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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

९६ रंगनाथ रामायण
तब राम ने दशरथ से कहा—'महाराज, मेरे वियोग से शोक-सन्तप्त मेरी माता
कौसल्या को सांत्वना देते हुए आप उनकी रक्षा करते रहें।'
तब दशरथ ने अत्यन्त दुःखी होकर कहा—'हे राम, न जाने मैने पूर्व जन्म में कौन-सा
पाप किया था ? उसका फल तो मुझे भोगना ही चाहिए। माताओ से पुत्रो को अलग करके
तुम्हारे हृदयो को दुःख देना पड रहा है। हाय, कैकेयी के वचनो के कारण तुम्हें वन में कष्टो को
सहने के लिए निष्ठुर होकर भेजना पड रहा है। हे पुत्र, हे राम, यह कैसा अनर्थ है।'
यो कहकर दशरथ मूर्च्छित हो गये। उपचार के उपरात जब वे कुछ सँभले, तब
उन्होने चौदह वर्ष के लिए आवश्यक श्रेष्ठ वस्त्र तथा आभूषण सीता को दिलवाये।
सीता ने उन श्रेष्ठ वस्त्रो तथा आभूषणो को धारण किया।
१५. राम का दशरथ को सांत्वना देना
तब दशरथ को देखकर राम ने कहा—'महाराज में चौदह वर्ष की अवधि चौदह
दिन की तरह बिताकर शीघ्र ही लौट आऊँगा। मेरी अपेक्षा भरत आपका प्रिय भक्त है।
आप दुख मत कीजिए। भरत का राज-तिलक कर दीजिए। माता कैकेयी के कृत्य को
सोचते हुए आप मन-ही-मन क्षुब्ध मत होइए। मेरी माँ आपकी सेवा अच्छी तरह करती
रहेगी। उन पर आप भी कृपा-दृष्टि रखिए।'
यो कहकर उन्होने सीता तथा लक्ष्मण के साथ उनकी परिक्रमा की और प्रणाम
किया। तब राजा ने अपने पुत्रो तथा बहू को आशीर्वाद दिया—'तुम वन जाकर कुशल-
पूर्वक लौटो।' उसके पश्चात् उन तीनो ने कौसल्या के चरण-कमलो का स्पर्श किया।
राघव की वेश-भूषा देखकर माता ने क्रूर विधि की निंदा करती हुई विलाप किया और
फिर राम तथा लक्ष्मण को आशीर्वाद दिये।
१६. सीता को सीख देना
फिर जानकी को देखकर कौसल्या अत्यन्त दुःखी होकर बोलीं—'राम को योग्य राज-
पुत्र समझकर बिना हमारे माँगे ही तुम्हारे पिता ने तुम्हारा विवाह उसके साथ कर दिया।
किन्तु आज दैव-योग से तुम्हारी यह दशा हो गई। तुम्हें तापस-वृत्ति ग्रहण कर अपने
पति के साथ वनो में निवास करना पड रहा है। इसके लिए चिन्ता मत करो। राघव
अवश्य बाद को पृथ्वी का पालन करेगा। चाहे पति निर्धन ही क्यो न हो जाय, फिर भी
स्त्री को उसे त्यागना नहीं चाहिए। यही सती स्त्रियो का धर्म है। पति की आज्ञा पालन
करनेवाली स्त्रियो का दोनो लोको में शुभ होगा।'
तब सीता ने कौसल्या को देखकर कहा—'हे माताजी, मैं अवश्य पति के अनुकूल
होकर भक्ति के साथ उनकी सेवा करूँगी और धर्म के मार्ग पर चलूँगी। पति की प्रसन्नता
जिस रमणी को प्राप्त नही है, वह चक्र-हीन रथ के समान और तार-हीन वीणा के समान है।
वह पुत्रोवाली पुण्यवती होने पर भी अत्यन्त दुःखी रहेगी। अत, यदि पति को प्रिय हो,
तो मै अपने प्राणो को भी बडे हर्ष से निछावर कर दूँगी।'
तब कौसल्या ने सीता से कहा—'भू-माता की पुत्री होकर तुम्हारे ये गुण तुम्हारे
अनुकूल ही हैं। लक्ष्मण, उज्ज्वल गुण-सम्पन्न तुम्हारे पति का आप्त-बन्धु है। उसके प्रति

स्नेह रखना ।' 'आपकी आज्ञा शिरोधार्य है'—सीता ने कहा और उन्हें प्रणाम किया ।
कौसल्या ने उन्हें हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद दिये ।
फिर कौसल्या ने राम को संबोधित करके कहा—'हे राजकुमार, मैथिली तथा
सौमित्र का सतत ध्यान रखना ।' राम बोले—'माता, आपकी आज्ञा का पालन अवश्य
करूँगा । लक्ष्मण तो मेरा दाहिना हाथ हैं और सीता मेरी गति के समान हैं । क्या में
कभी इनके प्रति असावधान रह सकता हूँ ? यदि में धनुष धारण करूँ, तो (इन्हें) कौन-सा
भय हो सकता हैं । चाहे त्रिनयन ही क्यो न आ जायें । अब आप शोक मत कीजिए ।
हम तीनो, आपको, पिताजी को और सब माताओ को प्रणाम करते हैं, आप हमें आशीर्वाद
दीजिए ।'
इस प्रकार कहते हुए उन्होने सीता तथा लक्ष्मण के साथ तीन सौ पचास माताओ
की प्रदक्षिणा की । यह दृश्य देखकर सभी माताओ का हृदय पिघल गया और वे विलाप
करने लगी ।
जब तीनो ने माता सुमित्रा को प्रणाम किया, तब उन्होने उन्हें हृदय से लगा लिया
और राम तथा सीता को आशीर्वाद दिये । उसके पश्चात् वे महाराज के अनुचित कार्य
का विचार करके दुःखी हुई और लक्ष्मण को पास बुलाकर अत्यंत गंभीर स्वर में बोली—
'हे वत्स ! तुम राम को ही अपने पिता दशरथ के समान और जानकी को मेरे समान
मानना । वन को ही अयोध्या समझना और अत्यंत भक्तियुक्त होकर राम की सेवा करते हुए
अत्यधिक विजय तथा उन्नति प्राप्त करो ।' उसके बाद वे राम को देखकर बोली—
'हे रघुवीर, लक्ष्मण सतत तुम्हारे कल्याण का विचार करनेवाला, कल्मष-रहित सखा तथा
अनुज है । वन में तुम इसकी रक्षा करते रहना ।' राम ने माता की आज्ञा को बड़ी नम्रता
से स्वीकार किया ।

१७. राम का वन-गमन

तत्पश्चात् राम ने गृह-देवताओ, मुनियो तथा माताओ को प्रणाम किया और सीता
तथा लक्ष्मण के साथ शर-चाप-तूणीर से युक्त हो वे वन के लिए रवाना हुए । तब दशरथ ने
मन-ही-मन दुःखी होते हुए सुमंत्र को देखकर कहा—'वह देखो, राम वन जा रहा है,
उसके लिए रथ ले जाओ ।'
राजा की आज्ञा मानकर सुमंत्र रथ को लिये राम के पास पहुँचे और भक्ति से
प्रणाम करके बोले--'हे रघुराम, राजा ने यह रथ भेजा है । इस पर आरूढ होकर आप
वन के लिए प्रस्थान कीजिए ।' राजा की आज्ञा को मानकर राम ने सीता को पहले रथ
पर बिठाया, फिर अपने शस्त्रो को रखने के बाद लक्ष्मण के साथ स्वयं भी उस विशाल
रथ पर चढ़कर वन के लिए रवाना हुए ।
नागरिक, वृद्ध, आप्त, मंत्री, स्त्रियाँ, बालक, मित्र, आश्रित, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य
तथा शूद्र अत्यधिक दुःख प्रकट करते हुए रथ के आगे-पीछे तथा दोनो ओर भीड लगाकर
चलने लगे । कुछ लोग मथरा को कोस रहे थे कि उसने इक्ष्वाकु-वंश के गौरव को नष्ट
कर दिया, कुछ कैकेयी की निंदा करते हुए कह रहे थे कि क्या रघुराम को तपस्वी का
१३

८६ रंगनाथ रामायण
रूप देना उचित था, दूसरे कुछ लोग दशरथ पर क्रोध प्रकट करते हुए कह रहे थे कि
राजा का इस प्रकार अपनी पत्नी से भीत होना उचित नहीं था, कुछ लोग दुखी होकर
कह रहे थे कि आज राम तथा सौमित्र अधिकार-रहित होकर कितने अनाथ हो गये ?
ऐसे भी लोग थे, जो कह रहे थे कि प्राप्त होनेवाले साम्राज्य का भार वहन किये बिना
व्यर्थ ही ये लोग वन में जा रहे है ? कुछ कह रहे थे, चौदह वर्ष तक ये लोग कैसे
विपत्तियो को झेलते रहेंगे ? कुछ मन-ही-मन सोच रहे थे कि न जाने इस राजकुमारी ने
किस व्रत का अनुष्ठान किया है ? कुछ कह रहे थे कि अत्यंत दुखी होकर राम के
वन चले जाने के पश्चात् बुद्धिमान् भरत कैसे राज्य करेंगे ? कुछ सीता की प्रशसा कर रहे थे
कि कोमलगात्री भूमि-सुता को पति ने यही (अयोध्या में ही) क्यो नही छोड़ दिया ?
कुछ आश्चर्य कर रहे थे कि ऐसे पुत्र को वन जाते हुए देखकर न जाने कौसल्या कैसे
धैर्य रख सकी ? इस प्रकार, कहते हुए सभी लोग शोक-सतप्त मन-से रथ के पीछे-पीछे
जाने लगे ।
कौसल्या तथा सुमित्रा अत्यंत दुख के प्रवाह में डूबी हुई (उनके पीछे) जा रही थी ।
उनके हाथो का सहारा लिये हुए, झुके हुए, दुख से लडखडाते महाराज दशरथ
रनवास की स्त्रियो के साथ अविरल अश्रु-जल से भरे नेत्रो से, 'हे राम ! हे राम !'
का आर्त्तनाद करते हुए अत पुर से वाहर निकले । तब रवि का प्रकाश मद पड गया और
अधकार चारो ओर से आकाश में व्याप्त होने लगा । अग्नि ने अपना सहज दहन-गुण
त्याग दिया । पृथ्वी में दरारें पड गई । नक्षत्रो का प्रकाश मद पड गया । आकाश में
ग्रह एक दूसरे से टकरा गये । हाथियों का मदजल सूख गया । अश्वो की आँखो से अश्रु
टपकने लगे । छोटे, वडे, वूढे, वच्चे, सभी की विलाप-ध्वनि सारे आकाश में व्याप्त हो गई ।
सुर-लोक की कामिनियो का अत्यधिक आर्त्तनाद नगर-निवासियो को सुनाई पडने लगा ।
तब दशरथ ने अश्रुपूरित नेत्रो से रथ की ओर देखा, मगर उन्हें कुछ भी दृष्टि-
गोचर नही हुआ । तब वे उच्च स्वर में चिल्लाने लगे--'हे सुमत्र, रथ लौटा लाओ ।
रामचन्द्र का चद्रविव-सदृश मुख एक वार देखने दो ।' इस तरह नगर के बाहर भी शीघ्र
गति से आनेवाले महाराज को देखकर रामचंद्र सुमंत्र से बोले--'वह देखो, सूर्यवंशाधिप
आ रहे है । रथ की गति तीव्र कर दो । शीघ्रता करो ।'
उनकी आज्ञा के अनुसार सुमंत्र ने रथ की गति तीव्र कर दी। तब वसिष्ठ राजा से
मन-ही-मन दुखी होते हुए बोले--'हे अनघ, इस प्रकार दुखी होकर तुम्हें
(अपनी सतान को) भेजना नही चाहिए । यहाँ से अब तुम लौट चलो ।' तब दशरथ
रुक गये और अपने पुत्र के रथ की ओर अपलक-दृष्टि से देखते रहे । जब वे आँखो से
ओझल हो गये, तब उस रथ की धूलि की ओर देखते रहे । जब वह भी दिखाई नही पडी
तब वे ऊँचे स्वर में--'हा राम ! हा राम !' का आर्त्तनाद करते हुए पृथ्वी पर गिर-
कर लोटने लगे ।
जब उनकी मूर्च्छा छूटी, तब वे अत्यंत क्रोध-भरी दृष्टि से कैकेयी को देखकर बोले--
'तुम्हारी पाप-मंत्रणा से अनभिज्ञ होकर मैं अपने पुत्र-रत्न को खो बैठा । तुम्हारे साथ

