रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 214, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ रंगनाथ रामायण
एक दूसरे के घुटनो, जांघो, वक्षो, नाभियो तथा कटि-प्रदेशो को विचित्र ढंग से झुकाकर
इस प्रकार युद्ध करने लगे, जैसे पूर्व तथा पश्चिम के समुद्र आपस में युद्ध करते हो ।
उसी समय राम ने अपने धनुष पर वाण का संधान करके, उसे चलाने के विचार से,
उन दोनो को देखा । किंतु उनके वदन तथा रदन, पूँछ तथा बाहु, उदर तथा अवर, उरु
तथा पार्श्व, कक्ष तथा वक्ष, पैर तथा उँगली, वीक्षण तथा शिक्षण, वेष तथा भाषा, नाक
तथा गाल, सिर तथा स्कंध, पिंडली तथा चरणयुग्म, कर्ण तथा वर्ण, कठ तथा अग, इन
सब को एक समान देखकर, यह निर्णय नही कर सके कि इन दोनो में वालि कौन है
और सुग्रीव कौन ? तब राम ने मन-ही-मन आश्चर्यचकित होकर सोचा कि यदि में
वाण चलाऊँ, तो न जाने इनमें से कौन मृत्यु-मुख को प्राप्त हो जायें । यो सोचकर वे
बिना वाण चलाये ही रह गये ।
युद्ध करते-करते अत्यधिक थक जाने पर भी सुग्रीव ने अपनी सारी शक्ति तथा
निपुणता लगाकर युद्ध किया, किन्तु वालि से परास्त हो गया । वालि की बलिष्ठ मुष्टियो
के आघातो के कारण वह घोघो की थैली के समान हो गया और लबी साँसें लेता हुआ
सोचने लगा—‘हाय रे, राम का विश्वास करके में क्यो आया ? इसका मुझे अच्छा
पुरस्कार मिला । वस, वस, अव अपना रास्ता नापने में ही मेरा कल्याण है।' यो सोचते
हुए वह सुध-बुध खोकर, अपनी पूँछ को कठ में लपेटे हुए, चारो ओर देखते तथा भूलते
हुए ऋष्यमूक पर्वत पर भागा और मन-ही-मन दुःखी होने लगा ।
ठीक इसी समय राम वहाँ पहुँचे । अनन्त विक्रमधाम राम को देखकर सूर्यपुत्र ने
सिर झुकाकर कहा—‘हे राजन्, मैने आपका विश्वास करके अपना असमान बल-विक्रम
दिखाकर वालि से युद्ध किया । किन्तु आपने मेरी उपेक्षा की, मेरी रक्षा नही की, चुप-
चाप देखते ही रह गये । सूर्य-वंश में जन्म लेकर ऐसा अधर्म करना, क्या, आपको शोभा
देता है ? हे देव, आपके सत्य तथा तेज का विश्वास करके मैंने वालि को छेडा । नहीं
तो में कहाँ और वालि कहाँ ? वालि को चुनौती देकर फिर बचकर आना असंभव था ।
शायद किसी पूर्व-पुण्य के फल से बचकर में पूर्ववत् इस पर्वत पर पहुँच सका। आपका विश्वास
करने के कारण शत्रु के हाथो से पराजय और जग-हँसाई मुझे प्राप्त हुई । आपमें दया,
साहस और शक्ति की अधिकता देखकर मैंने आपका विश्वास किया था ।'
इन वचनो को सुनकर राम बोले—'हे सुग्रीव, तुम अपने मन में इतना संदेह क्यो
करते हो ? इसमें मेरा कोई दोष नही है । क्या मैं तुम्हें शत्रु के हाथ में सौंप दूंगा ?
एक बात सुनो । विश्व-विमोहक आकारवाले विख्यात अश्विनीकुमारो के समान तुम्हारी
और वालि की रूप-रेखा समान होने के कारण मैं तुम दोनो में भेद नहीं कर सका और
बाण चलाने में मुझे भय हुआ; क्योकि यह अस्त्र अमोघ है । इसलिए तुम इसे बुरा मत
समझो । इस बार तुम इन गज-पुष्पो की माला पहनकर वालि से युद्ध करो । मैं अवश्य
ही वालि का वध करूँगा । संदेह मत करो, दृढ़ निश्चय से युद्ध के लिए किष्किंधा
के लिए प्रस्थान करो।' यो कहकर उन्होने अपने प्रिय अनुज से गज-पुष्पो की माला मँगवाकर
उसे सुग्रीव के कंठ में पहनाया । तब सुग्रीव नक्षत्रो से घिरे हुए चन्द्र के समान,