रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 222, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें१६२ रंगनाथ रामायण
अंत नहीं है । प्राणों के जाते समय आपने यहाँ पधारकर मुझे दर्शन दिये । परलोक में
जाने पर ही जिसके दर्शन संभव होते हैं, (उनके दर्शन) मैंने अभी प्राप्त कर लिये हैं ।
मैं कृतार्थ हुआ । हे सूर्य-वंश-तिलक, हे परमकल्याण-रूप, अब मेरे प्राण नहीं बचेंगे ।
कृपया यह बाण (मेरे शरीर से) निकालिए ।' राम की आज्ञा पाकर नील ने उस दिव्य
बाण को वालि के शरीर से बाहर निकाला । तब वालि ने पवन की गति को अपने
शरीर में रोककर, उस रुद्ध पवन की सहायता से अपनी चित्त-वृत्ति को निश्चल बनाकर,
उस सुंदरमूर्ति श्रीराम को मन में धारण करके, ब्रह्मानंद का अनुभव करते हुए ब्रह्मरन्ध्र के
द्वारा अपने प्राण छोड़ दिये ।
तब तारा आदि स्त्रियाँ वालि के शरीर पर गिरकर बार-बार हाहाकार करती हुईं
विलाप करने लगीं । अंगद, सुग्रीव तथा वहाँ के सभी कपि-पुंगव 'हाय, वालि तुम हमें
छोड़कर चले गये !' कहते हुए विलाप करने लगे । तब सौमित्र ने सुग्रीव तथा अन्य
कपियों को सांत्वना देते हुए कहा- हे हनुमान्, तुम तुरंत वस्त्र, माला, कर्पूर, चंदन आदि
मँगवाओ । हे तारे, स्वर्ण तथा रत्नों से निर्मित शिविका शीघ्र मँगवाओ ।' उन्होंने वैसा
ही किया । सभी वनचर वहाँ पहुँच गये । सूर्य-पुत्र ने तारा आदि स्त्रियों का दुःख शान्त
किया । रामचन्द्र की आज्ञा प्राप्त करके सुग्रीव, अंगद, हनुमान् आदि ने वालि की उत्तर-
क्रियाएँ यथाविधि समाप्त कीं । दस रात्रियों तक शेष क्रिया-कर्म पूरे किये और परिशुद्ध
होकर रामचंद्र के सम्मुख उपस्थित हुए ।
१०. सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाना
तब राम ने अत्यंत हर्ष से उन कपि-नायकों को देखकर कहा—'अब तुमलोग मेरा
आदेश मानकर किष्किंधा नगर को सजाओ और कपिराज के सिंहासन पर सुग्रीव का राज-
तिलक करो तथा अंगद को युवराज के पद से अभिषिक्त करो ।' तुरन्त सभी वानर-दण्ड-
नायक एकत्र होकर किष्किंधा चले आय । उन्होंने सारा नगर सुंदर ढंग से सजाया ।
सारा नगर, नूतन शृंगारों से सुसज्जित भवन, रत्नों की वेदियाँ, रमणीय हीरों के चौकों
से अलंकृत द्वार, सुरम्य ध्वजाएँ, विशाल तथा सुगंधित जल से सिक्त राज-मार्ग तथा उनमें
संचार करनेवाले निरुपम सुंदराकार पुरजनों से परिपूर्ण दीखने लगा । उन्होंने राजसभा का
भी अलंकार किया, मानो वह अत्यधिक ऐश्वर्य-रूपी समुद्र का आवास हो । नद तथा
नदियों का जल मँगाया और विविध मंगल-द्रव्यों को एकत्र किया । इसके पश्चात् उन्होंने
सुंदर पुण्य मुहूर्त्त में पुण्याह वाचन का उच्चारण करते हुए कपिसिंह (सुग्रीव) को सिंह के
चर्म से अलंकृत सिंहासन पर बिठाया और जिस प्रकार देवता इन्द्र का अभिषेक करते हैं,
वैसे ही उज्ज्वल तथा पवित्र ढंग से श्रेष्ठ वानरों ने सुग्रीव का राज्याभिषेक किया। पुण्य-
स्त्रियाँ रत्नों की वर्षा करने लगीं । तदनंतर उन्होंने अंगद को युवराज के पद पर प्रतिष्ठित
किया । तब सारे अंतःपुर तथा नगर में अत्यधिक आनंद छा गया । नल, नील, तार,
हनुमान् तथा सगे-संबंधी सुग्रीव से बड़े प्रेम से मिले । अन्य वानर-राजाओं ने हाथ जोड़कर
बड़े हर्ष से उसकी प्रशंसा की । तब सुग्रीव ने अपनी विशाल संपत्ति को प्राप्त करके, बड़ी
प्रसन्नता से रत्न-राशि वानरों को भेंट की । तत्पश्चात् सुग्रीव ने अपनी वानर-सेना के