-रात्रि के समय सुमंत्र से प्रजा को भुलावा देकर वहाँ से चल देने`

  • न देखकर, राम ने अर्द्ध-रात्रि के समय (अर्द्ध-रात्रि)
  • सुमंत्र से प्रजा को भुलावा देकर वहाँ से चल देने

Line 35:

  • की बात उन्हें समझाकर कहा कि रथ तैयार करके ले आओ । रथ के आते ही उन्होंने
    • की बात उन्हें समझाकर कहा कि रथ तैयार करके ले आओ । (wait, is it तैयार? Look at L35: रथ तैयार - wait! Is it तैयार or तैयार? Look at the matra on त: it's ऐ matra, but look at the letter: तै with dot? No, wait! रथ तैयार vs रथ तैयार? Look at नैयार: wait, is the first letter त or न? Look at L35: रथ नैयार करके? Wait, let's look at तैयार: the letter is नै! No, wait, look at न in उन्होंने: it has a loop. Look at त in बात: it curves down. In रथ ... करके ले आओ: the letter has a loop! It looks like तैयार where the top loop of त is closed, or is it a typo नैयार? Wait, look at तैयार vs `नैयार

१०० रंगनाथ रामायण
कराया और तृण तथा शिला-आवृत भूमि पर अत्यत वेग से उसे चलाने का आदेश दिया ।
उनका गमन तथा महाराज के आदेश की कथा सुनकर मार्ग के ग्राम-वासी अत्यत दु खी
हुए और धैर्य तजकर रुदन करने लगे । ऐसे कितने ही ग्रामवासियों का रुदन वार-वार
सुनते हुए मार्ग के विविध वन-दृश्यों को सीता को दिखाते हुए, प्राचीन काल में सूर्य-वश-
मणि इक्ष्वाकु को मनु के द्वारा दी हुई भूमि का अवलोकन करते हुए अत्यत शीघ्र गति से
उन्होने सरयू नदी¹ को पार किया और दूसरे दिन सध्या तक गगा नदी के तट पर
पहुँच गये । वहाँ पहुँचकर उन्होने एक इगुदी-वृक्ष के नीचे बडी शान्ति के साथ विश्राम किया ।
वहाँ, तमसा नदी के तट पर अयोध्या की प्रजा ने प्रभात के समय उठकर चारो
ओर देखा, तो वे सभ्रमित तथा आश्चर्य-चकित रह गये । वहाँ न राम-लक्ष्मण थे, न रथ
का कही पता था । उनके शोक की सीमा नही रही । रथ के पहियो के चिह्न देखकर
उन्होने सोचा कि कदाचित् महाराज की आज्ञा पाकर राम राज्य-भार को वहन करने
अयोध्या लौट गये हैं । वे अयोध्या को लौट आये, किन्तु वहाँ भी राम को न देखकर वे
शोकाग्नि में तपने लगे और कहने लगे—‘हाय ! राम हमें भुलावा देकर चले गये ! ’
वे राम की दयालुता, उनकी सत्यनिष्ठा तथा सद्व्यवहार की प्रशसा करते हुए उनके वियोग
में दु ख का अनुभव करने लगे ।
१५. गुह से राम की भेंट
निषादराज गुह को जब यह समाचार मिला कि राघव गगा-तट पर ठहरे हुए हैं,
तब वह राम-लक्ष्मण की सेवा में कदमूल-फल आदि खाद्य पदार्थ, सुनहले वस्त्र तथा
विविध उपहार लेकर आया और बडी भक्ति से उन्हें प्रणाम करके सब वस्तुओ को उनके
चरणो में अर्पित करके कहा—‘हे देव, क्या कारण है कि आप राज-पाट छोडकर वनवास
के लिए पधारे हैं ? हे सूर्य-वश-तिलक, मेरे जैसे सेवक के रहते हुए आपकी ऐसी दशा क्यो ?
जिस दुष्ट ने आपकी यह दशा कर दी है, उस नीच का मैं युद्ध में वध कर डालूँगा ।’
उसकी सद्भक्ति, शक्ति तथा धीर वचनो को सुनकर राघव अत्यत प्रसन्न हुए और
उसे गले से लगाकर अपना सारा वृत्तात कह सुनाया । सारी कथा सुनने के पश्चात्
गुह मन-ही-मन चितित हुआ और कैकेयी की करतूत पर दुःख प्रकट करने लगा । उसने
दशरथ की सरलता पर खेद प्रकट किया और दशरथात्मजो की दुर्दशा का विचार करके
शोक-पीडित हुआ । राम अत्यत स्नेहातुर हुए और आप तथा लक्ष्मण दोनो ने उचित रीति
से गुह के दु ख का शमन किया ।
इतने में सूर्यास्त हो गया । राजकुमारो ने सध्या-वंदन आदि से निवृत्त होकर गगा-
जल से अपनी क्षुधा शात की । उसके पश्चात् राम, जानकी तथा लक्ष्मण तृण-शय्या पर
विश्राम करने लगे । सूत (सुमन्त्र) तथा शृगवेरपुर का स्वामी गुह उनकी सेवा में लगे रहे ।
१ सरयू नदी तो अयोध्या से उत्तर होकर बहती है और फिर विहार में प्रवेश
करती है । राम दक्षिण की ओर चले थे, उन्हें सरयू नदी कैसे मिलती ? वाल्मीकि ने
गंगा के निकट पहुँचने के पहले राम को वेदश्रुति और गोमती नदी को पार
उतरवाया है ।—सम्पादक

लक्ष्मण ने चौदह वर्ष तक अपने भाई की रक्षा में सलग्न रहने के उद्देश्य से दिन-
रात कभी नहीं सोने की प्रतिज्ञा की और धनुष-बाण धारण किये अपने भाई की शय्या से
थोड़ी दूर पर खड़े हो गये। उस रात को निद्रा देवी स्त्री का रूप धारण करके आईं
और लक्ष्मण से बोली—'हे मानधनी, में निद्रादेवी हूँ। विधि के निर्देश का पालन तो मुझे करना ही
होगा। आप मेरे लिए क्या व्यवस्था देते हैं, जिससे मैं आपको छोड़कर चली जाऊँ ?'
तब लक्ष्मण बोले—'तुम दिन-रात ऊर्मिला पर हावी होकर रहो। अवधि पूरा
करके मैं तुम्हें ग्रहण करूँगा।' उनका आदेश शिरोधार्य करके निद्रा चली गई और लक्ष्मण
भी निद्रा देवी की कृपा प्राप्त करके संतुष्ट हो गये।
इसके पश्चात् लक्ष्मण ने सुकुमार यौवन-शोभा-सपन्न तथा धीरचेता राम एवं
सीता के दुख का वृत्तांत गुह को कह सुनाया और कहा—'हंस-तूलिका-तल्प (हंसों के
पंखों से बनाई हुई कोमल गद्दी) पर शयन करनेवाले (भोगी) आज खुरदरे पत्थरों पर
बिछी पल्लव-शय्या पर पत्थरों के चुभते रहने से परेशान होते हुए किसी तरह गाढ निद्रा
में खर्राटे भर रहे हैं।' इसके पश्चात् उन्होंने गुह को माता कौसल्या और सुमित्रा के
शोक का वृत्तांत सुनाया और दोनों अत्यंत शोकमग्न हो गये।
इतने में अरुणोदय हुआ। राघव ने निष्ठा से प्रातःकाल के सब विधि-विधान
पूरा किये। उसके पश्चात् उन्होंने गुह के द्वारा वट का दूध मँगाया, लक्ष्मण तथा अपने
कोमल तथा दीर्घ केश खोलकर उन्हें उस दूध से जहाँ-तहाँ भिगोकर उनकी जटाएँ बनाईं।
वैदेही विवश तथा क्षुब्ध हो देखती रही। फिर अनुज के साथ राम ने बड़ी निष्ठा से वैखानस-
वृत्ति (वानप्रस्थ की एक शाखा) ग्रहण की।
तत्पश्चात् राम ने सुमंत्र को पास बुलाकर कहा—'हे सुमंत्र अब हमें रथ पर चढ़ना
नहीं चाहिए। अतः, तुम रथ को लेकर अयोध्या को लौट जाओ और राजा की सेवा में
प्रवृत्त हो जाओ। महाराज को तथा माताओं को हमारे प्रणाम कहना। तब सौमित्र ने
क्रोध से कहा—'अब भी ऐसी बातें क्यों ? (शान्तिपूर्ण वचन क्यों ?) उनमें मेरी ओर
से कहना कि अपनी स्त्री की प्रेरणा से उन्होंने नीति-भ्रष्ट होकर, किसी बात का विचार
किये बिना ही हमारी ऐसी दशा कर दी। अब वे अपनी स्त्री तथा प्रिय पुत्र के साथ
राज-भोग का अनुभव करें। अब तुम जा सकते हो।' लक्ष्मण की बातों से अप्रसन्न होकर
राम ने कहा—'सौमित्र, तुम अपनी बातें बन्द करो।' और, सुमंत्र को संबोधित करके
कहा—'तुम ये बातें राजा से मत कहना। यदि वे ये बातें सुनेंगे, तो और अधिक दुख से
पीड़ित होंगे।' तब सुमंत्र ने अत्यधिक शोक-संतप्त तथा अत्यंत भीत होकर कहा—
'हे देव, आपको वन में छोड़कर मैं दीन की तरह अयोध्या कैसे जाऊँ ? मैं प्रजा से यह
समाचार कैसे कहूँ ? मैं यह रिक्त रथ किस मुँह से ले जाऊँ ? कौसल्या को मैं कैसे
सांत्वना दूँ ? कैकेयी का मुँह मैं कैसे देखूं ? नहीं, यह मुझसे नहीं हो सकता। मैं भी
आपके साथ चलूँगा।'
तब राम हँसकर बोले—'हमने गंगा पार करके वन में प्रवेश किया है, यह समाचार
तुम जब जाकर कैकेयी से कहोगे, तभी वे उसे सत्य मानेंगी। इसलिए तुम शोक न

