रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें८६ रंगनाथ रामायण
रूप देना उचित था, दूसरे कुछ लोग दशरथ पर क्रोध प्रकट करते हुए कह रहे थे कि
राजा का इस प्रकार अपनी पत्नी से भीत होना उचित नहीं था, कुछ लोग दुखी होकर
कह रहे थे कि आज राम तथा सौमित्र अधिकार-रहित होकर कितने अनाथ हो गये ?
ऐसे भी लोग थे, जो कह रहे थे कि प्राप्त होनेवाले साम्राज्य का भार वहन किये बिना
व्यर्थ ही ये लोग वन में जा रहे है ? कुछ कह रहे थे, चौदह वर्ष तक ये लोग कैसे
विपत्तियो को झेलते रहेंगे ? कुछ मन-ही-मन सोच रहे थे कि न जाने इस राजकुमारी ने
किस व्रत का अनुष्ठान किया है ? कुछ कह रहे थे कि अत्यंत दुखी होकर राम के
वन चले जाने के पश्चात् बुद्धिमान् भरत कैसे राज्य करेंगे ? कुछ सीता की प्रशसा कर रहे थे
कि कोमलगात्री भूमि-सुता को पति ने यही (अयोध्या में ही) क्यो नही छोड़ दिया ?
कुछ आश्चर्य कर रहे थे कि ऐसे पुत्र को वन जाते हुए देखकर न जाने कौसल्या कैसे
धैर्य रख सकी ? इस प्रकार, कहते हुए सभी लोग शोक-सतप्त मन-से रथ के पीछे-पीछे
जाने लगे ।
कौसल्या तथा सुमित्रा अत्यंत दुख के प्रवाह में डूबी हुई (उनके पीछे) जा रही थी ।
उनके हाथो का सहारा लिये हुए, झुके हुए, दुख से लडखडाते महाराज दशरथ
रनवास की स्त्रियो के साथ अविरल अश्रु-जल से भरे नेत्रो से, 'हे राम ! हे राम !'
का आर्त्तनाद करते हुए अत पुर से वाहर निकले । तब रवि का प्रकाश मद पड गया और
अधकार चारो ओर से आकाश में व्याप्त होने लगा । अग्नि ने अपना सहज दहन-गुण
त्याग दिया । पृथ्वी में दरारें पड गई । नक्षत्रो का प्रकाश मद पड गया । आकाश में
ग्रह एक दूसरे से टकरा गये । हाथियों का मदजल सूख गया । अश्वो की आँखो से अश्रु
टपकने लगे । छोटे, वडे, वूढे, वच्चे, सभी की विलाप-ध्वनि सारे आकाश में व्याप्त हो गई ।
सुर-लोक की कामिनियो का अत्यधिक आर्त्तनाद नगर-निवासियो को सुनाई पडने लगा ।
तब दशरथ ने अश्रुपूरित नेत्रो से रथ की ओर देखा, मगर उन्हें कुछ भी दृष्टि-
गोचर नही हुआ । तब वे उच्च स्वर में चिल्लाने लगे--'हे सुमत्र, रथ लौटा लाओ ।
रामचन्द्र का चद्रविव-सदृश मुख एक वार देखने दो ।' इस तरह नगर के बाहर भी शीघ्र
गति से आनेवाले महाराज को देखकर रामचंद्र सुमंत्र से बोले--'वह देखो, सूर्यवंशाधिप
आ रहे है । रथ की गति तीव्र कर दो । शीघ्रता करो ।'
उनकी आज्ञा के अनुसार सुमंत्र ने रथ की गति तीव्र कर दी। तब वसिष्ठ राजा से
मन-ही-मन दुखी होते हुए बोले--'हे अनघ, इस प्रकार दुखी होकर तुम्हें
(अपनी सतान को) भेजना नही चाहिए । यहाँ से अब तुम लौट चलो ।' तब दशरथ
रुक गये और अपने पुत्र के रथ की ओर अपलक-दृष्टि से देखते रहे । जब वे आँखो से
ओझल हो गये, तब उस रथ की धूलि की ओर देखते रहे । जब वह भी दिखाई नही पडी
तब वे ऊँचे स्वर में--'हा राम ! हा राम !' का आर्त्तनाद करते हुए पृथ्वी पर गिर-
कर लोटने लगे ।
जब उनकी मूर्च्छा छूटी, तब वे अत्यंत क्रोध-भरी दृष्टि से कैकेयी को देखकर बोले--
'तुम्हारी पाप-मंत्रणा से अनभिज्ञ होकर मैं अपने पुत्र-रत्न को खो बैठा । तुम्हारे साथ