रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 135, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें.घाट के निकट झाड़ियो में छिपा बैठा था । विविध मृग-समूहो के पानी पीने का शब्द
मुझे सुनाई पडने लगा । जैसे-जैसे शब्द सुनाई पडने लगा, वैसे-वैसे मैने शब्दवेधी वाण
चलाकर उनका वध कर डाला । मै इससे सतुष्ट न होकर वही ताक में बैठा रहा । उस
समय यज्ञदत्त नामक एक मुनि-पुत्र वहाँ आया और अपना जल-कलश पानी में डुबोया ।
कलश के डूबने से जो 'गट्गट्' की ध्वनि सुनाई पडी, उसे सुनकर मुझे भ्रम हुआ कि वह
कोई मत्त गज है । तुरन्त मैने (शब्दवेधी) वाण चलाया । उस तीव्र शर के लगते ही—
'हे पिता, हे माता, का आत्तंनाद मेरे हृदय को चीरकर निकल गया । वह मुनि-पुत्र पृथ्वी
पर गिरकर कहने लगा—'हाय, मै वनो में कन्द-मूल-फल खाते हुए तपस्वी का जीवन
व्यतीत करते, अपने माता-पिता की सेवा करता रहता हूँ । मैने किसी का अहित
नही चाहा । मुझे ऐसी घोर मृत्यु क्योकर प्राप्त हुई ? कोई पापी रात के समय, रति-
केलि में प्रवृत्त मृगो का वध नही करता । कौन है वह मदान्ध, जिसने अर्द्ध-रात्रि के समय
मुझपर बाण चलाया है । न जाने उसकी क्या दुर्गति होगी ? अब मेरी मृत्यु को वह
कैसे रोक सकेगा ? हाय मेरे अंधे, दीन तथा वृद्ध माता-पिता इस पुत्र-शोक को कैसे
सह सकेंगे ? 'रात अधिक बीत गई है, अकेले गया हुआ है, उसके आने में इतना विलम्ब क्यो
हो रहा है'—ऐसे सोचती हुई न जाने मेरी माता कितना दुख करती रहेगी ? मेरे पिता
मेरे नही लौटने का समाचार मेरी माता से कहकर न जाने शकाकुल मन से कितने व्याकुल
होते होगे ? वे सोचते होगे कि बाल-सुलभ-कौतुक में व्यस्त, हमारा पुत्र अभी तक लौटा
नही है । या सोचते होगे कि शायद जल लाने में असमर्थ होकर वह वही रह गया है ।
यदि वे मेरी मृत्यु का समाचार सुन लें, तो न जाने उनकी क्या दशा होगी ? उन्हें कौन
जल ले जाकर देगा ? उनकी रक्षा आगे कौन करेगा ? हाय, इस एक शर से हम
तीनो की मृत्यु एक साथ हो गई । विधि के क्रूर विधान को मै क्या दोष दूँ ?'
“उस मुनि-पुत्र का आर्त्तनाद सुनकर मैं अत्यत क्षोभ-युक्त हो, उस महापुरुष को
देखने की तीव्र उत्कण्ठा लिये हुए अधकार के दूर होने की प्रतीक्षा करने लगा। इतने में
उस वनधि (वन) में मेरी शोक-वनधि (शोक-समुद्र) उमडाते हुए चन्द्रोदय हुआ । तब मैने
सरयू नदी को पार किया और उत्तर की दिशा में ढूँढने लगा । वहाँ मैने एक स्थान पर
मुनि-कुमार को अपने हाथ में जल-कलश को नीचे रखकर अपना कपोल कलश के मुंह पर
टेककर पडे हुए पाया । उसके वक्ष तथा पीठ से बहनेवाली रक्त-धाराओ से सारा शरीर
भीग गया था । उसकी शिखा खुल गई थी और अत्यधिक पीडा से उसका मुख कान्ति-
हीन हो गया था । शर के भीतर प्रवेश करने से वह इस प्रकार पडा हुआ था, जैसे कोई
योगी आत्मचिंतन में लीन हो और वह दैहिक व्यापारो को रोक, इंद्रियो की गति का दमन
करके अतिम योग-क्रिया में विस्मृत होकर पडा हो ।
“उस सुंदर आकृतिवाले मुनि-कुमार को तथा अपने बाण को देखकर मै घबडा गया ।
तुरत मैने नदी से जल लाकर उस मुनि-कुमार की आँखे पोछी तथा इसका सारा
शरीर पोंछ डाला और फिर वहने लगा--'हाय मुनिनाथ ! प्रमादवश मेरे शर ने आपका वध
कर डाला। इस नदी में जल के लिए आप क्यो आये ? मै अब इस पाप से कैसे मुक्त होऊँगा?'
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