करके लौट जाओ। मेरे बदले तुम राजा को बार-बार धैर्य देते हुए, उनकी सेवा करते
रहना।' तब अत्यंत दीन होकर सुमंत्र साकेत नगर के लिए रवाना हुए।
१९. राम का गंगा पार करके वन में प्रवेश करना
राघव ने बड़ी भक्ति के साथ मन-ही-मन अयोध्या नगर को प्रणाम किया और गुह
की लाई हुई नाव में बैठकर गंगा पार करने लगे। बीच धारा में पहुँचने पर सीता ने
गंगा नदी को भक्ति के साथ हाथ जोड़कर प्रणाम किया और अत्यंत विनीत भाव से
प्रार्थना करने लगीं—'हे माता गंगे ! दशरथ नृप की आज्ञा से राज त्यागकर दुर्दशा को
प्राप्त मेरे पति घोर कानन में चौदह वर्ष तक निवास करने जा रहे हैं। मैं उनके साथ
भ्रमण करती हुई (अवधि-समाप्ति पर) यदि राम-लक्ष्मण के साथ सकुशल लौट आऊँगी,
तो आपकी सेवा में असंख्य गायें, वस्त्र, मिष्टान्न आदि विविध चढ़ावे समर्पित करूँगी और
भूसुरों को दान दूँगी।' इस प्रकार उन्होंने भव-भंग (संसार के पापों का नाश करनेवाली)
धवलांग (धवल शरीरवाली) भवमौलिसंग (शिव के जटाजूट में निवास करनेवाली)
गंगा की प्रार्थना की।
गंगा नदी पार करने के पश्चात् राम ने गुह का आभार मानकर उसे विदा किया
और उसके बताये हुए मार्ग से सीता को बीच में करके आगे-आगे लक्ष्मण तथा पीछे-पीछे
स्वयं चलने लगे। इस प्रकार तीन योजन का मार्ग तय करके सुधर्मद नामक सरोवर के
निकट पहुँचकर उस दिन वहीं ठहर गये। उस भयंकर कानन में अकेली सीता को सोती
हुई देखकर, अपनी दशा, अपनी माताओं का शोक कैकेयी की इच्छा की पूर्ति, महाराज की
सत्य-निष्ठा, प्रजा का दुःख—इन सब के बारे में अपने अनुज से कहते हुए रामचन्द्र की
आँखों में अश्रु बहने लगे।
रात्रि व्यतीत हुई। प्रभात- होते ही राघव वहाँ से रवाना हुए और तीन योजन
चलकर पवित्र गंगा तथा यमुना के संगम-स्थल पर प्रयाग पहुँचे। वहाँ निवास करनेवाले
मुनिलोक-वंद्य भरद्वाज मुनि को देखकर राम ने उन्हें प्रणाम किया और सारा समाचार उनसे
निवेदन किया। उस तपोधन ने रघुवंशज उन दोनों भाइयों को आशीर्वाद दिये, रघुराम
की सुशीलता पर आश्चर्य प्रकट किया और तथ्य को जान गये। उन्होंने कंद-मूल-फल
आदि से उन्हें संतुष्ट करके बड़े प्रेम से उनका सत्कार किया। वहाँ उन्होंने बड़े आराम
से रात बिताई और प्रातःकाल ही बड़ी निष्ठा से संध्योपासना करके मुनियों के आशीर्वाद
प्राप्त किये। इसके पश्चात् पुण्यात्मा भरद्वाज से अनुपम चित्रकूट पर्वत का मार्ग जानकर
वे वहाँ से विदा हुए। वन के बीच राम अपने धनुष की टंकार-मात्र सुनकर भागनेवाले
मृग-समूहों को सीता को दिखाते हुए उनका मनोरंजन करते जाते थे। जब वे थक जाते
या सीता थक जाती थीं, तो थोड़ी देर के लिए ठहर जाते और फिर चल पड़ते। इस
प्रकार कई दुर्गम स्थलों को पार करके वे यमुना के तट पर पहुँच गये। यमुना को पार
करते ही उन्होंने सिद्ध-वटवृक्ष (अक्षय वट) को देखा। सीता ने बड़ी भक्ति से अपनी
कार्यसिद्धि-हेतु हाथ जोड़कर उस वृक्ष की प्रार्थना की। वे उस रात को वहीं ठहर गये।
और, दूसरे दिन घोर जंगलों में सुरक्षित मार्ग से होते हुए उन्होंने माल्यवती से घिरकर,

अयोध्याकांड १०३
श्रेष्ठ सयमी मुनियो के निवास-स्थान से होते हुए सुललित तरु-लताओ के समूह से भरे
चित्रकूट को देखा । उस पर्वत पर निवास करनेवाले तपोधन मुनियो को देखकर उन्होने
प्रणाम किया और उनसे उचित आदर-सत्कार प्राप्त किया । फिर, उनकी आज्ञा प्राप्त
करके गम और उनके अनुज दोनो ने एक स्थान पर बडे उत्साह से पेडों की शाखाओ
को काटकर अनोखी पर्णशाला बनाई । एक काले हिरन का वध करके गृह-शान्ति तथा
हवन-आदि विधिवत् पूरा किये । उसके पश्चात् राम और सीता ने उस पर्णशाला की
प्रशंसा करते हुए उसमें प्रवेश किया और मुनियो की प्रशंसा प्राप्त करते हुए उनकी चरित्र-
चर्चाओ में आनंद लेने हुए वहाँ रहने लगे ।
२०. काकासुर-वृत्तांत
एक दिन सीता की जाँघ पर सिर रखे राम सोये हुए थे । सीता भोजन के लिए
कंद-मूल-फल आदि तैयार कर रही थी । तब निर्भय गति से एक दुष्ट कौआ पर्णशाला में
प्रवेश करके उसका नाश करने लगा । सीता ने उसे भगाने का प्रयत्न किया, फिर भी वह
भागा नही । वह इधर-उधर देखकर अंत में सीता के स्तन पर बैठकर चोंच मारने लगा ।
जब रक्त की धारा बहने लगी, तब राम जाग पडे । उस दुष्ट कौए की करतूत पर क्रुद्ध
होकर राम ने उस पर एक बाण चलाया । उसने कौए का पीछा किया । कौआ काँव-काँव
करता हुआ (उस बाण से बचने के लिए) तीनो लोको का चक्कर काटने लगा । मगर कही
कोई रक्षक नही मिला । उसने दिक्पाल, ब्रह्मा तथा शिव की शरण माँगी । किन्तु उन्होने कहा—
'यह श्रीराम का शर है । इसे हम रोक नही सकते ।' तब वह कौआ फिर राम की
शरण में आया । तब अत्यन्त कृपा से उस कौए को देखकर राम ने कहा—'मेरा बाण कभी
खाली नही जायगा । अत तुम अपना कोई अग उसे देकर अपनी जान बचाओ । तब
कौए ने बडी भक्ति से अपनी एक आँख उस अस्त्र को भेंट की और वहाँ से चला गया ।
तब राम ने देवताओ को सीता के तैयार किये हुए फल आदि का भोग चढ़ाया और उसके
पश्चात् सब लोगो ने उन फलो को ग्रहण किया ।
२१. सुमंत्र का अयोध्या पहुँचना
वहाँ सुमंत्र राम की गति-विधि जानने के लिए तीन दिन तक गुह के साथ रहे ।
फिर दूसरे दिन उन्होने घोर दुख से पीडित होते हुए अयोध्या नगर में प्रवेश किया ।
सहज श्री से हीन उस राज-मार्ग में जब वह जाने लगा, तब नगरवासी रथ की ध्वनि
सुनकर यह कहते हुए सुमंत्र के पास आये कि देखो, रामभद्र आ गये हैं । किन्तु रथ में
रघुराम को न देखकर वे सुमंत्र से कहने लगे—'हे क्रूरकर्मी, राम के बिना यह रिक्त
रथ यहाँ क्यो लाये हो ?' इस प्रकार लोगों की भीड एकत्रित होकर उनकी निंदा
करने लगी । सुमंत्र उन्हें रामचन्द्र का वृत्तांत सुनाते हुए राजा के अंत पुर के निकट आ
पहुँचे । वहाँ रथ से उतरकर वे गजा के निवास की ओर गये । उन्होने धूलि-धूसरित
शरीर तथा अश्रु-पूरित नयनों से, मन-ही-मन कुढ़नेवाले राजा को अविगत दुख से अभि-
भूत होकर कौसल्या के घर में पडे और विलाप करते हुए देखा । उन्होने राजा को प्रणाम

