रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकांड १८४
गया है। हे सौमित्र, मुझे पेड़ की छाया में ले चलो ।' तब लक्ष्मण ने कहा-'हे देव,
यह चंद्र है, सूर्य नही । वह देखिए, उसमें हिरण का चिह्न दिखाई दे रहा है।' लक्ष्मण
की बातें सुनकर वे व्याकुल हो कह उठे-'हाय ! हिरण की-सी आँखोंवाली (हमसे )
बिछुड़ गई हैं', और मूर्च्छित हो गये ।
लक्ष्मण ने दाशरथि का शीतलोपचार किया और उनकी मूर्च्छा दूर की । तब राम
संभलकर बोले-'अब हमें तुरंत लंका पर आक्रमण कर देना चाहिए । हे सौमित्र, देखा
तुमने ? सूर्य-पुत्र हमसे क्या कहकर गया था ? वर्षाकाल के समाप्त होते ही आने का
वचन दिया था । वर्षाकाल तो समाप्त हो गया, किन्तु वह आया नहीं है । कदाचित् वह
मेरे किये उपकार को भूलकर तारा के साथ रति-क्रीडा में मग्न रहता हो या राज्य-मद में
अपने आपको भूलकर पडा हो । अन्यथा मेरे कार्य के सबंध में वह अपने मन में सोचता
क्यो नहीं है ? हम इस कृतघ्नता को सहते हुए विलंब क्यो करें ? विबुध जनो का कहना है
कि उपकार को भूल जानेवाले, वचन भंग करनेवाले और अपने मित्र का कार्य नहीं
करनेवाले अधम पुरुष होते हैं । तुम शीघ्र जाकर सुग्रीव को बुलाओ। यदि वह आने से इनकार
करे और अकडता हो, तो उससे कह देना कि जिस शर ने वालि का संहार किया था,
वह कही गया नहीं है । अच्छा, अब तुम जाओ ।'
१२. लक्ष्मण का किष्किंधा में जाना
तब लक्ष्मण ने अपने अग्रज को प्रणाम किया और आँखो से अग्नि-कण उगलते हुए
अपने श्रेष्ठ धनुष-वाण लेकर, लंबे-लंबे डग भरते हुए चले । वे ऐसे लंबे डग भरते हुए जा
रहे थे कि पृथ्वी थर-थर कांपने लगी और उनके पवन-सम वेग के कारण सभी वृक्ष टूटकर
गिरने लगे । वे पुण्यात्मा जब किष्किंधा पहुंचे, तब सभी कपि भयभीत हो जहाँ-तहाँ भागने लगे ।
किले के फाटक पर रहनेवाले वानरो ने यह सोचकर कि न जाने यह कौन है,
तुरंत किले के किवाड बंद कर दिये और वानर-समूह को फाटक की रक्षा के लिए नियुक्त
करके, उसका समाचार अपने राजा को सुनाने के लिए भयभीत होकर दौडे । राजमहल में
पहुँचकर उन्होने हाथ जोडकर तारा की परिचारिकाओ से सारा समाचार कह सुनाया ।
परिचारिकाओ ने, यह सोचकर कि राजा को समाचार देने के लिए यह उचित समय नही है,
अगद के पास जाकर हाथ जोडकर कहा- 'हे विख्यात तेजस्वी युवराज, हमारे किले के
फाटक पर कोई महाबलशाली मुनि-वेश में जटा-वल्कल धारण किये, हाथ में धनुष-वाण
लिये हुए यम के समान आकर खड़ा हुआ है ।' तब अगद ने मन-ही-मन निश्चय कर
लिया कि अवश्य राम के भाई होगे । उसने तुरत फाटक पर आकर लक्ष्मण को देखा ।
तब लक्ष्मण ने उसे देखकर कहा-'हे अगद, मेरे आगमन का समाचार सूर्यपुत्र को (सुग्रीव
को) सुना दो ।'
अंगद तुरंत उस सुग्रीव के पास पहुँचा, जो मन्मथ के विकार-सागर में निमग्न
पडा था । रूमा अपने कर-पल्लवो से उनके चरणो को दबा रही थी । तारा तथा मूदूर
उसके तकिये के समान बैठी थी । इस प्रकार के सुख-भोग में निमग्न सुग्रीव को देखकर
अंगद ने कहा- 'लक्ष्मण हमारे किले के फाटक पर, क्रोधाग्नि में जलते हुए खडे हैं ।'