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सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 220

१६० रंगनाथ रामायण,
तुम विन्ध्याद्रि को उखाड़कर फेंकने तथा उन्हें व्याकुल करने में समर्थ हो,
तुम महाबलशाली, त्रिभुवनों के पालन करनेवाले, कुल-पर्वतों को भेदनेवाले (इन्द्र) के
पुत्र हो । कोलंबु नामक क्रूर गंधर्व का संहार करनेवाले युद्ध-वीर तुम ही तो हो । ऐसे
तुम, एक मानव के हाथों से ऐसी नीच मृत्यु को प्राप्त हुए । अब में क्या कहूँ ? सूर्य-पुत्र
तुम्हारा सामना करने की शक्ति नहीं रख सकने के कारण तुम्हें युद्ध में मारने के लिए
राम को साथ लेकर आया था । मैंने तुम से कहा था कि राम को जीतना असंभव है;
तुम युद्ध में मत जाओ । मेरी वात तुमने नही मानी, मेरा सर्वस्व तुमने हर लिया ।
मैंने कहा कि वह महात्मा विष्णु ही हैं, उनके निकट मत जाओ । यह भी कहा कि वह
महान् शूर हैं, तुम अपना प्रताप त्याग दो । तुमने नही जाना कि राम तुम्हारा संहार करने
आया हुआ यम ही है । तुमने उनसे दुख पाया । जब समुद्र का मंथन करते-करते देवासुरों
की सारी शक्ति शिथिल हो गई थी और वे क्लान्त होकर पड़े हुए थे, तब तुम्हारी जिन
भुजाओं ने वासुकि को मंदर पर्वत से लपेटकर, समुद्र का मंथन करके तीनों लोकों में
अपनी श्रेष्ठ शक्ति का परिचय दिया था, वे ही आज धूलि से सनी हुई हैं । महान् शक्ति-
शाली राक्षसराज (रावण) को अपनी दृढ़ मुष्टि में पकड़कर उसको व्याकुल करते हुए
सभी समुद्रों में डुबोनेवाली तुम्हारी पूँछ आज मिट्टी में लोट रही है । नीलकंठ के
श्रीचरण-कमलों में भ्रमर के समान झुकनेवाला तुम्हारा सिर आज निरी पृथ्वी पर पड़ा है ।
है हृदयेश्वर, मै तुम्हें छोड़कर जीवित नही रह सकती, जहाँ तुम जाओगे, वही मै भी
जाऊँगी । इस वेदना को सहना मेरे भाग्य में लिखा था । मैं अपनी अनाथ अवस्था के
कारण दुखी नहीं होती । है इन्द्र-नदन, मै आपके प्रिय पुत्र के लिए शोक करती हूँ ।
है स्वामिन्, तुम्हारा पुत्र धूल में सने हुए तुम्हारी गोद में लोट रहा है । उसे क्यों नही अपनाते ?
है राजन्, अपने पुत्र अंगद को अपनी जाँघों पर बैठाकर, प्रेम से उसका सिर सूँघकर,
उसके गालों पर हाथ फेरकर, उसे चूमते हुए, उसको रोने से क्यो नही रोकते ?'
इस प्रकार विलाप करती हुई और उमड़ते हुए शोक से उसने सुग्रीव को संबोधित
करके कहा—'वालि के सामने खड़े रहने की क्षमता न रखने के कारण, कई बार कायर
के समान तुम भाग गये और अनाथ की तरह जाकर राघव को साथ ले आकर कपट-
विजय के बाद तुमने किष्किंधा को जीता । तुमने जो चाहा, वही हुआ । तुम्हारा प्रतिशोध
पूरा हुआ । अब कपियों का राज्य लेकर उसका पालन करो । संधि की वातें (मित्रता
की वातें) करके राघव को यहाँ लाने के लिए हनुमान् तो तुम्हारे साथ हैं ही । मंत्रणा
के लिए तुम्हारे पास नल, नील तथा तार भी हैं । (अब तुम्हें किस बात की कमी है ?)'
इसके पश्चात् उस कमलाक्षी ने रघुराम को देखकर कहा—'हे राजन्, आपने वालि
का संहार क्यों किया ? हे रघुराम, क्या वालि ने आपकी ऐसी दशा कर देने के लिए
(वनवास की आज्ञा देने के लिए) आपके पिता को परामर्श दिया था ? हे रघुराम, क्या
वालि आपके राज्य-सुख को छीननेवाला भरत था ? क्या वालि दुष्टता करके आपकी
पत्नी को चुराकर ले जानेवाला रावण था ? आपने वालि से अकारण वैर ठानकर इस
प्रकार उसका संहार क्यों किया ? आप-जैसे पुण्यात्मा, आप-जैसे प्रभु और, आप-जैसे करुणानिधिको