रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 143, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंधर्मों का पतन हो जायगा, शत्रु प्रबल होगे और वर्णसंकर पैदा होगे । राज्य को राजा-
रहित नही रहना चाहिए । तुम विमलमतिमान् हो, तुम राज्य का भार संभालो ।'
मुनि के उपदेश सुनकर भरत ने हाथ जोडकर कहा—'हे मुनिनाथ, क्या मैं इतना
मूर्ख हूँ कि अपने कुल की रीति न जानूं ? मेरी माता ने मेरे अग्रज को वन भेजकर
मेरे पिता के प्राण ले लिये हैं । क्या यह (दण्ड) मेरे लिए पर्याप्त नही है ? क्या अब
राज्य करने की बात भी में सोचूं ? आप आगे कुछ मत कहिए । मैं कैकेयी का पुत्र हूँ,
इसीलिए तो आप मुझसे ऐसी बातें कहते है । अन्यथा आप मेरे संबंध में ऐसे विचार मन
में नहीं लाते ।' मैं तुरत अपने भाई राम के पास जाऊँगा । उनसे प्रार्थना करके उन्हें
लौटा लाऊँगा और उनका राज-तिलक कराऊँगा । यदि मैं ऐसा नही कर सका, तो जैसे मेरे भाई ने
मुनि-वृत्ति ग्रहण की, वैसे मै भी मुनि-वृत्ति लूंगा । इसके सिवा मेरे लिए और कोई मार्ग नहीं है ।'
२६. भरत का राम के पास जाना
इस प्रकार निश्चय करके भरत ने मन्त्रियों को देखकर कहा—'हमें अपने बड़े भाई
के दर्शनार्थ जाना है । मार्गों को ठीक करो और सभी नगरवासियों को मार्ग में जहाँ-
तहाँ ठहरने के लिए उचित व्यवस्था करके आवश्यक वस्तुओं का संग्रह करो ।' मन्त्रियो ने
उनकी आज्ञा का पालन किया । दूसरे दिन बंदी-मागध, मन्त्री, सुकुमार नर्त्तकी, नट, नौ
सहस्र हाथी, एक लाख अश्व, साठ सहस्र रथ और असंख्य पदचर सेना, सभी नगरवासी
तथा धन एवं रत्नराशियों को साथ लिये वसिष्ठ आदि मुनि, राजा, मन्त्री और प्रतिष्ठित
जनो के संग, भरत, शत्रुघ्न तथा उनकी माताएँ विविध वाहनों पर सवार होकर चले ।
इस प्रकार, चलकर सब गंगातट पर पहुँचे और वहाँ पड़ाव डाला । अत्यन्त बाहुबली
गुह को यह मालूम हुआ कि कैकेयी-पुत्र सेना के साथ राम पर आक्रमण करने के लिए
जा रहे है, तो वह अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और अपने दल-बल-सहित भरत के पास पहुँचकर
बोला—'हे भरत, जब रामचन्द्र आपको अपना सारा राज्य देकर वन में रहते हैं, तब क्या
आपको यह उचित है कि आप अपनी सेना के साथ उनपर आक्रमण करने चलें ? मैं राम
का सेवक हूँ । मैं आपको जाने नहीं दूंगा । मैं आपकी सेना का संहार कर डालूंगा ।
आपसे युद्ध करते हुए मैं मर जाऊँगा । तभी आप राम पर आक्रमण कर सकेंगे ।'
गुह के इन रोषपूर्ण वचनों को सुनकर भरत विमल मन से हँसते हुए बोले—
'हे गुह, मैं परमात्मा रामचन्द्र से प्रार्थना करके उन्हें अयोध्या लौटाकर उनका राज-तिलक
सम्पन्न कराने के उद्देश्य से ही उनकी सेवा में जा रहा हूँ । तुम अपने मन में अन्यथा
समझकर ऐसे वचन मत कहो ।' इस प्रकार कहकर भरत ने गुह को हृदय से लगाया
और उसके मन की राम-भक्ति समझ गये । गुह ने भरत के चरणों पर मस्तक नवाकर
अनुपम वन-वस्तुओं की भेंट की । फिर वह भरत को उस स्थल पर ले गया, जहाँ, पहले
राम गंगातट पर ठहरे थे । भरत ने अपना पड़ाव वही डाल दिया । उसके पश्चात् गुह
उन्हें उस स्थल पर ले गया, जहाँ राम ने जटाएँ धारण की थी । उस स्थल को देखकर
सभी नगरवासी, मुनि, मन्त्री तथा भरत अत्यन्त दुःखी हुए । तब भरत ने अत्यन्त दीन होकर
वट का दूध मँगवाकर अपने भाई शत्रुघ्न के साथ जटाएँ धारण कर लीं ।
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