१०४ रंगनाथ रामायण
करके कहा—'हे राजन्, आपके पुत्र-रत्न सत्यनिष्ठ राम तथा लक्ष्मण, दोनो ने जटाएँ
धारण किये, गंगा को पार किया और पैदल चित्रकूट पर्वत की ओर चले गये हैं ।'
इन वचनों को सुनकर राजा अत्यधिक शोक करने लगे । उन्होंने सुमंत्र को अपने
निकट बुलाकर अपने पुत्र का समाचार विस्तार-पूर्वक जान लिया और उसके पश्चात्
बोले—'हे अनघ, सुमंत्र, हे मतिमान्, तुम्हारे कारण मैं अपने रामभद्र का कुशल-समाचार
जान पाया । नेत्रों का दुःख तथा मन का शोक दूर करनेवाले उसे (राम को) जी भरकर
देखे बिना मेरे ये प्राण शरीर में रहते नहीं दीखते । तुम मुझे राम के पास
ले चलो ।' तब सुमंत्र बोले—'राजन्, यदि आप श्रीराम के पीछे जायेंगे, तो प्रजा को दुख होगा
और कैकेयी आपकी निंदा करेंगी । अत यह आपके लिए उचित नही है ।' हे
मानवेंद्र, आप इतना दुःख मत कीजिए, धैर्य धारण कर धर्म का पालन करते हुए पुण्यवान्
बनिए । समस्त दुःख भूलकर बिना किसी अभाव का अनुभव किये आपके पुत्र कानन में
सुख-पूर्वक रहते हैं ।'
इसके पश्चात् सुमंत्र ने लक्ष्मण के वचन राजा को सुनाये, तो राजा अत्यधिक ग्लानि
का अनुभव करते हुए बोले—'सौमित्र के वचन सत्य हैं । मैं वैसा ही कामांध हूँ । क्रूर-
कर्मी तथा पापी हूँ ।' इस प्रकार कहते हुए राजा ने सुमंत्र को भेज दिया और स्वयं मन-
ही-मन कुढ़ने लगे । उन्हें देखकर कौसल्या बोलीं—'हे राजन्, अब 'हे राम, हे राम, का
आर्त्तनाद करते हुए चिंतित क्यों हो रहे हैं ? क्यों ऐसा स्वांग भरते हैं ? इस तरह शोक
का अभिनय क्यों कर रहे हैं ? क्या मैं सब बातें नहीं जानती ? लोक-निंदा के भय से
आपने स्वयं कैकेयी को सारी बातें सिखा दी थीं । फिर अपने राम का राज-तिलक करके
उसे समस्त पृथ्वी का पालन कराऊँगा, ऐसी घोषणा करके आपने उसे वन भेज दिया है ।
आप महादुष्ट हैं । आप का भी कोई धर्म है ? निंदा के भय से आपने मेरे पुत्र का राज-तिलक
रोकने के लिए उसे वन भेज दिया है । निस्संकोच होकर यदि कैकेयी राम का वध
करने के लिए भी कहे, तो आप उसका वध भी कर देंगे । बहुत समय तक संतानहीन
होकर मैं दुःखी रहती थी । निदान कितने ही जप-तप और व्रतों के उपरांत मैंने इस इकलौते
पुत्र को प्राप्त किया था और इससे मेरा चित्त कुछ शांत हुआ था । आपने मुझे शांत
रहने भी नही दिया ।'
इस प्रकार निंदा करनेवाली कौसल्या को देखकर राजा अपनी पूर्व-कथा उन्हें
सुनाने का विचार करके बोले—'हे कौसल्ये ! तुम जो कुछ कह रही हो वह सत्य ही है ।
मैं निश्चय ही पापकर्मी हूँ । अब बहुत समय तक मेरे शरीर में प्राण नहीं रहेंगे, इसलिए
चिढ़ा-चिढ़ाकर मुझे मत मारो । मैंने जो पाप-कर्म पहले किये थे, वे वैसे ही नहीं टलेंगे ।
देवताओं को भी अपने कर्म का फल अवश्य भोगना ही पड़ता है । मैं अपनी एक कथा
सुनाऊँगा । तुम उसे सुनो ।'
२३. दशरथ का कौसल्या को अपने शाप का वृत्तांत सुनाना
“यह मेरी युवावस्था की बात है । मैं सारे राज्य पर शासन करता था । एक दिन
अर्धरात्रि के समय मैं मृगया की इच्छा से धनुष-बाण लिये सरयू नदी के किसी अनुपम

.घाट के निकट झाड़ियो में छिपा बैठा था । विविध मृग-समूहो के पानी पीने का शब्द
मुझे सुनाई पडने लगा । जैसे-जैसे शब्द सुनाई पडने लगा, वैसे-वैसे मैने शब्दवेधी वाण
चलाकर उनका वध कर डाला । मै इससे सतुष्ट न होकर वही ताक में बैठा रहा । उस
समय यज्ञदत्त नामक एक मुनि-पुत्र वहाँ आया और अपना जल-कलश पानी में डुबोया ।
कलश के डूबने से जो 'गट्गट्' की ध्वनि सुनाई पडी, उसे सुनकर मुझे भ्रम हुआ कि वह
कोई मत्त गज है । तुरन्त मैने (शब्दवेधी) वाण चलाया । उस तीव्र शर के लगते ही—
'हे पिता, हे माता, का आत्तंनाद मेरे हृदय को चीरकर निकल गया । वह मुनि-पुत्र पृथ्वी
पर गिरकर कहने लगा—'हाय, मै वनो में कन्द-मूल-फल खाते हुए तपस्वी का जीवन
व्यतीत करते, अपने माता-पिता की सेवा करता रहता हूँ । मैने किसी का अहित
नही चाहा । मुझे ऐसी घोर मृत्यु क्योकर प्राप्त हुई ? कोई पापी रात के समय, रति-
केलि में प्रवृत्त मृगो का वध नही करता । कौन है वह मदान्ध, जिसने अर्द्ध-रात्रि के समय
मुझपर बाण चलाया है । न जाने उसकी क्या दुर्गति होगी ? अब मेरी मृत्यु को वह
कैसे रोक सकेगा ? हाय मेरे अंधे, दीन तथा वृद्ध माता-पिता इस पुत्र-शोक को कैसे
सह सकेंगे ? 'रात अधिक बीत गई है, अकेले गया हुआ है, उसके आने में इतना विलम्ब क्यो
हो रहा है'—ऐसे सोचती हुई न जाने मेरी माता कितना दुख करती रहेगी ? मेरे पिता
मेरे नही लौटने का समाचार मेरी माता से कहकर न जाने शकाकुल मन से कितने व्याकुल
होते होगे ? वे सोचते होगे कि बाल-सुलभ-कौतुक में व्यस्त, हमारा पुत्र अभी तक लौटा
नही है । या सोचते होगे कि शायद जल लाने में असमर्थ होकर वह वही रह गया है ।
यदि वे मेरी मृत्यु का समाचार सुन लें, तो न जाने उनकी क्या दशा होगी ? उन्हें कौन
जल ले जाकर देगा ? उनकी रक्षा आगे कौन करेगा ? हाय, इस एक शर से हम
तीनो की मृत्यु एक साथ हो गई । विधि के क्रूर विधान को मै क्या दोष दूँ ?'

“उस मुनि-पुत्र का आर्त्तनाद सुनकर मैं अत्यत क्षोभ-युक्त हो, उस महापुरुष को
देखने की तीव्र उत्कण्ठा लिये हुए अधकार के दूर होने की प्रतीक्षा करने लगा। इतने में
उस वनधि (वन) में मेरी शोक-वनधि (शोक-समुद्र) उमडाते हुए चन्द्रोदय हुआ । तब मैने
सरयू नदी को पार किया और उत्तर की दिशा में ढूँढने लगा । वहाँ मैने एक स्थान पर
मुनि-कुमार को अपने हाथ में जल-कलश को नीचे रखकर अपना कपोल कलश के मुंह पर
टेककर पडे हुए पाया । उसके वक्ष तथा पीठ से बहनेवाली रक्त-धाराओ से सारा शरीर
भीग गया था । उसकी शिखा खुल गई थी और अत्यधिक पीडा से उसका मुख कान्ति-
हीन हो गया था । शर के भीतर प्रवेश करने से वह इस प्रकार पडा हुआ था, जैसे कोई
योगी आत्मचिंतन में लीन हो और वह दैहिक व्यापारो को रोक, इंद्रियो की गति का दमन
करके अतिम योग-क्रिया में विस्मृत होकर पडा हो ।

“उस सुंदर आकृतिवाले मुनि-कुमार को तथा अपने बाण को देखकर मै घबडा गया ।
तुरत मैने नदी से जल लाकर उस मुनि-कुमार की आँखे पोछी तथा इसका सारा
शरीर पोंछ डाला और फिर वहने लगा--'हाय मुनिनाथ ! प्रमादवश मेरे शर ने आपका वध
कर डाला। इस नदी में जल के लिए आप क्यो आये ? मै अब इस पाप से कैसे मुक्त होऊँगा?'
१४

१०६ रंगनाथ रामायण
"इस प्रकार मैं अपना दुःख प्रकट कर रहा था कि मुनि-कुमार ने आँखें खोलीं ।
उसने अपनी ओर, फिर मेरी ओर देखा, और मेरे भय को देखकर कहा—'हे राजन् !
आप क्या करेंगे ? आप क्यों दुःखी होते हैं ? मुझे मारने की शक्ति आपमें कहाँ है ?
दैवयोग से ही मेरी ऐसी गति हुई है । इसके लिए आप क्यों शोक करते हैं ? आपने
तो हाथी समझकर बाण चलाया था । जान-बूझकर तो नहीं चलाया । ब्रह्म-हत्या का दोष
भी आपको नहीं लगेगा; क्योंकि मैं ब्राह्मण नहीं हूँ । मैं वैश्य-पिता और शूद्र-माता से उत्पन्न
हुआ हूँ । मेरी मृत्यु देखकर आप विचलित मत होइए । आप मेरे माता-पिता को मेरी
मृत्यु का संवाद न भी दें, तो भी वे योग-दृष्टि से सभी बातें जान लेंगे । तब यदि वे
क्रुद्ध होकर आपको शाप देंगे, तो उसमें रघुकुल का क्षय हो सकता है । हे राजेन्द्र, इस
पहाड़ के निकट पश्चिमी कोने में एक वटवृक्ष है । उसी वटवृक्ष के पास में एक काँवर में
बिठाकर बड़ी श्रद्धा से उनकी सेवा-शुश्रूषा में लगा रहता हूँ । आज रात भी मैं उन्हें
उस वृक्ष के कोटर में बिठाकर आया हूँ । आप शीघ्र इस कलश का जल लेकर वहाँ
जाइए और उन्हें सावधानी से नीचे उतारकर निर्भय होकर उन्हें सारा वृत्तांत सुनाइए ।
हे राजन् ! इस अस्त्र के साथ मेरी मृत्यु अनुचित है । इसलिए धीरे-धीरे यह बाण निकाल
दीजिए । शरीर की पीड़ा अब मुझसे सही नहीं जाती । मेरे प्राण अब नहीं रहेंगे ।'
"मुनि कुमार के इन वचनों को सुनकर मैं धीरे-धीरे उनके निकट पहुँचा । अत्यधिक
आत्म-ग्लानि से पीड़ित होते हुए मैंने उस शर को निकालने के लिए हाथ बढ़ाया, किन्तु
भय से मेरा हाथ रुक गया । फिर साहस बटोरकर काँपते तथा दुःखी होते हुए मैंने उस
शर को निकाल दिया । उसी क्षण मुनिकुमार की मृत्यु हो गई ।
"मन-ही-मन दुःखी होते हुए मैं जल-कलश लेकर मुनि के आश्रम में पहुँच गया और
वहाँ अपने सुत की प्रतीक्षा करते हुए पर-कटे पक्षियों की तरह पड़े हुए वृद्ध तथा अंधे
पुण्यात्माओं को देखा । निकट सुनाई पड़नेवाली आहट सुनकर मुनि कहने लगे—'हे पुत्र,
इस प्रकार कहीं विलम्ब किया जाता है ? मैं तुम्हारी माता के साथ यही सोच रहा था
कि इतना विलंब करने का क्या कारण है ? क्या तुम एक ही स्थान में इतने समय
तक ठहर सकते हो ? तुमने कहाँ इतनी देर लगाई ? तुम्ही तो हमारी आँखें हो ।
हम अत्यंत वृद्धों के लिए तुम्ही आधार हो । हम गतिहीनों के लिए तुम्ही सद्गति हो ।
भला, तुम बोलते क्यों नहीं ? मैंने तुम्हें कहा ही क्या है ? हे पुत्र, मैं तो केवल जल
माँग रहा हूँ ।'
"मुनि के ये वचन मेरे मन के भय और शोक को बढ़ाने लगे । मैंने शीघ्र वृक्ष पर
चढ़कर काँवर नीचे उतारा और अत्यंत दीन होकर थर-थर काँपते हुए, एक क्षण तक इस
दुविधा में पड़ा रहा कि सारा समाचार कहूँ या न कहूँ । फिर यह सोचकर कि किसी
भी तरह मुझे कहना ही पड़ेगा, मैंने गद्गद स्वर से कहा—'हे उत्तम तपस्वी, मैं राजा
दशरथ हूँ । मैं आपका पालक हूँ, पुत्र नहीं हूँ । मैंने आज एक ऐसा नीच कर्म किया है,
जिसे सुनकर नीच व्यक्ति भी मेरी निंदा करेंगे । किसी भी युग में किसी और ने जो पाप
नहीं किया होगा, वैसा पाप करके मैं आज आपके पास आया हूँ । मैं कैसे कहूँ ? विधि ने

