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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 508 में से

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पृष्ठ 227

किष्किन्धाकांड १८७
कराया और उनकी आज्ञा लेकर मृदु-मधुर वचन कहने लगा—'हे सौमित्र, क्या में प्रभु
राघव के कार्य का विस्मरण करूँगा । में अभी सभी वानरो को एकत्र करूँगा और वैदेही
के अन्वेषण के लिए सभी दिशाओ में आदमी भेजूँगा । चलिए, में अभी आपके पीछे-पीछे
चलता हूँ । जिस शर से वालि पृथ्वी पर गिरा, जिस शर से सातो ताल-वृक्ष पृथ्वी पर
गिरे, वही शर सभी दानवो का नाश करने के लिए तथा साध्वी को मुक्त करने के लिए
पर्याप्त हैं । फिर भी में अत्यत भक्ति के साथ प्रभु राम की सेवा करूँगा और यश प्राप्त
करूँगा ।'
१३. सुग्रीव का माल्यवंत पर पहुँचना
इतना कहकर सुग्रीव ने नीतिवान् हनुमान् को देखकर कहा—'अब विलव करना
उचित नही है । वचन-पालन के निमित्त यत्न करो । हमारे राज्य के सभी वानरो को
सूचित करके, उनको रवाना करने का प्रयत्न करो । अब हमें प्रभु राम के दर्शनार्थ जाना है ।'
यों कहकर अत्यधिक उत्साह से सूर्यनंदन ने तारा आदि पत्नियो को विदा किया
और सब दिशाओ में रहनेवाले वानर-सेनापतियो को बुलाकर, उन्हें प्रस्थान करने की
आज्ञा दी ।
उस समय प्रस्थान की भेरी की जो ध्वनि हुई, वह पृथ्वी, आकाश तथा दिशाओं
को विदीर्ण करने लगी । सुग्रीव ने स्वर्ण तथा रत्नो से निर्मित एक रम्य शिविका में लक्ष्मण
को बड़े आदर के साथ बिठाया, श्वेत छत्र तथा चामर उस महात्मा के निकट सजाये, और
स्वयं एक शिविका पर आरूढ होकर लक्ष्मण के पीछे-पीछे चला । (लक्ष्मण के) आगे मगल-
वाद्य बज रहे थे और वंदी-मागधो की स्तुतियो की गंभीर ध्वनि हो रही थी । कपियो के
नेता आ-आकर सुग्रीव के दर्शन कर रहे थे । नक्षत्रो के मध्य में विलसित होनेवाले चन्द्र
के समान वह सुग्रीव, सभी वानर-वीरो की सेना को साथ लिये हुए, समस्त पृथ्वी को
कँपाते हुए, लक्ष्मण की सेवा में निरत-होकर वहाँ से चला ।
माल्यवत पर रामचन्द्र ने जब सेना का कोलाहल सुना, तब मन-ही-मन कहने लगे—
'लो कपि-सेना आ गई ।' अब उनका क्रोध शान्त हुआ और रवि-पुत्र के प्रति उनका
हृदय कोमल बन गया । सुग्रीव कुछ दूर पर ही सुदर तथा स्वर्ण-मणिमय शिविका से
उतरकर, सौमित्र के साथ राम के पास आया और बड़ी भक्ति के साथ हाथ जोड़कर
राम से कहा—'हे देव, सेनाओ को एकत्र करने में मैने अपने वीरो को भेजा था । उनके
एकत्र होते-होते इतना समय लग गया है । इसलिए आपके यहाँ आने में विलव हुआ,
अन्य किसी कारण से नही ।' तब राम ने सुग्रीव को कृपा की दृष्टि से देखकर उसको
आदर से अपनाया ।
तब कैलास-पर्वत, मेरु-पर्वत, नीलाचल, निष्धाद्रि, द्रोणाचल, ऋक्षाद्रि, पारियात्र,
उदयाद्रि, रत्नगिरि, अस्ताद्रि, मलयाचल, मथाद्रि आदि पर्वतो पर रहनेवाले महान् बाहुबली
(वानर), पवनसुत (हनुमान्), पनस, अगद, गवय, नील, गधमादन, पावकाक्ष, कालपाश,
प्रधन, वेगदर्शी, गवाक्ष, नल, मैन्द, महानाथ, धूम्र, जघ, गिरिभेदी, सुमुख, केसरी, ज्योतिर्मुख,
विमुख, तार, विनत, गज, जाववान्, सपाति, रभ, समुद्र-पुत्र सुवेण, शतवली, शरभ, सन्नाध