रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 215, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंवक-पक्तियो से अलकृत सध्या-गगन के समान, शरत्काल के वादलो के साथ विलम्बित मेरु-
पर्वत के समान सुशोभित दीखने लगा ।
तब राम तथा उनके अनुज बडे हर्ष से युद्ध के लिए सन्नद्ध हुए । उसके पश्चात्
वे नल, नील, तारा तथा हनुमान् के साथ सुग्रीव को साथ लिये हुए नदियो, पुष्पो से युक्त
लता-समूहो, पुन्नाग, नारगी, कदली तथा सहकार-वृक्षो से भरे वनो को देखते हुए उज्ज्वल
कैरव, पद्म तथा कह्लारो से शोभायमान, बहु सरोवरों का दर्शन करते हुए, गज, सिंह,
वराह तथा जगली भैसो को देखते हुए, बहुत दूर तक चल और वहाँ अग्नि-सम तेजस्वी
'सप्त जनाह्न' नामक मुनि के आश्रम का दर्शन किया । सुग्रीव के मुँह से उस आश्रम
का महत्त्व सुना । उसके पश्चात् वालि के शासन में रहते हुए ऐश्वर्य से संपन्न किष्किन्धा-
नगर को देखकर सुग्रीव सं वोले--'तुम पूर्ववत् जाकर वालि के साथ युद्ध करो, में अवश्य
वालि का सहार करूँगा ।' यो कहकर उस पुण्यात्मा सुग्रीव को आदर के साथ भेजकर
राम समीप ही एक पेड की आड में खडे हो गये ।
६. तारा का वालि को रोकना
तब सूर्यनदन ने किष्किंधा की सभी गुफाओ को विदीर्ण करते हुए घोर गर्जन किया
और इन्द्र-सुत वालि को अपने साथ युद्ध के लिए ललकारा । वालि अत्यत क्रोधावेश में
आकर सोचने लगा- 'यह एक मर्द की तरह अपने बाहुबल का गर्व कर रहा है । अब
इसका सहन करना उचित नही है, अब में इसका वध कर डालूँगा ।"
इस प्रकार निश्चय करके वह शक्तिशाली तथा जयशील वालि युद्ध के लिए निकला,
तो अपने पति का मार्ग रोककर तारा कहने लगी,--"हे देवेन्द्रनदन, विना सोचे-विचारे आप
सूर्य-पुत्र पंर आक्रमण करने क्यो जा रहे हैं ? अभी-अभी आपसे युद्ध करके वह घायल
होकर भाग गया था । फिर इतना शीघ्र वह कैसे आ गया ? यदि आपसे कही अधिक
बलवान् की सहायता उसे नही मिलती, तो वह कदापि यहाँ नही आता । हे इन्द्र-पुत्र,
यही नही, मैंने अगद से और एक वात सुनी हैं । अपने पिता की आज्ञा क अनुसार दशरथ-
राम वनवास के लिए आये थे । वहाँ दशकंधर (रावण) ने उनकी पत्नी को हर लिया ।
वे और उनके भाई मुनि-वेश में सीता की खोज में ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचे और सुग्रीव
को अपना सेवक स्वीकार करके तुम्हें मारना चाहते है । राघव स्वय विष्णु है, कमलनाभ है,
वैरियो के लिए भयंकर रूप हैं, दयालु हैं, धीर हैं और धनुविद्या के गुरु ह । उनका शत्रु
बनकर उनको जीतना असभव है । आप प्रेम से सूर्य-पुत्र को अपना राज्य देकर, फिर
राम से संधि कर लीजिए । यदि ऐसा नही हो सकता, तो मुनि-वृत्ति ग्रहण करके अपने
प्राणो की रक्षा कीजिए ।"
तारा के इन वचनो को सुनकर वालि अत्यत क्रुद्ध होकर बोला--'मेरी पत्नी होकर
तुम इतनी भयभीत क्यो होती हो ? में अपने बाहुबल से किसी भी बलवान् पुरुष को
युद्ध में जीतकर विजय प्राप्त कर सकता हूँ । मै कभी किसी से पराजित नही होऊँगा ।
जब शत्रु आकर युद्ध के लिए ललकारे, तब अधीर होकर उससे संधि कर लेना वीरों का
धर्म नही है । हे कमलाक्षी, मेरे-जैसे बलवान् के रहते, मुझे स्वीकार नहीं करके, राम ने
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