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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 141

होती हुई तुम निर्दयता से ऐसा कठोर आचरण कैसे कर सकी ? राम को मुनि-वेष में
वनवास की आज्ञा तुम कैसे दे सकी ? निर्मल धर्माचरण करनेवाले रघुवंशियो की रीति
तुम्हें क्या मालूम नही है ? मै अपने पिता की मृत्यु पर कैसे शोक कर सकता हूँ ? कौन-
सा मुँह लेकर राम को देख सकता हूँ ? हाय ! न जाने मन-ही-मन राम कितने व्याकुल
हुए होगे ? न जाने लक्ष्मण को कितना क्रोध आया होगा ? वन के लिए जाते समय
सीता ने न जाने मुझे कितने अपशब्द कहे होगे ? कौन जाने, माता कौसल्या की क्या
दशा हुई ? माता सुमित्रा तथा अन्य रानियाँ न जाने कितनी दु खी होती होगी ? इनके
सामने विलाप करने के लिए मै कहाँ योग्य रहा ? मै उनके मन की व्यथा दूर कैसे कर
सकूँगा ? मुझे अब यह नगर किसलिए ? मुझे राजभोग किसलिए ? निश्चय, वन ही
अब मेरे लिए शरण है । घोर पापिनी तुम्हारी माता ने एक राक्षस से तुम्हें जन्म
दिया होगा। तुम महाराज केकय से उत्पन्न पुत्री नही हो । अब मै तुमसे क्या कहूँ ?" इन सब
बातो को आड में खडी छिपकर सुननेवाली मथरा को देखकर लोगो ने कहा--'इसीने
इतने सारे पाप कराये' यह सुनते ही शत्रुघ्न ने उस वृद्ध स्त्री की टाँग पकड़कर एकदम
उसे उठाया और बडे जोर से उसे घुमाकर इस तरह नीचे फेंक दिया कि उसकी कूबट
जाती रही, केश बिखर गये और सभी भूषण तितर-बितर होकर गिर पडे । सभी स्त्रियाँ
देखती रह गई । कैकेयी आदि अन्य रानियाँ भागने लगी । कैकेयी का वध करने के लिए
शत्रुघ्न को जाते हुए देख भरत ने कहा—'इस पापिन को मारकर हम पाप क्यो कमायें ?
रामचन्द्रजी सुनेंगे, तो मातृृहता कहकर हमसे घृणा करेंगे । इसलिए तुम यह काम मत करो ।'

२५ भरत का कौसल्या के घर जाना

वहाँ से निकलकर भरत अनुज के साथ कौसल्या के यहाँ गये और उनके चरणो में
सर नवाकर शोक-सन्तप्त हृदय से दोनो भाई उच्च स्वर से विलाप करने लगे । तब भरत
को देखकर कौसल्या बडे क्रोध से इस प्रकार बोलने लगी—'पति को खोकर, सुत से अलग
रहते हुए अत्यत दुख से पीडित मै रोती हूँ, तो वह स्वाभाविक ही है । तुम क्यो रो रहे हो ?
तुमने जैसा चाहा, तुम्हारी माता ने कर दिया । हे वत्स, अंब तुम राज्य सँभालो ।
यह सुनकर अत्यत भीत हो, हाथ जोडे कौसल्या के पीछे चलते हुए भरत कहने लगे—
'माताजी-यदि मैने मन, वचन तथा कर्म मे श्रीराम का अहित किया हो या पृथ्वी
का पालन करना चाहा हो, कैकेयी के मन की इच्छा मुझे मालूम रही हो, एक भी अहित
मैने सोचा हो, तो मैं उस पापी की गति प्राप्त करूँ, जिसने मद्य पिया हो, निर्धन ब्राह्मण
का वध किया हो, गुरु-पत्नी से व्यभिचार किया हो, युद्ध में अपजय प्राप्त की हो, दुष्टता
से सोना चुराया हो, गाय की हत्या की हो, न्याय-रहित होकर राज्य-पालन किया हो,
बराबर चुगली खाई हो, शरणार्थी को शरण नही दी हो, माता-पिता को अपशब्द कहे हो,
श्रेष्ठ धर्म को बेचा हो, स्वामी से द्रोह किया हो, गुरुजनो को अपशब्द कहे हो, सतत
पापी होकर असत्य कहा हो, दूसरो के धन की इच्छा की हो और पर-स्त्री गमन किया हो ।
मै रामचन्द्रजी का अहित क्यो करूँगा ? मै कहाँ और ये नीच कर्म कहाँ ?' इस
प्रकार विलाप करनेवाले भरत के शोक का आभिप्राय समझकर कौसल्या आत्म-ग्लानि का