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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 223

किष्किन्धाकाण्ड [Right: १६३]

साथ रामचंद्र के निकट पहुँचकर बडी भक्ति से उनके चरणो में प्रणाम किया और हाथ
जोडकर बडे प्रेम तथा आनद से कहने लगा—'हे विश्वेश, अब आपको यहाँ ठहरने की
क्या आवश्यकता है ? आप कृपया मेरे नगर में पधारें।'
११. राम का माल्यवंत पर पहुँचना
तब राम ने सुग्रीव को देखकर बडे प्रेम से कहा—'हे सूर्य-पुत्र, तपस्वियो को नगरो
में निवास नही करना चाहिए, इसलिए किष्किन्धा नगर हमारे रहने योग्य नही है । आषाढ
का महीना आ गया है, अत शत्रुओ पर आक्रमण करने के लिए यह समय अनुकूल नहीं है।
मैं वर्षाऋतु में किसी तरह माल्यवंत पर अपने दिन व्यतीत करूँगा । तुम किष्किन्धा
में जाकर रहो । शरत्काल के आते ही हम शत्रुओ पर आक्रमण करने के लिए प्रस्थान
करेंगे।' इन वचनो को कहकर राम ने उसे बड़े आदर के साथ विदा किया और उस
स्थान को छोडकर वे अपने अनुज के साथ माल्यवत पर्वत पर जा पहुँचे ।
पर्वत पर पहुँचकर राम कुसुम सदृश कोमल सीता के गुण, वय तथा असमान रूप-
विलास को मन-ही-मन सोचते हुए अत्यधिक दुख में मग्न हो रहे ।
उस समय आकाश में, सूर्य के प्रकाश को ढँकते हुए बादल इस प्रकार घिर आये,
जैसे सीता के वियोग से दुखी होनेवाले राम को घेरकर दुख बार-बार आता था । बादलों
में से निकलकर बिजली इस प्रकार जहाँ-तहाँ अपनी चचलता दिखाने लगी, मानो वह बता
रही हो कि रावण का राज्य राम के द्वारा विचलित हो जायगा । वायु के साथ धूल इस
प्रकार आकाश की तरफ उड़ने लगी, मानो पृथ्वी देवताओ को इस बात की सूचना देने
जा रही हो कि इक्ष्वाकु-वल्लभ (राम) देवलोक के शत्रु (रावण) पर आक्रमण करने जा
रहे हैं । आकाश में इंद्र-धनुष इस प्रकार सुशोभित हो रहा था, मानो युद्ध में राक्षसो का
वध करने के लिए यम ने अपने हाथ का काल-पाश भेज दिया हो । आकाश में जहाँ-तहाँ
मँडराते हुए मेघ ऐसे गर्जन कर रहे थे, मानो राम की सहायता के लिए देवताओ की भेजी
हुई सेना, भेरी-निनाद कर रही हो । प्रथम वर्षा की बूँदें जहाँ-तहाँ इस तरह गिरने लगीं,
मानो वर्षाकाल-रूपी पुरुष के, आकाश-लक्ष्मी से बड़े प्रेम से भेंट होने पर, उसके (मोतियो
के) हार टूटकर उसके मोती पृथ्वी पर गिर रहें हो । जहाँ-तहाँ धरती के भीतर से भांप
इस प्रकार निकलने लगी, मानो (राक्षस के हाथो में) फँसकर कैद में पड़ी हुई अपनी पुत्री
का स्मरण करके धरती माता दुख से पीडित होकर नि श्वास छोड रही हो । आकाश में
उमड-घुमडकर दौडनेवाले बादलो को देखकर चातक पक्षी ऐसे फूल उठे, मानो राम-लक्ष्मण-
रूपी मेघो को देखकर सुर-लोक के चातक आनद से फूल उठे हो । मेघ के 'घर-घर' गर्जन
के साथ लय मिलाकर मयूर केका करते हुए इस प्रकार नृत्य करने लगे, मानो मर्दल की
'धी-धी-घप' की ध्वनि से लय मिलाकर नर्त्तकियां संगीत के साथ नृत्य कर रही हो । भयंकर घोष
करते हुए वज्र पर्वत के शिखरो पर इस प्रकार गिरने लगे, मानो वे यह प्रकट कर रहे हो
कि राक्षसो के अगो पर राम के बाण इसी प्रकार गिरेंगे । अत्यधिक अरुण वर्ण धारण
करके इद्रगोप (वीरबहूटी) पृथ्वी पर इस प्रकार बिखर गये, मानो वे यह प्रकट करते हों
कि राक्षसराज के शरीर के मास के टुकड़े इसी प्रकार रण-भूमि में बिखर जायेंगे ।
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