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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 217

किष्किन्धाकाण्ड १८७.
७. वालि का संहार
निग्रह तथा अनुग्रह के निधि राम ने जब देखा कि सुग्रीव अब क्लात तथा खिन्न
हो गया है, तब सोचने लगे कि यदि मैं अब वालि का वध नही करूँ, तो वह अवश्य ही
सुग्रीव को मार डालेगा । तब राम ने सप्त समुद्रो तथा सप्त लोको को क्षुब्ध करते और
समस्त भूतो को कँपाते हुए, अपने धनुष का टकार किया, वालि को तृणवत् मानकर, लक्ष्य
को साधा, और एक अमोघ अस्त्र का सधान करके उसे उस असमान बलशाली वालि पर
चलाया । तब वह वाण अपनी सूर्य-तेज सदृश काति को सारे आकाश-मडल में विकीर्ण
करने तथा भयकर अग्नि-शिखाओ को फैलाते हुए, गरुड, उरग, अमर, गधर्वो को भयभीत
करते हुए ऐसे वेग से चला, मानो अपने पुत्र की रक्षा करने तथा शत्रु को दण्ड देने के लिए
सूर्य ही अस्त्र के रूप में जा रहा हो, अथवा सूर्य-पुत्र होने के कारण यम धर्मराज ने ही
अपने अनुज सुग्रीव की रक्षा करने के लिए, अपना काल-दड वालि पर चलाया हो । वह
वाण सीधे जाकर वालि के उर में लगा । वालि पृथ्वी पर ऐसे गिरा कि दिग्गजो, पर्वतो
तथा वृक्षो के साथ पृथ्वी काँप उठी । वह वाण वालि के उर के पार निकलकर पृथ्वी में
धँस गया । अविरल बहनेवाली रक्त की धाराओ से वानरेश्वर का सारा शरीर भीग
गया और वह इस प्रकार पृथ्वी पर गिरा, मानो पुष्पित अशोक-वृक्ष आँधी में गिर गया हो,
अथवा प्रलय-काल में कातिहीन होकर पृथ्वी पर गिरा हुआ सूर्य हो । तब पृथ्वी पर
विवश पडे हुए उस वालि के पास राम आये ।
अपने समीप पहुँचे हुए रघुराम को देखकर मन-ही-मन कुपित होता हुआ वालि
कहने लगा—'हे राघवेश्वर, हे रामचंद्र, इस पृथ्वी पर लोग आपको धर्मात्मा कहते है ।
आप दम-शम, दया, सत्य, सम-बुद्धि, नीति, सौजन्य आदि सद्गुणो के भाण्डार हैं । ऐसे
होते हुए भी आपने अपनी महत्ता को त्यागकर मेरे और सुग्रीव के युद्ध करते समय
हमारे बीच में आये और मेरे ऊपर वाण चलाया, क्या यह आपके लिए उचित है ?
मैंने आपका कोई अपकार नही किया है । मैने कभी आपकी बुराई नहीं सोची । मै आपका
शत्रु भी नही हूँ। मैं जानता भी नही हूँ कि आपके शत्रुओ ने आपका क्या अहित किया है।
उन बातो को जानकर मैने आपकी उपेक्षा की हो, सो भी नही । फिर भी आपका
ऐसा करना, क्या उचित है ? हे सूर्य-कुल-तिलक, आप जानते हुए भी अनजान बनकर रहे ।
ससार में राजा लोग, शरभ, सिंह, शार्दूल, कोला, गज, हिरण आदि का सहार करने
के लिए मृगया खेलते हैं । भला, कही कोई वानरो का वध भी करता है ? सूर्य-पुत्र तथा मैं,
दोनो भाई-भाई हैं। गर्वाध हो, क्रूर बनकर, हम चाहें जैसा भी आचरण करें, आपका इस
प्रकार मेरा सहार करने का क्या कारण है ? खरगोश, नेवला, कछुआ, जगली सूअर आदि
जानवर खाद्य होते हैं, किन्तु वानर को कोई खाता नही है । फिर आपने आड में छिपकर
क्यो मेरा वध किया ? हे राजन्, अब आप अपने अनुज के साथ मेरे रक्त-मास का भोग
लगाइए । उज्ज्वल कीर्तिवान्, जगद्विख्यात दशरथ की आज्ञा से वन में तपस्वियो का-सा
जीवन व्यतीत करने के लिए आप आये, फिर भी जीव-हिंसा का त्याग नही किया ।
यदि इस पृथ्वी पर रहते हुए हम कोई अपराध करते हैं, तो उसके लिए दण्ड देने का कार्य