सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 209

स्वर में लक्ष्मण को बुलाकर कहा—'लक्ष्मण, देखा तुमने ? सीता के सभी श्रृंगार इस
प्रकार मिट्टी में मिल गये हैं । भला, आभूषणों को गिरा देने का क्या अर्थ है ? इनको
साथ रखने में उसे क्या कष्ट होता ? सीता तो मेरी प्राणेश्वरी है । हाय, इस अंचल की
दशा को तो देखो ! जो भीना अंचल उसके सुडौल कुचों पर सतत रहता था, उसकी ऐसी
दशा हुई ! मेरे चरणों को गुलाबजल से धोकर, उन्हें इसी से वह पोछती थी । इसे
विजन बनाकर, अत्यन्त सुंदर ढंग से मेरे श्रम-बिंदुओं को सुखा देती थी । अपनी प्रभा-
समन्वित तनुलता की कांति बिखेरती हुई वह इसी के पाँवड़े बिछा देती थी ।' इस प्रकार
शोक करते हुए राम अश्रु बहाने तथा बार-बार मूर्च्छित होने लगे । फिर संभलकर भक्ति
के साथ सिर झुकाये खड़े सुग्रीव को देखकर रघुनाथ बोले—'हे सुग्रीव, बतलाओ कि मेरी
देवी को लेकर आनेवाला वह इन्द्र का शत्रु किस देश में रहता है ? उसका नगर कौन-सा है ?
मैं अभी उस राक्षस का संहार करके सीता को छुड़ा लाऊँगा ।'
यह सुनकर सुग्रीव बोला—'हे देव, मैं उस द्रोही का निवास नहीं जानता । फिर
भी कोई चिंता नहीं । अब मैं सब बातें जानने का प्रयत्न करूँगा । आप शोक त्यागकर
धैर्य धारण कीजिए । अत्यंत पराक्रमी वालि के द्वारा अपनी पत्नी के हरे जाने पर भी
मैं इतना दुखी नहीं हूँ । हे देव, विपत्ति-रूपी सागर को आत्मधैर्य-रूपी नौका से ही पार
किया जा सकता है । हे प्रभो, हम जैसे साधारण मानवों की तरह आप भी शोक करें,
यह कहाँ उचित है ?'
सुग्रीव के आप्त वचन सुनकर रघुवीर धैर्य धारण करते हुए सोचने लगे—'सीता के
खो जाने का ढंग जानने के पश्चात् मन-ही-मन दुखी होते रहना शूरता नहीं है । यों सोचकर
उन्होंने संताप त्याग कर सीता को किसी भी प्रकार प्राप्त करने के कार्य में प्रवृत्त होने
का निश्चय किया । किन्तु उसके पूर्व उन्होंने सुग्रीव के शत्रु का अंत करने का निश्चय
किया । सीता के आभूषण लक्ष्मण को सौंपकर वे सुग्रीव को देखकर बोले—'हे मित्र,
विद्वानों का कहना है कि विपत्ति के समय मित्र के समान कोई सहायक नहीं होते । चाहे
मित्र गुणवान् हो, या गुणहीन, विपत्ति के समय वही सहायक होता है । तुम्हारी मित्रता
प्राप्त करके मुझे किसी भी वस्तु के अभाव की चिंता नहीं रही, यह तो निश्चित है ।
अब मैं उस पापी वालि का वध करूँगा, जो तुम्हारी स्त्री का अपहरण करके तुम्हारा वध
करना चाहता है । भाइयो में स्नेह का भाव हो, तो उससे श्रेष्ठ सुख और कुछ नहीं है ।
किन्तु ऐसा स्नेह तुम में क्यों नहीं रह पाया ? तुम्हारे और तुम्हारे अग्रज में शत्रुता
क्यों हुई ? इसका वृत्तांत मुझे सुनाओ ।'
तब सुग्रीव ने कहा—'हे राम, मैं अपने और वालि की शत्रुता का वृत्तांत सुनाता हूँ,
सुनिए । (समुद्र-मंथन के समय) मंद्राचल को मथानी बनाकर, वासुकि को नेती बनाकर
जब देवताओं ने हमारे बाहुबल को जानकर हमसे प्रार्थना की, तब मैं और वालि, दोनों
मंथन के लिए एक ओर खड़े हो गये और दूसरी ओर देवता, गरुड़, उरग, असुर, सिद्ध
आदि थे । इस प्रकार जब हम क्षीरसागर का मंथन करने लगे, तब उसमें से हलाहल
निकलकर समस्त लोक को जलाने लगा, तो महादेव ने सबको आश्चर्यचकित करते हुए