अयोध्याकांड १०७

ही मुझसे ऐसा दुस्साहस करने के लिए प्रेरित किया है । सरयू नदी के तट पर में अँधेरी
निशा में मृगया के लिए गया था और मृगों के आने के स्थान के पास छिपकर उनकी
आहट सुनकर उनपर शब्दवेधी बाण चलाकर उनका शिकार करता था । संयोग की बात,
उसी समय आपके पुत्र ने नदी के प्रवाह में जल के लिए कलश डुबोया । उसकी ध्वनि
सुनकर मुझे हाथी का भ्रम हुआ और मैंने बाण चला दिया । हे अनघ, मेरे उस शक्ति-
शाली बाण ने आपके पुत्र के प्राण हर लिये ।'
“इतना सुनना था कि मुनि का हृदय धक् से रह गया और वे मूर्च्छित हो गये ।
मुनि-पत्नी 'हाय पुत्र !' कहकर भूमि पर निश्चेष्ट हो गिर पड़ी । थोड़ी देर के बाद मेरा
विलाप सुनकर उनकी मूर्च्छा छूटी, तो उन्होंने मुझे देखकर कहा—'हे दशरथ ! तुमने हमको
शोकाग्नि में जलाने के लिए हमारे पुत्र को कहाँ छिपा रखा है ? वन में तपस्या करते हुए
हम अंधे तथा वृद्ध को मारकर तुमने घोर पाप किया है । तुम्हारा बाण लगते ही
न जाने हमारे पुत्र ने क्या कहा होगा ? कौन जाने कि उस हृदय-पीडा से उसके प्राण
निकल गये या अभी तक वह तड़प रहा है ? क्या मृत्यु का कोई कारण नहीं होना चाहिए
क्या बाण बिना कारण ही मुनि-पुत्र के प्राण हर सकता है ? वानप्रस्थ-आश्रम में जीवन
व्यतीत करनेवालों का वध, चाहे इन्द्र भी करें, तो उसका भी नाश हो जाता है, तो राजा
की क्या गिनती ? हे राजन्, तुमने अनजान में हमारे पुत्र का वध किया है, इसलिए तुम
पर क्रोध करना उचित नहीं है । अपने पुत्र को देखे बिना हमारी शोकाग्नि शांत नहीं
होगी । हमें अपने पुत्र के पास ले चलो ।'
“इस प्रकार शोक-विह्वल उन वृद्ध तपस्वियों को ले जाकर उन्हें उनके पुत्र को
दिखाकर मैंने कहा—'यही आपका पुत्र है । मुनि-पत्नी हाथों से टटोलते हुए कहने लगी,
'कहाँ है वह दयालु, उदार और विमलचेता ? कहाँ है वह तपोधन तथा पुण्यवान् ?
कहाँ है वह विद्वानों की प्रशंसा के योग्य आचरणवाला ? कहाँ है वह सतत वेदाध्ययन
में तत्पर ?' यों कहती हुई वह अपने पुत्र पर गिरकर विलाप करने लगी । फिर उन्होंने
उसे अपनी गोद में लिटाकर उसके भीगे हुए केशों पर सिर रखकर रोती हुई
कहने लगी—'हे विमलात्मा, हे यज्ञदत्त, हे सदाचरणवाले, हे धर्म-निपुण, तुम हमसे कहे बिना
कभी कहीं नहीं जाते थे । आज तुमने ऐसा क्यों किया ? आज स्वर्गलोक की यात्रा
के लिए जाते समय तुमने मुझसे क्यों नहीं कहा ? हे मेरे वंश-तिलक ! मैं बड़ी पापिनी हूँ ।
अर्द्ध-रात्रि के समय मैंने तुमसे (जल के लिए) जाने को कहा । गुरुजनों की भक्ति
में संसार में अद्वितीय पुत्र को मैंने खो दिया । मेरे लिए अब तपस्या किसलिए ? तुम्हारे
साथ परलोक जाने में ही मेरी सद्गति है । कहाँ तीक्ष्ण बाण और कहाँ तुम्हारे प्राण ?
कहाँ राजा दशरथ और कहाँ तुम ? हाय ! अन्त में तुम्हारे कर्म-फल ने इन सबका
संयोग करके तुम्हारे प्राण ले लिये हैं ।'
“शोक-संतप्त माता के इस तरह के आर्तनाद को सुनकर मुनि अपने पुत्र पर गिरकर
कहने लगे—'हाय पुत्र ! तुम तो मेरे पास आकर मेरी सेवा करते थे । आज मैं तुम्हारे
पास आया हूँ, तो भी तुम मेरी सेवा-शुश्रूषा नहीं करते हो, क्या तुम्हें यह उचित है ?

इस वाण से जो घाव तुम्हें लगा, उसके द्वारा क्या तुम्हारा सारा निर्मल गुण-समूह निकल
गया ? मैं अब किसे वेद पढाऊँगा ? किसे अब शास्त्र समझाऊँगा ? किसे धर्म सुनाऊँगा ?
काव्य किसे समझाऊँगा ? हमारी आवश्यकता पहचानकर हमें कौन फल तथा जल
लाकर देगा ? मैंने सदा तुम्हें चिरायु रहने का ही तो आशीर्वाद दिया है ? कब मैंने वज्रसम
‘शक्तिशाली वाण से तुम्हारी मृत्यु की कल्पना की थी ? हे पुत्र, तुम मुझे भी अपने साथ
ले चलो, तो मैं यम से भी पुत्र-भिक्षा देने की प्रार्थना करूँगा । संसार की यही रीति है
कि पुत्र अपने माता-पिता के परलोक-संबधी क्रिया-कर्म करते है । आज विधि ने उस
क्रम को उलट दिया और तुम्हारे क्रिया-कर्म करने के लिए हमें नियोजित किया । जबतक
तुम रहे, तुमने बड़ी भक्ति से हमारी सेवा करके हमारी रक्षा की । हे पुण्यचरित्र !
मैं किस युग में तुम्हारे जैसा पुत्र प्राप्त करूँगा ? तुम पाप-रहित हो, श्रेष्ठ तपोनिधि हो,
गुरुभक्त, परमार्थी, आर्य, धर्मनिष्ठ, दानी, पर-दुःखनिवारण करनेवाले, अन्न आदि महादान
करनेवाले जो पुण्य लोक प्राप्त करते हैं, वही तुम भी प्राप्त करो ।'
“इस प्रकार शोक करते हुए उन्होंने अपने पुत्र का यथाविधि अग्नि-संस्कार किया ।
यज्ञदत्त ने देवताओ के विमान में आरूढ हो आकाश की ओर प्रस्थान करते हुए कहा—
'हे गृहजनो, मैंने स्वर्गलोक का भोग प्राप्त किया है आपकी सतत सेवा करते हुए पुण्य-
वान् हुआ हूँ । अब मेरी मृत्यु का आप शोक मत कीजिए । जिस समय जो होना चाहिए,
वह हुए बिना नहीं रहता । होनहार होकर ही रहता है । आप इन पर (राजा पर)
क्रोध न कीजिए ।' इस प्रकार कह उसके स्वर्गलोक चले जाने के बाद, उन्होंने पुत्र-प्रेमजन्य
दुःख से प्रेरित होकर मुझे शाप दिया—‘हे राजन् ! लो, हम पुत्र-शोक से मर रहे हैं,
तुम भी हमारे समान ही पुत्र-शोक के कारण मृत्यु को प्राप्त करोगे ।’ इस प्रकार, कहकर
उन्होंने वहीं अपने प्राण छोड़ दिये ।”
२३. दशरथ का स्वर्गवास
'यही मेरा कर्म-फल है, जिसे भोगने का समय आसन्न है । अग्निसम पवित्र उन
तपस्वियो का अग्नि-संस्कार करके मैं नगर में लौट आया । मेरा धैर्य छूट गया है । मेरी
बुद्धि भ्रमित हो रही है, कंठ सूख रहा है, आँखें देखने में असमर्थ हो रही हैं, दूसरे के
शब्द सुनाई नहीं पड़ रहे हैं, अब मेरे प्राण रोकने पर भी इस शरीर में नहीं रुकेंगे ।
मेरे लिए कल्पतरु, बुद्धिमान्, पराक्रमी, गुणवान्, मेरा भाग्य-प्रद, शुभ-गुण-संयुक्त राम को
इस समय मैं नहीं देख पा रहा हूँ । आज सात दिन हुए, मैंने राम को नहीं देखा । राम
को छोड़कर मैं कैसे रह सकता हूँ ?’ इस प्रकार 'हा राम ! हा राम !' का आर्तनाद
करते हुए दशरथ का स्वर्गवास हो गया ।
शोक से अत्यधिक पीड़ित होकर राजा सो गये हैं, ऐसा सोचकर कौसल्या भी
सो गई । प्रभात होते ही बंदी तथा मागध स्तुति-पाठ करने लगे, मंगल-वाद्य बजने लगे और
नगर-निवासी एकत्रित होकर राजा के दर्शनार्थ उत्कंठा से प्रतीक्षा करने लगे । प्रतिदिन
की तरह राजा अबतक जगे क्यों नहीं, यह सोचते हुए परिचारक राजा की शय्या के
निकट गये और राजा को सोई हुई दशा में देख उन्हें कुछ भय हुआ । लंबी साँस भरते हुए

