रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 213, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंको बालि अपनी वर-शक्ति से एक साथ अपने हाथो में पकड़कर उनके सभी पत्तो को तोड
सकता है । इन्द्रादि देवता इन में से किसी एक ताल को भी हिला नही सकते । हे वसुधेश,
यदि आप एक बाण से इस सातो ताल-वृक्षो को गिरा सकते है, तो हम विश्वास कर सकते है
कि आपकी शक्ति बालि की शक्ति स भी अधिक है । मातग मुनि ने मुझसे कहा था कि
जो इन सातो ताल-वृक्षो को एक ही बाण से गिराने की शक्ति रखता है, उस व्यक्ति
के हाथो से बालि का नाश होगा ।'
तब राम ने मदहास करके कहा—'हे वनेचरेश्वर, उन ताल-वृक्षो को तुम अवश्य
मुझे दिखाओ । तब निपुण राम ने वज्र-सम अद्वितीय तथा निशित बाण सधान करके
चलाया, तो वह बाण, पृथ्वी पर टेढे-मेढे ढग से खडे उन ताल-वृक्षो को एक साथ ऐसे
काटकर गिरा दिया, मानो रावण की नाडियो को ही काट दिया हो । उसके पश्चात् वह
शर निकट के पर्वत को भी पार करके पृथ्वी में प्रवेश किया और पाताल तक पहुँचकर
किंचित भी अपनी गति मद किये बिना, बडे वेग से रघुराम के तूणीर में वापस आ गया ।
यह देखकर सुग्रीव आश्चर्यचकित हो अत्यधिक आनद में डूब गया और मन-ही-मन यह
सोचकर फूल उठा कि जिन ताल-वृक्षो के मूल सप्त पातालो तक गये थे, जिनके पत्र सप्त
वायुमडलो तक फैले थे, ऐसे तालो को इन्होने एक ही शर से गिरा दिया । अब मेरा सदेह
दूर हो गया । अब अवश्य ही राघव के हाथो वालि का वध होगा । मैं अब वानर-राज्य
पर शासन कर सकूँगा । तब सूर्यवश के प्रभु राम को देखकर सूर्यपुत्र ने हाथ जोडकर
कहा—'हे देव, आपका रूप देखकर मैने आपकी शक्ति की कल्पना नही करके पशु-बुद्धि
का परिचय दिया । मै सूर्यपुत्र हूँ और आप सूर्य-वश-म्भव है । अत मैने आपकी समानता
करने का विचार करने का अपराध किया । आप त्रिलोकीनाथ है । मुझ मूर्ख को अपना
सेवक मानकर मेरे शत्रु का संहार कीजिए और मुझे मेरा राज्य दिलाकर मेरा दुख दूर
कीजिए ।'
५ वालि-सुग्रीव का द्वंद्व-युद्ध
तब राम ने अत्यधिक कृपा-दृष्टि से सुग्रीव को देखकर कहा—'हे सुग्रीव, तुम शीघ्र
ही किष्किंधा को जाओ और वहाँ बालि से युद्ध करते रहो । मैं एक ही वाण से ( वालि
का वध करके) सहज ही तुम्हें राज्य दिला दूँगा । तुम निर्भय होकर जाओ । तब विना
किसी सकोच के तथा अत्यत उत्साह से सुग्रीव ने, नल, नील, हनुमान् तथा बलवान् तार
आदि को साथ लिये युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर किष्किंधा के लिए प्रस्थान किया । राम
तथा लक्ष्मण उसके पीछे-पीछे चले । किष्किंधा के निकट एक वन में प्रवेश करके उन्होने
वहाँ से सुग्रीव को वालि पर आक्रमण करने के लिए भेजा । सुग्रीव शीघ्र किष्किंधा पहुँचा
और नगर के बाहर खडे होकर भयकर गर्जन किया और अपने साथ युद्ध करने के लिए
बालि को चुनौती दी । हाथी का चिघाडना सुनकर जिस प्रकार सिंह क्रोध में आ जाता है,
वैसे क्रुद्ध होकर, शिवजी के चरण-कमलो को प्रणाम करके, रावण के कठो को अपनी
बगल में दबानेवाले वालि ने आकर सुग्रीव का सामना किया । अप्रतिहत पराक्रमी, समान
रूप, समान क्रोध, समान शक्ति तथा समान पराक्रम रखनेवाले दोनो वानर जूझ गये और