रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ रंगनाथ रामायण
सुग्रीव ने शकाकुल चित्त से अपने मत्रियो को बुलाकर कहा—'क्या कारण है कि सौमित्र
मित्रता छोडकर इस प्रकार आ गये है ? मेरे जाने, मेरे द्वारा कोई अपराध नही हुआ है ।'
इस प्रकार दुविधा में पडे सुग्रीव को देखकर हनुमान् ने कहा—"राम ने उस महेन्द्रसुत वालि
का युद्ध में सहार करके तुम्हें कपियों का राज्य दिया था । ऐसे राम के कार्य को भुलाकर
तुम इस प्रकार भोग-विलास में निमग्न रहते हो ? क्या यह उचित है ? इसमें कोई
सदेह नही कि इसी कारण से सौमित्र यहाँ उग्र रूप धारण करके आये होगे । ऐसे वीर को
द्वार पर ही खडा रखना उचित नही । लोकवद्य उस महात्मा का स्वागत-करो, उनकी
सेवा करो, राम के कार्य का विचार करो और अपना वचन पूरा करो ।"
इन बातो को सुनकर सूर्य-पुत्र ने रामानुज को लिवा लाने का आदेश दिया । तब
लक्ष्मण ने स्वर्ण-गोपुरों के हर्म्य-समूह, विश्वकर्मा के द्वारा निर्मित चित्रो का कला-कौशल,
कैलास पर्वत के समान दीखनेवाले सौध, मध्यभाग में निर्मित क्रीडा-सरोवरों से युक्त उपवन
देव-गंधर्व के अवतार, वानरो के आवास आदि से पूर्ण उस नगर में प्रवेश किया और वहाँ
की अनुपम वस्तुओं की उत्कृष्टता पर आश्चर्य प्रकट करते हुए, इन्द्र के गृह की समता
रखनेवाले वानरराज के प्रासाद में प्रवेश किया । वहाँ पहुँचकर उन्होंने उमडते हुए
क्रोध से, अप्सराओं का सौंदर्य देखा और सुंदर स्त्रियो का स्निग्ध संगीत, उनकी वीणा,
वेणु एव मृदगो की ध्वनि, तथा उनके गहनो की मधुर ध्वनि सुनी । वे यम के समान
अत्यधिक क्रुद्ध होकर अत पुर के द्वार पर आकर खडे हुए ।
उनके आगमन का वृत्तात सुनकर, सुग्रीव अकेले ही न आकर, तारा को भी अपने
साथ लिये हुए शीघ्र वहाँ आया । अत्यधिक भय के साथ उनका क्रोध तथा उनका रूप
देखकर बड़ी भक्ति से उनके चरणो पर गिरकर उचित अर्घ्य-पाद्य देने का उपक्रम किया ।
इतन में ही उसे देखकर लक्ष्मण गरज उठे—'हे रामद्रोही, हे कृतघ्न, क्या यह उचित है
कि तुम मेरी पूजा-अर्चना करो । तुमने सत्यात्मा जानकीनाथ को वचन दिया था कि वर्षा-
काल के समाप्त होते ही आऊँगा । किन्तु तुम नही आये । तुमने अपने वचन का भग
किया । रघुराम की आज्ञा का तुमने विचार नही किया । तुम पशुबुद्धिवाले हो । राम
के जिस शर ने वालि का वध किया था, वह कालाग्नि उगल रहा है । वह तुम्हारा
सर्वनाश किये बिना नही रहेगा । हे नीच वनचर, मूर्ख बनकर तुम स्वय अपना नाश कर
रहे हो ।'
तब तारा ने अत्यत भयभीत होकर कहा—'हे अनघ, यह सूर्य-पुत्र आपका दास है ।
यह राज्य-सपत्ति, यह ऐश्वर्य आप ही के दिये हुए है । ये रविसुत आपके ही लगाये हुए
पौधे के समान है । ये सूर्य-पुत्र, रण विशारद राम की आज्ञा का पालन नही कर रहे हैं,
सो बात नही है । इस कार्त्तिक-पूर्णिमा तक सारी कपि-सेना को एकत्र करने के लिए उन्होंने
सेनापति नील को भेज दिया है और स्वय युद्ध में जाने के लिए सन्नद्ध होकर बैठे हैं । ये न राम-
द्रोही हैं, न असत्यभाषी, न कृतघ्न ही हैं । अत आप इनपर कृपा कीजिए ।'
इन बातो को सुनकर लक्ष्मण का क्रोध शान्त हुआ और उन्होंने सुग्रीव की पूजा-
अर्चना स्वीकार की । उसके पश्चात् सुग्रीव ने राजकुमार को एक स्वर्ण-पीठ पर आसीन