उन्होंने राजा के हाथ-पैर छूकर देखे । उन्हें अब ज्ञात हो गया कि राजा के शरीर में
प्राण नही है । तब वे रुदन करने लगे । कौसल्या हड़बड़ाकर उठी, सुमित्रा भी जागकर आई ।
उन दोनो ने राजा को देखा और ऊँचे स्वर में विलाप करने लगी—'हाय प्राणनाथ,
हाय महाराज ! आप हमें छोड़कर चले गये ।' यह विलाप सुनकर कैकेयी दौड़ी हुई आई ।
दोनो ने सिर पीटते हुए कैकेयी को देखकर कहा--'हाय कैकेयी ! आज तुम्हारी
इच्छाएँ पूरी हुईं । तुमने काकुत्स्थ-वंश का सर्वनाश किया । राम को वन में भेजकर
अपयश का सहन करते हुए तुमने दशरथ के प्राण ले लिये । आज से तुम अपने पुत्र के
साथ समस्त पृथ्वी का उपभोग करो ।'
इस प्रकार, कौसल्या आदि रानियाँ कैकेयी को घेरकर रोने-कलपने लगीं । वह सिर
झुकाये अत्यधिक शोक से अपने पति के शरीर पर गिरकर कई प्रकार से विलाप करने लगी ।
कौसल्या की चेतना जब लौट आई, तब उन्होंने कहा—'हे राजन् ! क्या आप
जैसे धर्मात्मा की ऐसी मृत्यु होनी चाहिए ? आपके आदेश का उल्लघन न करके मैं धोखा
खा गई । आपकी सत्यनिष्टा ने आपकी यह दशा कर दी । अत्यत क्रूर स्त्री कैकेयी को
देखकर और राम के वनवास के दुख से अभिभूत होकर मैं आपकी उचित परिचर्या न
कर सकी । आपकी इच्छा का पालन करते हुए वन में निवास करके राघव महायश का
भागी बना । सत्य का पालन करके आपने स्वर्ग-सुख को प्राप्त किया । अब मुझे केवल
आप जैसे उत्तम पति को कटुवचन सुनाने का पाप मिला ।'
इस प्रकार, कौसल्या को विलाप करते देख सुमित्रा आदि रानियाँ ऊँचे स्वर में रुदन
करने लगीं । बात-की-बात में यह समाचार सारे नगर में फैल गया । स्त्रियों के विलाप
से सारा आकाश गूंजने लगा । सूर्योदय के होते ही अत्यन्त भीत हो राजा के मित्र,
नातेदार, सामंत-राजा, वसिष्ठ आदि मुनि, ब्राह्मण तथा नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति, आकर
शोक व्यक्त करने लगे । वसिष्ठ मुनि मंत्रियों के परामर्श के पश्चात् महाराज दशरथ के
शरीर को तेल में डुबोकर मणिमय सिंहासन पर उसे बैठा दिया, मानो वे दरबार में बैठे
हुए हों । उसके पश्चात् उन्होंने सामंत राजाओं को तथा मंत्री और राजनीतिज्ञों को संबोधित
करते हुए कहा—'महाराज साम्राज्य का पालन करके सुरधाम चले गये । पिता का वचन
पालन करने के लिए राम अपनी स्त्री के साथ वन-वास करने गये । उससे पूर्व ही शत्रुघ्न
के साथ भरत अपने मामा के नगर गये हैं । यदि हम रामचन्द्र को बुला भेजें, तो वे नहीं
आयेंगे । वे अपने प्रण के पालन में पटु हैं । इसलिए हमें राजकाज को संभालने के लिए
भरत को शीघ्र बुलाना चाहिए । राजा के बिना कोई भी देश, नगर या राष्ट्र शोभा
नही देता । दण्डनीति, दान-धर्म आदि की व्यवस्था बिगड़ जायगी । शत्रु प्रबल हो जायेंगे ।
जार-चोर आदि की वृद्धि होगी । दुर्जन सज्जनों को दुख देने लगेंगे । सामंत, दुर्ग-रक्षक
आदि कर नहीं देंगे ।'
ऐसा निश्चय करके उन्होंने धीमान्, जयन्त आदि चार मंत्रियों को बुलाकर कहा—
'तुम लोग भिन्न-भिन्न वस्त्राभरण लिये हुए वज्रपुर जाओ और भरत को यहाँ की घटनाओं
का पता दिये बिना सिर्फ इतना कहो कि गुरु वसिष्ठ ने आपको लिवा लाने के लिए हमें

११० रंगनाथ रामायण
भेजा है । तुम उन्हें अपने साथ अवश्य लिवा लाना, शीघ्र जाओ । वे मंत्री घोड़ों पर सवार हो
रथ की गति से चलने हुए विभिन्न नगरों, जनपदों, नदियों, काननों, पहाड़ों तथा झाड़ियों
को पार करते हुए केकयराज के नगर में जा पहुँचे । दशरथ की मृत्यु के सातवें दिन
रात को वहाँ उन्होंने (भरत और शत्रुघ्न) स्वप्न में देखा कि उनके पिता गोबर तथा
कीचड़ में भरे विशाल गड्ढे में गिर पड़े हैं । समुद्र सूख गया है, चन्द्र पृथ्वी पर गिर गया है,
भद्रगज का एक दाँत टूट गया है । ऐसे दुःस्वप्न देखकर वे जाग पड़े और अत्यंत
भीत होकर अपने इष्ट-मित्रों को स्वप्न का वृत्तांत सुनाकर, उसका फल जानना चाहा ।
इसी समय अयोध्या के दूत वहाँ पहुँचे और भरत को प्रणाम करके साथ लाई हुई भेंट उन्हें
देकर अत्यंत विनीत भाव से बोले—'हे देव, किसी कार्यवश वसिष्ठजी ने आपको शीघ्र
लिवा लाने के लिए हमें भेजा है । अतः आप शीघ्र प्रस्थान कीजिए ।'
दूतों के कृत्रिम हाव-भाव देखकर वे और भी भीत हो गए । उन्होंने अपने
मामा से सारा वृत्तांत कह सुनाया और सादर उनकी आज्ञा प्राप्त करके रथ पर आरूढ़ हो,
मंत्री तथा चतुरंगिणी सेना के साथ चल पड़े । अत्यंत वेग से यात्रा करते हुए वे सात
दिनों में अयोध्या पहुँच गये ।
२४. भरत का अयोध्या में प्रवेश
अयोध्या में प्रवेश करते ही उन्होंने देखा कि सारा नगर पतिहीना पत्नी के समान
तथा चन्द्रहीन रात्रि के समान श्रीहीन होकर उजड़ा हुआ दीख रहा है । यह ढंग देखकर
वे मन-ही-मन व्याकुल होकर सोचने लगे कि आज सारा नगर शून्य-सा लग रहा है ।
नगर-निवासी मुझे देखकर आँखों से आँसू बहा रहे हैं । मुझसे कतराते हुए जा रहे हैं ।
क्या कारण है कि दुकानों में कोई भी चीज सजाकर नहीं रखी गई है ? यों सोचते
हुए अंतःपुर के फाटक पर वे रथ से उतर गये और आप और शत्रुघ्न शून्य-से दीखनेवाले
अंतःपुर में पहुँचे । उनको देखते ही कैकेयी बड़े प्रेम से उनके सामने आई और उन्हें
हृदय से लगा लिया । तब उन्होंने बड़ी भक्ति से उनको प्रणाम किया और अपने मामा
की दी हुई भेंट उन्हें देकर उनका कुशल-समाचार कह सुनाया । उसके उपरांत भरत ने
माता से पूछा—'हे माता, यह कैसा आश्चर्य है कि सारा अंतःपुर वैभवहीन होकर शून्य-सा
लग रहा है । राम-लक्ष्मण और महाराज सकुशल तो हैं ?' तब बहुत चिंतित होती हुई
कैकेयी ने भरत के संभ्रम को बढ़ाती हुई मंद हास के साथ कहा—'हे वत्स, किसी दिन
तुम्हारे पिताजी ने बड़े प्रेम से मुझे दो वर दिये थे । मैंने एक वर से भरत का राज-
तिलक और दूसरे वर से राम के वनवास की प्रार्थना की । पिता की आज्ञा के अनुसार
राम, जानकी-लक्ष्मण-समेत वन-वास के लिए चला गया । पुत्र के वियोग से महाराज
स्वर्ग सिधारे । ईर्ष्यावश मैंने तुम्हारे लिए यह व्यवस्था कर ली । अब राज्य सँभालो, प्रजा
का पालन करो, ऐश्वर्य प्राप्त करो और अपने बाहुबल से राज्य की रक्षा करो । इसके
विपरीत कुछ मत कहो ।'
इन बातों को सुनते ही भरत मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े । थोड़ी देर के
बाद सँभलकर उन्होंने अत्यंत क्रोध से कैकेयी को देखकर कहा—"हे माता ! मेरी माता

