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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

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पृष्ठ 221

किष्किन्धाकाण्ड १९१
क्या ऐसा करना उचित है ? क्या जानकी के साथ आपका विवेक भी चला गया ?
क्या घोर विरहाग्नि में आपका ज्ञान भी जल गया ? हे राजन्, मेरा भाग्य ही
आज ऐसा हो गया है। अब मैं क्या करूँ ? होनहार को मैं कैसे दोष दूँ ? मैं वालि को
छोड़कर नहीं रह सकती । हे देव, आप मेरा भी वध कर डालिए।'
इस प्रकार विलाप करती हुई वह अपनी छाती और मुँह को पीटती हुई रुदन
करती रही । तब हनुमान् ने तारा को देखकर कहा—'क्या ऐसी कोई धर्म-नीति है, जिसे
तुम नहीं जानतीं ? युद्ध में स्वर्ग को प्राप्त होनेवाले वीर वालि के लिए इस प्रकार तुम
शोक क्यो करती हो ? ये सब कार्य भगवान् की इच्छा के अनुसार चलते हैं।' इस प्रकार
वह नीति-विलक्षण (हनुमान्) वार-वार तारा को समझाता रहा ।
९. वालि का सुग्रीव को उपदेश देना
इतने में अमरेन्द्र-पुत्र ने आँखें खोलकर अपनी पत्नी का अवर्णनीय शोक तथा अंगद
के उससे भी अधिक कठोर दुख को देखा और फिर सूर्य-नदन को सबोधित करके कहा—
'हे भ