकुत्स्य-वंशज राम मुझे वधन में डालेंगे ।
कुछ दिनों में वर्षा समाप्त हुई, आकाश में दीखनेवाले मेघ विलीन हो गये ।
अपनी किरणो को सारे लोको में फैलाते हुए सूर्य सर्वत्र प्रकाशमान होने लगा । पृथ्वी
कीचड़ से रहित हो गई । सरोवरों में कमल सुंदर रूप से दीखने लगे । मत्त गज अपने
दाँतो से टीलों को खोद-खोदकर मिट्टी उछालने लगे । रात्रि चन्द्रिका तथा नक्षत्रों से
सुगोभित हो उठी । हंस सरोवरों में निवास करने के लिए लौट आये और मृणालो का
भक्षण कर संतुष्ट हुए । ईख, लाल-लाल धान तथा पकी फसलें प्रचुर हो गईं । वृषभ-
समूह गर्जन करने लगा । जल का गँदलापन दूर हो गया और वह स्वच्छ दीखने लगा तथा
यात्रियो को (इससे) सुख मिलने लगा । आवाश में मेघ निर्मल दीखने लगे । जल कम हो
जाने से नदियाँ पार करने योग्य हो गईं ।
इसके कुछ दिन पूर्व हनूमान सूर्य-पुत्र से मिलकर कहने लगा--'शरत्काल आ गया है,
अब श्रीराम का कार्य संपन्न करना चाहिए । अत सब वानर-राजाओ को बुला भेजो।'
तब रवि-पुत्र ने अपने सेनापति नील को बुलाकर कहा—'विविध पर्वत, नदी तथा द्वीपो
के राजाओ, वानर, लगूर तथा रीछ-राजाओ को बुला भेजो । जो नही आवे, उसे भी आदेश
भेजकर बुला लेना ।'
यहाँ राम ने अनुज की सहायता तथा सांत्वना प्राप्त करते हुए, दुख से पीडित होते
हुए जैसे-तैसे वर्षाकाल को समाप्त किया । शरत्काल का आगमन होते ही कोमलागी
सीता का स्मरण-मात्र से उनके मन में विविध इच्छाएँ उत्पन्न हुईं । मदनातुर हो वे भ्रमित
मन से उदयाद्रि पर स्यित उडुपति को देखकर कहने लगे—'यह कैसा उत्पात है ? यह
कंसी रीति है ? रात्रि के समय सूर्योदय क्यो दुआ ? मेरे शरीर का ताप दुगुना हो