होती हुई तुम निर्दयता से ऐसा कठोर आचरण कैसे कर सकी ? राम को मुनि-वेष में
वनवास की आज्ञा तुम कैसे दे सकी ? निर्मल धर्माचरण करनेवाले रघुवंशियो की रीति
तुम्हें क्या मालूम नही है ? मै अपने पिता की मृत्यु पर कैसे शोक कर सकता हूँ ? कौन-
सा मुँह लेकर राम को देख सकता हूँ ? हाय ! न जाने मन-ही-मन राम कितने व्याकुल
हुए होगे ? न जाने लक्ष्मण को कितना क्रोध आया होगा ? वन के लिए जाते समय
सीता ने न जाने मुझे कितने अपशब्द कहे होगे ? कौन जाने, माता कौसल्या की क्या
दशा हुई ? माता सुमित्रा तथा अन्य रानियाँ न जाने कितनी दु खी होती होगी ? इनके
सामने विलाप करने के लिए मै कहाँ योग्य रहा ? मै उनके मन की व्यथा दूर कैसे कर
सकूँगा ? मुझे अब यह नगर किसलिए ? मुझे राजभोग किसलिए ? निश्चय, वन ही
अब मेरे लिए शरण है । घोर पापिनी तुम्हारी माता ने एक राक्षस से तुम्हें जन्म
दिया होगा। तुम महाराज केकय से उत्पन्न पुत्री नही हो । अब मै तुमसे क्या कहूँ ?" इन सब
बातो को आड में खडी छिपकर सुननेवाली मथरा को देखकर लोगो ने कहा--'इसीने
इतने सारे पाप कराये' यह सुनते ही शत्रुघ्न ने उस वृद्ध स्त्री की टाँग पकड़कर एकदम
उसे उठाया और बडे जोर से उसे घुमाकर इस तरह नीचे फेंक दिया कि उसकी कूबट
जाती रही, केश बिखर गये और सभी भूषण तितर-बितर होकर गिर पडे । सभी स्त्रियाँ
देखती रह गई । कैकेयी आदि अन्य रानियाँ भागने लगी । कैकेयी का वध करने के लिए
शत्रुघ्न को जाते हुए देख भरत ने कहा—'इस पापिन को मारकर हम पाप क्यो कमायें ?
रामचन्द्रजी सुनेंगे, तो मातृृहता कहकर हमसे घृणा करेंगे । इसलिए तुम यह काम मत करो ।'

२५ भरत का कौसल्या के घर जाना

वहाँ से निकलकर भरत अनुज के साथ कौसल्या के यहाँ गये और उनके चरणो में
सर नवाकर शोक-सन्तप्त हृदय से दोनो भाई उच्च स्वर से विलाप करने लगे । तब भरत
को देखकर कौसल्या बडे क्रोध से इस प्रकार बोलने लगी—'पति को खोकर, सुत से अलग
रहते हुए अत्यत दुख से पीडित मै रोती हूँ, तो वह स्वाभाविक ही है । तुम क्यो रो रहे हो ?
तुमने जैसा चाहा, तुम्हारी माता ने कर दिया । हे वत्स, अंब तुम राज्य सँभालो ।
यह सुनकर अत्यत भीत हो, हाथ जोडे कौसल्या के पीछे चलते हुए भरत कहने लगे—
'माताजी-यदि मैने मन, वचन तथा कर्म मे श्रीराम का अहित किया हो या पृथ्वी
का पालन करना चाहा हो, कैकेयी के मन की इच्छा मुझे मालूम रही हो, एक भी अहित
मैने सोचा हो, तो मैं उस पापी की गति प्राप्त करूँ, जिसने मद्य पिया हो, निर्धन ब्राह्मण
का वध किया हो, गुरु-पत्नी से व्यभिचार किया हो, युद्ध में अपजय प्राप्त की हो, दुष्टता
से सोना चुराया हो, गाय की हत्या की हो, न्याय-रहित होकर राज्य-पालन किया हो,
बराबर चुगली खाई हो, शरणार्थी को शरण नही दी हो, माता-पिता को अपशब्द कहे हो,
श्रेष्ठ धर्म को बेचा हो, स्वामी से द्रोह किया हो, गुरुजनो को अपशब्द कहे हो, सतत
पापी होकर असत्य कहा हो, दूसरो के धन की इच्छा की हो और पर-स्त्री गमन किया हो ।
मै रामचन्द्रजी का अहित क्यो करूँगा ? मै कहाँ और ये नीच कर्म कहाँ ?' इस
प्रकार विलाप करनेवाले भरत के शोक का आभिप्राय समझकर कौसल्या आत्म-ग्लानि का

अनुभव करती हुई सोचने लगी—'हाय ! मैने ऐसे पुण्य-चरित को क्यो कोसा ?' फिर
उन्होंने भरत तथा शत्रुघ्न को हृदय से लगा लिया और परिताप से विलाप करने लगी ।
तब सयमी वसिष्ठ उन्हें लेकर राजा के अत पुर में गये । वहाँ रत्न-पीठ पर राजा
का शव रखा था । राजा की आँखें बन्द थी, मानो राजा ने यह विचार कर लिया हो कि
यह पापिन कैकेयी का पुत्र है, इसे नही देखना चाहिए । पिता का शव देखकर भरत
मूर्च्छित हो गये । थोडी देर में सँभलकर अत्यधिक पीडित हो आर्तनाद करने लगे—
'हे राजन्, मैं कैकेयराज के यहाँ से अनुपम मणि-भूषण आपके लिए ले आया हूँ । इन्हें
स्वीकार क्यो नही करते ? आप नेरी ओर देखते क्यो नही हैं ? मेरा दोष क्या है ?
पापिन कैकेयी का पुत्र हूँ, क्या इसलिए आप मुझे देखना नहीं चाहते ? हे महाराज !
इस सुमित्रा-पुत्र को तो देखिए । वह दुख से कैसे तडप रहा है। शत्रुघ्न को उठाकर उसके
शरीर पर लगी धूल को आप पोछने क्यो नहीं ? इस पर कृपा कीजिए । इससे बोलिए ।
इसने क्या किया है ? इसे अपने हृदय से लगा लीजिए । आपके सद्गुण, आपकी दया
और आपका स्नेह कहाँ छिप गये हैं। हे पिता, क्या कैकेयी ने आपकी बुद्धि को कलुषित
कर दिया है ? क्या ऐसी मृत्यु ही आपके भाग्य में लिखी थी ? राजाओ की मृत्यु तो
होती ही है, किन्तु ऐसी मृत्यु कही नही होती । मै इन कष्टो से कैसे पार पाऊँगा ?
हाय, में क्या करूँ ?'
इस प्रकार विलपते हुए भरत को देखकर वसिष्ठ ने कहा—'तुम्हारे पिता ने साठ
सहस्र वर्ष तक पृथ्वी पर शासन किया और मनु के धर्म-पथ पर चलते हुए समस्त धर्मों
का पालन किया । अत में तुम जैसे पुत्रो को प्राप्त किया । इसलिए तुम शोक मत करो।
इनकी देह का अग्नि-सस्कार करो ?'
मुनि की आज्ञा शिरोधारण कर भरत ने दूसरे दिन, मुनियो, राजाओ तथा अन्य
महात्माओ को बुलाया । दशरथ के शव को तीर्थ-जलो से स्नान कराया और श्रेष्ठ वस्त्र,
तथा भूषणो से उसे सजाया । वेदोक्त विधि से दान आदि देने के पश्चात् उस शव को
अरथी पर रखा । इसके उपरान्त मन्त्र-पूत अग्नि को लिये हुए वे (भरत) अनुज तथा मुनिजनो के
साथ अरथी के आगे-आगे चलने लगे । अरथी के अगल-बगल में उच्च स्वर में रुदन करती
हुई कौसल्या आदि रानियाँ लड़खडाती हुई चलने लगीं । सरयू के निकट श्मशान में चिता
सजाई गई । उसमें त्रेताग्नियो को प्रतिष्ठित करके वेद-विधि से (भरत ने) महाराज
दशरथ के शव का अग्नि-सस्कार किया, तिलोदक दिया, पिंडदान किया और फिर अत पुर
में लौट आये । उन्होंने बारह दिन तक विधि-युक्त क्रिया करते हुए ब्राह्मणो को दान आदि
देकर सतुष्ट किया ।
अन्त्येष्टि-क्रियाओ की समाप्ति के पश्चात् इक्ष्वाकुओ के कुलगुरु मुनि वसिष्ठ आगे
होने योग्य कार्यों का विचार करके, सामत राजाओ तथा मत्रियो को साथ लिये भानु-सम
उज्ज्वल भरत के निकट पहुँचकर बोले—'हे वत्स, तुम्हारे पिता परलोक सिधार गये हैं।
और तुम्हारे भाई राम वनवास के लिए गये हैं । राज्य में कोई राजा नही-रहे, तो राज-
काज चल नही सकते । प्रजा उच्छृङ्खल हो जायगी, पृथ्वी विचलित होगी और समस्त

धर्मों का पतन हो जायगा, शत्रु प्रबल होगे और वर्णसंकर पैदा होगे । राज्य को राजा-
रहित नही रहना चाहिए । तुम विमलमतिमान् हो, तुम राज्य का भार संभालो ।'
मुनि के उपदेश सुनकर भरत ने हाथ जोडकर कहा—'हे मुनिनाथ, क्या मैं इतना
मूर्ख हूँ कि अपने कुल की रीति न जानूं ? मेरी माता ने मेरे अग्रज को वन भेजकर
मेरे पिता के प्राण ले लिये हैं । क्या यह (दण्ड) मेरे लिए पर्याप्त नही है ? क्या अब
राज्य करने की बात भी में सोचूं ? आप आगे कुछ मत कहिए । मैं कैकेयी का पुत्र हूँ,
इसीलिए तो आप मुझसे ऐसी बातें कहते है । अन्यथा आप मेरे संबंध में ऐसे विचार मन
में नहीं लाते ।' मैं तुरत अपने भाई राम के पास जाऊँगा । उनसे प्रार्थना करके उन्हें
लौटा लाऊँगा और उनका राज-तिलक कराऊँगा । यदि मैं ऐसा नही कर सका, तो जैसे मेरे भाई ने
मुनि-वृत्ति ग्रहण की, वैसे मै भी मुनि-वृत्ति लूंगा । इसके सिवा मेरे लिए और कोई मार्ग नहीं है ।'
२६. भरत का राम के पास जाना
इस प्रकार निश्चय करके भरत ने मन्त्रियों को देखकर कहा—'हमें अपने बड़े भाई
के दर्शनार्थ जाना है । मार्गों को ठीक करो और सभी नगरवासियों को मार्ग में जहाँ-
तहाँ ठहरने के लिए उचित व्यवस्था करके आवश्यक वस्तुओं का संग्रह करो ।' मन्त्रियो ने
उनकी आज्ञा का पालन किया । दूसरे दिन बंदी-मागध, मन्त्री, सुकुमार नर्त्तकी, नट, नौ
सहस्र हाथी, एक लाख अश्व, साठ सहस्र रथ और असंख्य पदचर सेना, सभी नगरवासी
तथा धन एवं रत्नराशियों को साथ लिये वसिष्ठ आदि मुनि, राजा, मन्त्री और प्रतिष्ठित
जनो के संग, भरत, शत्रुघ्न तथा उनकी माताएँ विविध वाहनों पर सवार होकर चले ।
इस प्रकार, चलकर सब गंगातट पर पहुँचे और वहाँ पड़ाव डाला । अत्यन्त बाहुबली
गुह को यह मालूम हुआ कि कैकेयी-पुत्र सेना के साथ राम पर आक्रमण करने के लिए
जा रहे है, तो वह अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और अपने दल-बल-सहित भरत के पास पहुँचकर
बोला—'हे भरत, जब रामचन्द्र आपको अपना सारा राज्य देकर वन में रहते हैं, तब क्या
आपको यह उचित है कि आप अपनी सेना के साथ उनपर आक्रमण करने चलें ? मैं राम
का सेवक हूँ । मैं आपको जाने नहीं दूंगा । मैं आपकी सेना का संहार कर डालूंगा ।
आपसे युद्ध करते हुए मैं मर जाऊँगा । तभी आप राम पर आक्रमण कर सकेंगे ।'
गुह के इन रोषपूर्ण वचनों को सुनकर भरत विमल मन से हँसते हुए बोले—
'हे गुह, मैं परमात्मा रामचन्द्र से प्रार्थना करके उन्हें अयोध्या लौटाकर उनका राज-तिलक
सम्पन्न कराने के उद्देश्य से ही उनकी सेवा में जा रहा हूँ । तुम अपने मन में अन्यथा
समझकर ऐसे वचन मत कहो ।' इस प्रकार कहकर भरत ने गुह को हृदय से लगाया
और उसके मन की राम-भक्ति समझ गये । गुह ने भरत के चरणों पर मस्तक नवाकर
अनुपम वन-वस्तुओं की भेंट की । फिर वह भरत को उस स्थल पर ले गया, जहाँ, पहले
राम गंगातट पर ठहरे थे । भरत ने अपना पड़ाव वही डाल दिया । उसके पश्चात् गुह
उन्हें उस स्थल पर ले गया, जहाँ राम ने जटाएँ धारण की थी । उस स्थल को देखकर
सभी नगरवासी, मुनि, मन्त्री तथा भरत अत्यन्त दुःखी हुए । तब भरत ने अत्यन्त दीन होकर
वट का दूध मँगवाकर अपने भाई शत्रुघ्न के साथ जटाएँ धारण कर लीं ।
१५

