रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 144, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसर दिन नित्यकर्मों से निवृत्त होकर भरत ने गुह के द्वारा मँगाई गई पाँच सौ
विशाल नावों में चढ़कर माताओं, मुनियों, मन्त्रियों तथा सेना के साथ गंगा नदी पार की ।
वहाँ से गुह को साथ लिये हुए, उसके बताये मार्ग पर चलते हुए भरद्वाज के उस आश्रम
के पास पहुँचे, जहाँ से निकलनेवाले यज्ञ-धूम से सारा आकाश व्याप्त होकर बादलों का
भ्रम उत्पन्न कर रहा था तथा जिन्हें देखकर मोर अपने पंखों को फैलाकर आनंदोन्मत्त हो
नाच रहे थे । उनके पंखों के समूह से सारा आश्रम-स्थल ऐसा दीख रहा था, मानो
विचित्र रत्न-तोरणों से सारा आश्रम अलंकृत किया गया हो ।
२७. भरत का भरद्वाज के आश्रम में पहुँचना
भरत ने अपनी सारी सेना आश्रम से बहुत दूर पर ठहराकर आप स्वयं उस
पुण्यात्मा भरद्वाज मुनि के दर्शनार्थ गये और मुनि को देखकर प्रणाम किया । भरद्वाज
बड़े रुष्ट होकर बोले—'हे भरत जब राम-राघव वन में निवास कर रहे हैं, तब तुम
अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर उनपर आक्रमण करने क्यों जा रहे हो ?' मुनि का क्रोध
समझकर भरत भय तथा विनय के साथ बोले—'हे मुनीश्वर, मैं तो रामचन्द्रजी से राज्य
ग्रहण करने की प्रार्थना करने जा रहा हूँ । दूसरे किसी उद्देश्य से नहीं । आप अन्यथा
न समझें ।'
भरत की बातों से हर्षित होकर भरद्वाज बोले—'हे अनघ, तुम अपनी समस्त सेना
के साथ आज हमारे आश्रम में ठहरकर हमारा सत्कार स्वीकार करो ।' इसके पश्चात्
मुनि ने विश्वकर्मा को बुलाकर कहा—'तुम तुरत एक सुंदर नगर का निर्माण करो, जिसमें
सभी लोगों के लिए उनकी योग्यता के अनुसार निवास रहे । विश्वकर्मा ने तुरत पाँच
योजन विस्तार में एक विशाल नगर बनाया, जो भूमि-देवता के चरण के आभूषण-सा विराज
रहा था । उसमें एक स्वर्णमय राजभवन भी था । उस भवन में श्वेत छत्र-सपन्न
सिंहासन रखा हुआ था और एक रमणीय सभा-भवन भी था । मुनि की आज्ञा से भरत ने
उस राजभवन में प्रवेश किया । वहाँ सिंहासन को देखकर भरत ने उसे राम का सिंहासन
कहकर उसका नमस्कार किया और उसके निकट ही एक पीठ पर आसीन हुए । मुनि की
आज्ञा से किन्नर, गंधर्व तथा खेचर रमणियों ने भरत के सामने आकर नृत्य-गान किया ।
इस प्रकार, मुनि की आज्ञा से सभी निवासों में नृत्य-गीत आदि, पृथ्वी पर जितने मनोरंजन
हो सकते थे, वे सब वहाँ संपन्न हुए । (अयोध्या की) प्रजा ने स्नान आदि से निवृत्त होकर
स्वच्छ वस्त्र पहने, मदार-पुष्प-मालाएँ पहनीं, चंदन का लेप किया और विविध आभूषण
पहने । इसके पश्चात् कामधेनु द्वारा प्रस्तुत किये गये चार प्रकार के भोजन ग्रहण करके
परितृप्त हुए । तब सुरांगनाओं के साथ रति-क्रीड़ाओं में मग्न होते हुए वे अपने जन्म को
सफल मानने लगे । इस प्रकार, मुनि का आश्रम स्वर्ग का भी तिरस्कार करता हुआ-सा
दीखने लगा ।
भरत तथा उनकी सेना ने मुनि भरद्वाज की प्रशंसा करते हुए रात वहीं बिताई ।
प्रातःकाल होते ही उन्होंने देखा कि वहाँ न कोई नगर था, न भवन, न सुरांगनाएँ । भरत
के आश्चर्य की सीमा न रही । वे श्रेष्ठ तपस्वी भरद्वाज के सम्मुख जाकर बोले—