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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 508 में से

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पृष्ठ 212

१९२ रंगनाथ रामायण
बाहर आया और गर्जन करते हुए दुंदुभि के समान ध्वनि करनेवाले उस दुंदुभि का सामना
करके बोला—'देखूँ अब तुम कहाँ जाते हो ?' इस प्रकार कहकर वालि ने शिलाओ तथा
वृक्षों को उखाड़-उखाड़कर फेंका और मुष्टि के प्रहारो से उसे व्याकुल कर दिया । जब
उसने अपने तीक्ष्ण शृंगो से वालि पर आक्रमण करना आरंभ किया, तब वालि ने क्रुद्ध
होकर, भयंकर रूप धारण करके एक पर्वत उठाकर उस पर फेंका । राक्षस ने उसे बचाकर,
स्वयं एक और पहाड़ उठाकर वालि पर फेंका । तब कपिराज ने एक बहुत बड़ा पर्वत
उस पर फेंका । राक्षस ने अपने सींगों से उन पहाड़ो को हटाते हुए, वालि के कंठ को
पकड़कर ऐसा धक्का दिया कि वालि विचलित हो उठा । तब वालि ने उसका पीछा किया
और एक वृक्ष उखाड़कर उस राक्षस पर फेंका । राक्षस उससे भी बच गया और छिपकर
वालि पर आक्रमण करने लगा । तब वालि ने एक मोटे ताड़ के वृक्ष से उस पर प्रहार
किया । राक्षस ने अपने सींगो से उसे भी उठाकर फेंक दिया, तो कपिराज ने अपनी
कठोर मुष्टिसे उस पर प्रहार करना आरंभ किया । राक्षस भी अपने सींगो से वालि को मारने लगा ।
इस प्रकार एक दूसरे पर प्रहार करते हुए एक सौ वर्ष तक दोनो घोर युद्ध करने लगे ।
तब वालि ने उसके दोनो सींगो को पकड़ कर नीचे गिरा दिया और उसका वध कर डाला ।
उसके पश्चात् उसने अपना सारा बल लगाकर लात मारी, तो उसका शव मुंह तथा
नाक से रक्त बहाते हुए वज्राघात से गिरनेवाले पर्वत की तरह, एक योजन दूर पर
जा गिरा । गेरू रंग के झरने के समान गिरनेवाली उस रक्त-धारा की कुछ बूंदें, इस
पर्वत पर भी गिरी । तब इस पर्वत पर तपस्या में निरत भयंकर शक्तिशाली मतंग मुनि ने
क्रोध में आकर शाप दिया कि वालि इस पर्वत पर न चढ़ सकेगा । हे जगन्नाथ, मैं इसी
कारण से निर्भय हो सतत इस ऋष्यमूक पर ही निवास करता हूँ । हे राजन्, दुंदुभि के
उस शरीर को एक योजन तक फेंक सकने की शक्ति वालि के सिवा और किसी में नही हैं।
यदि आप उस शव को, उससे भी दूर, न फेंक सकें, तो मैं आपकी शक्ति पर विश्वास
नही कर सकता ।'
तब राम ने मंद-मंद हँसकर कहा—'हे सूर्यपुत्र, मैं उस दुंदुभि के शरीर को वैसे ही
फेंककर तुम्हारा संदेह दूर करूँगा । मुझे वह शव दिखाओ । मेरु-मंदराकारवाले उस शव को
सुग्रीव के दिखाने पर, राम उसके पास पहुँचे और उसकी परवाह किये बिना ही, केवल
अपने अंगूठे से उठाकर उसे दस योजन दूर फेंक दिया । तब भी सुग्रीव को रघुराम की
शक्ति के महत्व पर विश्वास नही हुआ । उसने कहा—'हे देव, जब वालि ने इसे फेंका
था तब यह बहुत से रक्त-मांस से भरा था, आज तो केवल इसकी अस्थियाँ रह गईं हैं।
इसलिए आप इसे बड़े वेग से फेंक सके, इसलिए विश्वास नही होता कि आपका
बल वालि से भी अधिक है । इतना ही नही, बिना थके वालि पहाड़ो को गेंदो की तरह
उछाल सकता है; चारो समुद्रो में संध्या-वंदन करता है और शिवजी के चरणो को अपने
सिर पर धारण करता है । वायु से भी अधिक वेग से वह सभी समुद्रो को पार कर
सकता है । ऐसे वालि की, जिसे इन्द्र ने स्वर्ण-माला प्रदान की थी, कौन समता कर
सकता है ? हे राजन्, और एक बात सुनिए । यहाँ जो सात ताल-वृक्ष खड़े है, इन सभी