दूसर दिन नित्यकर्मों से निवृत्त होकर भरत ने गुह के द्वारा मँगाई गई पाँच सौ
विशाल नावों में चढ़कर माताओं, मुनियों, मन्त्रियों तथा सेना के साथ गंगा नदी पार की ।
वहाँ से गुह को साथ लिये हुए, उसके बताये मार्ग पर चलते हुए भरद्वाज के उस आश्रम
के पास पहुँचे, जहाँ से निकलनेवाले यज्ञ-धूम से सारा आकाश व्याप्त होकर बादलों का
भ्रम उत्पन्न कर रहा था तथा जिन्हें देखकर मोर अपने पंखों को फैलाकर आनंदोन्मत्त हो
नाच रहे थे । उनके पंखों के समूह से सारा आश्रम-स्थल ऐसा दीख रहा था, मानो
विचित्र रत्न-तोरणों से सारा आश्रम अलंकृत किया गया हो ।
२७. भरत का भरद्वाज के आश्रम में पहुँचना
भरत ने अपनी सारी सेना आश्रम से बहुत दूर पर ठहराकर आप स्वयं उस
पुण्यात्मा भरद्वाज मुनि के दर्शनार्थ गये और मुनि को देखकर प्रणाम किया । भरद्वाज
बड़े रुष्ट होकर बोले—'हे भरत जब राम-राघव वन में निवास कर रहे हैं, तब तुम
अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर उनपर आक्रमण करने क्यों जा रहे हो ?' मुनि का क्रोध
समझकर भरत भय तथा विनय के साथ बोले—'हे मुनीश्वर, मैं तो रामचन्द्रजी से राज्य
ग्रहण करने की प्रार्थना करने जा रहा हूँ । दूसरे किसी उद्देश्य से नहीं । आप अन्यथा
न समझें ।'
भरत की बातों से हर्षित होकर भरद्वाज बोले—'हे अनघ, तुम अपनी समस्त सेना
के साथ आज हमारे आश्रम में ठहरकर हमारा सत्कार स्वीकार करो ।' इसके पश्चात्
मुनि ने विश्वकर्मा को बुलाकर कहा—'तुम तुरत एक सुंदर नगर का निर्माण करो, जिसमें
सभी लोगों के लिए उनकी योग्यता के अनुसार निवास रहे । विश्वकर्मा ने तुरत पाँच
योजन विस्तार में एक विशाल नगर बनाया, जो भूमि-देवता के चरण के आभूषण-सा विराज
रहा था । उसमें एक स्वर्णमय राजभवन भी था । उस भवन में श्वेत छत्र-सपन्न
सिंहासन रखा हुआ था और एक रमणीय सभा-भवन भी था । मुनि की आज्ञा से भरत ने
उस राजभवन में प्रवेश किया । वहाँ सिंहासन को देखकर भरत ने उसे राम का सिंहासन
कहकर उसका नमस्कार किया और उसके निकट ही एक पीठ पर आसीन हुए । मुनि की
आज्ञा से किन्नर, गंधर्व तथा खेचर रमणियों ने भरत के सामने आकर नृत्य-गान किया ।
इस प्रकार, मुनि की आज्ञा से सभी निवासों में नृत्य-गीत आदि, पृथ्वी पर जितने मनोरंजन
हो सकते थे, वे सब वहाँ संपन्न हुए । (अयोध्या की) प्रजा ने स्नान आदि से निवृत्त होकर
स्वच्छ वस्त्र पहने, मदार-पुष्प-मालाएँ पहनीं, चंदन का लेप किया और विविध आभूषण
पहने । इसके पश्चात् कामधेनु द्वारा प्रस्तुत किये गये चार प्रकार के भोजन ग्रहण करके
परितृप्त हुए । तब सुरांगनाओं के साथ रति-क्रीड़ाओं में मग्न होते हुए वे अपने जन्म को
सफल मानने लगे । इस प्रकार, मुनि का आश्रम स्वर्ग का भी तिरस्कार करता हुआ-सा
दीखने लगा ।
भरत तथा उनकी सेना ने मुनि भरद्वाज की प्रशंसा करते हुए रात वहीं बिताई ।
प्रातःकाल होते ही उन्होंने देखा कि वहाँ न कोई नगर था, न भवन, न सुरांगनाएँ । भरत
के आश्चर्य की सीमा न रही । वे श्रेष्ठ तपस्वी भरद्वाज के सम्मुख जाकर बोले—

'हे महात्मा, आपके तपोबल की महिमा की प्रशंसा करना ब्रह्मा के लिए भी कठिन है । अब
हम सूर्यवंश-तिलक रघुराम की सेवा में जायेंगे । हमें आज्ञा दें।' यो कहकर भरत ने
अपनी माताओ से मुनि को प्रणाम करवाया । मुनि बोले—'ये कौन-कौन हैं ? अलग-अलग
इनका परिचय मुझे दो ।' तब भरत ने कहा—'हे महात्मा, ये राजा की ज्येष्ठ रानी
सफलजन्मा कौसल्या है, जिन्होंने सब लोगो में कीर्त्ति तथा प्रशंसा पाई है । राम को पुत्र-
रूप में प्राप्त कर अपनी कोख को सफल बनाया है, पर उनके (राम के) वियोग की
अग्नि में तप्त हो रही है । ये लक्ष्मण को जन्म देनेवाली पुण्यशीला सुमित्रा हैं, जो कौसल्या
के बायें हाथ की तरह रहती हैं । पुष्प-रहित कर्णिकार की शाखा के समान अलंकारहीना
होकर राम के वियोग-दुख से दुःखी हैं । ये हतपुण्या मेरी माता कैकेयी हैं, जिनके कारण
मेरे अग्रज वनवास के लिए गये हैं, जिनके कारण मेरे पिता का देहात हुआ और जिनकी
इच्छा ने मेरी ऐसी दुर्गति कर दी है ।' इतना कहकर उमडते हुए शोक मे विह्वल तथा
गद्गद हो वे चुप हो रहे । मुनि ने उन्हें सांत्वना देते हुए आगे के कार्य का विचार करके
कहा—'कैकेयी ने लोकहित किया है । यह तुम लोगो को आगे स्पष्ट होगा ।' इतना
कहकर उन्होने भरत को राम के निवास-स्थान का मार्ग बताया और उन्हें आशीर्वाद देकर
विदा किया ।
भरत ने अत्यंत श्रद्धा मे युक्त हो सेना के साथ चित्रकूट पर्वत की ओर प्रस्थान
किया । हाथियो के चिंघाडने, अश्वो के हिनहिनाने, सेना के वार्त्तालाप करने, तथा रथो के
चलने से जो विपुल रव होता था, उससे भीत होकर जगली मृग चारो दिशाओ में
भागने लगे । विशाल सेना के चलने से उठी हुई धूलि से आवृत होकर सूर्यमडल भी मलिन
दीखने लगा ।
वहाँ चित्रकूट में कुटिल-कुतला सीता के साथ राम बडे आनंद से वार्त्तालाप कर रहे थे ।
सीता का ध्यान पर्वत की शोभा की ओर आकृष्ट करते हुए वे कह रहे थे—
'हे बिंबाधरवाली, देखा तुमने पर्वत की शोभा, हमारे नेत्रो को कितना अपूर्व आनंद पहुँचा रही है ।
इस पर्वत की महिमा का वर्णन करना क्या शेषनाग के लिए भी संभव है ?
निर्झरो की घन गभीर ध्वनियो को मेघ-गर्जन समझकर अत्यंत आनंद से तुम्हारे केश
की समता रखनेवाले अपनी पंखो को फैलाकर नाचनेवाले उन मयूरो को देखो । क्या,
इन भीलनियो को तुमने देखा, जो अपने कुच-कुंभो को गज-कुंभो की समता प्रदान करने
के लिए, गजो के कुभस्थल को चीरकर उसमें से निकले हुए मणियो को धारण कर रखा है।
देवताओ का संकेत-स्थान होने के कारण इस घाटी में दिव्य सुगंधि फैल रही है ।
वहाँ देखो, वह गंधर्वों का क्रीडा-स्थल उनके पदतलो के महावर-वर्ण से प्रकाशमान दीख
रहा है । हे किन्नर-कंठवाली, यह गिरि-गुफा देखो, जो किन्नर-किन्नरियो के संगीत से
मुखरित है । हे कोकिलकंठी, इस सहकार-वृक्ष को देखो, जो कोयल की कलध्वनि तथा
पल्लवो से युक्त है । हे कोमलांगी, मलया निल विभिन्न प्रकार के फूलो की सुगंधि को
एकत्रित करते हुए मद-मद गति से चलकर हम पर अपना प्रभाव डाल रहा है । वहाँ
उस मंदाकिनी को देखो, जो लाल तथा सफेद कमलो के समूह से अलंकृत है, जिसके कूल